बृहस्पति भगवान की उत्पत्ति और भूमिका
प्रस्तावना
सनातन धर्म में अनेक देवी-देवता पूजे जाते हैं, जिनमें देवगुरु बृहस्पति का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्ञान, विद्या, धर्म, न्याय, समृद्धि और संतान के प्रदाता के रूप में पूजे जाने वाले भगवान बृहस्पति सभी देवताओं के गुरु हैं। वे न केवल ग्रह मंडल में एक शक्तिशाली ग्रह के रूप में स्थित हैं, बल्कि आध्यात्मिक जगत में वे गुरुत्व और मार्गदर्शन के साक्षात प्रतीक भी हैं। गुरुवार का दिन भगवान बृहस्पति को समर्पित है और इस दिन उनकी पूजा-अर्चना करने से भक्तों को विशेष कृपा प्राप्त होती है। आइए, देवगुरु बृहस्पति की दिव्य उत्पत्ति, उनकी महिमा और उनकी संसार के कल्याण में भूमिका को विस्तार से जानें। उनके पवित्र चरित्र और लीलाओं का स्मरण मात्र ही मन में शांति और संतोष भर देता है, तथा जीवन के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करता है।
पावन कथा
देवगुरु बृहस्पति की उत्पत्ति की कथा अत्यंत पवित्र और प्रेरणादायक है, जो हमें ज्ञान, तपस्या और धर्मपरायणता का महत्व सिखाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे महर्षि अंगिरा और उनकी पत्नी देवी सुरूपी (मतांतर से श्रद्धा या स्मृति) के पुत्र हैं। महर्षि अंगिरा ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक थे और स्वयं भी महान ज्ञानी और तपस्वी थे। उनके तेज और तपस्या का प्रभाव इतना अधिक था कि उनके घर में ज्ञान और धर्म का वास स्वभाविक था।
बाल्यकाल से ही बृहस्पति अत्यंत मेधावी और जिज्ञासु स्वभाव के थे। उन्हें सांसारिक भोग-विलास में कोई रुचि नहीं थी, बल्कि उनका मन सदैव आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान की ओर उन्मुख रहता था। उन्होंने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया ताकि वे उस परम ज्ञान को प्राप्त कर सकें, जो उन्हें देवताओं के गुरु के पद पर आसीन कर सके। उन्होंने अनेक वर्षों तक हिमालय की दुर्गम कंदराओं में, पवित्र नदियों के तटों पर और घने वनों में गहन तपस्या की। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि स्वयं भगवान ब्रह्मा उनके समक्ष प्रकट हुए।
भगवान ब्रह्मा ने बृहस्पति की निष्ठा और लगन देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बृहस्पति से वर मांगने को कहा। बृहस्पति ने विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की कि उन्हें ऐसा ज्ञान, ऐसी बुद्धि और ऐसा सामर्थ्य प्राप्त हो, जिससे वे समस्त देवों का मार्गदर्शन कर सकें और धर्म की स्थापना में सहायक बन सकें। भगवान ब्रह्मा ने उन्हें ‘देवगुरु’ होने का वरदान दिया और कहा कि वे ज्ञान, बुद्धि और वाणी के स्वामी होंगे। ब्रह्मा जी ने उन्हें नवग्रहों में भी स्थान प्रदान किया और कहा कि वे ‘गुरु’ ग्रह के रूप में समस्त प्राणियों के भाग्य पर शुभ प्रभाव डालेंगे।
इस वरदान के फलस्वरूप, बृहस्पति देवों के गुरु बन गए और उन्हें ‘बृहस्पति’ के नाम से जाना जाने लगा, जिसका अर्थ है ‘ब्रह्म का पति’ या ‘विशाल बुद्धि वाला’। उन्होंने देवताओं को वेद-वेदांगों, नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र और युद्ध नीति का ज्ञान प्रदान किया। उनके मार्गदर्शन में ही देवगण असुरों पर विजय प्राप्त करते थे। जब-जब देवगण किसी संकट में पड़ते, बृहस्पति देव अपनी दिव्य दृष्टि और ज्ञान से उन्हें सही मार्ग दिखाते थे। उनकी अनुपस्थिति में देवगण अक्सर भ्रमित हो जाते और असुरों से पराजित होने लगते थे।
बृहस्पति देव का विवाह तारा नामक एक परम सुंदरी और पतिव्रता स्त्री से हुआ था। एक बार जब बृहस्पति देव अपनी तपस्या में लीन थे या किसी अन्य लोक में गए हुए थे, तब चंद्रमा (चंद्र देव) तारा के अनुपम सौंदर्य पर मोहित हो गए। चंद्रमा अपनी कामवासना को नियंत्रित न कर सके और उन्होंने तारा का हरण कर लिया। जब बृहस्पति देव को इस बात का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने चंद्रमा से अपनी पत्नी को लौटाने का आग्रह किया। परंतु चंद्रमा, अपने मद में चूर, बृहस्पति देव की बात मानने को तैयार नहीं हुए।
