धाम से लाई हुई मूर्तियाँ: स्थापना कैसे?
**प्रस्तावना**
सनातन धर्म में मूर्ति पूजा का अत्यंत महत्व है। हम अपने आराध्य की प्रतिमा में ही उस निराकार ब्रह्म के साकार रूप को देखते हैं, उनसे संवाद करते हैं और अपने हृदय की सारी भावनाएँ व्यक्त करते हैं। जब ये पावन मूर्तियाँ किसी तीर्थ धाम, किसी सिद्ध पीठ या किसी प्राचीन मंदिर से हमारे घर आती हैं, तो उनका आगमन मात्र एक वस्तु का आगमन नहीं होता, बल्कि साक्षात ईश्वर का हमारे निवास में पदार्पण होता है। धामों में स्थापित होने के कारण इन मूर्तियों में पहले से ही दिव्य ऊर्जा और प्राण प्रतिष्ठा का संचार होता है। ऐसे में, इन पवित्र प्रतिमाओं को अपने घर में सम्मानपूर्वक स्थापित करना और उन्हें अपनी नित्य पूजा-अर्चना का आधार बनाना, किसी भी भक्त के लिए एक अत्यंत सौभाग्यशाली और हृदयस्पर्शी अनुभव होता है। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि अपने आराध्य के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण का प्रकटीकरण है। इस पावन अवसर पर, यह आवश्यक हो जाता है कि हम पूरी श्रद्धा, भक्ति और सही विधि-विधान के साथ इन दिव्य मूर्तियों की स्थापना करें, ताकि हमारा घर भी एक छोटा धाम बन सके और हम निरंतर ईश्वरीय कृपा का अनुभव कर सकें। यह आलेख आपको धाम से लाई गई मूर्तियों की स्थापना के लिए एक विस्तृत और सरल मार्गदर्शिका प्रदान करेगा, ताकि आप इस पवित्र कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न कर सकें।
**पावन कथा**
एक बार की बात है, वृंदावन के पावन रज कणों में लीन, माधवी नाम की एक परम भक्त रहती थी। उसके हृदय में बचपन से ही लड्डू गोपाल के प्रति असीम प्रेम था। वह सदा यही प्रार्थना करती थी कि काश उसे भी अपने घर में लड्डू गोपाल की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हो। कई वर्षों की साधना और प्रार्थना के बाद, एक दिन उसे वृंदावन के एक प्राचीन संत ने एक अत्यंत दिव्य और मनमोहक लड्डू गोपाल की मूर्ति भेंट की, जो स्वयं किसी सिद्ध मंदिर से लाई गई थी। माधवी की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उसे लगा मानो उसके प्रभु साक्षात उसके घर पधारने वाले हैं।
मूर्ति लेकर जब माधवी अपने घर पहुँची, तो उसके मन में अपार हर्ष और थोड़ी घबराहट भी थी। वह सोच रही थी कि इतनी पावन मूर्ति की स्थापना कैसे करे, ताकि कोई भूल न हो जाए। उसने तुरंत अपनी दादी माँ से संपर्क किया, जो धर्म-कर्म की गहरी जानकार थीं। दादी माँ ने उसे बड़े प्रेम से समझाया कि धाम से लाई मूर्तियों में पहले से ही दैवीय ऊर्जा होती है, इसलिए मुख्य उद्देश्य उन्हें सम्मानजनक स्थान देना और भक्ति से उनकी सेवा करना है।
माधवी ने दादी माँ के निर्देशों का पालन करना आरंभ किया। सबसे पहले उसने अपने घर के एक शांत कोने को चुना, जहाँ दिनभर सूर्य का प्रकाश आता था और हवा का संचार भी अच्छा था। उसने उस स्थान को गंगाजल से शुद्ध किया, गोबर से लेपन किया और हल्दी-कुमकुम से स्वस्तिक बनाकर उसे फूलों और रंगोली से सजाया। उसका पूरा घर मानो उस दिव्य आगमन की तैयारी में चमक उठा था।
