महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की उपासना का महापर्व है। शिव पुराण में वर्णित इस पावन पर्व के गूढ़ रहस्यों, आध्यात्मिक महत्व और विधिपूर्वक पूजन की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें। जानें कैसे शिव पूजन से मिलती है पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति।

महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की उपासना का महापर्व है। शिव पुराण में वर्णित इस पावन पर्व के गूढ़ रहस्यों, आध्यात्मिक महत्व और विधिपूर्वक पूजन की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें। जानें कैसे शिव पूजन से मिलती है पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति।

महाशिवरात्रि: शिव पुराण के रहस्य, महत्व और पूजन विधि का पूर्ण ज्ञान

**प्रस्तावना**
सनातन धर्म में अनेक पर्व मनाए जाते हैं, किंतु उनमें महाशिवरात्रि का पर्व अत्यंत विशेष स्थान रखता है। यह रात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का, उनके भक्तों के लिए आध्यात्मिक उत्थान का और परम मुक्ति की ओर बढ़ने का महापर्व है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली यह रात्रि, शिव तत्व को समझने और उसमें लीन होने का अनुपम अवसर प्रदान करती है। शिव पुराण, भगवान शिव के विराट स्वरूप, उनकी लीलाओं और उनके भक्तों पर होने वाली कृपा का विस्तृत वर्णन करता है। यह पवित्र ग्रंथ महाशिवरात्रि के गूढ़ रहस्यों, इसके आध्यात्मिक महत्व और इसे विधिपूर्वक मनाने की विस्तृत पूजन विधि का संपूर्ण ज्ञान प्रदान करता है। इस पर्व पर शिव पुराण का पाठ, श्रवण या उसके अनुसार पूजन करने से साधक जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। यह केवल एक व्रत या त्योहार नहीं, अपितु आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक महायोग है, जहां हर भक्त शिवमय होकर अनंत शांति और आनंद का अनुभव करता है। आइए, इस परम पावन महाशिवरात्रि के रहस्य, महत्व और पूजन विधि को शिव पुराण के आलोक में विस्तार से जानें।

**पावन कथा**
महाशिवरात्रि के महत्व और उसके पीछे के रहस्यों को समझने के लिए शिव पुराण में वर्णित कई पावन कथाएं सहायक हैं। इनमें से एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा है, भगवान शिव के निराकार ब्रह्म स्वरूप ‘लिंगोद्भव’ की। सृष्टि के प्रारंभ में, जब भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, तब एक विशाल, अनंत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ, जिसका आदि और अंत खोजने में दोनों देव असमर्थ रहे। ब्रह्मा जी हंस का रूप धारण कर ऊपर की ओर उसका अंत खोजने निकले और विष्णु जी वराह का रूप धारण कर नीचे की ओर उसके मूल की तलाश में गए, परंतु हजारों वर्षों तक यात्रा करने के बाद भी वे सफल नहीं हो पाए। अंत में, निराश होकर जब वे वापस लौटे, तब उस ज्योतिर्लिंग से भगवान शिव प्रकट हुए। यह लिंगोद्भव क्षण ही महाशिवरात्रि का उद्भव माना जाता है। इस दिन भगवान शिव ने स्वयं को निराकार ब्रह्म के रूप में प्रकट किया, यह दर्शाते हुए कि वे ही संपूर्ण सृष्टि के मूल हैं और सभी देवताओं में परम श्रेष्ठ हैं। इसलिए, इस दिन शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व है, जो भगवान शिव के अनादि और अनंत स्वरूप का प्रतीक है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कथा एक निषादराज लुब्धक की है, जो शिव पुराण में वर्णित है। लुब्धक एक शिकारी था और अत्यंत क्रूर स्वभाव का था। एक बार वह शिकार की तलाश में वन में भटक रहा था और रात हो गई। एक हिरणी का पीछा करते हुए वह एक पेड़ पर चढ़ गया। वह पेड़ बेल का था। लुब्धक को भूख-प्यास लगी थी और वह डरा हुआ भी था कि कोई हिंसक जानवर आ सकता है। इसलिए वह पूरी रात जागता रहा। हिरणी की प्रतीक्षा करते हुए, वह अनजाने में बेल के पत्ते तोड़कर नीचे गिराता रहा। पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जिसके बारे में लुब्धक को कोई जानकारी नहीं थी। बेल के पत्ते शिवलिंग पर गिरते रहे। लुब्धक ने रात भर कुछ भी खाया-पिया नहीं था, इस प्रकार उसका अनजाने में उपवास हो गया। रात में, जब वह शिकार का इंतजार कर रहा था, उसने अनजाने में ‘ओम नमः शिवाय’ का उच्चारण भी कर लिया, क्योंकि उस पेड़ के नीचे एक ऋषि ध्यान कर रहे थे और उनके मंत्र जाप से लुब्धक के मन में भी यही शब्द गूंजने लगे थे। इस प्रकार, लुब्धक ने अनजाने में ही महाशिवरात्रि का व्रत, रात्रि जागरण, शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना और मंत्र जाप जैसे सभी प्रमुख कार्य संपन्न कर लिए।

