सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व, अक्षय तृतीया, इस वर्ष हमें अक्षय पुण्य अर्जित करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान कर रहा है। यह वह अद्भुत दिवस है जब किए गए सभी शुभ कार्य, दान-पुण्य और तप कभी क्षय नहीं होते, अर्थात् उनका फल अविनाशी होता है। भगवान परशुराम की जयंती, मां गंगा का अवतरण और युगादि तिथि के रूप में इसकी महत्ता हमें अपने पूर्वजों और संस्कृति से जोड़ती है। आइए, इस लेख में अक्षय तृतीया के महत्व, इसकी पावन कथाओं, पूजा विधि, लाभ और उन नियमों को विस्तार से जानें, जो हमें इस दिन अधिकतम शुभ फल प्राप्त करने में सहायता करेंगे।

सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व, अक्षय तृतीया, इस वर्ष हमें अक्षय पुण्य अर्जित करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान कर रहा है। यह वह अद्भुत दिवस है जब किए गए सभी शुभ कार्य, दान-पुण्य और तप कभी क्षय नहीं होते, अर्थात् उनका फल अविनाशी होता है। भगवान परशुराम की जयंती, मां गंगा का अवतरण और युगादि तिथि के रूप में इसकी महत्ता हमें अपने पूर्वजों और संस्कृति से जोड़ती है। आइए, इस लेख में अक्षय तृतीया के महत्व, इसकी पावन कथाओं, पूजा विधि, लाभ और उन नियमों को विस्तार से जानें, जो हमें इस दिन अधिकतम शुभ फल प्राप्त करने में सहायता करेंगे।

अक्षय तृतीया २०२४: पूजा विधि, महत्व, कथा, शुभ मुहूर्त और अक्षय पुण्य प्राप्ति के दिव्य उपाय

प्रस्तावना
सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना गया है। यह वह अद्वितीय दिवस है, जब किए गए सभी शुभ कार्य, दान-पुण्य और तप कभी क्षय नहीं होते, अर्थात् उनका फल अविनाशी होता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यह महापर्व आता है और इस दिन सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में होते हैं, जिससे इसकी शुभता और भी बढ़ जाती है। ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, जो कभी नष्ट न हो। यही कारण है कि इस दिन प्रारंभ किया गया कोई भी शुभ कार्य, चाहे वह विवाह हो, गृह प्रवेश हो, व्यापार का शुभारंभ हो, या कोई धार्मिक अनुष्ठान, वह सदा-सदा के लिए फलदायी होता है। अक्षय तृतीया २०२४ का यह विशेष अवसर हमें अपने जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन को साधने और अक्षय पुण्य अर्जित करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है। यह दिन स्वयं सिद्ध मुहूर्त के रूप में भी जाना जाता है, अर्थात किसी भी शुभ कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस तिथि का प्रत्येक क्षण स्वयं में इतना पावन है कि बिना किसी अन्य मुहूर्त के भी सभी मांगलिक कार्य बिना बाधा के संपन्न हो सकते हैं और उनका फल अनंत होता है। आइए, इस दिव्य तिथि के महत्व, इसकी पावन कथाओं, पूजा विधि और उन नियमों को विस्तार से जानें, जो हमें इस दिन अधिकतम शुभ फल प्राप्त करने में सहायता करेंगे।

पावन कथा
अक्षय तृतीया की महिमा अनेक पावन कथाओं में निहित है, जो इस दिन की महत्ता को और बढ़ाती हैं। यह दिवस कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। सर्वप्रथम, यह भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्मोत्सव है, जिन्हें चिरंजीवी माना जाता है। मान्यता है कि परशुराम जी आज भी पृथ्वी पर विद्यमान हैं और अक्षय तृतीया उनकी जयंती के रूप में मनाई जाती है। परशुराम जी ने धर्म की स्थापना के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए और उनका स्मरण मात्र ही समस्त पापों का नाश कर देता है।