फिर उसने स्नान आदि से निवृत्त होकर, सात्विक भाव से आवश्यक सामग्री जुटाई: पंचामृत, गंगाजल, शुद्ध वस्त्र, चंदन, रोली, पुष्प, धूप, दीपक और भाँति-भाँति के नैवेद्य। जब मूर्ति को घर लाया गया, तो माधवी ने उसे एक पवित्र कपड़े में लपेटकर अपने सिर पर रखकर अंदर प्रवेश किया, मानो किसी राजसी अतिथि का स्वागत कर रही हो। उसने मूर्ति को सीधे ज़मीन पर न रखकर, एक स्वच्छ आसन पर विराजित किया।
स्नान की बारी आई। माधवी ने एक बड़े पात्र में पंचामृत तैयार किया और बड़ी कोमलता से अपने लड्डू गोपाल को उससे स्नान कराया, साथ ही निरंतर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करती रही। फिर शुद्ध जल और गंगाजल से स्नान कराकर, एक नवीन और कोमल वस्त्र से उन्हें पोंछा। उसके बाद, उसने लड्डू गोपाल को छोटे-छोटे वस्त्र पहनाए, चंदन का तिलक किया और फूलों की सुंदर माला पहनाई। माधवी की आँखों में प्रेम के आँसू थे, हर क्रिया में उसका हृदय भक्ति से भरा हुआ था।
स्थापना की मुख्य विधि आरंभ हुई। माधवी ने आसन पर बैठकर हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लिया। उसने अपने गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए कहा कि वह अपने परिवार के सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उत्थान के लिए यह स्थापना कर रही है। सबसे पहले उसने विघ्नहर्ता गणेश का ध्यान किया और उनकी पूजा की। फिर, उसने अपने लड्डू गोपाल को सावधानी से सजाई हुई चौकी पर स्थापित किया।
आँखें बंद करके, माधवी ने अपने इष्ट का ध्यान किया और उनसे अपने घर में विराजमान होने तथा अपनी पूजा स्वीकार करने का आह्वान किया। जब प्राण प्रतिष्ठा के क्षण आए, तो दादी माँ के निर्देशानुसार, उसने अपनी अनामिका उंगली से मूर्ति को स्पर्श करते हुए, हृदय से प्रार्थना की कि लड्डू गोपाल उसके घर को अपना स्थायी निवास बना लें। उस क्षण माधवी ने एक अद्भुत ऊर्जा का अनुभव किया। उसे लगा जैसे स्वयं लड्डू गोपाल मुस्कुरा रहे हों, और एक अलौकिक शांति उसके पूरे अस्तित्व में समा गई।
इसके बाद, माधवी ने बड़े भाव से षोडशोपचार पूजा संपन्न की। उसने भगवान को आवाहन किया, आसन दिया, पाद्य, अर्घ्य और आचमन कराया, उन्हें वस्त्र अर्पित किए, चंदन लगाया, पुष्प और मालाएँ चढ़ाईं, धूप-दीप प्रज्वलित किए और नाना प्रकार के नैवेद्य अर्पित किए। अंत में, उसने आरती की और फिर तीन बार परिक्रमा करके अपने आराध्य से किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा याचना की। उस दिन माधवी का घर सचमुच वृंदावन का एक लघु रूप बन गया था। उसके हृदय को जो शांति और आनंद मिला, वह अवर्णनीय था। उस दिन से उसके घर में सदैव भगवान का वास रहा और माधवी ने अपने जीवन का हर क्षण उनकी सेवा में समर्पित कर दिया, जिससे उसका और उसके परिवार का जीवन धन्य हो गया।
**दोहा**
धाम से आई मूर्ति, घर में लाई शांति।
भाव प्रेम से पूजो, मिटे सकल भ्रांति।।
**चौपाई**
जहाँ विराजै देव छवि, सुख समृद्धि वहाँ आवै।
मन निर्मल हो भक्ति बढ़े, घर आंगन महकावै।।
शुभ दिशा में आसन दीजै, पावन स्थान सजावै।
नित सेवा से मन तृप्त हो, प्रभु कृपा नित पावै।।
