दशहरा 2024: रावण दहन से आत्म-जागरण तक – विजयादशमी का पावन संदेश
**प्रस्तावना**
शरद ऋतु के आगमन के साथ ही भारतवर्ष में त्योहारों की एक अनूठी श्रृंखला प्रारंभ हो जाती है। इन्हीं में से एक है विजयादशमी, जिसे हम दशहरा के नाम से भी जानते हैं। यह केवल एक पर्व नहीं, अपितु अधर्म पर धर्म की, असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की विजय का शाश्वत प्रतीक है। वर्ष 2024 का दशहरा हमें एक बार फिर इस गहन आध्यात्मिक सत्य को आत्मसात करने का अवसर प्रदान कर रहा है। भगवान श्रीराम के लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करने का यह पावन दिन हमें केवल बाहरी रावण का दहन ही नहीं सिखाता, बल्कि हमारे भीतर छिपी अहंता, द्वेष और अज्ञानता रूपी बुराइयों को भी भस्म करने की प्रेरणा देता है। रामलीला के मंचन से लेकर रावण के पुतले के दहन तक, हर क्रिया में एक गहरा संदेश छिपा है। यह पर्व हमें बताता है कि चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः असत्य का साम्राज्य ढह जाता है और धर्म की पताका ही लहराती है। आज के समय में जब चारों ओर विभिन्न प्रकार की नकारात्मकता और चुनौतियाँ व्याप्त हैं, दशहरा का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें अपने नैतिक मूल्यों को बनाए रखने और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करता है।
**पावन कथा**
त्रेता युग की वह गौरवशाली गाथा, जो सदियों से भारतीय संस्कृति की आत्मा बनी हुई है, विजयादशमी के दिन चरितार्थ हुई थी। अयोध्या के महाराज दशरथ के पुत्र, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने पिता के वचन का पालन करते हुए चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार किया। उनकी धर्मपत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण भी उनके साथ वन को चले गए। वनवास के दौरान ही, लंका के अत्यंत बलशाली, महाज्ञानी किंतु अहंकारी राक्षसराज रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया। यह घटना सत्य और धर्म पर अधर्म के प्रहार की शुरुआत थी।
माता सीता को खोजते हुए भगवान राम किष्किंधा पहुँचे, जहाँ उनका मिलन पवनपुत्र हनुमान और सुग्रीव से हुआ। हनुमानजी ने अतुलनीय पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए लंका जाकर माता सीता का पता लगाया और उन्हें प्रभु राम के आने का संदेश दिया। हनुमानजी ने लंका दहन कर रावण की शक्ति का भी पूर्वाभास कराया। इसके पश्चात् भगवान श्रीराम ने वानर सेना और भालुओं के सहयोग से समुद्र पर ‘रामसेतु’ का निर्माण कराया, जो उनकी अटूट आस्था, संकल्प शक्ति और असंभव को संभव करने की क्षमता का प्रतीक है।
लंका पहुँचकर भगवान राम ने रावण को अनेक अवसर दिए कि वह माता सीता को ससम्मान लौटा दे, परंतु रावण का अहंकार इतना प्रबल था कि उसने धर्म और न्याय के मार्ग को ठुकरा दिया। तब युद्ध अनिवार्य हो गया। भगवान श्रीराम की सेना और रावण की विशाल राक्षस सेना के बीच भयंकर संग्राम छिड़ गया। इस युद्ध में रावण के अनेक पराक्रमी योद्धा जैसे कुंभकरण और मेघनाद वीरगति को प्राप्त हुए। रावण स्वयं परम शिवभक्त और वेदों का ज्ञाता था, लेकिन उसके अहंकार, परस्त्री हरण के पाप और अधर्म ने उसे विनाश की ओर धकेल दिया था।
अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर धर्म की स्थापना की। रावण के वध के साथ ही पृथ्वी से पाप और अधर्म का एक बड़ा भार उतर गया। यह केवल एक राजा पर दूसरे राजा की विजय नहीं थी, बल्कि यह धर्म, न्याय, सत्यनिष्ठा और त्याग की अधर्म, अन्याय, छल और अहंकार पर विजय थी। रावण दहन के पश्चात् माता सीता को अशोक वाटिका से मुक्त कराया गया और भगवान राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान सहित अयोध्या लौटे। उनके अयोध्या आगमन पर दीप जलाकर भव्य स्वागत किया गया, जिसे आज हम दीपावली के रूप में मनाते हैं। विजयादशमी का यह पर्व हमें सदैव स्मरण कराता है कि अंततः जीत सत्य और धर्म की ही होती है, चाहे मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो।
**दोहा**
दशमी तिथि पावन अति, प्रभु राम किए संहार।
रावण संग हर पाप जले, हो जीवन में उद्धार।।
**चौपाई**
बुराई पर विजय का, यह पर्व महान।
धर्म की पताका फहराए, श्री राम का ध्यान।।
अहंकार का हो दहन, क्रोध का विनाश।
मन में जागे सद्भाव, मिटे अज्ञान का पाश।।
**पाठ करने की विधि**
विजयादशमी के पावन पर्व पर केवल रावण दहन का दर्शन करना ही पर्याप्त नहीं, अपितु इसके आध्यात्मिक संदेश को अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक पाठ है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें। अपने घर के पूजा स्थल को स्वच्छ करें और भगवान श्रीराम, माता सीता तथा हनुमानजी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। सर्वप्रथम भगवान गणेश का स्मरण कर पूजा का संकल्प लें। इसके पश्चात् भगवान श्रीराम का विधिवत पूजन करें। उन्हें रोली, चंदन, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