सुबह होने पर, जब उसने हिरणी को देखा, तो वह उसे मारने के लिए तैयार हुआ, लेकिन हिरणी ने उससे अपने बच्चों से मिलने का अनुरोध किया और वचन दिया कि वह वापस लौट आएगी। लुब्धक ने उसे जाने दिया। थोड़ी देर बाद, हिरणी अपने बच्चों के साथ वापस आई और लुब्धक से कहा कि वह अपना वचन पूरा करने आई है। लुब्धक, हिरणी के इस सत्य और वचनबद्धता से इतना प्रभावित हुआ कि उसका हृदय परिवर्तन हो गया। उसने शिकार करना छोड़ दिया और दयालु हो गया। उसी क्षण, भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने लुब्धक को दर्शन दिए। शिव जी ने लुब्धक से कहा कि तुमने अनजाने में ही महाशिवरात्रि का व्रत, जागरण और पूजन करके मुझे प्रसन्न कर दिया है। तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो गए हैं और तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। लुब्धक को शिवलोक में स्थान मिला।

यह कथा दर्शाती है कि भगवान शिव कितने भोले और कृपालु हैं। वे केवल भावना और श्रद्धा देखते हैं। यदि कोई अनजाने में भी शिवरात्रि का व्रत, पूजा या जागरण कर ले, तो उसे भी महाकाल की कृपा प्राप्त होती है। इस कथा से यह भी सिद्ध होता है कि महाशिवरात्रि का महत्व केवल विधि-विधान तक सीमित नहीं है, अपितु यह हृदय की शुद्धता, त्याग और भक्ति का पर्व है। इस दिन सच्चे मन से किया गया कोई भी कार्य, चाहे वह अनजाने में ही न हो, शिव कृपा का पात्र बन जाता है। यह शिव पुराण का सार है कि भगवान शिव अत्यंत दयालु हैं और उनके भक्तों को कभी निराश नहीं करते।

**दोहा**
महाशिवरात्रि आई है, शिव शंकर का नाम।
श्रद्धा से जो पूजता, पावे सुखद विराम।।

**चौपाई**
जय जय शिव शम्भू अविनाशी, तुम ही सकल जग के वासी।
भोलेनाथ त्रिलोकी स्वामी, तुम अंतर्यामी शिव नामी।।
डमरूधारी, त्रिशूलधारी, नागेश्वर, भव भय हारी।
बेलपत्र, जलधारा सोहे, हर मन को प्रभु तुम मोहे।।
महाकाल तुम काल के कामी, तुम ही देवों के शिरनामी।
तुम्हरी पूजा जो जन करही, भवसागर से पार उतरही।।
अंधकार में ज्ञान प्रकाशो, हर संकट को प्रभु तुम नाशो।
महाशिवरात्रि पर्व सुहावन, शिव पुराण कहे अति पावन।।
हर हर महादेव!

