बृहस्पति बीज मंत्र के जप से देवगुरु बृहस्पति की कृपा कैसे प्राप्त करें? जानें इसकी विधि, चमत्कारी लाभ और गुरु पुष्य योग पर जप का विशेष महत्व, जो आपके जीवन में ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य लाता है।

बृहस्पति बीज मंत्र के जप से देवगुरु बृहस्पति की कृपा कैसे प्राप्त करें? जानें इसकी विधि, चमत्कारी लाभ और गुरु पुष्य योग पर जप का विशेष महत्व, जो आपके जीवन में ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य लाता है।

बृहस्पति बीज मंत्र: गुरु कृपा और सौभाग्य का अनुपम साधन

**प्रस्तावना**
सनातन धर्म में देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, बुद्धि, धर्म, संतान, विवाह, धन और भाग्य का कारक ग्रह माना जाता है। देवताओं के गुरु होने के नाते वे समस्त लोकों को उचित मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में बृहस्पति शुभ स्थिति में होते हैं, तो उसे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, सम्मान और समृद्धि प्राप्त होती है। इसके विपरीत, यदि बृहस्पति कमजोर या पीड़ित हों, तो व्यक्ति को शिक्षा में बाधाएँ, आर्थिक कठिनाइयाँ, वैवाहिक समस्याएँ और निर्णय लेने में असमंजस जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में देवगुरु बृहस्पति को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का सबसे शक्तिशाली और अचूक उपाय है बृहस्पति बीज मंत्र का जप। यह मंत्र न केवल ग्रह दोषों को शांत करता है, बल्कि साधक को ज्ञान, विवेक, आध्यात्मिक उन्नति और अटूट सौभाग्य से भी परिपूर्ण करता है। विशेष रूप से गुरु पुष्य योग जैसे शुभ मुहूर्त में इस मंत्र का जप अनगिनत गुना अधिक फलदायी होता है, जिससे जीवन में गुरु की अनुपम कृपा और दैवीय आशीर्वाद सहज ही प्राप्त होता है। आइए, इस पावन मंत्र की महिमा, इसकी जप विधि और इससे मिलने वाले अनमोल लाभों को विस्तार से जानते हैं।

**पावन कथा**
प्राचीन काल की बात है, एक समृद्ध राज्य था जिसका नाम ‘धर्मपुरी’ था। इस राज्य के राजा का नाम ‘धर्मादित्य’ था, जो अपनी न्यायप्रियता, प्रजा-प्रेम और धर्मनिष्ठा के लिए दूर-दूर तक विख्यात थे। उनके राज्य में कभी कोई दुखी या अभावग्रस्त नहीं रहता था। धर्मादित्य अत्यंत विद्वान और धार्मिक प्रवृत्ति के थे, और वे सदैव देवगुरु बृहस्पति का सम्मान करते थे। परंतु, समय का चक्र बड़ा विचित्र होता है। एक बार राजा धर्मादित्य के जीवन में ऐसा समय आया जब उनके शुभ ग्रहों का प्रभाव क्षीण होने लगा, विशेषकर उनके बृहस्पति की स्थिति कमजोर पड़ने लगी।

धीरे-धीरे राज्य में अनेक विपत्तियाँ आने लगीं। पहले तो लगातार कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिससे अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई। फिर राज्य के मुख्य व्यापारी दिवालिया होने लगे, जिससे आर्थिक संकट गहरा गया। राजा के सबसे विश्वसनीय मंत्रीगण भी गलत सलाह देने लगे, और उनके अपने निर्णय भी उचित परिणाम नहीं दे पा रहे थे। पुत्र प्राप्ति के लिए किए गए अनुष्ठानों में भी बाधाएँ आ रही थीं। राजा धर्मादित्य का मन अशांत रहने लगा और वे अपने पूर्व के तेज और बुद्धि को खोते हुए महसूस करने लगे। उनकी प्रजा भी उदास रहने लगी और पूरे राज्य में निराशा का भाव छा गया।

राजा ने अनेकों यज्ञ और अनुष्ठान करवाए, दान-पुण्य भी किया, परंतु कोई स्थायी समाधान नहीं मिल पा रहा था। एक दिन, जब राजा अपने राजमहल में चिंतित बैठे थे, तब उन्हें सूचना मिली कि परमज्ञानी और सिद्ध संत, महर्षि गर्ग उनके राज्य की सीमा पर स्थित आश्रम में पधारे हैं। राजा धर्मादित्य ने तुरंत महर्षि गर्ग से भेंट करने का निश्चय किया। वे विनम्र भाव से महर्षि के आश्रम पहुँचे और उन्हें प्रणाम कर अपनी समस्त व्यथा सुनाई।

महर्षि गर्ग ने राजा की बात धैर्यपूर्वक सुनी और अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान लिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हे राजन, आपकी कुंडली में देवगुरु बृहस्पति इस समय पीड़ित अवस्था में हैं, जिसके कारण ये सारी विपत्तियाँ आपके जीवन और राज्य में आ रही हैं। बृहस्पति ही ज्ञान, धर्म, समृद्धि और भाग्य के अधिष्ठाता हैं। जब वे कमजोर होते हैं, तो इन सभी क्षेत्रों में नकारात्मकता आने लगती है।”

राजा ने विनम्रतापूर्वक पूछा, “हे महर्षि, क्या इस संकट से निकलने का कोई उपाय नहीं है?”

