पापमोचनी एकादशी तिथि
प्रस्तावना
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत विशेष स्थान है। प्रत्येक एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है और अपने नाम के अनुरूप फल प्रदान करती है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह एकादशी सभी प्रकार के ज्ञात और अज्ञात पापों का शमन करने वाली, भक्तों को भवसागर से पार उतारने वाली और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाली मानी जाती है। यह मात्र एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, ईश्वर के प्रति समर्पण और आध्यात्मिक उत्थान का एक पवित्र अवसर है। इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और भगवान मधुसूदन की आराधना करने से मनुष्य को लौकिक और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है, और वह जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम् धाम को प्राप्त करता है। आइए, इस पावन तिथि के महत्व, कथा और पूजन विधि को विस्तार से जानते हैं, ताकि आप भी इस दिव्य व्रत का पूर्ण लाभ उठा सकें। यह एकादशी हमें आत्मनिरीक्षण और प्रायश्चित्त का अवसर प्रदान करती है, जिससे हमारा जीवन पवित्र और सार्थक बन सके।
पावन कथा
प्राचीन काल में, मंदराचल पर्वत पर देवताओं और गंधर्वों के साथ-साथ अनेक ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे। उन्हीं में से एक थे परम तेजस्वी और तपस्वी ऋषि च्यवन। उनके पुत्र का नाम मेधावी था, जो स्वयं भी बड़े तपस्वी थे और कठोर साधना में लीन रहते थे। ऋषि मेधावी शिव भक्त थे और अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनकी तपस्या की अग्नि इतनी प्रबल थी कि उससे स्वर्गलोक के देवता भी भयभीत रहते थे। एक बार कामदेव ने ऋषि मेधावी की तपस्या भंग करने के लिए स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा मंजुघोषा को भेजा। मंजुघोषा अपनी मोहिनी अदाओं और अनुपम सौंदर्य के लिए विख्यात थी।
मंजुघोषा ने अपनी मधुर वाणी, मोहक नृत्य और मादक अदाओं से ऋषि मेधावी का ध्यान भंग करने का प्रयास किया। वह ऋषि के समीप आकर वीणा बजाने लगी और सुमधुर गीत गाने लगी, जिससे वातावरण संगीतमय हो उठा। पहले तो ऋषि मेधावी अपनी तपस्या में अटल रहे, परंतु कामदेव के मायाजाल और मंजुघोषा के अद्वितीय सौंदर्य के सम्मुख उनकी कठोर तपस्या डगमगा गई। वे मंजुघोषा के मोहपाश में बंध गए और अपनी तपस्या को भूलकर कई वर्षों तक उनके साथ ही रहे। उन्हें यह आभास ही नहीं हुआ कि उन्होंने कितना समय मंजुघोषा के साथ व्यतीत कर दिया है। ऋषि मेधावी पूर्णतः मंजुघोषा के प्रेम में लीन हो चुके थे, और उन्हें अपने कर्तव्य तथा तपस्या का स्मरण ही नहीं रहा।
जब बहुत समय बीत गया, और मंजुघोषा ने देखा कि ऋषि मेधावी पूरी तरह से उसके वश में हैं, तो एक दिन उसने स्वर्ग लौटने की आज्ञा मांगी। उसने कहा, ‘हे तपस्वी! मुझे अब अपने लोक वापस लौटना चाहिए। आप मुझे जाने की आज्ञा दें।’ तब ऋषि मेधावी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें अनुभव हुआ कि उन्होंने अपनी सारी तपस्या और पुण्य मंजुघोषा के साथ व्यर्थ कर दिए हैं। उनका क्रोध प्रचंड रूप से प्रकट हुआ और उन्होंने मंजुघोषा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया। क्रोध में अंधे होकर उन्होंने मंजुघोषा को एक भयानक और कष्टप्रद योनि में धकेल दिया।
मंजुघोषा ने भयभीत होकर ऋषि मेधावी से अपने उद्धार की प्रार्थना की। उसने आँचल फैलाकर कहा, ‘हे मुनिवर! मैंने तो केवल कामदेव के कहने पर ऐसा किया था। मेरा इसमें कोई दोष नहीं था। कृपया मुझे क्षमा करें और इस भयानक श्राप से मुक्ति का कोई उपाय बताएं।’ ऋषि मेधावी को भी अपनी गलती का बोध हुआ कि उन्होंने अपनी तपस्या भंग होने के क्रोध में एक निरपराध अप्सरा को इतना कठोर श्राप दे दिया। उन्होंने शांत होकर कहा, ‘हे मंजुघोषा! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में पापमोचनी एकादशी आती है। तुम सच्चे मन से उस एकादशी का व्रत करो और भगवान विष्णु की पूजा करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो जाएंगे और तुम्हें पिशाचिनी योनि से मुक्ति मिलेगी।’ भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करते हुए उन्होंने मंजुघोषा को उद्धार का मार्ग बताया।
