सावन सोमवार: शिव भक्ति का अनुपम पर्व, मोक्ष का द्वार
**प्रस्तावना**
हिन्दू धर्म में सावन मास का अपना एक विशेष महत्व है। यह पवित्र मास भगवान शिव को समर्पित है, जब प्रकृति भी शिवमय हो उठती है और चहुँ ओर हरियाली तथा वर्षा की फुहारें मन को शांति प्रदान करती हैं। सावन का प्रत्येक सोमवार, जिसे ‘सावन सोमवार’ कहा जाता है, भगवान शिव के भक्तों के लिए अत्यंत पावन और शुभ माना जाता है। इस दिन भक्तगण श्रद्धापूर्वक व्रत रखते हैं, भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। यह महीना शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है, जहां हर भक्त महादेव की असीम करुणा और प्रेम को अनुभव कर पाता है। सावन सोमवार का व्रत केवल शारीरिक संयम ही नहीं, अपितु मानसिक शुद्धि और आत्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। यह वह समय है जब साधारण जल की बूँद भी भगवान शिव को अर्पित होकर अमृततुल्य हो जाती है, और एक सरल बेलपत्र भी असीमित फल प्रदान करता है। इस अनुपम अवसर पर हम सावन सोमवार के महत्व, उसकी पावन कथा, पूजा विधि और उससे जुड़े लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, ताकि हर शिव भक्त इस पुण्य अवसर का पूर्ण लाभ उठा सके।
**पावन कथा**
सावन सोमवार के पावन महत्व के पीछे कई कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से एक अत्यंत हृदयस्पर्शी कथा देवी पार्वती के घोर तपस्या की है। यह कथा प्रेम, निष्ठा और अटल संकल्प की मिसाल है। प्राचीन काल में, जब देवी सती ने यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया था, तब भगवान शिव अत्यंत विरक्त और वैरागी हो गए थे। वे संसार से विमुख होकर गहन तपस्या में लीन हो गए, जिससे समस्त सृष्टि में हाहाकार मच गया। उस समय तारकासुर नामक राक्षस का आतंक चारों ओर फैल चुका था, जिसे केवल शिव-पुत्र ही मार सकता था। ऐसे में देवताओं ने माता पार्वती को भगवान शिव के प्रति आकर्षित करने का कार्यभार सौंपा।
देवी पार्वती, जो पूर्वजन्म में सती थीं, बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने का संकल्प ले चुकी थीं। उनके पिता पर्वतराज हिमालय ने उन्हें हर प्रकार का सुख और वैभव दिया था, परंतु पार्वती जी का मन तो केवल कैलाशपति महादेव में ही रमा हुआ था। उन्होंने शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या का मार्ग चुना। यह तपस्या कोई साधारण तपस्या नहीं थी। उन्होंने अपने शरीर को विभिन्न प्रकार के कष्ट दिए। उन्होंने पहले तो फल-फूल खाकर तपस्या की, फिर धीरे-धीरे पत्तों का सेवन भी त्याग दिया, जिसके कारण उनका नाम ‘अपर्णा’ पड़ा। वे न केवल गर्मियों की चिलचिलाती धूप में खुले आसमान के नीचे तपस्या करती थीं, बल्कि सर्दियों की कंपकंपाती ठंड में भी जल में रहकर शिव का ध्यान करती थीं। वर्षा ऋतु में वे खुले मैदान में खड़ी होकर वर्षा की धारों को अपने शरीर पर सहती थीं। उनकी यह अविचल तपस्या कई वर्षों तक चलती रही, जिससे तीनों लोक उनके संकल्प से काँप उठे।
देवताओं ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें कई वरदान दिए, लेकिन पार्वती जी का एकमात्र लक्ष्य भगवान शिव को प्राप्त करना था। भगवान शिव उनकी परीक्षा लेने के लिए स्वयं एक ब्रह्मचारी का रूप धारण कर उनके समक्ष प्रकट हुए। ब्रह्मचारी ने पार्वती से कहा, “हे देवी! आप इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हैं? आप तो अत्यंत सुंदर और कोमल हैं। क्या आपको किसी और सुंदर राजकुमार की तलाश नहीं? आप जिस शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं, वे तो एक वैरागी हैं, श्मशान में निवास करते हैं, शरीर पर भस्म लगाते हैं, गले में सर्प धारण करते हैं, और जिनके पास न तो धन है, न ही कोई घर।” ब्रह्मचारी ने शिव की अनेक बुराइयाँ कीं, ताकि पार्वती का मन डिगाया जा सके।
किंतु पार्वती जी ने ब्रह्मचारी की एक भी बात नहीं सुनी। उन्होंने अत्यंत क्रोधित होकर कहा, “हे ब्रह्मचारी! आप भगवान शिव के बारे में कुछ नहीं जानते। वे अनादि, अनंत, परमपिता और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। उनकी महिमा का वर्णन कोई नहीं कर सकता। आप जैसे अज्ञानी उन्हें क्या समझेंगे? मैं उन्हें ही अपने पति के रूप में प्राप्त करूँगी, चाहे इसके लिए मुझे अपने प्राण ही क्यों न त्यागने पड़ें।” पार्वती जी के इस अटल निश्चय और निष्ठा को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और पार्वती जी से कहा, “हे पार्वती! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। आज से तुम मेरी हो। तुमने अपने अटूट प्रेम और विश्वास से मुझे जीत लिया है।”
