सनातन धर्म में बृहस्पतिवार का व्रत भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। यह व्रत सुख, समृद्धि, ज्ञान और सौभाग्य प्रदान करने वाला माना जाता है। इस लेख में हम इस पावन व्रत की संपूर्ण विधि, लाभ और नियमों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, ताकि हर भक्त देवगुरु की कृपा प्राप्त कर सके।

सनातन धर्म में बृहस्पतिवार का व्रत भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। यह व्रत सुख, समृद्धि, ज्ञान और सौभाग्य प्रदान करने वाला माना जाता है। इस लेख में हम इस पावन व्रत की संपूर्ण विधि, लाभ और नियमों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, ताकि हर भक्त देवगुरु की कृपा प्राप्त कर सके।

बृहस्पतिवार का व्रत विधि

**प्रस्तावना**
सनातन धर्म की अलौकिक परंपराओं में प्रत्येक दिन किसी न किसी दिव्य शक्ति को समर्पित है। इसी क्रम में बृहस्पतिवार का दिन देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है, जिन्हें देवताओं का गुरु और ग्रहों में गुरु का स्थान प्राप्त है। भगवान विष्णु का प्रिय दिन होने के कारण इस दिन उनके पूजन का भी विशेष महत्व है। यह व्रत सुख-समृद्धि, ज्ञान, सौभाग्य, संतान प्राप्ति और वैवाहिक जीवन में मधुरता लाने वाला माना जाता है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पावन व्रत का अनुष्ठान करते हैं, उन्हें देवगुरु बृहस्पति और लक्ष्मीपति भगवान नारायण की असीम कृपा प्राप्त होती है। पीत वस्त्र, पीली वस्तुएं और पीला चंदन इस दिन की पूजन विधि का अभिन्न अंग हैं, जो बृहस्पति ग्रह से संबंधित हैं। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है, अपितु जीवन के लौकिक कष्टों का भी निवारण करता है। आइए, इस पावन व्रत की महिमा, कथा, विधि और इसके लाभों को विस्तार से जानें।

**पावन कथा**
बहुत समय पहले की बात है, एक नगर में एक बहुत ही धनवान साहूकार रहता था। उसके घर में धन-संपदा की कोई कमी नहीं थी, परंतु उसकी पत्नी बहुत ही कंजूस स्वभाव की थी। वह किसी को कुछ नहीं देती थी और अपने धन का सदुपयोग भी नहीं करती थी। साहूकार भी उसी के जैसा कंजूस था। वे दोनों बृहस्पतिवार के दिन भी न तो किसी को कुछ देते थे और न ही स्वयं व्रत रखते थे। उनके इस आचरण से देवगुरु बृहस्पति अप्रसन्न रहते थे।

उसी नगर में एक गरीब ब्राह्मणी रहती थी। वह प्रतिदिन बृहस्पतिवार का व्रत रखती थी और श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु तथा बृहस्पति देव की पूजा करती थी। एक बार गुरुवार के दिन वह ब्राह्मणी साहूकार के घर गई और बोली, “हे साहूकारानी! यदि तुम अपने घर को गोबर से लीपकर शुद्ध करो, तो तुम्हारे घर में लक्ष्मी का वास होगा और बृहस्पति देव की कृपा भी बनी रहेगी।” साहूकारानी ने ब्राह्मणी की बात को अनसुना कर दिया। ब्राह्मणी निराश होकर अपने घर लौट आई।

कुछ दिनों बाद एक और बृहस्पतिवार आया। ब्राह्मणी फिर से साहूकारानी के पास गई और उसे बताया कि आज बृहस्पतिवार है, घर को पवित्र कर, स्नान कर, पीले वस्त्र धारण कर, भगवान विष्णु का पूजन करो और बृहस्पति व्रत की कथा सुनो। ऐसा करने से दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि आती है। साहूकारानी ने इस बार ब्राह्मणी की बात पर ध्यान दिया और सोचा कि शायद ऐसा करने से मेरी धन-संपत्ति और बढ़ जाएगी। उसने ब्राह्मणी के बताए अनुसार स्नान किया, पीले वस्त्र पहने, घर को शुद्ध किया और पूजन का संकल्प लिया।