मंजुघोषा ने ऋषि मेधावी के बताए अनुसार पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। उसने विधि-विधान से भगवान विष्णु का पूजन किया और रात भर जागरण कर भगवान के नाम का स्मरण किया। व्रत के प्रभाव से उसके सारे पाप धुल गए और वह पुनः अपने दिव्य रूप को प्राप्त कर स्वर्ग लोक चली गई। उसके शरीर से पिशाचिनी का रूप उतर गया और वह पहले से भी अधिक सुंदर और तेजस्वी दिखाई देने लगी।
ऋषि मेधावी ने भी स्वयं को पाप का भागी समझा क्योंकि उन्होंने एक स्त्री को श्राप दिया था और अपनी तपस्या भंग की थी। उन्होंने अपने पिता च्यवन ऋषि से अपनी गलती स्वीकार की और प्रायश्चित्त का मार्ग पूछा। च्यवन ऋषि ने उन्हें भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। पिता के आदेश पर मेधावी ऋषि ने भी विधिपूर्वक पापमोचनी एकादशी का व्रत किया और अपने सभी पापों से मुक्ति प्राप्त की। उन्होंने पुनः अपनी तपस्या आरंभ की और श्रेष्ठ मुनियों में गिने जाने लगे। यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, सच्ची श्रद्धा और निष्ठा से पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु की महिमा अपरंपार है और यह व्रत उनकी कृपा प्राप्त करने का एक सीधा मार्ग है। यह कथा हमें क्षमा, प्रायश्चित्त और ईश्वर पर अटल विश्वास के महत्व को दर्शाती है।
दोहा
पापमोचनी एकादशी, हरत सकल भव त्रास।
विष्णु कृपा बरषत सदा, पूरण हो सब आस।।
चौपाई
जय जय एकादशी सुव्रत भारी, पाप ताप हरण सुखकारी।
जो नर नारी करे उपचारा, भवसागर से उतरै पारा।।
विष्णु चरण में चित्त लगावे, व्रत के फल से मुक्ति पावे।
काम क्रोध मद लोभ मिटावे, निर्मल मन कर हरि गुण गावे।।
जीवन धन्य होवे जग माही, परम शांति मिले मन मांहि।।
पाठ करने की विधि
पापमोचनी एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र और फलदायी होता है। इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और समस्त पापों का शमन होता है। यहाँ इसकी विस्तृत विधि दी गई है जिसका पालन करके आप व्रत का पूर्ण फल प्राप्त कर सकते हैं:
1. **दशमी तिथि की तैयारी:** एकादशी से एक दिन पहले दशमी तिथि को सूर्यास्त के बाद से ही अन्न का सेवन बंद कर देना चाहिए। इस दिन केवल एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। मन को शांत और पवित्र रखें।
2. **संकल्प:** एकादशी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सर्वप्रथम अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त हों। इसके बाद पवित्र नदियों के जल अथवा शुद्ध जल से स्नान करें और स्वच्छ, पीतांबर वस्त्र धारण करें। फिर हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। संकल्प मंत्र इस प्रकार कह सकते हैं: “मैं भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त करने और अपने समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों से मुक्ति पाने के लिए पापमोचनी एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक करूँगा/करूँगी।”
3. **पूजा मंडप की तैयारी:** अपने घर के पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। एक स्वच्छ चौकी या आसन पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। यदि आपके पास शालिग्राम शिला है, तो उन्हें भी स्थापित करें। भगवान के साथ माता लक्ष्मी की स्थापना भी अत्यंत शुभ मानी जाती है।
4. **भगवान विष्णु का पूजन:** सर्वप्रथम दीपक प्रज्ज्वलित करें और धूप-दीप करें। भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल मिलाकर) से स्नान कराएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर वस्त्र (पीतांबर) या मौली अर्पित करें। फिर चंदन, रोली, अक्षत, सुगंधित पुष्प (जैसे गुलाब, गेंदा), पुष्प माला, मौसमी फल, मिठाई और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी दल भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। नैवेद्य के रूप में फल, पीले रंग की मिठाई, खीर आदि चढ़ाएं।
5. **मंत्र जाप और पाठ:** “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर मंत्र का अधिकाधिक जाप करें। कम से कम 108 बार जाप अवश्य करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना, श्री रामचरितमानस या श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों का पाठ करना भी अत्यंत शुभ होता है। एकादशी माहात्म्य का श्रवण करें या स्वयं उसका पाठ करें।