इसी दिन सतयुग का समापन हुआ और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था। यह युगादि तिथि होने के कारण भी अत्यंत पवित्र मानी जाती है और इस दिन किए गए अनुष्ठान विशेष फल प्रदान करते हैं, क्योंकि यह कालचक्र के एक महत्वपूर्ण संक्रमण का बिंदु है। भगवान वेद व्यास जी ने इसी दिन महाभारत लिखना प्रारंभ किया था, जिसे ज्ञान का एक विशाल सागर माना जाता है। यह ज्ञान के आरंभ का भी प्रतीक है और दर्शाता है कि इस दिन विद्यारंभ करना भी अत्यंत शुभ होता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान सूर्यदेव ने युधिष्ठिर को अक्षय पात्र प्रदान किया था। यह वह अद्भुत पात्र था जिससे द्रौपदी जब तक भोजन न कर लें, तब तक भोजन समाप्त नहीं होता था। इस पात्र ने वनवास के दौरान पांडवों को भोजन की चिंता से मुक्त कर दिया था, जिससे वे अपने अतिथियों का सत्कार कर पाते थे, भले ही उनके पास स्वयं कुछ न हो। यह घटना अक्षय तृतीया के ‘अक्षय’ गुण का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर दिव्य शक्तियों द्वारा सहायता प्राप्त होती है और कमी कभी नहीं आती।

गंगा नदी का पृथ्वी पर अवतरण भी इसी दिन हुआ था, राजा भगीरथ के अथक प्रयासों से गंगा मैया स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थीं। गंगा स्नान इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है, क्योंकि यह पापों का नाश करता है और मोक्ष प्रदान करता है। इसी दिन मां गंगा को पृथ्वी पर लाने का संकल्प पूर्ण हुआ था।

एक अन्य कथा के अनुसार, धन के देवता कुबेर ने इसी दिन भगवान शिव की तपस्या करके अतुल्य धन-संपदा प्राप्त की थी और उन्हें देवताओं का कोषाध्यक्ष बनाया गया था। यही कारण है कि इस दिन लक्ष्मी-कुबेर की पूजा से धन-धान्य की वृद्धि होती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

भगवान कृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा की कथा भी अक्षय तृतीया से जुड़ी है। जब दरिद्र सुदामा अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे, तो उनके पास भेंट करने के लिए केवल थोड़े से चावल थे। भगवान कृष्ण ने उन चावलों को प्रेम से ग्रहण किया और बदले में सुदामा को अतुल्य धन-संपत्ति और ऐश्वर्य प्रदान किया, जिसकी सुदामा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह घटना दर्शाती है कि सच्चे मन से किया गया छोटा सा दान भी अक्षय फल देता है और भगवान भक्त के प्रेम को देखकर उसे अनंत गुना वापस लौटाते हैं।

इन सभी कथाओं का सार यही है कि अक्षय तृतीया का दिन पुण्य संचय, दान-धर्म और नवीन कार्यों के शुभारंभ के लिए अत्यंत शुभ होता है। इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य अनंत काल तक फल देता है, जिससे हमारा जीवन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से समृद्ध होता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही सच्चा ‘अक्षय’ होता है।

दोहा
अक्षय तृतीया शुभ घड़ी, दान-पुण्य फलदाय।
श्री हरि कृपा बरसती, अक्षय सुख हो जाय।।

चौपाई
जय जय अक्षय तृतीया महान, हर घर बरसे सुख-सम्मान।
लक्ष्मी संग हरि कृपा करें, धन धान्य से भंडार भरें।
परशुराम जयंती मनाओ, युग आरंभ का पर्व सुहाओ।
गंगा धरती पर आई जिस दिन, अक्षय पुण्य कमाओ हर दिन।

