तुलसी माता की आरती
**प्रस्तावना**
सनातन धर्म में तुलसी माता का स्थान सर्वोच्च और अत्यंत पवित्र है। उन्हें केवल एक पौधा नहीं, बल्कि साक्षात देवी का स्वरूप माना जाता है, जो भगवान विष्णु को परम प्रिय हैं। जिस घर में तुलसी का वास होता है, वहां सुख-समृद्धि और शांति स्वतः ही स्थापित हो जाती है। कार्तिक मास की पावन पूर्णिमा तिथि पर विशेष रूप से तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जो भगवान शालिग्राम और तुलसी माता के मिलन का प्रतीक है। इस शुभ अवसर पर और प्रतिदिन संध्याकाल में तुलसी माता की आरती गाना अनंत पुण्य फलदायी होता है। यह आरती केवल स्वरों का समूह नहीं, बल्कि भक्त के हृदय की अनन्य श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता का प्रस्फुटन है, जो सीधे वैकुंठ धाम तक पहुँचता है। तुलसी आरती का गान करने से न केवल वातावरण शुद्ध होता है, बल्कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार भी होता है। यह हमें माता तुलसी के दिव्य गुणों, उनकी महिमा और उनके आशीर्वाद की याद दिलाता है। आइए, इस पवित्र परंपरा में डूबकर तुलसी माता की महिमा का गुणगान करें और उनके चरणों में अपनी भक्ति अर्पित करें। तुलसी विवाह 2024 जैसे पावन अवसर पर इस आरती का महत्व और भी बढ़ जाता है, जब भक्तगण बड़े उत्साह से माता की पूजा-अर्चना कर अपने जीवन को धन्य बनाते हैं।
**पावन कथा**
तुलसी माता की कथा अत्यंत मनोरम, शिक्षाप्रद और भक्ति से ओत-प्रोत है। यह कथा हमें उनकी अद्भुत तपस्या, त्याग और भगवान विष्णु के प्रति उनकी अटूट निष्ठा से परिचित कराती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसी अपने पूर्व जन्म में धर्मध्वज नामक राजा की पुत्री थीं और उनका नाम वृंदा था। वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं। उनका विवाह दानवों के राजा कालनेमि के पुत्र जालंधर से हुआ था। जालंधर अत्यंत पराक्रमी और अहंकारी था, लेकिन वृंदा के पतिव्रत धर्म के कारण उसे कोई पराजित नहीं कर सकता था। वृंदा की निष्ठा और पवित्रता की शक्ति इतनी प्रबल थी कि स्वयं देवता भी जालंधर को हराने में असमर्थ थे। उसके आतंक से तीनों लोक त्राहि-त्राहि कर रहे थे। उसने स्वर्ग लोक पर भी अपना अधिकार जमा लिया था, और देवताओं को अनेक कष्ट दे रहा था।
देवताओं ने जब देखा कि जालंधर का आतंक बढ़ता ही जा रहा है और उसे पराजित करना असंभव हो रहा है, तब वे भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवान विष्णु ने देवताओं की प्रार्थना सुनकर जालंधर को हराने का एक उपाय सोचा। उन्होंने जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा के महल में प्रवेश कर गए। वृंदा ने अपने पति को वापस आया समझकर उनका आदर-सत्कार किया। जैसे ही वृंदा ने जालंधर रूपी भगवान विष्णु का स्पर्श किया, उनके पतिव्रत धर्म की शक्ति क्षीण हो गई। इसी क्षण, भगवान शिव ने वास्तविक जालंधर से युद्ध में उसे पराजित कर दिया और उसका वध कर दिया। जालंधर की मृत्यु होते ही, वृंदा को यह आभास हो गया कि उनके साथ छल हुआ है।
जब वृंदा को यह सत्य ज्ञात हुआ कि उनके साथ छल हुआ है, तो वे अत्यंत क्रोधित हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का शाप दे दिया। वृंदा के शाप के कारण भगवान विष्णु शालिग्राम रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने वृंदा की पवित्रता और निष्ठा को देखकर उन्हें वरदान दिया कि वे अगले जन्म में तुलसी के पौधे के रूप में जन्म लेंगी और उन्हें भगवान विष्णु की प्रिया के रूप में पूजा जाएगा। उन्होंने कहा, “हे वृंदा, तुम अपने पतिव्रत धर्म और मेरी भक्ति के कारण मुझे