महर्षि गर्ग ने उत्तर दिया, “अवश्य है, राजन! देवगुरु बृहस्पति अत्यंत करुणामय हैं। आप उनके बीज मंत्र का विधिपूर्वक जप करें। इस मंत्र के प्रभाव से बृहस्पति प्रसन्न होंगे और आपकी समस्त समस्याओं का निवारण होगा। विशेष रूप से जब गुरु पुष्य योग का संयोग बने, तब इस मंत्र का जप कई गुना अधिक फलदायी होता है।”

महर्षि गर्ग ने राजा धर्मादित्य को बृहस्पति बीज मंत्र की दीक्षा दी और उसकी जप विधि, नियम और सावधानियाँ विस्तार से समझाईं। राजा धर्मादित्य ने महर्षि के वचनों पर पूर्ण विश्वास किया और उनके बताए अनुसार साधना आरंभ कर दी। उन्होंने राजसी सुखों का त्याग कर दिया और एक साधारण कुटिया में रहकर पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विकता के साथ मंत्र जप में लीन हो गए। वे प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान करते, स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करते और हल्दी की माला से “ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करते।

कई माह तक उन्होंने यह साधना जारी रखी। इस दौरान कई गुरु पुष्य योग आए, और राजा ने उन शुभ मुहूर्तों में भी विशेष जप और दान किया। धीरे-धीरे उन्हें अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार महसूस होने लगा। उनकी बुद्धि और निर्णय शक्ति फिर से तीव्र होने लगी। राज्य में भी परिवर्तन दिखने लगे। अचानक ही आकाश में घने बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा हुई, जिससे सूखे की समस्या समाप्त हो गई। नई फसलें लहलहा उठीं। व्यापारियों के कारोबार में भी सुधार आने लगा। राजा को नए और बुद्धिमान सलाहकार मिले, जिन्होंने राज्य की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि राजा को एक योग्य और धर्मात्मा पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसने उनके वंश को आगे बढ़ाया।

राजा धर्मादित्य ने अपनी खोई हुई समृद्धि, सम्मान और सबसे बढ़कर, आंतरिक शांति और ज्ञान को पुनः प्राप्त कर लिया था। उन्होंने समझा कि देवगुरु बृहस्पति की कृपा से ही यह सब संभव हुआ है। उन्होंने जीवन भर महर्षि गर्ग और देवगुरु बृहस्पति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और अपने राज्य में बृहस्पति उपासना को प्रोत्साहन दिया। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और विधिपूर्वक मंत्र जप से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाओं को दूर किया जा सकता है और देवगुरु की कृपा से जीवन में ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य की वर्षा होती है।

**दोहा**
करहु बृहस्पति सुमिरन, हरहु सकल अज्ञान।
ज्ञान बुद्धि धन धान्य देहु, सफल करहु कल्याण॥

**चौपाई**
जय गुरु देवा, जय गुरु देवा,
तुम हो देवों के गुरु सेवा।
ज्ञान प्रकाशक, धर्म विधाता,
विद्या बुद्धि के तुम हो दाता।
पीत वर्ण तुम, शोभा न्यारी,
करहु कृपा, हे सुखकारी।
दुःख दरिद्र सब दूर भगाओ,
मोक्ष मार्ग पथ हमें दिखाओ।

**पाठ करने की विधि**
बृहस्पति बीज मंत्र का जप अत्यंत सरल है, परंतु इसे पूर्ण विधि-विधान और श्रद्धा के साथ करना चाहिए ताकि इसका पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
1. **शुद्धिकरण**: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध और पीले वस्त्र धारण करें।
2. **स्थान**: शांत और पवित्र स्थान का चुनाव करें। पूजा घर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) उत्तम माना जाता है।
3. **आसन**: पीले रंग के ऊनी या कुशासन पर बैठें।
4. **संकल्प**: हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर अपनी मनोकामना कहते हुए जप का संकल्प लें। जैसे कि ‘मैं (अपना नाम) अपनी (मनोकामना) पूर्ति के लिए देवगुरु बृहस्पति के बीज मंत्र का इतने (संख्या) बार जप करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।’
5. **ध्यान**: देवगुरु बृहस्पति का ध्यान करें। उन्हें पीले वस्त्रों में, स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित, चतुर्भुज रूप में, एक हाथ में दण्ड, दूसरे में रुद्राक्ष माला, तीसरे में वर मुद्रा और चौथे में पुस्तक धारण किए हुए कल्पना करें।
6. **माला**: जप के लिए हल्दी की माला या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें।
7. **मंत्र**: “ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः” इस मंत्र का जप करें। प्रतिदिन कम से कम एक माला (108 बार) या ग्यारह माला (1188 बार) जप करें। यदि आप विशेष अनुष्ठान कर रहे हैं, तो ११,००० या १.२५ लाख जप का संकल्प भी लिया जा सकता है।
8. **गुरु पुष्य योग का महत्व**: गुरु पुष्य योग बृहस्पति देव की उपासना के लिए अत्यंत ही शुभ और शक्तिशाली माना जाता है। जब गुरुवार को पुष्य नक्षत्र का संयोग होता है, तो इसे गुरु पुष्य योग कहते हैं। इस विशेष मुहूर्त में किया गया बृहस्पति बीज मंत्र का जप अनंत गुना अधिक फल प्रदान करता है। इस दिन जप की संख्या बढ़ाना, पीले वस्त्र दान करना, धार्मिक पुस्तकों का दान करना और ब्राह्मणों को भोजन कराना विशेष लाभकारी होता है।
9. **भोग और आरती**: जप पूर्ण होने के बाद देवगुरु को पीले फूल, पीले मिष्ठान्न (जैसे बेसन के लड्डू), गुड़, चने की दाल और शुद्ध घी का दीपक अर्पित करें। अंत में देवगुरु की आरती करें।