पाठ करने की विधि
अक्षय तृतीया के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो गंगाजल मिले जल से स्नान करें।
पूजा स्थल को शुद्ध करें और गंगाजल छिड़कें। एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। साथ ही, यदि संभव हो तो भगवान परशुराम और कुबेर जी का चित्र भी स्थापित करें।
सर्वप्रथम भगवान गणेश का स्मरण कर पूजा आरंभ करें, क्योंकि वे विघ्नहर्ता हैं।
संकल्प लें कि आप अक्षय तृतीया का व्रत और पूजा पूरी श्रद्धा और निष्ठा से करेंगे, तथा इसके पुण्य फल को लोक कल्याण हेतु समर्पित करेंगे।
भगवान विष्णु को पीत वस्त्र, पीत पुष्प (जैसे गेंदा या पीली कनेर), तुलसी दल, चंदन, अक्षत और नैवेद्य (खीर, पीली मिठाई, बेसन के लड्डू) अर्पित करें। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें।
देवी लक्ष्मी को लाल पुष्प (गुलाब या कमल), कुमकुम, हल्दी, अक्षत, श्रीफल (नारियल) और मिष्ठान अर्पित करें। ‘ॐ महालक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का जप करें।
दीपक प्रज्वलित करें और धूप-अगरबत्ती जलाएं। भगवान विष्णु सहस्रनाम, लक्ष्मी स्तोत्र, या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की आरती करें। आरती के बाद क्षमा प्रार्थना करें और अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करें।
पूजा के बाद दान का विशेष महत्व है। इस दिन जल कलश, पंखा, छाता, जौ, चना, गेहूं, चावल, वस्त्र, स्वर्ण या रजत जैसी वस्तुएं अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करें। ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराएं। गौ सेवा और पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना भी शुभ माना जाता है।
यह भी ध्यान रखें कि इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने से भी अक्षय फल की प्राप्ति होती है और पितरों को शांति मिलती है।
नए कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, दुकान का उद्घाटन, या नया व्यापार आदि के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन कोई नया निवेश या संपत्ति खरीदना भी लाभकारी होता है।

पाठ के लाभ
अक्षय तृतीया पर सच्चे मन से पूजा, दान और शुभ कार्य करने से अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं, जिनका वर्णन शास्त्रों में मिलता है:
1. **अक्षय पुण्य की प्राप्ति**: इस दिन किया गया हर शुभ कर्म, दान, तप, हवन, जप आदि का फल कभी क्षय नहीं होता, बल्कि कई गुना बढ़कर मिलता है। यह पुण्य अगले जन्मों तक भी साथ रहता है।
2. **धन-धान्य में वृद्धि**: भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की कृपा से घर में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य का वास होता है। दरिद्रता दूर होती है और आर्थिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। कुबेर देव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
3. **पापों का नाश**: इस दिन के पुण्य कर्मों से जन्म-जन्मांतर के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यह दिन आत्मशुद्धि का भी अवसर प्रदान करता है।
4. **मनोकामना पूर्ति**: जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा और पवित्र हृदय से इस दिन पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी सद्-मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान उसकी हर इच्छा को पूरा करते हैं।
5. **विवाह और संतान सुख**: अविवाहितों को शीघ्र विवाह का संयोग बनता है, क्योंकि यह दिन नए आरंभ के लिए शुभ है। संतानहीन दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है, विशेषकर यदि वे संतान गोपाल मंत्र का जप करें।
6. **स्वास्थ्य लाभ**: दान-पुण्य और सात्विक जीवन शैली अपनाने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उत्तम रहता है। रोगों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति दीर्घायु होता है।
7. **पितरों को शांति**: पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने से उन्हें शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे कुल में सुख-समृद्धि आती है।
8. **सकारात्मक ऊर्जा**: यह दिन जीवन में नई सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह का संचार करता है। चारों ओर से शुभता आती है और निराशा दूर होती है।
9. **संपत्ति में वृद्धि**: इस दिन सोना, चांदी या अन्य अचल संपत्ति खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे संपत्ति में अक्षय वृद्धि होती है।