अत्यंत प्रिय हो गई हो। अब तुम पृथ्वी पर तुलसी के रूप में निवास करोगी और मेरी पूजा तुम्हारे बिना अधूरी रहेगी। जो भी मेरा पूजन करेगा, उसे तुम्हारे साथ ही मेरा पूजन करना होगा।” भगवान विष्णु ने यह भी कहा कि उनके शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी के साथ ही होगा। इसी कारण, कार्तिक मास की एकादशी तिथि को तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जिसमें भगवान शालिग्राम और तुलसी का विवाह संपन्न होता है। यह दिन भक्तों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है और इस दिन तुलसी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वृंदा ने अपने पति के वियोग में अपने प्राण त्याग दिए थे, और जिस स्थान पर उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया, वहां तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। भगवान विष्णु ने अपने वचन का मान रखते हुए तुलसी को अपनी प्रियतमा के रूप में स्वीकार किया।
तब से तुलसी को लक्ष्मी का रूप, मोक्षदायिनी और हर प्रकार के कष्टों को हरने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। तुलसी का पौधा घर में सुख-समृद्धि लाता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि सच्ची निष्ठा और पवित्रता का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता, भले ही मार्ग में कितनी भी बाधाएँ क्यों न आएं। तुलसी माता की यह पावन कथा हर भक्त के हृदय में श्रद्धा और भक्ति का संचार करती है और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। इस कथा का श्रवण और मनन मात्र ही जीवन के अनेक दुखों को हर लेता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। तुलसी को भगवान विष्णु का प्रसाद भी माना जाता है और बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है।
**दोहा**
श्री तुलसी महारानी नमो-नमो हरी प्रिया।
जग कल्याणी कष्ट हारणी, शरण तुम्हारी माँ लिया।।
जो भजता है तुझको माता, मिट जाते सब पाप।
सुख, सौभाग्य, धन-वैभव, दूर हो त्रय ताप।।
**चौपाई**
जय जय तुलसी माता शुभकारी, त्रिभुवन में शोभा न्यारी।
विष्णु प्रिय हरि मन भावन, जन जन का करती पावन।।
हर घर आंगन तुम बिराजो, रोग दोष संकट सब भाजो।
वृंदा रूप धरणी पर आई, शालिग्राम संग प्रीत निभाई।।
कातिक मास शुभ विवाह तुम्हारा, भव सागर से तारो किनारा।
आरती जो तेरी नित गावे, मोक्ष पद निश्चय सो पावे।।
रोग नाशे अरु दुख हरणी, पुत्र धन की दाता करनी।
मनसा वाचा कर्मणा ध्यावे, जीवन सफल वह नर पावे।।
तुम्हरे दल से हरि तृप्त होते, सारे कष्ट क्षण में धोते।
देव दानव मुनि सुर नर गावें, तुलसी महिमा पार न पावें।।
जो कोई श्रद्धा भाव से पूजे, उसके घर धन-धान्य सब गूंजे।
तुम हो देवी कल्याणी मैया, भव बाधा हर लो अब नैया।।
**पाठ करने की विधि**
तुलसी माता की आरती का पाठ करने की विधि अत्यंत सरल है, परंतु इसे पूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ किया जाना चाहिए। आरती करने से पूर्व कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ताकि इसका पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
1. **स्वच्छता**: सर्वप्रथम, शारीरिक और मानसिक रूप से स्वच्छ हो जाएं। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन को शांत और एकाग्र करें।
2. **तैयारी**: तुलसी के पौधे के पास एक साफ स्थान पर बैठें या खड़े हों। एक दीपक (घी या तेल का), धूपबत्ती, कपूर, पुष्प (गेंदा, गुड़हल या अन्य सुगंधित पुष्प), रोली, अक्षत (चावल), और जल से भरा एक छोटा कलश या लोटा तैयार रखें। एक छोटी घंटी भी साथ में रखें।