इस घटना से देवों और दानवों के बीच एक भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिसे ‘ताराकामय युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। देवों ने बृहस्पति का साथ दिया, जबकि शुक्राचार्य (जो दानवों के गुरु थे और बृहस्पति के प्रतिद्वंद्वी भी) ने चंद्रमा का साथ दिया। इस युद्ध में त्रिलोक में हाहाकार मच गया। अंततः, भगवान ब्रह्मा को हस्तक्षेप करना पड़ा। ब्रह्मा जी ने दोनों पक्षों को शांत किया और चंद्रमा से तारा को बृहस्पति देव को लौटाने का आदेश दिया। तारा तो लौट आईं, परंतु वे गर्भवती थीं। जब बृहस्पति ने पूछा कि यह किसका पुत्र है, तो तारा ने लज्जावश कुछ नहीं कहा। ब्रह्मा जी के कहने पर तारा ने बताया कि यह पुत्र चंद्रमा का है। उस बालक का नाम बुध रखा गया, जो आगे चलकर स्वयं एक ग्रह और विद्वान देवता बने। बृहस्पति देव ने अपनी महानता और उदारता का परिचय देते हुए बुध को स्वीकार किया और उन्हें अपने पुत्रों के समान स्नेह दिया।
यह कथा बृहस्पति देव के धैर्य, ज्ञान, क्षमाशीलता और उनके गुरुत्व के गुणों को उजागर करती है। वे न केवल देवताओं के गुरु हैं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए भी एक आदर्श मार्गदर्शक हैं, जो हमें सही और गलत का भेद सिखाते हैं और धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उनकी महिमा अनंत है और उनका स्मरण मात्र ही समस्त कष्टों का निवारण करता है।
दोहा
ज्ञान पुंज गुरुदेव तुम, देवों के आधार।
कृपा दृष्टि जब होत है, खुले मुक्ति के द्वार।।
चौपाई
जय जय जयति गुरु बलवंता। बुद्धि प्रदाता सुख कंदा।।
पीत वसन अंग शोभित सारे। सकल मनोरथ पूर्ण हमारे।।
विद्या वैभव संतान दानी। जग में कीरति सबकी जानी।।
देवों के गुरु तुम जग तारे। तुम ही संकट हरण हमारे।।
पाठ करने की विधि
गुरुवार के दिन भगवान बृहस्पति की पूजा और उनके मंत्रों का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो, तो केले के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करें, अन्यथा अपने पूजा स्थान पर ही गुरु बृहस्पति की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
सर्वप्रथम भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद निम्नलिखित विधि से पूजा प्रारंभ करें:
1. **संकल्प:** हाथ में जल, फूल और चावल लेकर अपनी मनोकामना कहते हुए व्रत या पाठ का संकल्प लें।
2. **आवाहन:** भगवान बृहस्पति का ध्यान करते हुए उनका आवाहन करें।
3. **अर्घ्य:** उन्हें जल अर्पित करें।
4. **स्नान:** गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं।
5. **वस्त्र:** पीले वस्त्र या पीला धागा अर्पित करें।
6. **गंध व पुष्प:** चंदन, हल्दी और पीले पुष्प (जैसे गेंदा) अर्पित करें।
7. **दीप और धूप:** शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सुगंधित धूप करें।
8. **नैवेद्य:** चने की दाल, गुड़, केले, पीले लड्डू या पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।
9. **मंत्र जाप:** “ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः” इस बीज मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। इसके अतिरिक्त, “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” या “बृहस्पति गायत्री मंत्र” (ॐ वृषभध्वजाय विद्महे, कृपा हस्थाय धीमहि, तन्नो गुरुः प्रचोदयात्) का भी जाप कर सकते हैं।
10. **कथा पाठ:** गुरुवार व्रत कथा या बृहस्पति चालीसा का पाठ करें।
11. **आरती:** अंत में कपूर या घी के दीपक से भगवान बृहस्पति की आरती करें।
पूजन के बाद प्रसाद वितरित करें और स्वयं भी ग्रहण करें।
पाठ के लाभ
देवगुरु बृहस्पति के मंत्रों का पाठ और पूजन करने से भक्तों को अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं:
1. **ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि:** बृहस्पति देव ज्ञान और बुद्धि के प्रदाता हैं। उनके स्मरण और पूजन से व्यक्ति की स्मरण शक्ति, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होती है। विद्यार्थियों के लिए यह विशेष लाभकारी है।
