यात्रा में भी अखंड जप: अपनी साधना को निरंतर कैसे रखें?

यात्रा में भी अखंड जप: अपनी साधना को निरंतर कैसे रखें?

यात्रा में भी अखंड जप: अपनी साधना को निरंतर कैसे रखें?

प्रस्तावना
सनातन परंपरा में जप साधना को आत्मिक उन्नति का एक परम पावन मार्ग माना गया है। यह वह शक्ति है जो मन को एकाग्र करती है, आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है और जीवन में शांति व स्थिरता लाती है। जप केवल मंत्रों का उच्चारण नहीं, अपितु स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करने का एक गहरा माध्यम है, जो हमारे अंतर्मन को शुद्ध करता है और हमें आंतरिक बल प्रदान करता है। परंतु, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, खासकर जब हम यात्रा करते हैं, अपनी इस अमूल्य साधना को निरंतर बनाए रखना कई बार एक चुनौती प्रतीत होता है। हम सोचते हैं कि क्या यात्रा के शोरगुल में, बदलती परिस्थितियों में और नए स्थानों पर अपनी माला का जाप संभव है? सनातन स्वर आपके इस प्रश्न का समाधान लेकर आया है। यह ब्लॉग आपको ऐसे व्यावहारिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करेगा, जिससे आप अपनी यात्रा के दौरान भी अपनी जप साधना को न केवल जारी रख पाएंगे, बल्कि उसे और भी गहरा और प्रभावी बना सकेंगे। याद रखिए, सच्ची साधना बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि भीतर की श्रद्धा और संकल्प पर निर्भर करती है। आइए, जानते हैं कैसे यात्रा में भी आप अपनी जप की पवित्र डोर को अखंड रख सकते हैं।

पावन कथा
प्राचीन काल में, एक छोटे से गाँव में धर्मपाल नामक एक सज्जन व्यक्ति रहते थे। धर्मपाल अपनी सादगी, ईमानदारी और ईश्वर भक्ति के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। उनका मुख्य व्यवसाय व्यापार था, जिसके लिए उन्हें अक्सर दूर-दराज के नगरों और गाँवों की यात्रा करनी पड़ती थी। उनकी दिनचर्या में सबसे महत्वपूर्ण स्थान उनके इष्टदेव के नाम-जप का था। वे प्रातःकाल उठकर अपनी एक सौ आठ मनकों वाली रुद्राक्ष की माला से एक निश्चित संख्या में मंत्रों का जाप करते थे और संध्याकाल में भी यही क्रम दोहराते थे। यह उनकी आत्मिक खुराक थी, जिसके बिना उन्हें अपने जीवन में एक अधूरापन महसूस होता था। उनका विश्वास था कि प्रभु का नाम ही उन्हें हर संकट से बचाता है और हर कार्य में सफलता दिलाता है। उन्होंने कभी भी अपनी साधना को किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होने दिया था, चाहे वह कितनी भी कठिन क्यों न रही हो।

एक बार की बात है, धर्मपाल को एक बहुत महत्वपूर्ण व्यापारिक सौदे के लिए एक सुदूर राज्य की यात्रा पर जाना पड़ा। यह यात्रा कई दिनों की थी और मार्ग में कई बाधाएं आने की संभावना थी। गाँव छोड़ने से पहले, उनकी पत्नी ने चिंता व्यक्त की, “स्वामी, इतनी लंबी और कठिन यात्रा में आप अपनी जप साधना कैसे जारी रख पाएंगे? मार्ग में चोर-डाकुओं का भय है, वन्य प्राणियों का खतरा है, और विश्राम के लिए शांत स्थान मिलना भी मुश्किल होगा।” उनकी आँखों में अपने पति के प्रति अगाध प्रेम और साथ ही उनकी साधना भंग होने की आशंका थी।