उस दिन साहूकार व्यापार के लिए बाहर गया हुआ था। साहूकारानी ने पूजा-पाठ करने के बाद अपने घर के आंगन में केले के पेड़ के पास बैठ कर व्रत कथा सुनी और मन ही मन भगवान बृहस्पति से प्रार्थना की। उसकी भक्ति और जिज्ञासा देखकर बृहस्पति देव प्रसन्न हुए। उसी दिन साहूकार को व्यापार में भारी हानि हुई और उसकी सारी धन-संपत्ति नष्ट हो गई। वह घर लौटा तो अपनी पत्नी को पूजा करते देख क्रोधित हुआ। उसने अपनी पत्नी से कहा कि तुम्हारी पूजा-पाठ करने से मेरा सारा धन चला गया।

साहूकारानी को भी बहुत दुख हुआ। उसने सोचा कि जब मैंने ब्राह्मणी के कहने पर बृहस्पतिवार का व्रत किया, तो मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? वह ब्राह्मणी के पास गई और अपनी सारी व्यथा सुनाई। ब्राह्मणी ने कहा कि तुमने व्रत तो रखा, परंतु दान-पुण्य नहीं किया। धन-संपत्ति आने पर भी तुम अपने धन का अभिमान करती रही। तुम्हें अपनी कंजूसी का त्याग करना होगा। दान करने से ही देवगुरु प्रसन्न होते हैं।

ब्राह्मणी की बात सुनकर साहूकारानी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने निश्चय किया कि अब वह पूरे नियम और श्रद्धा से व्रत करेगी और दान भी करेगी। अगले बृहस्पतिवार को उसने पुनः व्रत रखा और नियमपूर्वक पूजन किया। उसने गरीबों को पीले वस्त्र और चना दाल का दान किया। साहूकार ने भी अपनी पत्नी की सलाह मानकर दान-पुण्य करना शुरू किया। उनकी भक्ति और परोपकार से बृहस्पति देव प्रसन्न हुए। धीरे-धीरे साहूकार का व्यापार फिर से फलने-फूलने लगा और उसकी खोई हुई संपत्ति वापस लौट आई। उनका घर फिर से धन-धान्य से भर गया और वे सुखी जीवन जीने लगे। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और दान-पुण्य से ही देवगुरु बृहस्पति प्रसन्न होते हैं और भक्तों के जीवन में सुख-शांति प्रदान करते हैं।

**दोहा**
गुरु बृहस्पति देव कृपा करो, ज्ञान बढ़ाओ हे प्रभु।
धन, धान्य सुख संपत्ति दो, हर दुख संकट अब सबु।।

**चौपाई**
जयति जयति श्री गुरु देवा, जो करत सब जीव की सेवा।
विद्या बुद्धि ज्ञान दाता, सुख संपत्ति सब मन भाता।।
पीत वसन धर शुभ सोहैं, त्रय ताप सकल मन मोहैं।
विष्णु प्रिय गुरु पावनकारी, हरौ क्लेश सब संसारी।।

**पाठ करने की विधि**
बृहस्पतिवार के व्रत का अनुष्ठान अत्यंत सरल है, परंतु इसे पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ करना चाहिए। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो इस दिन पीले रंग के आसन पर ही बैठें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एक केले के पौधे को भी चौकी के पास रखें, यदि घर में हो तो। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। अब शुद्ध जल से आचमन करें और व्रत का संकल्प लें। संकल्प लेते समय हाथ में पुष्प, अक्षत और जल लेकर मन ही मन अपनी मनोकामना दोहराएं।

पूजन सामग्री में पीली वस्तुएं जैसे चने की दाल, हल्दी, गुड़, पीले फूल, पीली मिठाई (जैसे बेसन के लड्डू), केले, शहद, धूप, दीप और पीला चंदन अवश्य रखें। सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और उनकी पूजा करें। इसके बाद भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को पीले चंदन का तिलक लगाएं। उन्हें पीले पुष्प, चने की दाल (रातभर भिगोकर रखी हुई), गुड़, केले और पीली मिठाई अर्पित करें। धूप और दीप प्रज्वलित करें। अब ‘ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। इसके पश्चात् बृहस्पति व्रत कथा का पाठ करें अथवा किसी से सुनें। कथा सुनने के बाद कपूर से भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की आरती करें। आरती के बाद सभी को प्रसाद वितरित करें। प्रसाद में चने की दाल और केले का विशेष महत्व है।

