सावन में करें भोलेनाथ की विशेष पूजा, पाएं महादेव का असीम आशीर्वाद और मनोकामना पूर्ति का वरदान
प्रस्तावना
सावन का महीना, शिव भक्तों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं। यह वह पवित्र मास है जब कण-कण में शिवत्व का वास होता है, और प्रकृति भी भोलेनाथ की भक्ति में लीन प्रतीत होती है। वर्षा की रिमझिम फुहारें, हरियाली से आच्छादित धरा और शीतल समीर, सभी शिव महिमा का गुणगान करते हैं। देवों के देव महादेव को समर्पित यह मास भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का अनुपम संदेश लेकर आता है। इस पूरे मास में भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष आराधना से असंभव भी संभव हो जाता है। सावन सोमवार के व्रत, शिव मंत्रों का जाप, रुद्राभिषेक और विभिन्न प्रकार के शिव पूजन से महादेव प्रसन्न होकर अपने भक्तों की हर इच्छा पूर्ण करते हैं। यह कालखंड आध्यात्मिक उन्नति, आत्मशुद्धि और मानसिक शांति के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। सावन मास के दौरान पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व बताया गया है, जो तन और मन दोनों को पवित्र करता है। शिव पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में इस मास की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो हमें भगवान शिव की असीम कृपा को प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है। आइए, इस पावन सावन मास में हम महादेव की महिमा का गुणगान करें और जानें कैसे उनकी कृपा प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।
पावन कथा
प्राचीन काल की बात है, क्षीरसागर मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला, तो समस्त ब्रह्मांड में त्राहि-त्राहि मच गई। उस भयंकर विष की ज्वाला से देवता, असुर और मनुष्य सभी भयभीत थे। कोई भी उस विष को ग्रहण करने को तैयार नहीं था, क्योंकि उसके संपर्क में आते ही जीवन का अंत निश्चित था। तब सभी देवतागण, भगवान विष्णु के साथ मिलकर कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के पास पहुंचे और उनसे इस संकट से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। महादेव, जो करुणा के सागर हैं और अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, उन्होंने बिना किसी संकोच के उस भयंकर हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। यह देखकर सभी देवतागण आश्चर्यचकित रह गए। विष के प्रभाव से महादेव का कंठ नीला पड़ गया और तभी से वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। इस घटना से ब्रह्मांड का विनाश टल गया और सभी प्राणियों की रक्षा हुई। यह घटना सावन मास में ही घटित हुई थी, ऐसा माना जाता है। इसीलिए सावन मास में भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी माह में उन्होंने संसार को विनाश से बचाया था।
एक और पावन कथा के अनुसार, माता सती ने हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में दूसरा जन्म लिया। भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए उन्होंने सावन मास में कठोर तपस्या की थी। उन्होंने निराहार रहकर केवल बेलपत्र और जल का सेवन कर महादेव को प्रसन्न करने का प्रयास किया। माता पार्वती की अटूट निष्ठा और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। तभी से यह माना जाता है कि सावन मास में भगवान शिव और माता पार्वती की एक साथ पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है। शिव और शक्ति का यह मिलन सृष्टि के संतुलन और प्रेम के महत्व को दर्शाता है।
पुराणों में वर्णित एक और कथा के अनुसार, ऋषि मार्कण्डेय ने अपनी अल्पायु को जानकर भगवान शिव की कठोर तपस्या की। वे जानते थे कि उनकी मृत्यु अठारह वर्ष की आयु में हो जाएगी। जब यमराज उनके प्राण लेने आए, तो मार्कण्डेय ऋषि शिव लिंग से लिपट गए और ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का जाप करने लगे। भगवान शिव प्रकट हुए और यमराज को परास्त कर मार्कण्डेय को अमरता का वरदान दिया। यह घटना भी सावन मास में हुई थी। यह कथा दर्शाती है कि भगवान शिव अपने सच्चे भक्तों की रक्षा हर संकट से करते हैं और उन्हें काल के भय से भी मुक्त कर देते हैं। सावन का महीना शिवभक्ति और उनकी महिमा को स्मरण करने का अद्भुत अवसर प्रदान करता है, जहां भक्त विभिन्न प्रकार से भोलेनाथ को प्रसन्न कर सकते हैं और उनके असीम आशीर्वाद के भागी बन सकते हैं। इस मास में की गई भक्ति शीघ्र फलदायी होती है और महादेव अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं, उन्हें सुख-समृद्धि और आरोग्य का वरदान देते हैं।