नियम और सावधानियाँ
अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर कुछ नियमों का पालन करना और कुछ सावधानियां बरतना अत्यंत आवश्यक है ताकि पूर्ण फल प्राप्त हो सके और कोई अनिष्ट न हो:
1. **पवित्रता**: इस दिन शारीरिक और मानसिक शुद्धता बनाए रखें। प्रातःकाल स्नान अवश्य करें। किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन) का सेवन न करें। सात्विक आहार ग्रहण करें।
2. **दान का महत्व**: दान करते समय मन में किसी प्रकार का अभिमान या बदले की भावना न रखें। गुप्त दान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। दान हमेशा सुपात्र को ही करें, अर्थात जिसे वास्तव में आवश्यकता हो। अपनी कमाई का एक अंश अवश्य दान करें।
3. **कठोर वचन**: किसी से भी कटु वचन न बोलें, वाद-विवाद से बचें और सभी के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव रखें। घर में शांति और सौहार्द बनाए रखें।
4. **सात्विक जीवन**: ब्रह्मचर्य का पालन करें और अनावश्यक भोग-विलास से दूर रहें। मन को शांत और एकाग्र रखें।
5. **तुलसी का प्रयोग**: पूजा में तुलसी दल का प्रयोग अवश्य करें, क्योंकि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है और तुलसी बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है।
6. **क्रोध और लोभ**: क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी नकारात्मक भावनाओं से बचें। किसी का बुरा न सोचें और न करें। ईर्ष्या से दूर रहें।
7. **शुभ मुहूर्त**: हालांकि अक्षय तृतीया का पूरा दिन स्वयं में एक शुभ मुहूर्त होता है, फिर भी विशेष महत्वपूर्ण कार्यों के लिए पंचांग का परामर्श ले सकते हैं, खासकर यदि आप कोई बड़ा अनुष्ठान कर रहे हों।
8. **जल का दान**: गर्मी के मौसम को देखते हुए इस दिन जल दान का विशेष महत्व है। राहगीरों और पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था अवश्य करें। प्याऊ लगवाएं या जलपात्र भरें।
9. **सोना खरीदना**: यदि संभव हो तो इस दिन सोना या अन्य धातु (जैसे चांदी) खरीदना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक है। परंतु यदि यह संभव न हो तो श्रद्धापूर्वक पूजा-पाठ और दान-पुण्य करना ही पर्याप्त है, क्योंकि सच्ची श्रद्धा से बढ़कर कोई वस्तु नहीं। दिखावे से बचें।
10. **पूर्वजों का स्मरण**: इस दिन अपने पूर्वजों का स्मरण करें और उनके निमित्त तर्पण या पिंडदान अवश्य करें। उनका आशीर्वाद प्राप्त करना भी अक्षय पुण्य देता है।

निष्कर्ष
अक्षय तृतीया का यह महापर्व मात्र एक तिथि नहीं, बल्कि सनातन धर्म के उन गहन सिद्धांतों का प्रतीक है जो कर्म, दान और धर्म के महत्व को रेखांकित करते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे द्वारा किए गए प्रत्येक शुभ कार्य का फल अक्षुण्ण रहता है, और हमारे नेक इरादे कभी व्यर्थ नहीं जाते। यह दिन हमें आत्मचिंतन, परोपकार और भगवद् भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भगवान परशुराम की जयंती, मां गंगा का अवतरण, और युगादि तिथि के रूप में इसकी महत्ता हमें अपने पूर्वजों और संस्कृति से जोड़ती है, और हमें अपनी जड़ों को याद दिलाती है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आइए, इस अक्षय तृतीया २० २४ के पावन अवसर पर हम सब अपने मन, वचन और कर्म से शुद्ध होकर दान-पुण्य करें, प्रभु का स्मरण करें, और अपने जीवन में अक्षय सुख-समृद्धि तथा शांति का मार्ग प्रशस्त करें। यह विश्वास रखें कि आज बोया गया पुण्य का बीज अनंत काल तक फलदायी होगा, जिससे हमारा लोक और परलोक दोनों सुधरेंगे। इस दिन की गई पूजा, पाठ, और दान हमें न केवल सांसारिक लाभ देते हैं, बल्कि हमें आत्मिक संतोष और ईश्वर से जुड़ाव का अनुभव भी प्रदान करते हैं।

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