पूरे दिन फलाहार व्रत रखें। शाम को भी एक बार पुनः दीप प्रज्वलित कर आरती करें। रात्रि में भोजन में नमक रहित पीली चीजों का सेवन करें, जैसे कि पीली दाल की खिचड़ी, बेसन की रोटी या दूध और केले का सेवन करें। व्रत का पारण अगले दिन शुक्रवार को स्नान आदि के बाद करें। इस व्रत में नमक का सेवन पूर्णतया वर्जित होता है।

**पाठ के लाभ**
बृहस्पतिवार का व्रत श्रद्धापूर्वक करने से अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण लाभ है ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि। देवगुरु बृहस्पति विद्या और विवेक के प्रदाता हैं, अतः इस व्रत से शिक्षा और करियर में सफलता मिलती है। विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और उनके दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है और विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपतियों को भी इस व्रत से लाभ होता है।

इसके अतिरिक्त, यह व्रत धन-धान्य और भौतिक सुखों में वृद्धि करता है। आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और घर में समृद्धि आती है। कुंडली में बृहस्पति ग्रह कमजोर होने पर उसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने में यह व्रत सहायक होता है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, क्योंकि यह व्रत मन को शांत और एकाग्र बनाता है। आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। व्यक्ति में परोपकार की भावना बढ़ती है और वह सद्कर्मों की ओर अग्रसर होता है। यह व्रत जीवन में आने वाली हर चुनौती का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है और अंततः मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है।

**नियम और सावधानियाँ**
बृहस्पतिवार के व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। सबसे पहले, इस दिन बाल धोना, नाखून काटना और दाढ़ी बनाना वर्जित माना जाता है। ऐसा करने से धन और मान-सम्मान की हानि हो सकती है। भोजन में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। केवल पीली वस्तुओं का ही सेवन करें और केवल एक समय ही भोजन ग्रहण करें। केले का सेवन न करें, क्योंकि केले के पौधे की पूजा की जाती है। यदि केले का सेवन आवश्यक हो तो पूजन सामग्री में अर्पित केले को स्वयं न खाकर किसी गाय या गरीब को दे दें।

इस दिन किसी को उधार देना या उधार लेना भी शुभ नहीं माना जाता। घर में पोछा लगाने से बचें, क्योंकि इससे घर की लक्ष्मी बाहर चली जाती है। यदि बहुत आवश्यक हो तो केवल पानी से पोंछा लगा सकते हैं, साबुन या डिटर्जेंट का उपयोग न करें। ब्राह्मणों, गुरुजनों और बड़ों का सम्मान करें। किसी का अपमान न करें और किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्य से दूर रहें। स्वच्छ मन और पवित्र विचारों के साथ ही व्रत का पालन करें। दान-पुण्य अवश्य करें, विशेष रूप से चने की दाल, गुड़ और पीले वस्त्र का दान करें। क्रोध, लोभ और अहंकार का त्याग करें। नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

**निष्कर्ष**
बृहस्पतिवार का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु स्वयं को देवत्व से जोड़ने का एक पवित्र माध्यम है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में धन के साथ-साथ ज्ञान, धर्म और परोपकार का भी उतना ही महत्व है। देवगुरु बृहस्पति की कृपा से न केवल हमारे भौतिक कष्ट दूर होते हैं, अपितु आध्यात्मिक चेतना का भी विकास होता है। इस व्रत को पूर्ण विश्वास और सच्चे हृदय से करने पर व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह हमें सद्गुणों को अपनाने और दुर्गुणों का त्याग करने की प्रेरणा देता है। जो भक्त इस पावन व्रत को नियमपूर्वक करते हैं, उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और संतोष का वास होता है। देवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु की असीम अनुकंपा उन पर सदैव बनी रहती है, और वे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करते हैं। आइए, इस व्रत के माध्यम से अपने जीवन को ज्ञान और भक्ति के प्रकाश से आलोकित करें।

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Category:
धार्मिक व्रत
पूजा विधि
सनातन परंपरा
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