6. **व्रत कथा श्रवण:** एकादशी की पावन कथा का श्रवण अवश्य करें। ऊपर दी गई ऋषि मेधावी और मंजुघोषा की कथा का पाठ या श्रवण करने से व्रत का महत्व और दृढ़ होता है।
7. **रात्रि जागरण:** एकादशी की रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें, उनके गुणों का गान करें और उनकी महिमा का चिंतन करें। यह जागरण मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
8. **फलाहार/निर्जला:** व्रत अपनी शारीरिक शक्ति और श्रद्धा के अनुसार फलाहारी या निर्जला रखा जा सकता है। जो भक्त निर्जला व्रत नहीं कर सकते, वे फल, दूध, दही, जल, जूस आदि का सेवन कर सकते हैं। अन्न और अनाज से बनी किसी भी वस्तु का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है। साबूदाना, सेंधा नमक आदि का प्रयोग कर सकते हैं।
9. **द्वादशी पारणा:** एकादशी व्रत का पारणा (व्रत तोड़ना) द्वादशी तिथि को सूर्योदय के पश्चात् और हरि वासर समाप्त होने से पूर्व करना चाहिए। पारणा के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें या अन्न, वस्त्र आदि का दान करें। इसके बाद स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करें। पारणा हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करना चाहिए। हरि वासर में पारणा करना वर्जित है, इसलिए हरि वासर का समय ध्यान में रखें।
पाठ के लाभ
पापमोचनी एकादशी का व्रत अनेक लौकिक और पारलौकिक लाभ प्रदान करता है। इस पवित्र व्रत को श्रद्धा और निष्ठा से करने वाले भक्तों को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
* **समस्त पापों से मुक्ति:** जैसा कि इस एकादशी के नाम से ही स्पष्ट है – ‘पापमोचनी’ अर्थात पापों का मोचन करने वाली। यह व्रत व्यक्ति को अपने जीवन में किए गए सभी ज्ञात-अज्ञात, छोटे-बड़े पापों से मुक्ति दिलाता है। सच्चे मन से किया गया यह व्रत आत्मशुद्धि का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
* **मोक्ष की प्राप्ति:** शास्त्रों में वर्णित है कि जो भक्त निष्ठापूर्वक पापमोचनी एकादशी का व्रत करता है, उसे मृत्यु के उपरांत भगवान विष्णु के परमधाम वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।
* **शारीरिक और मानसिक शुद्धि:** व्रत रखने से शरीर के विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और शारीरिक तंत्र शुद्ध होता है। मानसिक रूप से भी यह व्रत आत्मसंयम, इंद्रिय-निग्रह और एकाग्रता को बढ़ावा देता है, जिससे मन शांत और तनावमुक्त होता है।
* **आर्थिक समृद्धि और खुशहाली:** इस व्रत के प्रभाव से घर में सुख-शांति बनी रहती है, धन-धान्य की वृद्धि होती है और दरिद्रता का नाश होता है। भगवान विष्णु की कृपा से भक्तों के जीवन में समृद्धि आती है।
* **मनोकामना पूर्ति:** जो भक्त सच्ची निष्ठा और पवित्र भाव से इस व्रत को करते हैं, उनकी सभी शुभ मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। चाहे वह संतान की इच्छा हो, उत्तम स्वास्थ्य की कामना हो, व्यापार में सफलता हो या अन्य कोई अभिलाषा।
* **ग्रह दोष शांति:** ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, एकादशी का व्रत करने से नवग्रहों की अशुभता कम होती है और उनके सकारात्मक प्रभाव में वृद्धि होती है। यह विशेष रूप से गुरु और शुक्र ग्रहों को मजबूत करता है।
* **आध्यात्मिक उन्नति:** यह व्रत आध्यात्मिक विकास में अत्यंत सहायक है। यह व्यक्ति को ईश्वर के समीप लाता है, भक्ति भाव को बढ़ाता है और जीवन के उच्च उद्देश्यों की ओर प्रेरित करता है। यह साधना और तपस्या का एक महत्वपूर्ण सोपान है।
* **कष्टों से निवारण:** जीवन में आने वाले विभिन्न कष्टों, बाधाओं और संकटों से मुक्ति मिलती है। भगवान विष्णु अपने भक्तों की हर प्रकार से रक्षा करते हैं और उन्हें हर संकट से उबारते हैं, जिससे जीवन में स्थिरता और सुरक्षा का अनुभव होता है।
* **यश और कीर्ति की वृद्धि:** इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और यश की प्राप्ति होती है, जिससे उसका सामाजिक जीवन भी समृद्ध होता है।
नियम और सावधानियाँ
पापमोचनी एकादशी का व्रत करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और किसी भी प्रकार के दोष से बचा जा सके। ये नियम न केवल शारीरिक शुद्धि के लिए बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण हैं:
* **दशमी तिथि से नियम:** एकादशी से एक दिन पूर्व दशमी तिथि को सूर्यास्त के पश्चात् अन्न का सेवन बंद कर देना चाहिए। इस दिन सात्विक, एक समय का भोजन ग्रहण करें। लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन पूर्णतः वर्जित है। ब्रह्मचर्य का पालन करें और भूमि पर शयन करने का प्रयास करें।
* **एकादशी के दिन वर्जित:** एकादशी के दिन चावल, दाल, अनाज, प्याज, लहसुन, मांसाहार, मदिरा और अन्य किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का सेवन पूर्णतः वर्जित है। तम्बाकू, गुटखा या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन न करें। बाल कटवाना, नाखून काटना भी इस दिन वर्जित माना जाता है।
* **क्रोध और लोभ का त्याग:** व्रत के दिन मन में किसी के प्रति द्वेष, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मोह या काम वासना का भाव न लाएं। वाणी में मधुरता रखें, किसी की निंदा न करें और अपशब्दों का प्रयोग कदापि न करें। मन को शांत और ईश्वर के ध्यान में लगाएं।
* **तुलसी दल का प्रयोग:** भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का प्रयोग अवश्य करें, क्योंकि तुलसी उन्हें अत्यंत प्रिय है। लेकिन, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। उन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर स्वच्छ जल में रखकर उपयोग कर लेना चाहिए।
* **जल का सेवन:** यदि निर्जला व्रत नहीं कर सकते हैं, तो जल, दूध, दही, फल, सूखे मेवे (जैसे बादाम, अखरोट), नारियल पानी, नींबू पानी, शकरकंद, आलू आदि का सेवन कर सकते हैं। कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना भी फलाहार में लिया जा सकता है, लेकिन सेंधा नमक का ही प्रयोग करें।
* **अस्वस्थ व्यक्ति:** वृद्ध, बच्चे, गर्भवती महिलाएं, और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को व्रत नहीं रखना चाहिए। वे केवल कथा श्रवण, भगवान का स्मरण, भजन-कीर्तन कर सकते हैं और फलाहार ले सकते हैं। स्वास्थ्य की अनदेखी न करें।
* **पारणा के नियम:** द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में ही व्रत का पारणा करें। हरि वासर (एकादशी तिथि का अंतिम चारवा हिस्सा) में पारणा करना वर्जित है, अतः इसका समय देखकर ही व्रत खोलें। पारणा के लिए ब्राह्मण को भोजन कराना और उन्हें दक्षिणा व वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पारणा के भोजन में भी सात्विकता बनाए रखें।
* **भूमि शयन:** एकादशी की रात्रि में भूमि पर शयन करना शुभ माना जाता है, जिससे भौतिक सुखों के प्रति वैराग्य का भाव उत्पन्न होता है।
* **ब्रह्मचर्य:** व्रत के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है। शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
पापमोचनी एकादशी का व्रत मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह जीवन को शुद्ध, पवित्र और सार्थक बनाने का एक महाव्रत है। यह हमें सिखाता है कि अनजाने में हुए पापों का भी प्रायश्चित संभव है, बशर्ते मन में सच्ची पश्चाताप की भावना और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा हो। ऋषि मेधावी और मंजुघोषा की कथा हमें यही संदेश देती है कि भगवान विष्णु की महिमा अपरंपार है और उनकी शरण में आने वाले किसी भी भक्त को वे निराश नहीं करते। वे सदैव अपने भक्तों के उद्धार के लिए तत्पर रहते हैं।
इस पावन एकादशी पर व्रत रखकर, भगवान मधुसूदन का ध्यान करके और उनके नाम का जाप करके हम न केवल अपने पापों से मुक्ति पा सकते हैं, बल्कि जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और अंततः मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं। यह व्रत हमें आत्मसंयम, त्याग और परोपकार का महत्व सिखाता है, जिससे हमारा चरित्र और आध्यात्मिक बल बढ़ता है। यह हमें भौतिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मिक आनंद की ओर ले जाता है। आइए, हम सभी इस पवित्र तिथि पर अपने मन को शुद्ध करें, प्रभु के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करें और जीवन को धन्य बनाएं। भगवान विष्णु आप सभी पर अपनी असीम कृपा बनाए रखें और आपको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। जय श्री हरि!

