जानकी व्रत
**प्रस्तावना**
जानकी व्रत, जिसे सीता नवमी के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण दिन है। यह पावन पर्व प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन, राजा जनक की पुत्री और भगवान श्रीराम की अर्धांगिनी, माता सीता पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं। जानकी व्रत माता सीता के जन्मोत्सव का प्रतीक है और उनके त्याग, समर्पण, धैर्य तथा पवित्रता को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन भक्तजन उपवास रखकर, पूजा-अर्चना करके और माता सीता की कथा का श्रवण करके उनके दिव्य गुणों को आत्मसात करने का प्रयास करते हैं। यह व्रत विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की लंबी आयु और सौभाग्य के लिए विशेष रूप से रखा जाता है, जबकि अविवाहित कन्याएँ सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए इसे करती हैं। माता सीता, जिन्हें जानकी, वैदेही, मिथिलानंदिनी आदि नामों से भी जाना जाता है, स्त्री-धर्म और आदर्श भारतीय नारीत्व की प्रतिमूर्ति हैं। उनका जीवन त्याग, प्रेम और अटूट निष्ठा का अद्भुत उदाहरण है। यह व्रत हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेने और धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है।
**पावन कथा**
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में मिथिलापुरी में एक धर्मनिष्ठ और प्रजापालक राजा जनक राज करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। एक बार मिथिला राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। महर्षियों और विद्वानों ने राजा जनक को यज्ञ करने और भूमि में हल चलाने का परामर्श दिया ताकि वर्षा हो और अकाल समाप्त हो। राजा जनक ने स्वयं यह कार्य करने का निश्चय किया। जब राजा जनक यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद सोने के हल से भूमि जोत रहे थे, तभी हल का फाल एक स्थान पर अटक गया। उन्होंने उस स्थान पर खुदाई करवाई तो वहाँ एक स्वर्ण पेटी मिली। उस पेटी के भीतर एक अत्यंत तेजस्वी, सुंदर कन्या थी। उस कन्या को देखकर राजा जनक और रानी सुनयना का हृदय वात्सल्य से भर गया। उन्होंने उस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। हल के फाल को ‘सीत’ कहते हैं, इसलिए उस कन्या का नाम ‘सीता’ रखा गया। वे ‘जानकी’ भी कहलाईं क्योंकि वे राजा जनक की पुत्री थीं और ‘वैदेही’ भी क्योंकि वे विदेह वंश की थीं।
सीता माता बचपन से ही अत्यंत गुणवान, विनम्र और धार्मिक स्वभाव की थीं। उनका रूप सौंदर्य अलौकिक था और उनकी वाणी में मधुरता थी। जैसे-जैसे सीता बड़ी होती गईं, उनके विवाह की चिंता राजा जनक को सताने लगी। राजा जनक ने प्रतिज्ञा की थी कि जो भी भगवान शिव का धनुष ‘पिनाक’ उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह करेंगे। यह धनुष इतना भारी था कि बड़े-बड़े योद्धा, राजा और बलवान भी उसे हिला तक नहीं पाए थे। अनेक राजाओं और राजकुमारों ने धनुष यज्ञ में भाग लिया, परंतु कोई भी धनुष को उठाना तो दूर, हिला भी नहीं सका।
तभी महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान राम और उनके अनुज लक्ष्मण मिथिलापुरी पधारे। गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम ने बड़ी सहजता से उस विशाल धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह धनुष बीच से टूट गया। यह देखकर चारों ओर हर्ष और जय-जयकार होने लगी। राजा जनक की प्रतिज्ञा पूरी हुई और बड़े धूमधाम से भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह संपन्न हुआ। यह विवाह न केवल दो व्यक्तियों का मिलन था, बल्कि दो आदर्श आत्माओं का, धर्म और कर्तव्य के प्रतीक का संगम था।
विवाह के पश्चात, श्रीराम और सीता अयोध्या लौटे जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। उनका जीवन अत्यंत सुखमय चल रहा था, परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। रानी कैकेयी के वरदान के कारण भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला। माता सीता ने अपने पति के साथ वन जाने का दृढ़ निश्चय किया। उन्होंने महल के समस्त सुखों को त्याग कर वन के कष्टमय जीवन को स्वीकार किया। वनवास के दौरान उन्होंने अनेक ऋषि-मुनियों की सेवा की और अपनी त्याग और तपस्या से सभी को प्रभावित किया। पंचवटी में रहते हुए, रावण ने छल से सीता माता का हरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया। लंका में अशोक वाटिका में रहते हुए, माता सीता ने अपार कष्ट सहे, लेकिन उनकी पवित्रता और श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा कभी डगमगाई नहीं। रावण के अनेकों प्रलोभनों और धमकियों के बावजूद उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म का पूरी निष्ठा से पालन किया। हनुमान जी ने लंका जाकर माता सीता का पता लगाया और उन्हें श्रीराम के संदेश से अवगत कराया।
भगवान श्रीराम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की और रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया। अग्निपरीक्षा के माध्यम से माता सीता ने अपनी पवित्रता सिद्ध की और पूरे संसार को अपनी निष्ठा का प्रमाण दिया। अयोध्या लौटने पर श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने धर्मपरायण राज्य की स्थापना की, जिसे रामराज्य के नाम से जाना जाता है।