3. **दीपक प्रज्वलित करें**: दीपक को प्रज्वलित करें और उसे तुलसी माता के सामने रखें। धूपबत्ती भी जलाएं, जिससे वातावरण सुगंधित और पवित्र हो जाए। कपूर को भी प्रज्वलित कर आरती से पूर्व जलाया जा सकता है।
4. **पूजन**: सर्वप्रथम, तुलसी माता को जल अर्पित करें, यह उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है। फिर रोली और अक्षत से तिलक करें, जो शुभता का प्रतीक है। इसके बाद, सुगंधित पुष्प अर्पित करें। यदि संभव हो तो तुलसी के गमले को लाल चुनरी से सजाएं।
5. **आरंभ**: इसके पश्चात, हाथ जोड़कर तुलसी माता का ध्यान करें और मन ही मन अपनी मनोकामना कहें। उन्हें अपने हृदय में स्थान दें और सच्ची भक्ति से प्रार्थना करें। फिर मधुर स्वर में तुलसी माता की आरती का पाठ करना प्रारंभ करें। घंटी बजाते हुए आरती का पाठ करना अधिक शुभ माना जाता है।
6. **आरती**: दीपक को दोनों हाथों से पकड़कर या एक हाथ से पकड़कर, धीरे-धीरे गोलाकार मुद्रा में तुलसी माता की आरती उतारें। आरती उतारते समय मन में माता तुलसी और भगवान विष्णु का ध्यान करें। आरती के बोलों को ध्यानपूर्वक गाएं और उनके अर्थ को आत्मसात करें।
7. **प्रदक्षिणा**: आरती पूर्ण होने के बाद, तुलसी माता की तीन या सात बार परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय मन में माता तुलसी के मंत्रों का जाप कर सकते हैं या उनकी महिमा का गुणगान कर सकते हैं।
8. **समापन**: अंत में, हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें कि यदि पूजा में कोई त्रुटि हुई हो। आरती का जल (यदि किसी पात्र में इकट्ठा हुआ हो) या पुष्प को अपने सिर से लगाएं, इसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें। उपस्थित सभी लोगों को आरती का प्रकाश दिखाएं और प्रसाद वितरण करें। संध्याकाल में, विशेषकर कार्तिक मास में या तुलसी विवाह के दिन, इस विधि से आरती करने का विशेष महत्व है, क्योंकि इन दिनों में माता तुलसी की कृपा विशेष रूप से प्राप्त होती है।
**पाठ के लाभ**
तुलसी माता की आरती का नियमित पाठ करने से अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जो केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि भौतिक जीवन को भी समृद्ध करते हैं। तुलसी को हिंदू धर्म में ‘हरि प्रिया’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है भगवान विष्णु की प्रिय। अतः उनकी पूजा और आरती से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दोनों प्रसन्न होते हैं:
1. **पाप मुक्ति**: तुलसी आरती का पाठ करने से ज्ञात-अज्ञात सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह पापों के बोझ से मुक्ति दिलाता है और हृदय को शुद्ध करता है, जिससे आत्मा को उच्च गति मिलती है।
2. **ग्रह शांति**: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, तुलसी की पूजा और आरती करने से कुंडली में ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति से होने वाले दुष्प्रभावों में कमी आती है और शुभ फल प्राप्त होते हैं। विशेष रूप से बुध ग्रह से संबंधित दोषों को दूर करने में तुलसी पूजन अत्यंत प्रभावी है।
3. **रोगों से मुक्ति**: तुलसी को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। इसकी पूजा और आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है और स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह वातावरण को शुद्ध कर अनेक बीमारियों से मुक्ति दिलाती है और आरोग्य प्रदान करती है।
