गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश के जन्म और उनके प्रथम पूजनीय स्वरूप का स्मरण कराता है। यह ब्लॉग मोदक के मिठास, मूषक के रहस्य और मंगलमूर्ति के कल्याणकारी स्वरूप के गहन आध्यात्मिक अर्थ को उजागर करता है, जिससे भक्तों को विघ्नहर्ता की कृपा प्राप्त होती है।

गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश के जन्म और उनके प्रथम पूजनीय स्वरूप का स्मरण कराता है। यह ब्लॉग मोदक के मिठास, मूषक के रहस्य और मंगलमूर्ति के कल्याणकारी स्वरूप के गहन आध्यात्मिक अर्थ को उजागर करता है, जिससे भक्तों को विघ्नहर्ता की कृपा प्राप्त होती है।

गणेश चतुर्थी: मोदक, मूषक और मंगलमूर्ति का दिव्य रहस्य

**प्रस्तावना**
प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि, जिसे हम गणेश चतुर्थी के नाम से जानते हैं, भारतवर्ष में एक अनुपम उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह पावन पर्व सिर्फ भगवान गणेश के जन्मोत्सव का ही नहीं, अपितु उनके विराट व्यक्तित्व, उनकी अद्वितीय बुद्धि और उनकी करुणामयी प्रकृति का भी उत्सव है। भगवान गणेश, जो विघ्नहर्ता, बुद्धि प्रदाता और प्रथम पूज्य देव के रूप में पूजे जाते हैं, सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनकी उपासना से जीवन के समस्त विघ्न-बाधाएँ दूर होती हैं, ज्ञान और विवेक का प्रकाश फैलता है और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। इस शुभ अवसर पर उनके स्वरूप से जुड़ी हर एक वस्तु, चाहे वह उनके प्रिय मोदक हों या उनका नन्हा वाहन मूषक, गहरे आध्यात्मिक अर्थों को समेटे हुए है। गणेश चतुर्थी का यह पर्व हमें सिखाता है कि किस प्रकार हमें अपने भीतर के अहंकार को त्याग कर, ज्ञान और नम्रता के साथ जीवन पथ पर अग्रसर होना चाहिए। यह महोत्सव हमें अपने आराध्य के गुणों को आत्मसात करने और उनके दिव्य आशीर्वाद से अपने जीवन को धन्य बनाने का अवसर प्रदान करता है। मंगलमूर्ति गणेश की यह लीलाएँ हमें जीवन के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराती हैं और हमें सही मार्ग दिखाती हैं।

**पावन कथा**
एक बार कैलाश पर्वत पर सभी देवताओं के बीच यह विचार-विमर्श होने लगा कि सृष्टि में सबसे पहले किस देवता की पूजा की जानी चाहिए। यह प्रश्न इतना गहन था कि स्वयं देवर्षि नारद भी इसका समाधान नहीं कर पा रहे थे। तब भगवान शिव ने एक युक्ति सुझाई। उन्होंने कहा, “जो भी देवता तीनों लोकों की परिक्रमा सबसे पहले करके लौटेगा, उसे ही प्रथम पूज्य का अधिकार प्राप्त होगा।” यह सुनते ही सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर तीव्र गति से परिक्रमा के लिए निकल पड़े। देवराज इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर, भगवान कार्तिकेय अपने मयूर वाहन पर, और अन्य देवता भी अपने-अपने शक्तिशाली वाहनों पर आरूढ़ होकर वायु वेग से दौड़ पड़े।

परंतु, भगवान गणेश वहाँ उपस्थित थे, जिनका वाहन एक छोटा सा मूषक था। उन्हें देखकर कुछ देवताओं ने उपहास किया, यह सोचकर कि भला यह छोटे से मूषक पर सवार होकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कैसे करेंगे? गणेश जी शांत भाव से मंद-मंद मुस्कुराते रहे। उन्होंने किसी भी प्रकार की दौड़-धूप नहीं की। जब सभी देवता अपनी-अपनी यात्रा पर निकल पड़े, तब गणेश जी ने एक अद्भुत कार्य किया। उन्होंने अपने माता-पिता, भगवान शिव और माता पार्वती को एक आसन पर बैठाया, उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और अत्यंत भक्तिभाव से उनकी सात बार परिक्रमा की। परिक्रमा पूर्ण होने पर, उन्होंने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा, “हे माता-पिता! मेरे लिए तो आप ही संपूर्ण ब्रह्मांड हैं, और आपके चरणों में ही तीनों लोक समाहित हैं। मैंने अपनी परिक्रमा पूर्ण कर ली है।”