कालांतर में, प्रजा के अपवाद के कारण, श्रीराम को माता सीता का त्याग करना पड़ा। गर्भवती सीता वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में रहीं, जहाँ उन्होंने लव और कुश नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। उन्होंने अपने पुत्रों को वीरता और धर्म की शिक्षा दी। अंततः, अपने पुत्रों को श्रीराम को सौंपने के बाद, माता सीता ने अपनी पवित्रता के अंतिम प्रमाण के रूप में पृथ्वी में समा गईं, जहाँ से वे प्रकट हुई थीं। माता सीता का जीवन त्याग, सहनशीलता, पवित्रता और अटूट भक्ति का अनुपम उदाहरण है। जानकी व्रत इसी आदर्श देवी के स्मरण और उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का एक पवित्र माध्यम है।
**दोहा**
सीता राम मय सब जग जानी, करहुँ प्रणाम जोर जुग पानी।
बिनु जानकी राम न सोहैं, सीता बिना राम मन मोहैं।
**चौपाई**
राम लखन सीता सहित सोहैं, परम पुनीत प्रेम मन मोहैं।
सिया राम जय राम जय जय राम, कोटि कोटि प्रणाम जय सिया राम।
मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अजर बिहारी।
**पाठ करने की विधि**
जानकी व्रत या सीता नवमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
व्रत का संकल्प लें। इसके लिए हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर माता सीता और भगवान श्रीराम का ध्यान करते हुए मन में व्रत का संकल्प दोहराएं।
पूजा स्थान को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर माता सीता और भगवान श्रीराम की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
सबसे पहले गणेश जी का पूजन करें। इसके बाद माता सीता और भगवान श्रीराम का आवाहन करें।
उन्हें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं। तत्पश्चात शुद्ध जल से स्नान कराकर स्वच्छ वस्त्र अर्पित करें।
माता सीता को लाल या पीली चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी आदि सुहाग सामग्री अर्पित करें। भगवान श्रीराम को पीतांबर वस्त्र अर्पित करें।
तुलसी दल, पुष्प (विशेषकर कमल, गुलाब), फल, नैवेद्य (खीर, मिठाई) आदि अर्पित करें। धूप-दीप प्रज्वलित करें।
माता सीता के मंत्र “श्री जानकी रामाभ्यां नमः” या “ॐ जनकनन्दिन्यै विदेहायै नमः” का कम से कम 108 बार जाप करें।
जानकी स्तोत्र, रामचरितमानस के सीता-राम विवाह प्रसंग या सुंदरकांड का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
व्रत की कथा सुनें या पढ़ें। अंत में आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
इस दिन अन्न ग्रहण नहीं किया जाता। फलाहार या दूध का सेवन किया जा सकता है। अगले दिन पारण करके व्रत पूर्ण करें।
**पाठ के लाभ**
जानकी व्रत के श्रद्धापूर्वक पालन से अनेक शुभ फल प्राप्त होते हैं।
यह व्रत विवाहित स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और सुहाग की दीर्घायु प्रदान करता है।
अविवाहित कन्याओं को मनचाहा और सुयोग्य जीवनसाथी मिलता है।
माता सीता के गुणों को आत्मसात करने से व्यक्ति में त्याग, धैर्य, सहनशीलता और पवित्रता के भाव जागृत होते हैं।
पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि होती है और दांपत्य जीवन मधुर बनता है।
संतान प्राप्ति की कामना करने वाले दंपतियों को सीता माता के आशीर्वाद से संतान सुख प्राप्त होता है।
यह व्रत मन को शांति प्रदान करता है और समस्त पापों का नाश करता है।
माता सीता और भगवान श्रीराम की कृपा से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है।
**नियम और सावधानियाँ**
जानकी व्रत का पालन पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और निष्ठा के साथ करना चाहिए।
व्रत के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक आहार लें (यदि फलाहार कर रहे हैं)।
व्रत करने वाले व्यक्ति को क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए।
किसी की निंदा न करें और अपशब्दों का प्रयोग न करें।
मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखें।
पूजा सामग्री और स्थान की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।
पूजा के दौरान एकाग्रता बनाए रखें और पूरी श्रद्धा से मंत्र जाप व पाठ करें।
ब्राह्मण और गुरुजनों का आदर करें।
व्रत के अगले दिन पारण विधिपूर्वक करें और सामर्थ्य अनुसार दान-पुण्य करें।
रोगग्रस्त या गर्भवती स्त्रियाँ चिकित्सक की सलाह पर व्रत करें या केवल पूजा-पाठ में भाग लें।
**निष्कर्ष**
जानकी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु माता सीता के दिव्य गुणों और उनके आदर्श जीवन का स्मरण है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार जीवन के हर कठिन क्षण में धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग रहा जा सकता है। माता सीता का त्याग, उनका प्रेम, उनकी अटूट निष्ठा और उनकी सहनशीलता हमें हर युग में प्रेरणा देती रहेगी। इस पावन दिवस पर माता जानकी के चरणों में शत-शत नमन करते हुए हम कामना करते हैं कि उनके आदर्श हमारे जीवन को आलोकित करें और हमें धर्म, प्रेम और सत्य के पथ पर अग्रसर करें। जानकी मैया की जय! जय सियाराम!