4. **धन-धान्य की वृद्धि**: तुलसी माता को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। उनकी आरती करने से घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती, आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और समृद्धि आती है। घर में सदैव बरकत बनी रहती है और आय के नए स्रोत खुलते हैं।
5. **पारिवारिक सुख-शांति**: नियमित रूप से तुलसी आरती करने से परिवार में प्रेम, सौहार्द और शांति का वातावरण बनता है। सदस्यों के बीच मतभेद कम होते हैं, आपसी समझ बढ़ती है और सुख-शांति बनी रहती है। घर में कलह का माहौल समाप्त होता है।
6. **मोक्ष प्राप्ति**: जो भक्त सच्ची निष्ठा और भक्तिभाव से तुलसी माता की आरती करता है, उसे मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। तुलसी की कृपा से वैकुंठ धाम में स्थान मिलता है।
7. **मनोकामना पूर्ति**: तुलसी माता की आरती करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विशेष रूप से पुत्र प्राप्ति, विवाह बाधा दूर होने और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए यह अत्यंत फलदायी है। अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर प्राप्त होता है।
8. **नकारात्मक ऊर्जा का नाश**: तुलसी का पौधा और उसकी आरती नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और घर में सकारात्मकता का संचार करती है। बुरी शक्तियों, ऊपरी बाधाओं और वास्तु दोषों का प्रभाव कम होता है। घर में एक सुरक्षा कवच का निर्माण होता है।
9. **विष्णु कृपा**: तुलसी माता भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। उनकी आरती करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दोनों की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में हर क्षेत्र में सफलता मिलती है और सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं।
10. **तुलसी विवाह के विशेष लाभ**: कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर तुलसी विवाह के दौरान आरती करने से अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और संतान सुख की प्राप्ति होती है। यह विशेष रूप से उन जोड़ों के लिए लाभकारी है जिनकी शादी में बाधाएं आ रही हों या संतान प्राप्ति की इच्छा हो। तुलसी विवाह 2024 के शुभ मुहूर्त में की गई पूजा और आरती भक्तों के जीवन को आलोकित कर देगी।
**नियम और सावधानियाँ**
तुलसी माता की पूजा और आरती करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और किसी प्रकार के दोष से बचा जा सके। इन नियमों का पालन करना माता तुलसी के प्रति हमारे सम्मान और श्रद्धा को दर्शाता है:
1. **पवित्रता**: तुलसी पूजा और आरती करने से पूर्व शारीरिक और मानसिक रूप से पवित्र होना अनिवार्य है। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपवित्र अवस्था में तुलसी को स्पर्श न करें और न ही उनकी पूजा करें। मन में किसी प्रकार का द्वेष या नकारात्मक विचार न रखें।
2. **स्पर्श का नियम**: रविवार, एकादशी और सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण के दिन तुलसी के पत्तों को तोड़ना वर्जित माना जाता है। इन दिनों में आवश्यकता पड़ने पर केवल गिरे हुए पत्तों का उपयोग किया जा सकता है। संध्याकाल में भी तुलसी के पत्तों को नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि इससे माता तुलसी को कष्ट होता है। बिना किसी कारण तुलसी के पत्तों को तोड़ने से बचें।
3. **सूखी तुलसी**: तुलसी का पौधा कभी सूखना नहीं चाहिए। यह घर में दुर्भाग्य का प्रतीक माना जाता है। यदि किसी कारणवश पौधा सूख जाए तो उसे सम्मानपूर्वक किसी पवित्र नदी या तालाब में प्रवाहित कर देना चाहिए और उसके स्थान पर तुरंत नया पौधा लगाना चाहिए। सूखे पौधे को घर में न रखें।