धर्मपाल मुस्कुराए और बोले, “प्रिय, ईश्वर का नाम केवल किसी विशेष स्थान या समय तक सीमित नहीं है। वह तो कण-कण में व्याप्त है और हर पल हमारे साथ है। सच्ची साधना हृदय से होती है, बाह्य परिस्थितियों से नहीं। यह तो मन का मेल है प्रभु से, जो कभी टूटता नहीं।” उन्होंने अपनी प्रिय रुद्राक्ष की माला को एक छोटे, मखमली थैले में रखा और उसे अपने कमरबंद से बांध लिया। यह माला उनके लिए केवल मनकों का समूह नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का एक पवित्र माध्यम थी।

उनकी यात्रा प्रारंभ हुई। उन्हें घने जंगलों से गुजरना पड़ा, ऊँचे पहाड़ों को पार करना पड़ा और कई दिनों तक धूल भरी कच्ची सड़कों पर बैलगाड़ी में सफर करना पड़ा। कभी वे किसी सराय में रुकते, तो कभी खुले आकाश के नीचे ही किसी वृक्ष के नीचे रात बिताते। मार्ग में कई बार चुनौतियां आईं – कभी अचानक भयंकर वर्षा हो जाती, कभी भीषण गर्मी से व्याकुल होना पड़ता, कभी गाड़ी का पहिया टूट जाता, और एक बार तो उन्हें डाकुओं के एक छोटे समूह से भी सामना करना पड़ा।

इन सभी विषम परिस्थितियों में धर्मपाल ने अपनी साधना नहीं छोड़ी। जब बैलगाड़ी धीरे-धीरे चल रही होती, वे अपनी माला का थैला खोलकर, उसे अपने हाथ में छिपाकर मानसिक रूप से जप करते रहते। उनके होठ हिलते, पर कोई आवाज नहीं निकलती। यदि कोई शांत जगह मिल जाती, जैसे नदी का किनारा या किसी वृक्ष की छाँव, तो कुछ पल के लिए रुककर आँखें बंद कर लेते और पूरी एकाग्रता से अपने मंत्र का जाप करते। उन्होंने अपने लिए हर छोटे अवसर को साधना का माध्यम बना लिया था। जब डाकुओं ने उन्हें घेर लिया और तलवारें लहराईं, तब भी भयभीत होने के बजाय, उन्होंने दृढ़ता से अपने इष्ट का नाम स्मरण करना जारी रखा। उनके चेहरे पर शांति और आंखों में एक अद्भुत तेज देखकर डाकू भी चकित रह गए। उन्हें ऐसा लगा मानो इस व्यक्ति के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच है। बिना किसी नुकसान के, डाकू उन्हें जाने दिया। यह उनके अखंड विश्वास और साधना का ही फल था, जिसने उन्हें संकट की घड़ी में भी अविचल रखा।

एक दिन, जब वे एक घने जंगल से गुजर रहे थे, तो उन्हें अचानक बहुत तेज बुखार आ गया। उनकी देह शिथिल हो गई और वे बैलगाड़ी में ही अचेत हो गए। उनके साथ यात्रा कर रहे सहयात्री घबरा गए। उन्होंने सोचा कि अब इनका बचना मुश्किल है। लेकिन उस अचेत अवस्था में भी धर्मपाल के होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे और उनके भीतर से उनके इष्टदेव का नाम मंत्र लगातार गूंज रहा था। आधी रात को, एक वृद्ध संत उसी रास्ते से गुजरे। उन्होंने धर्मपाल की अवस्था देखी और उनके होंठों पर चल रहे मंत्र को सुना। संत अपनी दिव्य दृष्टि से समझ गए कि यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सच्चा साधक है, जिसकी आत्मा प्रभु के नाम में लीन है। उन्होंने धर्मपाल को अपनी औषधियां दीं और उनके माथे पर हाथ फेरा, साथ ही उनके लिए मंत्रों का उच्चारण किया। संत के आशीर्वाद और धर्मपाल की अपनी साधना के प्रभाव से, कुछ ही घंटों में उन्हें होश आ गया और अगले दिन वे पूरी तरह से स्वस्थ हो गए। यह नाम जप की ही शक्ति थी कि मृत्यु के मुँह से भी वे वापस लौट आए।