**पाठ करने की विधि**
धाम से लाई हुई मूर्तियों की स्थापना एक अत्यंत पवित्र कार्य है, जिसे श्रद्धा और नियमों के साथ करना चाहिए। यह विधि आपको क्रमबद्ध तरीके से स्थापना प्रक्रिया को समझने में मदद करेगी। सर्वप्रथम, आपको स्थापना के लिए एक शांत, स्वच्छ और पवित्र स्थान का चुनाव करना होगा। यह स्थान घर का पूजा घर या कोई ऐसा कोना हो सकता है जहाँ अनावश्यक आवाजाही न हो। सुनिश्चित करें कि मूर्ति का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर हो और पूजा करने वाले का मुख भी उन्हीं दिशाओं में रहे। मूर्ति को सीधे ज़मीन पर न रखें; इसके लिए एक साफ़ चौकी, वेदी या ऊँचे आसन का उपयोग करें, जो आपकी आँख के स्तर पर या थोड़ा ऊपर हो। शौचालय या किसी गंदे स्थान के पास मूर्ति स्थापित करने से बचें।
स्थान का चुनाव करने के बाद, उसकी शुद्धि अत्यंत महत्वपूर्ण है। उस स्थान को अच्छी तरह साफ़ करें, झाड़ू-पोंछा लगाएँ और फिर गंगाजल या सामान्य शुद्ध जल से पूरे स्थान का छिड़काव करें। यदि संभव हो, तो गाय के गोबर से लेपन करें या हल्दी-कुमकुम से स्वस्तिक बनाएँ। स्थान को रंगोली और ताजे फूलों से सजाकर एक दिव्य वातावरण तैयार करें।
स्थापना के लिए आवश्यक सामग्री पहले से जुटा लें। इनमें शुद्धि के लिए गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी का मिश्रण) शामिल हैं। पूजा सामग्री में दीपक (घी या तेल का), धूप, अगरबत्ती, चंदन, रोली (कुमकुम), हल्दी, अक्षत (साबुत चावल), मौली (कलावा), ताजे पुष्प, फूलों की माला, नैवेद्य (फल, मिठाई), पान-सुपारी, लौंग, इलायची और दक्षिणा होनी चाहिए। यदि मूर्ति पर पहनाए जा सकने वाले वस्त्र उपलब्ध हों तो वे भी रखें। घंटी, शंख, आरती के लिए कपूर और पूजा की चौकी या आसन भी आवश्यक हैं। यदि आप विधि-विधान से परिचित नहीं हैं, तो किसी योग्य पंडित या पुरोहित की सहायता लेना श्रेष्ठ होता है।
जब आप मूर्तियों को घर लाएँ, तो उन्हें अत्यधिक सम्मानपूर्वक लाएँ। उन्हें सिर पर या किसी पवित्र वस्त्र में लपेटकर लाएँ और सीधे ज़मीन पर न रखें। उन्हें तुरंत पूजा के लिए चुने गए स्थान पर एक साफ़ आसन पर रखें।
अब मूर्तियों का प्रारंभिक शुद्धि स्नान कराएँ। एक बड़े बर्तन में पंचामृत तैयार करें और धीरे-धीरे मूर्तियों पर डालते हुए अपने इष्ट देव के मंत्र का जाप करें। इसके बाद, शुद्ध जल या गंगाजल से उन्हें स्नान कराएँ। एक साफ़ और नए वस्त्र से मूर्तियों को धीरे-धीरे पोंछकर सुखाएँ। स्नान के बाद, मूर्तियों का श्रृंगार करें। उन्हें नए वस्त्र पहनाएँ, चंदन, कुमकुम या रोली से तिलक करें और फूलों की माला, आभूषण आदि से उनका श्रृंगार करें।
मुख्य स्थापना विधि में, आसन पर बैठकर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और कुछ द्रव्य (सिक्का) लेकर अपना नाम, गोत्र, स्थान और जिस उद्देश्य से आप यह स्थापना कर रहे हैं, उसे बोलकर संकल्प लें। इसके बाद, किसी भी शुभ कार्य को निर्विघ्न संपन्न करने के लिए सर्वप्रथम विघ्नहर्ता गणेश जी का ध्यान करें और उनकी पूजा करें। अब, पूजा की चौकी या वेदी पर तैयार की गई मूर्तियों को सम्मानपूर्वक स्थापित करें और मानसिक रूप से उन्हें आसन प्रदान करें।