इस दिन सुंदरकांड का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह हनुमानजी के पराक्रम और प्रभु राम के प्रति उनकी निष्ठा का प्रतीक है। यदि संभव हो तो श्रीरामचरितमानस के ‘लंकाकांड’ का पाठ करें, जिसमें राम-रावण युद्ध और धर्म की विजय का विस्तृत वर्णन है। इन पाठों को एकाग्र मन से और पूर्ण श्रद्धा भाव से करें। पाठ करते समय अपने मन में उन बुराइयों का स्मरण करें, जिन्हें आप अपने भीतर से मिटाना चाहते हैं – जैसे क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या। संकल्प लें कि इन बुराइयों का दहन भी रावण दहन के साथ ही करेंगे। शाम को रावण दहन के कार्यक्रम में शामिल हों और इस प्रतीक को अपने जीवन में आत्मसात करें कि हर बुराई का अंत निश्चित है। अंत में भगवान श्रीराम की आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
**पाठ के लाभ**
विजयादशमी के पावन पाठ और उसके आध्यात्मिक संदेश को आत्मसात करने से जीवन में अनेक शुभ लाभ प्राप्त होते हैं। सर्वप्रथम, यह मन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास का संचार करता है। जब हम धर्म की विजय का स्मरण करते हैं, तो हमें भी अपने जीवन की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है। सुंदरकांड या रामचरितमानस के पाठ से मानसिक शांति प्राप्त होती है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं। यह हमारी आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है और हमें सही-गलत का भेद समझने में सहायता करता है।
इस दिन भगवान श्रीराम का स्मरण करने से संकटों का नाश होता है और भय से मुक्ति मिलती है। यह हमें नैतिक और धार्मिक मूल्यों पर अडिग रहने की शक्ति देता है। रावण दहन का प्रतीक हमें सिखाता है कि अहंकार और बुराई का रास्ता अंततः पतन की ओर ले जाता है, जबकि विनम्रता और सत्य का मार्ग विजय दिलाता है। इस पाठ से व्यक्ति के भीतर आत्म-नियंत्रण, धैर्य और क्षमा जैसे दैवीय गुणों का विकास होता है। पारिवारिक एकता बढ़ती है और समाज में सद्भाव का वातावरण निर्मित होता है, क्योंकि यह पर्व हमें एक होकर बुराई का सामना करने की सीख देता है। अंततः, यह हमें मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है और जीवन को सार्थक बनाता है।
**नियम और सावधानियाँ**
विजयादशमी के पावन पर्व को श्रद्धा और निष्ठा के साथ मनाने के लिए कुछ नियमों और सावधानियों का पालन करना आवश्यक है। सर्वप्रथम, इस दिन सात्विकता बनाए रखें। मांस, मदिरा जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन कदापि न करें। मन में किसी के प्रति द्वेष या ईर्ष्या का भाव न रखें। पूजा-पाठ और अनुष्ठानों के दौरान पूर्ण पवित्रता का ध्यान रखें। स्नान के पश्चात् स्वच्छ वस्त्र ही धारण करें।
यदि आप सुंदरकांड या रामचरितमानस का पाठ कर रहे हैं, तो उसे पूरे ध्यान और उच्चारण की शुद्धता के साथ करें। पाठ के बीच में अनावश्यक वार्तालाप से बचें। बच्चों को रामलीला और रावण दहन के पीछे की कथा और उसके नैतिक मूल्यों से अवगत कराएँ, ताकि वे भी इस पर्व के वास्तविक अर्थ को समझ सकें। पटाखों का प्रयोग करते समय सावधानी बरतें और पर्यावरण का भी ध्यान रखें। अति उत्साह में आकर किसी को ठेस न पहुँचाएँ। रावण दहन को केवल एक मनोरंजन न मानकर, उसे अपनी आंतरिक बुराइयों के दहन का प्रतीक मानें और संकल्प लें कि आप उन बुराइयों का त्याग करेंगे। दूसरों के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव रखें, यही इस पर्व का मूल संदेश है।
**निष्कर्ष**
दशहरा 2024 हमें केवल एक पौराणिक विजय गाथा का स्मरण कराने वाला पर्व नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के हर मोड़ पर सत्य, धर्म और न्याय की स्थापना का आह्वान है। भगवान श्रीराम ने जिस प्रकार लंकापति रावण का वध कर धर्म की विजय पताका फहराई, उसी प्रकार हमें भी अपने भीतर के रावण – अहंकार, लोभ, क्रोध, मोह, ईर्ष्या – का दहन करना होगा। यह पर्व हमें बताता है कि जीवन में संघर्ष अवश्यंभावी हैं, परंतु यदि हम सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहें, तो विजय हमारी ही होगी।
रामलीला के मंचन और रावण दहन के भव्य कार्यक्रमों के बीच, हमें इस पर्व के गहन आध्यात्मिक अर्थ को समझना चाहिए। यह आत्म-चिंतन और आत्म-शुद्धि का अवसर है। आइए, इस विजयादशमी पर हम सब संकल्प लें कि हम अपने आचरण को शुद्ध रखेंगे, दूसरों के प्रति सद्भावना रखेंगे और समाज में धर्म तथा नैतिकता की स्थापना में अपना योगदान देंगे। यही वास्तविक दशहरा है – जहाँ बाहर का रावण जलने के साथ-साथ, भीतर का रावण भी भस्म होता है। सनातन धर्म का यह पावन पर्व हमें सदाचार और धर्मपरायणता की राह दिखाता रहे, यही हमारी प्रार्थना है। जय श्रीराम!
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Category: दशहरा, सनातन धर्म, आध्यात्मिक जीवन
Slug: dussehra-2024-spiritual-meaning-victory-over-evil
Tags: दशहरा, विजयादशमी, रामलीला, धर्म विजय, आध्यात्मिक महत्व, बुराई पर अच्छाई, श्रीराम, सनातन स्वर