धर्मपाल ने अपनी यात्रा पूरी की, व्यापार में भी सफलता प्राप्त की और सकुशल अपने घर लौटे। उनकी पत्नी और गाँव के लोग यह देखकर हैरान थे कि इतनी लंबी और कठिन यात्रा के बाद भी धर्मपाल का मुखमंडल पहले से अधिक तेजस्वी और शांत था। उन्होंने अपनी यात्रा के अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे ईश्वर का नाम ही उनका सच्चा साथी और रक्षक बना रहा। उन्होंने समझाया कि यात्रा के बाहरी कोलाहल के बावजूद, मन की गहराई में ईश्वर का स्मरण कभी रुकना नहीं चाहिए। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और साधना कभी भी किसी भी परिस्थिति से विचलित नहीं होती, बल्कि वही हमारी सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है और हमें हर बाधा से पार कराती है।

दोहा
मन की माला फेरिए, सुमिरन हो दिन रात।
दुख-सुख में हरि नाम का, रहे सदा ही साथ।।

चौपाई
राम नाम मनि दीप धरू जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरौ जौ चाहसि उजियार॥
कलिजुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।।
करम बचन मन डारि भरोसा। भजहु राम भजु राम भरोसा।।

पाठ करने की विधि
यात्रा के दौरान अपनी जप साधना को जारी रखने के लिए कुछ सरल और प्रभावी विधियाँ अपनाई जा सकती हैं, जो आपकी सुविधा और परिस्थितियों के अनुकूल हों। यह आपकी साधना को सशक्त बनाएगा और आपको आंतरिक शांति प्रदान करेगा।

1. **योजना बनाएं और समय निर्धारित करें:** यात्रा कार्यक्रम में कुछ समय, चाहे वह 15-20 मिनट का ही क्यों न हो, जप के लिए निर्धारित करें। यह सुबह जल्दी उठने का समय हो सकता है, रात को सोने से पहले, या यात्रा के दौरान प्रतीक्षा का खाली समय। यदि आप अपनी सामान्य माला संख्या नहीं कर पा रहे हैं, तो छोटे लक्ष्य निर्धारित करें, जैसे 1 या 2 माला। याद रखें, निरंतरता और नियमितता पूर्णता से अधिक महत्वपूर्ण है। थोड़ा-थोड़ा करके ही सही, पर प्रतिदिन अभ्यास करें।

2. **लचीलापन और स्थान का चुनाव:** आपको हमेशा एक ही आसन में बैठने की आवश्यकता नहीं है। आप बस, ट्रेन, हवाई जहाज में यात्रा करते समय, किसी कतार में प्रतीक्षा करते समय, या होटल के कमरे में भी जप कर सकते हैं। महत्वपूर्ण है मन की एकाग्रता। यदि संभव हो, तो कुछ क्षणों के लिए शांत स्थान, जैसे किसी मंदिर का कोना, एक शांत बगीचा, या आपके होटल के कमरे की बालकनी ढूंढने का प्रयास करें। मन की शांति ही वास्तविक आसन है और वही सर्वश्रेष्ठ स्थान है।