अपनी आँखें बंद करके इष्ट देवता का ध्यान करें। संबंधित देवता के मूल मंत्र का जाप करते हुए उनका आह्वान करें कि वे आपके घर में वास करें और आपकी पूजा स्वीकार करें। चूँकि ये मूर्तियाँ धाम से लाई गई हैं, उनकी प्राण प्रतिष्ठा पहले से ही हो चुकी होती है। आपको यहाँ पुनः “पूर्ण प्राण प्रतिष्ठा” करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उनकी ऊर्जा को अपने घर में स्थापित करने और उनसे जुड़ने की भावना से ही काम करना चाहिए। आप अपनी अनामिका उंगली से मूर्ति को स्पर्श करते हुए, अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए, उनसे आपके घर में विराजमान होने और आपकी पूजा स्वीकार करने की प्रार्थना कर सकते हैं। यदि पंडित जी उपस्थित हैं, तो वे एक संक्षिप्त प्राण प्रतिष्ठा मंत्रों का जाप कर सकते हैं ताकि मूर्ति आपके घर के वातावरण में पूरी तरह से घुलमिल जाए।
इसके पश्चात, आप सोलह उपचारों से पूजा आरंभ कर सकते हैं। इन सोलह उपचारों में देवता का आवाहन करना, उन्हें आसन देना, पाद्य (पैर धोना), अर्घ्य (हाथ धोना), आचमन (मुख शुद्धि), पंचामृत और जल से स्नान, वस्त्र अर्पित करना, उपवीत (यज्ञोपवीत) चढ़ाना (यदि लागू हो), गंध (चंदन, इत्र) लगाना, पुष्प और माला चढ़ाना, धूप जलाना, दीपक जलाना, नैवेद्य अर्पित करना, ताम्बूल (पान-सुपारी) चढ़ाना, दक्षिणा अर्पित करना और अंत में आरती करना शामिल है।
आरती के बाद, खड़े होकर तीन बार परिक्रमा करें और अपनी पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा याचना करें। अंत में, सभी उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरित करें। इस प्रकार, आपकी धाम से लाई हुई मूर्तियों की स्थापना विधि पूर्ण होती है।
**पाठ के लाभ**
धाम से लाई हुई मूर्तियों की घर में स्थापना और नियमित पूजा-अर्चना के अनेक आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ हैं। सबसे प्रमुख लाभ यह है कि आपके घर में साक्षात ईश्वर का वास होता है, जिससे घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। यह दिव्य उपस्थिति घर के सभी सदस्यों के मन में शांति और आनंद का संचार करती है। नियमित पूजा से मन एकाग्र होता है, विचारों में पवित्रता आती है और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
ऐसे घर में जहाँ ईश्वर का वास हो, वहाँ क्लेश और नकारात्मकता कम होती है। परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। यह स्थापना परिवार को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करती है, जहाँ सभी सदस्य एक साथ बैठकर प्रभु की आराधना करते हैं। बच्चों में धार्मिक संस्कार और नैतिक मूल्यों का विकास होता है, वे अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ते हैं।
धाम से लाई गई मूर्तियों में सिद्ध ऊर्जा होती है, जो घर में धन-धान्य, सुख-समृद्धि और आरोग्य लाती है। इन मूर्तियों की पूजा से भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और उन्हें जीवन के पथ पर सही मार्गदर्शन प्राप्त होता है। यह केवल भौतिक लाभ ही नहीं, बल्कि सबसे बढ़कर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। भक्त और भगवान के बीच एक गहरा, अटूट संबंध स्थापित होता है, जो उन्हें भय, चिंता और मोह से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। यह घर को एक तीर्थ स्थल में बदल देती है, जहाँ हर दिन उत्सव होता है और हर पल ईश्वर का अनुभव होता है।