माना जाता है कि देवी पार्वती ने अपनी इस घोर तपस्या का अधिकांश भाग सावन के महीने में ही किया था और इसी महीने में भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यही कारण है कि सावन का महीना और विशेषकर इसके सोमवार, भगवान शिव और देवी पार्वती के मिलन का प्रतीक माने जाते हैं। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर की प्राप्ति होती है और विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु तथा सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, निष्ठा और धैर्य से किए गए तप का फल अवश्य मिलता है।
**दोहा**
सावन सोमवार पावन मास, शिव शम्भू का ध्यान।
करत भक्तजन व्रत उपवास, पूरन हो कल्याण।।
**चौपाई**
मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी।
दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।।
**पाठ करने की विधि**
सावन सोमवार का व्रत और पूजा अत्यंत सरल परंतु श्रद्धापूर्ण विधि से की जाती है। यहाँ उसकी विस्तृत विधि बताई जा रही है:
1. **प्रातःकाल स्नान और संकल्प:** सोमवार के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में या पूजा स्थल पर बैठें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें कि आप पूरे दिन शिवजी की कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत रखेंगे।
2. **पूजा स्थल की तैयारी:** घर में या मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। यदि शिवलिंग है, तो और भी उत्तम। पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र करें।
3. **जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक:** एक लोटे में शुद्ध जल लें और उसमें थोड़ा गंगाजल मिला लें। यदि संभव हो तो दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत) से शिवलिंग का अभिषेक करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का निरंतर जप करते हुए धीरे-धीरे जलधारा अर्पित करें।
4. **सामग्री अर्पण:** अभिषेक के बाद शिवलिंग को साफ करें और उस पर चंदन या भस्म का त्रिपुंड लगाएँ। फिर बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र, आक के फूल, कनेर के फूल, सफेद फूल, फल और मिठाई अर्पित करें। भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय है, इसलिए कम से कम तीन पत्तों वाला बेलपत्र अवश्य चढ़ाएँ।
5. **दीप प्रज्वलन और धूप:** शुद्ध घी का दीपक जलाएँ और धूपबत्ती अर्पित करें।
6. **मंत्र जप:** शिव चालीसा, शिव तांडव स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र या ‘ॐ नमः शिवाय’ का 108 बार जप करें।
7. **कथा श्रवण/पठन:** सावन सोमवार व्रत की कथा अवश्य पढ़ें या सुनें।
8. **आरती:** अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें।
9. **प्रसाद वितरण:** आरती के बाद भगवान को भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरित करें।
10. **व्रत का पालन:** पूरे दिन निराहार या फलाहार व्रत का पालन करें। शाम को पुनः शिवजी की पूजा करके फलाहार ग्रहण कर सकते हैं। सूर्यास्त के बाद नमक का सेवन वर्जित होता है।
**पाठ के लाभ**
सावन सोमवार का व्रत और पूजा करने से भक्तों को अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जो लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के होते हैं:
1. **मनोकामना पूर्ति:** अविवाहित कन्याओं को उत्तम और सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है। विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु और सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए यह व्रत करती हैं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपतियों को शिवजी की कृपा से संतान सुख मिलता है।
2. **पापों का नाश:** श्रद्धापूर्वक किए गए इस व्रत से सभी प्रकार के ज्ञात-अज्ञात पाप नष्ट होते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की ओर अग्रसर होने का अवसर मिलता है।