**पाठ करने की विधि**
महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भगवान शिव की पूजा अर्चना शिव पुराण में वर्णित विधि के अनुसार करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। यह विधि अत्यंत सरल है, परंतु इसे पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ संपन्न करना चाहिए।
सर्वप्रथम, महाशिवरात्रि के दिन प्रातः काल उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें।
उसके बाद, हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर संकल्प लें कि आप महाशिवरात्रि का व्रत और पूजा पूर्ण श्रद्धा के साथ करेंगे। अपने नाम, गोत्र और पूजा के उद्देश्य का उच्चारण करें।
पूजा स्थल पर भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें। यदि घर में शिवलिंग नहीं है, तो मिट्टी का शिवलिंग बनाकर भी पूजा की जा सकती है।
शिवलिंग पर सबसे पहले जल से अभिषेक करें। उसके बाद दूध, दही, घी, शहद और चीनी (पंचामृत) से अभिषेक करें। प्रत्येक अभिषेक के बाद शुद्ध जल से पुनः स्नान कराएं।
अभिषेक करते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करते रहें। यह मंत्र शिवजी को अत्यंत प्रिय है।
पंचामृत अभिषेक के बाद, शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाएं। चंदन शिवजी को शीतलता प्रदान करता है।
फिर बेलपत्र, धतूरा, भांग, आंकड़े के फूल, शमी के पत्ते, कमल पुष्प आदि अर्पित करें। बेलपत्र तीन पत्तियों वाला होना चाहिए और उसे चिकनी तरफ से शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए।
इसके बाद धूप और दीप प्रज्वलित करें। भगवान शिव को नैवेद्य में फल, मिठाई (विशेषकर भांग मिश्रित मिठाई या ठंडाई) और भोग लगाएं। ध्यान रहे, शिवजी को तुलसी और हल्दी नहीं चढ़ाई जाती।
शिव चालीसा, शिव तांडव स्तोत्र और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करें। शिव पुराण की कथाओं का श्रवण या वाचन करें।
रात्रि में जागरण का विशेष महत्व है। रात्रि के चार प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए। प्रत्येक प्रहर की पूजा में अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक का विधान है – पहले प्रहर में जल, दूसरे में दही, तीसरे में घी और चौथे प्रहर में शहद से अभिषेक करें।
अगले दिन प्रातः काल स्नान कर, भगवान शिव को भोग लगाकर और ब्राह्मणों को दान देकर व्रत का पारण करें। पारण करने से पहले शिवजी से अपनी पूजा में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा याचना करें।

**पाठ के लाभ**
महाशिवरात्रि का व्रत और पूजन शिव पुराण की विधि के अनुसार करने से अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जो साधक के लौकिक और पारलौकिक जीवन को धन्य कर देते हैं।
1. **पापों से मुक्ति:** शिव पुराण स्पष्ट कहता है कि महाशिवरात्रि के दिन सच्चे मन से शिव पूजन करने से जन्म-जन्मांतर के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। व्यक्ति समस्त नकारात्मक कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
2. **मोक्ष की प्राप्ति:** यह व्रत मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल और सीधा मार्ग है। जो भक्त शिवरात्रि पर शिवजी की आराधना करते हैं, उन्हें शिवलोक में स्थान मिलता है और वे आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।
3. **रोगों से मुक्ति और दीर्घायु:** महामृत्युंजय मंत्र का जाप और शिव पूजन रोगों से मुक्ति दिलाता है, स्वास्थ्य प्रदान करता है और दीर्घायु प्रदान करता है। भगवान शिव को वैद्यनाथ भी कहा जाता है।
4. **धन-धान्य और समृद्धि:** शिवजी की कृपा से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। दरिद्रता का नाश होता है और आर्थिक परेशानियाँ दूर होती हैं।
5. **मनोकामना पूर्ण:** जो भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, भगवान शिव उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं, चाहे वे भौतिक हों या आध्यात्मिक। अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर की प्राप्ति होती है।
6. **भय मुक्ति:** भगवान शिव स्वयं महाकाल हैं, जो काल का भी नाश करते हैं। उनकी पूजा से सभी प्रकार के भय, शत्रु भय और मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है।
7. **ज्ञान और विवेक की वृद्धि:** शिव पुराण का पाठ और शिव चिंतन मन को एकाग्र करता है, ज्ञान और विवेक में वृद्धि करता है, जिससे जीवन के सही मार्ग का बोध होता है।
8. **पारिवारिक सुख:** यह व्रत परिवार में सामंजस्य, प्रेम और शांति लाता है। दाम्पत्य जीवन में मधुरता आती है।
इस प्रकार, महाशिवरात्रि का पूजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु आत्मिक उन्नति, पापों से मुक्ति और परम सुख की प्राप्ति का महामार्ग है।