**नियम और सावधानियाँ**
धाम से लाई हुई मूर्तियों की स्थापना के बाद, उनकी पवित्रता और सम्मान बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। सर्वप्रथम, एक बार मूर्ति स्थापित हो जाने के बाद, उनकी नियमित रूप से पूजा-अर्चना करना अनिवार्य है। उन्हें कभी भी अकेला या उपेक्षित न छोड़ें। प्रतिदिन स्नान, श्रृंगार, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करने का प्रयास करें।
पूजा स्थान और मूर्तियों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। पूजा से पहले और बाद में स्थान को साफ़ करें। मूर्तियों पर धूल-मिट्टी न जमने दें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपनी पूरी श्रद्धा और प्रेम के साथ पूजा करें। भगवान केवल आपके भाव के भूखे होते हैं, इसलिए दिखावे से अधिक आंतरिक पवित्रता और भक्ति पर ध्यान दें।
कुछ विशेष सावधानियाँ भी रखनी चाहिए। घर में कभी भी खंडित (टूटी हुई) मूर्तियों की पूजा न करें। यदि कोई मूर्ति टूट जाए, तो उसे अपमानित न करें, बल्कि उसे सम्मानपूर्वक जल में प्रवाहित कर दें या किसी पवित्र स्थान पर छोड़ दें। एक ही देवता की बहुत सारी मूर्तियों को एक साथ स्थापित करने से बचें, खासकर एक ही मुद्रा में। उदाहरण के लिए, शिवलिंग एक से अधिक नहीं होने चाहिए। यदि आप कई देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित कर रहे हैं, तो स्त्री और पुरुष देवताओं का उचित संतुलन बनाए रखने का प्रयास करें। पूजा के दौरान मन और शरीर दोनों की पवित्रता बनाए रखें। पूजा से पहले स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन को शांत रखें। किसी भी प्रकार के अनैतिक विचार या व्यवहार से दूर रहें। इन नियमों और सावधानियों का पालन करके आप अपने घर में स्थापित देव प्रतिमाओं के प्रति सच्चा सम्मान व्यक्त कर सकते हैं और उनकी कृपा के पात्र बन सकते हैं।
**निष्कर्ष**
धाम से लाई हुई मूर्तियों को अपने घर में स्थापित करना मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि साक्षात प्रभु को अपने हृदय और निवास में स्थान देने का एक दिव्य अवसर है। यह एक ऐसा पवित्र कार्य है जो आपके जीवन को भक्ति, शांति और असीम आनंद से भर देता है। जब हम इन पावन प्रतिमाओं को श्रद्धा और प्रेम से अपने घर लाते हैं, उन्हें विधि-विधान से स्थापित करते हैं और उनकी नियमित सेवा करते हैं, तो हम केवल एक मूर्ति की स्थापना नहीं करते, बल्कि अपने घर में दिव्यता का संचार करते हैं। यह प्रक्रिया हमें अपने आराध्य के और करीब लाती है, हमें अपनी सनातन संस्कृति की जड़ों से जोड़ती है और हमें जीवन के उच्चतर उद्देश्यों की ओर प्रेरित करती है। याद रखें, भगवान मूर्ति में नहीं, बल्कि आपके भाव में बसते हैं। इसलिए, सच्ची निष्ठा, अटूट विश्वास और निर्मल प्रेम के साथ की गई पूजा ही सबसे श्रेष्ठ होती है। धाम से लाई इन मूर्तियों के माध्यम से, आपका घर भी एक पवित्र धाम बन जाए, जहाँ हर सुबह नई ऊर्जा का उदय हो और हर संध्या प्रभु के आशीष की शीतलता में ढल जाए। यह दिव्य उपस्थिति आपके जीवन को सफल बनाए, आपको मोक्ष का मार्ग दिखाए और सदा आपको आनंदित रखे।
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Category:
पूजा-पाठ, भक्ति-भाव, गृहस्थ जीवन
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Tags:
धाम मूर्ति, स्थापना विधि, गृहस्थ पूजा, देव प्रतिमा, सनातन धर्म, पूजा-अर्चना, मंदिर घर में, प्राण प्रतिष्ठा