2. **सौभाग्य और समृद्धि:** गुरु ग्रह को धन और वैभव का कारक माना जाता है। इनकी कृपा से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक उन्नति होती है और सौभाग्य में वृद्धि होती है।
3. **विवाह और संतान सुख:** जिन लोगों के विवाह में बाधाएं आती हैं या संतान प्राप्ति में विलंब होता है, उन्हें बृहस्पति पूजा से विशेष लाभ मिलता है। अविवाहितों को सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
4. **स्वास्थ्य लाभ:** बृहस्पति देव शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं। उनके पूजन से गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
5. **सामाजिक मान-सम्मान:** गुरु की कृपा से व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा और उच्च पद प्राप्त होता है। लोग उसके ज्ञान और बुद्धिमत्ता का सम्मान करते हैं।
6. **ग्रह शांति:** जिनकी कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर या अशुभ स्थिति में होता है, उन्हें बृहस्पति देव की पूजा और मंत्र जाप से ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है और शुभ फल प्राप्त होते हैं।
7. **आध्यात्मिक उन्नति:** देवगुरु बृहस्पति आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति धर्म, नैतिकता और सत्य के मार्ग पर अग्रसर होता है, जिससे उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है।
नियम और सावधानियाँ
बृहस्पति देव की पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, जिससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
1. **पवित्रता:** पूजा से पूर्व स्नान करके स्वच्छ और पीले वस्त्र धारण करें। मन और शरीर दोनों की शुद्धता बनाए रखें।
2. **ब्रह्मचर्य:** गुरुवार के दिन व्रत करने वाले भक्तों को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
3. **पीले रंग का महत्व:** पूजा में पीले रंग के पुष्प, फल, वस्त्र और चंदन का प्रयोग करें। भोग में भी पीली वस्तुओं को प्राथमिकता दें।
4. **नमक का त्याग:** गुरुवार के व्रत में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। भोजन में दूध, फल, बेसन या चने की दाल से बनी चीजें ग्रहण करें।
5. **केश और नाखून:** कुछ मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार को बाल धोने, नाखून काटने या दाढ़ी बनाने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इससे बृहस्पति ग्रह का शुभ प्रभाव कम होता है।
6. **बड़ों का सम्मान:** अपने गुरुजनों, माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों का सदैव सम्मान करें। उनसे वाद-विवाद न करें, क्योंकि बृहस्पति देव गुरुत्व के प्रतीक हैं।
7. **धैर्य और श्रद्धा:** किसी भी पूजा या व्रत का फल तभी प्राप्त होता है, जब उसे पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और धैर्य के साथ किया जाए। मन में कोई शंका या कपट न रखें।
8. **दान:** गुरुवार के दिन पीली वस्तुओं (जैसे चने की दाल, हल्दी, पीले वस्त्र, केला) का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
निष्कर्ष
देवगुरु बृहस्पति सनातन धर्म के उन स्तंभों में से एक हैं, जो हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। उनकी उत्पत्ति से लेकर उनकी भूमिका तक, हर पहलू में हमें धर्म, नैतिकता, धैर्य और ज्ञान का संदेश मिलता है। वे न केवल ग्रहों में सबसे शुभ ग्रह माने जाते हैं, बल्कि वे प्रत्येक जीव के भीतर निहित गुरु तत्व का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। गुरुवार को उनकी आराधना करने से हमारे जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक विकास होता है। हमें सदैव बृहस्पति देव के गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए, जिससे हम एक सार्थक और धर्मपरायण जीवन जी सकें। आइए, हम सब मिलकर देवगुरु बृहस्पति के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करें और उनसे ज्ञान तथा सद्बुद्धि की प्रार्थना करें, ताकि हमारा जीवन सदा आलोकित रहे। जय बृहस्पति देव!
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Format: Devotional Article
Category: धार्मिक कथाएँ
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