**नियम और सावधानियाँ**
महाशिवरात्रि के व्रत और पूजन में कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
1. **पवित्रता:** व्रत के दौरान शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखें। किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्य, झूठ, क्रोध, निंदा या अपशब्दों के प्रयोग से बचें। मन को शांत और एकाग्र रखें।
2. **उपवास:** व्रत का पालन पूर्ण निष्ठा से करें। यदि पूर्ण उपवास संभव न हो, तो फलाहार ले सकते हैं। नमक का सेवन न करें। जल ग्रहण किया जा सकता है।
3. **अभिषेक सामग्री:** अभिषेक में शुद्ध जल, दूध, दही, घी, शहद, चीनी का ही प्रयोग करें। गंगाजल का प्रयोग अत्यंत शुभ होता है।
4. **बेलपत्र:** बेलपत्र हमेशा तीन पत्तियों वाला ही चढ़ाएं और इसे धोकर साफ कर लें। बेलपत्र की चिकनी सतह शिवलिंग को स्पर्श करनी चाहिए। बेलपत्र कभी बासी नहीं होते, उन्हें पुनः धोकर चढ़ाया जा सकता है।
5. **तुलसी और हल्दी का निषेध:** भगवान शिव की पूजा में तुलसी दल और हल्दी का प्रयोग वर्जित है।
6. **शंख से जल वर्जित:** शिवलिंग पर शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।
7. **प्रदक्षिणा:** शिवलिंग की परिक्रमा करते समय आधी परिक्रमा ही करें और वापस लौट आएं। जलधारी को पार न करें।
8. **जागरण:** रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। इस दौरान शिव कथाएं सुनें, मंत्र जाप करें और भजन-कीर्तन करें। आलस्य और नींद से बचें।
9. **दान:** व्रत के अगले दिन ब्राह्मणों को दान अवश्य दें। अन्न, वस्त्र, धन या पूजन सामग्री का दान करें।
10. **पारण:** चतुर्दशी तिथि समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण करें। पारण से पहले भगवान शिव से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें।
इन नियमों और सावधानियों का पालन करने से महाशिवरात्रि का व्रत सफल होता है और भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है।

**निष्कर्ष**
महाशिवरात्रि का यह पावन पर्व मात्र एक वार्षिक अनुष्ठान नहीं, अपितु शिव तत्व में लीन होने का एक स्वर्णिम अवसर है। शिव पुराण के गूढ़ रहस्य हमें यह बताते हैं कि भगवान शिव केवल संहारकर्ता ही नहीं, अपितु कल्याणकर्ता और मोक्षदाता भी हैं। उनके अनादि-अनंत स्वरूप को समझने और उनकी कृपा प्राप्त करने का यह दिन भक्तों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। हमने लिंगोद्भव की कथा और शिकारी लुब्धक की कहानी के माध्यम से शिवजी की महिमा और उनकी करुणा को समझा। यह कथाएं दर्शाती हैं कि शिवजी किसी भी भक्त पर, चाहे वह अनजाने में ही सही, यदि शुद्ध हृदय से उनका स्मरण कर ले, तो उस पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

महाशिवरात्रि का व्रत, जागरण, अभिषेक और बेलपत्र चढ़ाना – ये सभी क्रियाएं हमें भौतिक बंधनों से मुक्त कर आत्मिक शांति की ओर ले जाती हैं। शिव पुराण में वर्णित पूजन विधि हमें सही मार्ग दिखाती है ताकि हमारी भक्ति पूर्ण हो और हमें उसका समुचित फल प्राप्त हो। इस दिन किया गया प्रत्येक पुण्य कर्म, प्रत्येक मंत्रोच्चारण, और प्रत्येक भक्तिपूर्ण विचार अनंत गुना फलदायी होता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन की क्षणभंगुरता में हमें शाश्वत सत्य की ओर उन्मुख होना चाहिए।

आइए, हम सब इस महाशिवरात्रि पर अपने मन को शुद्ध करें, अहंकार का त्याग करें और सच्चे हृदय से भगवान शिव की शरण में जाएं। उनके नाम का जाप करें, उनके स्वरूप का ध्यान करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को आलोकित करें। यह पर्व हमें आंतरिक शक्ति, शांति और परम ज्ञान की ओर अग्रसर करे। भगवान शिव की कृपा हम सभी पर बनी रहे और हम सब मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ें। हर हर महादेव!

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