3. **रोग मुक्ति और स्वास्थ्य लाभ:** भगवान शिव को मृत्युंजय कहा जाता है। उनके आशीर्वाद से गंभीर बीमारियों से मुक्ति मिलती है और शरीर निरोगी तथा स्वस्थ रहता है।
4. **धन-धान्य की वृद्धि:** जो भक्त सच्ची श्रद्धा से शिवजी का पूजन करते हैं, उनके घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती। उन्हें ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
5. **मानसिक शांति:** शिव पूजा से मन को असीम शांति मिलती है। तनाव, चिंता और भय दूर होते हैं, और व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।
6. **मोक्ष की प्राप्ति:** सावन सोमवार का व्रत आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है और अंततः मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
7. **काल सर्प दोष से मुक्ति:** ज्योतिष के अनुसार, सावन सोमवार पर शिवजी की विशेष पूजा करने से काल सर्प दोष जैसे अनेक ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है।
8. **सभी कष्टों का निवारण:** भगवान शिव ‘भोलेनाथ’ कहलाते हैं क्योंकि वे बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं।
**नियम और सावधानियाँ**
सावन सोमवार का व्रत करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
1. **पवित्रता और स्वच्छता:** व्रत के दौरान शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखें। पूजा से पहले स्नान अवश्य करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर और पूजा स्थल को भी स्वच्छ रखें।
2. **सात्विक आहार:** व्रत के दौरान केवल सात्विक भोजन ग्रहण करें। सेंधा नमक का उपयोग किया जा सकता है, परंतु सामान्य नमक, प्याज, लहसुन, मांसाहार, शराब और तंबाकू का सेवन पूर्णतः वर्जित है। अनाज का सेवन भी नहीं करना चाहिए। फलाहार या दूध, दही आदि का सेवन करें।
3. **ब्रह्मचर्य का पालन:** व्रत के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
4. **क्रोध और हिंसा से बचें:** मन में किसी के प्रति द्वेष, क्रोध या हिंसा का विचार न लाएँ। शांत और संयमित रहें।
5. **नकारात्मक विचारों का त्याग:** व्रत के दौरान नकारात्मक विचारों से दूर रहें और अपना ध्यान पूरी तरह भगवान शिव की भक्ति में लगाएँ।
6. **भगवान शिव का अपमान न करें:** किसी भी परिस्थिति में भगवान शिव, उनके गणों या उनसे जुड़ी किसी भी चीज़ का अपमान न करें।
7. **बड़ों का आदर:** घर के बड़ों, गुरुजनों और सभी जीव-जंतुओं का सम्मान करें।
8. **स्वास्थ्य का ध्यान:** यदि कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी से ग्रस्त है, गर्भवती है या छोटा बच्चा है, तो उसे व्रत अपनी शारीरिक क्षमतानुसार करना चाहिए। ऐसे में केवल फलाहार या एक समय भोजन करके भी व्रत का पालन किया जा सकता है। उपवास के नाम पर शरीर को अत्यधिक कष्ट न दें।
9. **झूठ न बोलें:** व्रत के दौरान झूठ बोलने, चुगली करने या किसी को नीचा दिखाने से बचें।
**निष्कर्ष**
सावन सोमवार का पर्व केवल एक व्रत नहीं, अपितु भगवान शिव के प्रति अगाध श्रद्धा और अटूट विश्वास का प्रतीक है। यह वह अद्वितीय अवसर है जब भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। इस पवित्र मास में की गई थोड़ी सी भी भक्ति, पूजा-अर्चना या व्रत असाधारण फल प्रदान करता है। देवी पार्वती की तपस्या की कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची निष्ठा और अटल संकल्प से असंभव को भी संभव किया जा सकता है। सावन के ये पावन सोमवार हमें अपने आंतरिक शिव से जुड़ने, मन को शुद्ध करने और जीवन में सकारात्मकता लाने का अवसर प्रदान करते हैं। आइए, इस वर्ष सावन सोमवार के पावन पर्व को पूरे हृदय से मनाएँ, भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करें और अपने जीवन को धन्य करें। ‘हर हर महादेव!’ का घोष करते हुए हम सभी अपनी भक्ति को और अधिक प्रगाढ़ करें और महादेव की कृपा से जीवन को सुखमय, शांत और आनंदमय बनाएँ। शिव की महिमा अपरंपार है, उनकी कृपा से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। सावन माह की पवित्रता और शिव की दिव्यता हमारे जीवन में प्रकाश भर दे, यही कामना है।
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