3. **माला के विकल्प और प्रबंधन (माला टिप्स):**
* **छोटी और मजबूत माला:** यात्रा के लिए एक ऐसी माला चुनें जो छोटी, मजबूत और हल्के वजन की हो। 108 मनकों की जगह 27 या 54 मनकों की माला अधिक सुविधाजनक हो सकती है, जो आसानी से संभाली जा सके।
* **सुरक्षित रखें:** अपनी माला को हमेशा एक छोटे, मुलायम कपड़े के थैले (माला बैग) में रखें। इससे वह धूल-मिट्टी और टूटने से बची रहेगी, साथ ही उसकी पवित्रता भी बनी रहेगी। इसे अपने साथ अपने हैंडबैग में रखें, न कि चेक-इन लगेज में, ताकि यह आसानी से उपलब्ध रहे और सुरक्षित रहे।
* **वैकल्पिक माला का उपयोग:** यदि आप सार्वजनिक स्थान पर अपनी माला के साथ असहज महसूस करते हैं, तो आप कलाई पर पहनने वाली छोटी माला (रिस्ट माला) का उपयोग कर सकते हैं। यह कम ध्यान आकर्षित करती है और आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है।
* **अंगुलियों पर गिनना:** अपनी अंगुलियों के पोरों पर मंत्रों की संख्या गिनना एक अत्यंत गोपनीय और सुविधाजनक तरीका है। यह किसी भी स्थिति में, बिना किसी उपकरण के, चुपचाप किया जा सकता है।
* **घड़ी का उपयोग:** यदि आप माला का उपयोग नहीं करना चाहते हैं या ऐसी स्थिति है जहाँ माला संभव नहीं, तो एक निश्चित समय (जैसे 5-10 मिनट) के लिए लगातार जप करें। इससे आपको एक लक्ष्य मिलेगा और आप अपनी साधना को समयबद्ध तरीके से जारी रख पाएंगे।
* **मानसिक जप:** सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोपरि विधि है मानसिक जप। इसमें किसी माला, विशिष्ट आसन या मुद्रा की आवश्यकता नहीं होती। आप इसे कहीं भी, कभी भी, किसी भी स्थिति में कर सकते हैं – चलते हुए, खाते हुए, काम करते हुए। यह आपकी साधना का सबसे आंतरिक, अबाध और सर्वसुलभ रूप है, जो हर परिस्थिति में संभव है।

4. **यात्रा के समय का सदुपयोग:**
* **वाहन में जप:** बस, ट्रेन या हवाई जहाज में यात्रा करते समय अक्सर हम खाली बैठे रहते हैं। इस समय का उपयोग जप के लिए करें। आप आंखें बंद करके, हेडफोन लगाकर (यदि मंत्र सुन रहे हैं), या बस मानसिक रूप से जप कर सकते हैं। बाहरी शोर आपको विचलित न करे, इसके लिए आप स्वयं को मंत्र में लीन कर दें। यह समय को सार्थक और फलदायी बनाएगा।
* **प्रतीक्षा का समय:** एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, या बस स्टॉप पर प्रतीक्षा करते समय अक्सर हम बेचैन हो जाते हैं या मोबाइल फोन में व्यस्त रहते हैं। इस समय को जप में लगाकर आप अपनी बेचैनी को शांति में बदल सकते हैं और अपने मन को एकाग्र कर सकते हैं।

5. **मानसिक स्थिति को स्थिर रखें:** यात्रा अक्सर अप्रत्याशित चुनौतियों और तनाव से भरी हो सकती है। जप आपको शांत रहने, तनाव कम करने और सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखने में मदद करेगा। यह आपके भीतर एक संतुलन स्थापित करता है। असुविधाओं के बजाय, यात्रा के अनुभवों और सुविधाओं के लिए कृतज्ञता का भाव रखें, इससे आपका मन प्रसन्न रहेगा।

6. **कम संख्या, अधिक गुणवत्ता:** यदि आप अपनी सामान्य संख्या में माला जाप नहीं कर पा रहे हैं, तो चिंता न करें। कम संख्या में ही सही, लेकिन पूरी एकाग्रता, श्रद्धा और भावना के साथ जप करें। मंत्र की ध्वनि, उसके अर्थ और उससे जुड़े देवत्व पर ध्यान केंद्रित करें। गुणवत्ता संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है; कम जाप भी यदि भाव से किया जाए तो अधिक फलदायी होता है।

पाठ के लाभ
यात्रा के दौरान जप साधना को जारी रखने से अनगिनत आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मकता से भरने का एक शक्तिशाली उपकरण है।