**पाठ के लाभ**
बृहस्पति बीज मंत्र का नियमित और श्रद्धापूर्वक जप करने से साधक को अनेक प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
1. **ज्ञान और बुद्धि**: यह मंत्र बुद्धि और ज्ञान को तीव्र करता है, जिससे विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता मिलती है और निर्णय क्षमता में सुधार आता है।
2. **समृद्धि और धन**: आर्थिक समस्याओं का निवारण होता है, धन आगमन के नए स्रोत खुलते हैं और दरिद्रता दूर होती है।
3. **शुभ विवाह और संतान**: विवाह में आ रही बाधाएँ दूर होती हैं, योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। संतानहीन दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है।
4. **स्वास्थ्य लाभ**: पेट संबंधी रोग, लिवर की समस्याएँ और पीलिया जैसे रोगों में लाभ होता है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
5. **सामाजिक सम्मान**: समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है और व्यक्ति को उचित सम्मान प्राप्त होता है।
6. **भाग्य वृद्धि**: सोया हुआ भाग्य जागृत होता है और जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।
7. **आध्यात्मिक उन्नति**: यह मंत्र आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है, मानसिक शांति प्रदान करता है और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
8. **नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति**: कुंडली में कमजोर बृहस्पति के कारण होने वाले सभी नकारात्मक प्रभावों को समाप्त करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
9. **गुरु पुष्य योग का विशेष फल**: गुरु पुष्य योग पर किया गया यह जप सभी मनोकामनाओं को शीघ्र पूर्ण करता है और जीवन में असाधारण शुभता लाता है। इस दिन यह मंत्र सिद्ध हो जाता है।

**नियम और सावधानियाँ**
बृहस्पति बीज मंत्र का जप करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि मंत्र की शक्ति और पवित्रता बनी रहे:
1. **पवित्रता**: शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखें। साधना के दौरान तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन) का त्याग करें।
2. **ब्रह्मचर्य**: साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
3. **सात्विकता**: अपने विचारों में सात्विकता लाएँ। किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध या घृणा का भाव न रखें।
4. **गुरु का सम्मान**: अपने गुरुजनों, माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों का सदैव सम्मान करें। बृहस्पति देव को गुरु के रूप में पूजें।
5. **दान**: गुरुवार के दिन पीले वस्त्र, चने की दाल, बेसन के लड्डू, गुड़, हल्दी आदि का दान करना शुभ होता है। गाय को केला खिलाना भी श्रेष्ठ माना जाता है।
6. **नियमितता**: मंत्र जप में नियमितता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। यदि एक बार संकल्प ले लिया है, तो उसे पूरा अवश्य करें।
7. **अहंकार का त्याग**: साधना के दौरान मन में किसी भी प्रकार का अहंकार न आने दें। यह साधना विनम्रता और श्रद्धा का विषय है।
8. **एकाग्रता**: जप करते समय मन को एकाग्र रखें और मंत्र के उच्चारण पर ध्यान दें।
9. **गोपनीयता**: अपनी साधना और उसके अनुभवों को अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने प्रकट न करें।

**निष्कर्ष**
देवगुरु बृहस्पति का बीज मंत्र एक दिव्य औषधि के समान है जो जीवन की जटिलताओं को सुलझाकर सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। यह केवल एक मंत्र नहीं, अपितु एक ऐसा आध्यात्मिक सेतु है जो हमें साक्षात देवगुरु की कृपा से जोड़ता है। इस मंत्र का नियमित जप, विशेष रूप से गुरु पुष्य योग जैसे पावन अवसरों पर, साधक के भाग्य को परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। यह हमें सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, विवेक प्रदान करता है और जीवन के हर पड़ाव पर गुरु का आशीर्वाद बनाए रखता है। तो आइए, इस पावन मंत्र को अपने जीवन का अंग बनाएँ और देवगुरु बृहस्पति की असीम कृपा प्राप्त कर अपने जीवन को ज्ञान, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक उन्नति से परिपूर्ण करें। आपके जीवन में सदैव धर्म का प्रकाश बना रहे और गुरु की कृपा से सभी विघ्न दूर हों, यही कामना है।

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