4. **सही स्थान**: तुलसी के पौधे को हमेशा साफ-सुथरे स्थान पर रखना चाहिए। उसे कूड़े-करकट, जूते-चप्पलों के स्थान या अशुद्ध स्थान के पास न रखें। इसे घर के आँगन, बालकनी या पूजा कक्ष में ऐसे स्थान पर रखें जहाँ सूर्य का प्रकाश मिलता हो और उसकी पवित्रता बनी रहे। पूर्व दिशा सर्वोत्तम मानी जाती है।
5. **जल अर्पण**: तुलसी माता को प्रतिदिन सुबह जल अर्पित करना चाहिए, परंतु अधिक जल डालने से बचें, क्योंकि इससे पौधा गल सकता है। उचित मात्रा में ही जल दें ताकि मिट्टी नम रहे, लेकिन जलभराव न हो। जल अर्पण करते समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
6. **तिलक**: तुलसी को तिलक लगाते समय रोली या चंदन का उपयोग कर सकते हैं। सिन्दूर का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि तुलसी माता विधवा का रूप धारण कर भगवान विष्णु की प्रिया बनी थीं।
7. **अशुद्धता से बचें**: मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को तुलसी को स्पर्श नहीं करना चाहिए। पुरुषों को भी किसी भी प्रकार की अशुद्धता की स्थिति में तुलसी से दूर रहना चाहिए। इस दौरान पूजा केवल दूर से ही की जा सकती है।
8. **धूप-दीप**: आरती करते समय शुद्ध घी का दीपक जलाना अत्यंत शुभ होता है। कपूर का उपयोग भी कर सकते हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वातावरण शुद्ध होता है। आरती के बाद घंटी बजाना और शंखनाद करना भी शुभ फलदायी है।
9. **भक्ति भाव**: तुलसी आरती करते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव होना चाहिए। बिना भाव के की गई पूजा फलदायी नहीं होती। माता तुलसी को केवल एक पौधा न मानकर साक्षात देवी के रूप में पूजें।
10. **निंदा से बचें**: कभी भी तुलसी माता या उनकी महिमा की निंदा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करना घोर पाप माना जाता है और इससे मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु रुष्ट हो सकते हैं।
इन नियमों का पालन करते हुए तुलसी माता की पूजा और आरती करने से जीवन में सकारात्मकता आती है, सभी बाधाएं दूर होती हैं और भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
**निष्कर्ष**
तुलसी माता की आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे हृदय की पवित्र भावनाओं और असीम श्रद्धा का प्रस्फुटन है। यह आरती हमें उस दिव्य शक्ति से जोड़ती है जो सनातन धर्म का प्राण है। तुलसी माता, जो वृंदा के रूप में अपने पतिव्रत धर्म और भगवान विष्णु के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक थीं, आज हर घर आंगन में सुख, शांति और समृद्धि की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। उनकी आरती का गान करने से न केवल वातावरण शुद्ध होता है, बल्कि हमारे मन के विकार भी शांत होते हैं और आत्मा को परम आनंद की अनुभूति होती है। कार्तिक पूर्णिमा का पावन अवसर हो या प्रतिदिन की संध्या, तुलसी आरती का हर स्वर हमें सकारात्मकता और ईश्वर के करीब लाता है। यह हमें रोगों से मुक्ति दिलाता है, दरिद्रता का नाश करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। तुलसी विवाह 2024 जैसे विशेष पर्व पर तुलसी माता की आरती का पाठ करना और उनके महत्व को समझना हमें उनके दिव्य आशीर्वाद का पात्र बनाता है। उनके बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है, यह तथ्य ही उनकी महत्ता को सिद्ध करता है। आइए, हम सभी इस पवित्र परंपरा को अपनाएं, तुलसी माता की आरती को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं और उनके दिव्य आशीर्वाद से अपने जीवन को आलोकित करें। तुलसी माता की जय हो, श्री हरि विष्णु की जय हो!