दोहा
सावन मास अति पुण्यकर, शिव को भावे जलधार।
जो नर पूजन प्रेम से, पावे भव से उद्धार॥
चौपाई
जय जय शिव शंभु अविनाशी, सकल जगत के तुम हो वासी।
कंठ विषधर त्रिनयन धारी, भक्तन के संकट हरनहारी॥
शीश जटा गंग धार सुहाई, नागेश्वर शोभा अति पाई।
डमरूधारी कैलाशपति, हर हर महादेव जय जगपति॥
जो जन सावन मास सुहावन, करे भक्ति तज सब छल पावन।
सो फल पावे मनवांछित, शिव कृपा से हो आनंदित॥
पाठ करने की विधि
सावन मास में भगवान शिव की पूजा करने के लिए कुछ विशेष विधियाँ हैं, जिनका पालन करने से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सर्वप्रथम, प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो हरे या सफेद वस्त्र पहनें, क्योंकि ये रंग शिव को प्रिय हैं। स्वच्छ मन और शरीर से ही पूजा का आरंभ करें।
अपने घर के पूजा स्थान पर या किसी शिव मंदिर में जाकर पूजा प्रारंभ करें। एक स्वच्छ चौकी पर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें। यदि शिवलिंग उपलब्ध न हो तो आप शिव-पार्वती की तस्वीर का भी पूजन कर सकते हैं।
सबसे पहले शुद्ध जल से शिवलिंग का अभिषेक करें। इसके बाद गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और गन्ने के रस से क्रमानुसार अभिषेक करें। प्रत्येक अभिषेक के बाद शुद्ध जल से स्नान कराएँ ताकि पिछली सामग्री के अवशेष न रहें। ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप निरंतर करते रहें।
अभिषेक के पश्चात चंदन, भस्म और रोली से शिवलिंग पर तिलक करें। महादेव को चंदन और भस्म अत्यंत प्रिय है, जो शीतलता और वैराग्य का प्रतीक है।
बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, कनेर के फूल और शमी पत्र अर्पित करें। बेलपत्र अर्पित करते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप अवश्य करें और ध्यान रहे कि बेलपत्र की चिकनी सतह शिवलिंग को स्पर्श करे। शिव को भांग और इत्र भी अर्पित किया जाता है।
इसके बाद धूप और दीप प्रज्वलित करें। भगवान शिव को भोग में भांग, नैवेद्य, ऋतु फल, मिठाई और पंचामृत अर्पित करें। इस दौरान शिव चालीसा, शिव तांडव स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र या ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। सावन सोमवार के दिन विशेष रूप से व्रत रखें और इन विधियों का पालन करें, साथ ही शिव मंदिर में जाकर जलाभिषेक अवश्य करें।
शिव आरती गाकर पूजा का समापन करें और अंत में क्षमा प्रार्थना अवश्य करें, क्योंकि अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगना आवश्यक है। इस विधि से पूजा करने पर भगवान शिव शीघ्र ही प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
पाठ के लाभ
सावन मास में भगवान शिव की आराधना और विशेष पूजन से अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं, जो भक्तों के जीवन को सुखमय बनाते हैं और उन्हें आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं:
1. **मनोकामना पूर्ति**: सच्चे मन से की गई पूजा और व्रत से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। निःसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है।
2. **रोगों से मुक्ति**: महामृत्युंजय मंत्र का जाप और शिव का अभिषेक करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति स्वस्थ एवं दीर्घायु होता है। यह मंत्र अकाल मृत्यु के भय को भी दूर करता है।
3. **आर्थिक समृद्धि**: भगवान शिव की कृपा से धन-धान्य की कमी दूर होती है और व्यापार-व्यवसाय में उन्नति होती है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने से दरिद्रता का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
4. **ग्रह दोष निवारण**: कुंडली में अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए सावन मास में शिव पूजन अत्यंत लाभकारी होता है। विशेषकर शनि दोष, राहु-केतु के दुष्प्रभावों और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। शिव पूजा से नवग्रहों की शांति होती है।
5. **मोक्ष प्राप्ति**: आध्यात्मिक दृष्टि से, शिव पूजन से मन शुद्ध होता है, आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यह हमें सांसारिक मोह माया से ऊपर उठकर परमात्मा से जुड़ने में मदद करता है।