1. **मानसिक शांति और स्थिरता:** यात्रा के दौरान होने वाले तनाव, अनिश्चितता और अव्यवस्था के बीच जप मन को शांत और स्थिर रखने में मदद करता है। यह आपको आंतरिक रूप से केंद्रित रखता है और बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होने देता।
2. **आध्यात्मिक संबंध की निरंतरता:** यह सुनिश्चित करता है कि आप अपनी आध्यात्मिक दिनचर्या से विमुख न हों। ईश्वर के साथ आपका संबंध अटूट बना रहता है, चाहे आप कहीं भी हों, जिससे आपको सदैव ईश्वरीय सानिध्य का अनुभव होता है।
3. **सकारात्मक ऊर्जा का संचार:** जप से उत्पन्न सकारात्मक कंपन पूरे वातावरण को शुद्ध करते हैं और आपके भीतर एक ऊर्जा का संचार करते हैं, जिससे आप यात्रा की चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से कर पाते हैं और हर पल को उत्साह से जी पाते हैं।
4. **भय और चिंता से मुक्ति:** अनजाने स्थानों या परिस्थितियों में उत्पन्न होने वाले भय और चिंता को दूर करने में जप बहुत सहायक होता है। यह आपको आंतरिक बल और सुरक्षा का अनुभव कराता है, जिससे आप निर्भीक और निश्चिंत रहते हैं।
5. **समय का सदुपयोग:** यात्रा के दौरान प्रतीक्षा या खाली समय का सदुपयोग जप में करने से समय सार्थक बनता है और व्यर्थ की बातों या चिंताओं से मन हटता है, जिससे मन शांत और प्रसन्न रहता है।
6. **आंतरिक शुद्धि:** मंत्रों के बार-बार उच्चारण से मन के विकार दूर होते हैं और आत्मा का शुद्धिकरण होता है, जिससे आप भीतर से और अधिक निर्मल, पवित्र और शांत होते जाते हैं।
7. **नई ऊर्जा और उत्साह:** निरंतर जप आपको नई ऊर्जा और उत्साह प्रदान करता है, जिससे आप यात्रा का आनंद अधिक गहराई से ले पाते हैं और अपने गंतव्य पर अधिक सकारात्मकता के साथ पहुँचते हैं। यह आपके पूरे अस्तित्व को आनंद से भर देता है।
ये लाभ केवल यात्रा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में जप साधना के महत्व को दर्शाते हैं और हमें एक संतुलित व आध्यात्मिक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।

नियम और सावधानियाँ
यात्रा में जप करते समय कुछ नियम और सावधानियाँ आवश्यक हैं ताकि आपकी साधना शुद्ध और प्रभावी बनी रहे और आप उसका पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकें।