जब अन्य देवता लंबी और थका देने वाली यात्रा के बाद लौटे, तो उन्होंने देखा कि गणेश जी तो पहले से ही आसन पर विराजमान हैं। नारद मुनि ने यह देखकर आश्चर्यचकित होकर गणेश जी से पूछा कि उन्होंने इतनी शीघ्रता से यह कार्य कैसे संपन्न किया। तब गणेश जी ने अपनी माता-पिता की परिक्रमा का रहस्य बताया और कहा कि शास्त्र कहते हैं कि माता-पिता की सेवा और उनके प्रति श्रद्धा ही समस्त तीर्थों और ब्रह्मांड की परिक्रमा के समान है। सभी देवता गणेश जी की इस अनुपम बुद्धि और अपने माता-पिता के प्रति उनके अटूट प्रेम को देखकर नतमस्तक हो गए।

भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि भविष्य में समस्त शुभ कार्यों से पूर्व उनकी ही पूजा की जाएगी और जो कोई भी उनकी पूजा नहीं करेगा, उसके सभी कार्य अधूरे रह जाएँगे। इसी क्षण से गणेश जी को “विघ्नहर्ता” और “प्रथम पूज्य” का गौरव प्राप्त हुआ। माता पार्वती ने भी स्नेहपूर्वक उन्हें मोदकों का हार पहनाया। मोदक, जो गणेश जी को अत्यंत प्रिय हैं, ज्ञान और आनंद का प्रतीक हैं। उनका बाहरी स्वरूप भले ही सामान्य दिखे, पर भीतर से वे ज्ञान की मधुरता से भरे होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सच्चा ज्ञान बाहर से आडंबरहीन पर भीतर से परम आनंददायक होता है।

उनका वाहन मूषक भी गहरे अर्थ समेटे हुए है। मूषक भले ही छोटा हो, पर वह अत्यंत चंचल, तीव्र और किसी भी जगह पहुँचने में सक्षम होता है। यह हमारी इंद्रियों और चंचल मन का प्रतीक है। भगवान गणेश का मूषक पर सवार होना यह दर्शाता है कि वे अपनी इंद्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं। यह हमें सिखाता है कि भले ही हमारा मन कितना भी चंचल क्यों न हो, हम उसे नियंत्रित करके जीवन में महान लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। इस घटना के बाद से भगवान गणेश “मंगलमूर्ति” के नाम से भी विख्यात हुए, क्योंकि उनकी पूजा से सभी अमंगल दूर होकर शुभ और कल्याण ही होता है। इस प्रकार, मोदक, मूषक और मंगलमूर्ति – ये तीनों ही भगवान गणेश के दिव्य और करुणामयी स्वरूप के अभिन्न अंग बन गए, जो भक्तों को ज्ञान, सिद्धि और सुख का मार्ग दिखाते हैं।

**दोहा**
करि सुमिरन गणपति चरण, विघ्न हरें सब आप।
रिद्धि सिद्धि शुभ लाभ दें, मेटें सकल संताप॥

**चौपाई**
जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय जय सुरपाल॥
मूषक वाहन सोहत सुंदर, मोदक प्रिय लंबोदर।
मंगलमूर्ति नाम तिहारो, संकट हरो हे गणराया॥
प्रथम पूज्य तुम देव हमारे, ज्ञान बुद्धि के दाता प्यारे।
जो सुमिरत तुमको मन लाई, सकल मनोरथ पूर्ण होई॥
बुद्धि विवेक के सागर स्वामी, देवों में तुम अंतर्यामी।
रिद्धि सिद्धि संग विराजे, भक्तों के संकट तुम ही मेटे॥

**पाठ करने की विधि**
गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर भगवान गणेश की पूजा-अर्चना अत्यंत विधि-विधान से की जाती है। सबसे पहले, प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद, गणेश जी का आह्वान करें और उन्हें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण) से स्नान कराएँ। फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर उन्हें नए वस्त्र (मौली या कोई वस्त्र) अर्पित करें।

गणेश जी को लाल चंदन का तिलक लगाएँ, उन्हें पुष्प माला, सिंदूर, अक्षत (अखंड चावल) और दूर्वा घास (21 दूर्वा की गांठें गणेश जी को विशेष रूप से प्रिय हैं) अर्पित करें। धूप और दीप प्रज्वलित करें। अब सबसे महत्वपूर्ण भोग अर्पित करने का समय आता है। गणेश जी को मोदक (21 मोदक अत्यंत शुभ माने जाते हैं), लड्डू और अन्य मौसमी फल अर्पित करें। इसके बाद, गणेश अथर्वशीर्ष, गणेश चालीसा या गणेश स्तोत्र का पाठ करें। “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। अंत में, आरती करें और परिवार सहित भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त करें। पूजा के बाद प्रसाद सभी में वितरित करें। यह पूजा सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ की जानी चाहिए, जिससे गणेश जी की असीम कृपा प्राप्त होती है।