6. **भय मुक्ति**: काल मृत्यु का भय दूर होता है और व्यक्ति हर प्रकार के संकटों से सुरक्षित रहता है, जैसा कि मार्कण्डेय ऋषि की कथा में वर्णित है। महादेव अपने भक्तों की हर विपत्ति में रक्षा करते हैं।
7. **मानसिक शांति**: सावन में शिव भक्ति और ध्यान से मन शांत होता है, तनाव कम होता है और मानसिक एकाग्रता बढ़ती है। यह हमें आंतरिक शांति और संतोष प्रदान करता है।
इन सभी लाभों को प्राप्त करने के लिए सावन मास में पूरी श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा के साथ भगवान शिव की पूजा अर्चना करनी चाहिए। उनकी कृपा से जीवन में आने वाली हर चुनौती का सामना करने की शक्ति मिलती है।
नियम और सावधानियाँ
सावन मास में शिव पूजा करते समय कुछ नियमों और सावधानियों का पालन करना आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और किसी प्रकार के दोष से बचा जा सके:
1. **सात्विकता**: सावन मास में मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। पूर्ण रूप से सात्विक भोजन ग्रहण करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। यह शारीरिक और मानसिक शुद्धि के लिए आवश्यक है।
2. **क्रोध और लोभ त्याग**: मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध, लोभ या अन्य नकारात्मक भाव न रखें। शांत और सकारात्मक मन से पूजा करें। दूसरों की निंदा और व्यर्थ की बातों से बचें।
3. **बेलपत्र चयन**: बेलपत्र तीन पत्तों वाला होना चाहिए और कटा-फटा नहीं होना चाहिए। बेलपत्र को तोड़ने से पहले स्नान करना चाहिए और डंठल वाले हिस्से को शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए। एक ही बेलपत्र को धोकर बार-बार भी चढ़ाया जा सकता है।
4. **तुलसी वर्जित**: भगवान शिव की पूजा में तुलसी दल का प्रयोग नहीं किया जाता है, क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने असुर जालंधर का वध किया था, जिसकी पत्नी वृंदा (तुलसी का रूप) थीं। इसलिए तुलसी शिव को अप्रिय मानी जाती है।
5. **हल्दी और कुमकुम वर्जित**: शिवलिंग पर हल्दी और कुमकुम नहीं चढ़ाए जाते हैं, क्योंकि ये स्त्रियों से संबंधित सौंदर्य प्रसाधन हैं और शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है। इसके स्थान पर चंदन और भस्म का प्रयोग करें।
6. **केतकी और चम्पा वर्जित**: केतकी और चम्पा के फूल शिव को अप्रिय हैं, इसलिए इन्हें पूजा में उपयोग न करें। भगवान शिव को आक, धतूरा, कनेर और हरसिंगार के फूल अति प्रिय हैं।
7. **अभिषेक सामग्री**: अभिषेक करते समय तांबे के लोटे का उपयोग करें। लोहे, स्टील या प्लास्टिक के बर्तन का उपयोग न करें। अभिषेक के बाद शिवलिंग को पूरी तरह से साफ करें।
8. **नमक का त्याग**: यदि सावन सोमवार का व्रत रख रहे हैं, तो सेंधा नमक का भी सेवन न करें। फलाहार या दूध का सेवन कर सकते हैं। व्रत में अनाज का सेवन वर्जित है।
9. **अति निद्रा त्याग**: व्रत के दौरान दिन में सोना नहीं चाहिए और रात्रि जागरण कर शिव महिमा का गुणगान करना चाहिए। यह भक्ति और तपस्या का महत्वपूर्ण अंग है।
10. **पूर्व दिशा में मुख**: पूजा करते समय अपना मुख पूर्व दिशा की ओर रखें। यह अत्यंत शुभ माना जाता है।
इन नियमों का पालन करते हुए की गई पूजा से भगवान शिव अवश्य प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को असीम कृपा प्रदान करते हैं। यह नियम हमारी भक्ति को शुद्ध और प्रभावी बनाते हैं।
निष्कर्ष
सावन का पवित्र मास आध्यात्मिक ऊर्जा और शिव भक्ति का महापर्व है। यह हमें सिखाता है कि कैसे त्याग, तपस्या और सच्ची श्रद्धा से हम जीवन की हर बाधा को पार कर सकते हैं। महादेव, जो स्वयं विष का पान कर नीलकंठ कहलाए, वे हमें यह संदेश देते हैं कि परोपकार और प्रेम से बड़ा कोई धर्म नहीं। सावन मास में की गई शिव आराधना न केवल हमारे भौतिक कष्टों को दूर करती है, बल्कि हमारी आत्मा को भी शुद्ध करती है, हमें परम शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर करती है। इस मास में शिव पूजन से मन में सकारात्मकता आती है, जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है और सभी प्रकार के भय दूर होते हैं। यह एक ऐसा अवसर है जब प्रकृति स्वयं महादेव की भक्ति में लीन होती है और हमें भी उनके करीब आने का सुअवसर प्रदान करती है। तो आइए, इस पावन अवसर पर हम सब अपने मन, वचन और कर्म से भोलेनाथ की शरण में जाएं, उनकी महिमा का गुणगान करें और उनके असीम आशीर्वाद के भागी बनें। हर हर महादेव, शंभु।