1. **माला की पवित्रता:** अपनी माला को हमेशा एक स्वच्छ और मुलायम कपड़े के थैले (माला बैग) में रखें। उसे फर्श पर या किसी अपवित्र स्थान पर न रखें। माला को शरीर के निचले हिस्से से ऊपर रखें और किसी और को छूने न दें, यदि संभव हो।
2. **माला का चुनाव:** यात्रा के लिए हल्की, मजबूत और छोटी माला का चयन करें। रुद्राक्ष या चंदन की माला उपयुक्त होती है क्योंकि वे पवित्र मानी जाती हैं। यदि आप सार्वजनिक स्थानों पर माला का उपयोग कर रहे हैं, तो उसे थैले के भीतर ही रखें ताकि वह दूसरों की दृष्टि से ओझल रहे और आपकी साधना गोपनीय बनी रहे।
3. **स्वच्छता:** जप करने से पहले यदि संभव हो, तो हाथ-मुँह धो लें और स्वयं को स्वच्छ करें। यदि यह संभव न हो, तो कम से कम मन को शुद्ध करने का प्रयास करें और हाथों को साफ करें। शारीरिक स्वच्छता के साथ-साथ मानसिक स्वच्छता भी महत्वपूर्ण है।
4. **गोपनीयता और नम्रता:** सार्वजनिक स्थानों पर जप करते समय नम्रता और गोपनीयता बनाए रखें। जोर से जाप करने के बजाय, मानसिक या धीमे स्वर में जाप करें। दूसरों को असुविधा न हो, इसका ध्यान रखें। अपनी साधना का प्रदर्शन न करें।
5. **मन की एकाग्रता:** बाहरी शोरगुल या हलचल से विचलित न हों। मन को मंत्र में केंद्रित करने का अभ्यास करें। धीरे-धीरे, बाहरी वातावरण का आप पर प्रभाव कम होता जाएगा और आप आंतरिक शांति का अनुभव करेंगे। अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित करके भी मन को एकाग्र किया जा सकता है।
6. **आहार-विहार का ध्यान:** यात्रा में सात्विक भोजन का ही प्रयास करें, यदि संभव हो। तामसिक भोजन मन को चंचल कर सकता है। इससे मन शांत रहेगा और जप में सहायता मिलेगी। संयमित आहार और विहार साधना के लिए सहायक होते हैं।
7. **अहंकार से बचें:** अपनी साधना को प्रदर्शित न करें। यह आपकी और ईश्वर के बीच का एक निजी और पवित्र संबंध है। अपनी आध्यात्मिक प्रगति को स्वयं तक ही सीमित रखें।
8. **लचीलापन:** यदि किसी दिन आप बिल्कुल भी जप नहीं कर पा रहे हैं, तो स्वयं को दोष न दें। अगले दिन फिर से प्रयास करें। महत्वपूर्ण है कि आप अपनी साधना को पूरी तरह से न छोड़ें, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार ढाल लें।
9. **आस्था और विश्वास:** सबसे महत्वपूर्ण नियम है अपनी साधना और ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना। यही विश्वास आपकी साधना को बल प्रदान करेगा और आपको हर परिस्थिति में मार्गदर्शन देगा। बिना विश्वास के कोई भी साधना अधूरी है।

निष्कर्ष
यात्रा एक पड़ाव है, जीवन की बहती धारा का एक छोटा सा हिस्सा। परंतु हमारी आध्यात्मिक यात्रा और ईश्वर से हमारा संबंध इस भौतिक यात्रा से कहीं अधिक गहरा और शाश्वत है। यह आवश्यक नहीं कि आप अपने घर के शांत कोने में ही बैठकर साधना करें; सच्चा साधक तो हर स्थान को मंदिर और हर क्षण को अवसर बना लेता है। यात्रा के दौरान जप साधना को जारी रखना केवल एक आध्यात्मिक अभ्यास नहीं, बल्कि अपने संकल्प और विश्वास की अग्नि को प्रज्वलित रखने का एक प्रमाण है। यह हमें सिखाता है कि हम परिस्थितियों के दास नहीं, बल्कि अपनी इच्छाशक्ति के स्वामी हैं, और हमारी श्रद्धा ही हमें हर मुश्किल से पार ले जाती है।

जब आप यात्रा करते हैं, तो आप केवल भौगोलिक दूरी तय नहीं करते, बल्कि नए अनुभवों और विचारों के साथ जुड़ते हैं। इस दौरान अपनी जप साधना को बनाए रखकर आप अपने भीतर एक ऐसी स्थिरता और शांति का निर्माण करते हैं, जो किसी भी बाहरी उथल-पुथल से अप्रभावित रहती है। यह आपके मन को एकाग्र और चित्त को प्रसन्न रखता है। अपनी छोटी सी माला को अपना साथी बनाएं, या अपनी उंगलियों के पोरों पर ही अपने आराध्य के नाम का स्मरण करें। हर श्वास के साथ मंत्र को भीतर उतरने दें, उसे अपने रोम-रोम में समाने दें। याद रखें, आप अकेले नहीं हैं; आपके इष्टदेव का नाम सदैव आपके साथ है, आपका मार्गदर्शक और संरक्षक बनकर। तो उठिए, संकल्प कीजिए और अपनी यात्रा में भी भक्ति की इस पावन धारा को निरंतर बहने दें। आपकी हर यात्रा मंगलमय हो और आपकी साधना अखंड बनी रहे, जिससे आपका जीवन आनंद और दिव्यता से परिपूर्ण हो जाए! जय श्री राम! हर हर महादेव!

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