**पाठ के लाभ**
भगवान गणेश की उपासना और गणेश चतुर्थी पर उनकी विधिपूर्वक पूजा-अर्चना भक्तों के जीवन में अनेक प्रकार के लाभ लेकर आती है। सर्वप्रथम और सर्वोपरि, भगवान गणेश ‘विघ्नहर्ता’ के रूप में पूजे जाते हैं। उनकी कृपा से जीवन के समस्त विघ्न और बाधाएँ दूर होती हैं, जिससे व्यक्ति अपने लक्ष्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त कर पाता है। गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं। उनकी आराधना से स्मरण शक्ति तीव्र होती है, एकाग्रता बढ़ती है और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है। छात्र वर्ग के लिए यह विशेष रूप से लाभकारी है, क्योंकि इससे उन्हें विद्या अध्ययन में सफलता मिलती है।

भगवान गणेश रिद्धि और सिद्धि के स्वामी हैं। रिद्धि का अर्थ है समृद्धि और सिद्धि का अर्थ है पूर्णता। उनकी पूजा से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है, व्यापार में लाभ होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है। व्यक्ति को मानसिक शांति और संतोष की प्राप्ति होती है, जिससे तनाव और चिंताएँ दूर होती हैं। गणेश जी को मंगलमूर्ति भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है सभी प्रकार के शुभ और कल्याणकारी फल प्रदान करने वाले। उनकी पूजा से घर में सुख, शांति और खुशहाली का वास होता है, और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इसके अतिरिक्त, जो भक्त पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ गणेश जी की पूजा करते हैं, उन्हें आत्मिक बल और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह पूजा आत्म-ज्ञान और मोक्ष के मार्ग को भी प्रशस्त करती है, जिससे जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त होता है।

**नियम और सावधानियाँ**
गणेश चतुर्थी की पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और कोई त्रुटि न हो। सबसे महत्वपूर्ण है शारीरिक और मानसिक पवित्रता। पूजा से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के दौरान मन को शांत और शुद्ध रखें, किसी भी प्रकार के क्रोध, ईर्ष्या या नकारात्मक विचार से बचें। भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करते समय, सुनिश्चित करें कि दिशा ईशान कोण या पूर्व दिशा हो, क्योंकि यह शुभ मानी जाती है।

पूरे दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन जैसे तामसिक भोजन का सेवन वर्जित है। व्रत रखने वाले भक्त केवल फलाहार कर सकते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन से बचना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से ‘मिथ्या कलंक’ लगता है। यदि भूलवश चंद्रमा दिख जाए तो गणेश मंत्रों का जाप करना या कोई कथा सुनना चाहिए। दूर्वा और मोदक के बिना गणेश पूजा अधूरी मानी जाती है, अतः इन्हें अवश्य अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल का प्रयोग न करें, क्योंकि एक कथा के अनुसार गणेश जी ने तुलसी को श्राप दिया था। पूजा के दौरान किसी भी जीव-जंतु को कष्ट न पहुँचाएँ। अंत में, विसर्जन से पहले गणेश जी से अपनी भूलों के लिए क्षमा याचना करें और अगले वर्ष फिर से पधारने की प्रार्थना करें। इन नियमों का पालन करने से गणेश जी की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

**निष्कर्ष**
गणेश चतुर्थी का यह पावन पर्व मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला एक आध्यात्मिक संदेश है। भगवान गणेश का विराट व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि किस प्रकार बुद्धि, विवेक और नम्रता के साथ हम जीवन की हर चुनौती का सामना कर सकते हैं। उनके प्रिय मोदक हमें ज्ञान की मधुरता और संतुष्टि का पाठ पढ़ाते हैं, जबकि उनका मूषक वाहन हमें यह स्मरण कराता है कि इंद्रियों पर नियंत्रण ही सच्ची शक्ति है। मंगलमूर्ति गणेश की कृपा से हमारे जीवन के सभी अमंगल दूर होते हैं और शुभता का आगमन होता है। आइए, इस गणेश चतुर्थी पर हम सब भगवान गणेश के इन दिव्य गुणों को अपने जीवन में आत्मसात करें। उनके प्रति अपनी श्रद्धा को और भी गहरा करें और यह संकल्प लें कि हम भी उनके दिखाए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाएँगे। विघ्नहर्ता गणेश हम सभी पर अपनी असीम कृपा बरसाएँ और हमें सुख, समृद्धि, ज्ञान तथा शांति प्रदान करें। जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा! आपकी कृपा से सबका कल्याण हो।

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Category: गणेश उत्सव, हिन्दू पर्व, भक्ति साहित्य
Slug: ganesh-chaturthi-modak-mushak-mangalmurti-divya-rahasya
Tags: गणेश चतुर्थी, मोदक, मूषक वाहन, मंगलमूर्ति, विघ्नहर्ता, संकटनाशन, बुद्धि प्रदाता, सिद्धि विनायक

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