चैत्र नवरात्रि में क्या नहीं खाना चाहिए और क्यों?
**प्रस्तावना**
चैत्र नवरात्रि, सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और ऊर्जावान पर्व है। यह माँ दुर्गा की उपासना का महापर्व है, जो हमें आध्यात्मिक शुद्धि, आत्म-संयम और नवशक्ति की ओर अग्रसर करता है। इन नौ दिनों में प्रकृति में भी एक नई ऊर्जा का संचार होता है, और हम भक्तगण माँ जगदंबा की कृपा प्राप्त करने हेतु अनेक व्रत-उपवास और साधनाएँ करते हैं। इस पावन अवसर पर हमारा खान-पान हमारे मन और शरीर पर गहरा प्रभाव डालता है। उपवास केवल अन्न त्याग नहीं, अपितु शरीर और मन को सात्विक बनाकर दैवीय ऊर्जा के प्रति अधिक ग्रहणशील बनाने का एक माध्यम है। इसलिए, चैत्र नवरात्रि के दौरान हमें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। अशुद्ध भोजन न केवल शारीरिक रूप से हानिकारक होता है, बल्कि यह हमारे आध्यात्मिक मार्ग में भी बाधा उत्पन्न कर सकता है, हमारी एकाग्रता को भंग कर सकता है और माँ की दिव्य ऊर्जा से हमें दूर कर सकता है। इस लेख में हम इसी गूढ़ रहस्य को जानेंगे कि किन खाद्य पदार्थों से दूर रहकर हम अपनी नवरात्रि साधना को और भी अधिक सफल और फलदायी बना सकते हैं।
**पावन कथा**
अत्यंत प्राचीन काल की बात है, एक पुण्यभूमि पर ऋषि-मुनियों का निवास था, जहाँ तपस्या और साधना का वातावरण सदैव बना रहता था। उसी क्षेत्र के एक छोटे से गाँव में धर्मपाल नाम का एक युवा रहता था। धर्मपाल स्वभाव से सरल था, किंतु उसका मन चंचल था। वह अक्सर सांसारिक सुखों में लिपटा रहता और धर्म के गहन सिद्धांतों से अनभिज्ञ था। चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व आता, तो गाँव के सभी लोग व्रत रखते, माता की पूजा करते और सात्विक जीवन जीते, पर धर्मपाल कभी इन सब में गंभीरता से रुचि नहीं लेता। वह बस दिखावे के लिए कुछ नियमों का पालन करता और भीतर ही भीतर अपने मन की इच्छाओं को दबाता रहता, जिससे उसकी साधना कभी सफल नहीं हो पाती थी।
एक वर्ष, गाँव में एक महान संत पधारे। उन्होंने नवरात्रि के महत्व और उसके आध्यात्मिक रहस्यों पर प्रवचन देना आरंभ किया। संत ने समझाया, “हे भक्तजनों! नवरात्रि केवल नौ दिनों का व्रत नहीं है, यह स्वयं को शुद्ध करने, अपनी इंद्रियों को वश में करने और अपनी अंतरात्मा को माँ जगदंबा से जोड़ने का एक महायज्ञ है। इस यज्ञ में हमारी श्रद्धा, हमारा संकल्प और हमारा आहार, ये सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिस प्रकार यज्ञ की अग्नि को पवित्र समिधाएँ ही प्रज्वलित करती हैं, उसी प्रकार हमारे शरीर रूपी मंदिर में सात्विक आहार ही शुद्ध ऊर्जा का संचार करता है।”
धर्मपाल ने संत के इन वचनों को सुना और उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उसने पहली बार सच्चे अर्थों में नवरात्रि मनाने का संकल्प लिया। वह संत के पास गया और अपने चंचल मन और अपनी पिछली असफलताओं का वर्णन किया। संत मुस्कुराए और बोले, “पुत्र, तुम्हारा संकल्प ही तुम्हारी पहली सीढ़ी है। अब तुम्हें अपने आहार पर विशेष ध्यान देना होगा। माँ की साधना में शरीर को मंदिर बनाना होता है और इस मंदिर में केवल पवित्र भोग ही चढ़ाया जा सकता है। तामसिक और राजसिक भोजन मन में अशांति और इंद्रियों में विकार उत्पन्न करते हैं, जो साधना के मार्ग में सबसे बड़े शत्रु हैं।”
संत ने धर्मपाल को विस्तार से समझाया कि किन खाद्य पदार्थों से दूर रहना चाहिए:
“पुत्र, इन नौ दिनों में प्याज, लहसुन, मांसाहार, अंडे, शराब और अन्य सभी नशीले पदार्थों का पूर्णतया त्याग करो। ये पदार्थ तामसिक प्रवृत्ति के होते हैं और मन को अशांत करते हैं। दालें, अनाज (गेहूं, चावल), नमक (सामान्य नमक), और बाजार में मिलने वाले तले-भुने पदार्थ भी वर्जित हैं, क्योंकि ये मन में भारीपन और प्रमाद लाते हैं। बासी भोजन, अत्यधिक मसालेदार भोजन और तेल में तले हुए पदार्थ भी शरीर को आलस्य और मन को विचलित करते हैं। इनका त्याग करके तुम अपने शरीर को हल्का और मन को निर्मल बनाओगे।”
धर्मपाल ने संत के वचनों को हृदय से धारण किया। उसने इस नवरात्रि में प्याज-लहसुन, मांसाहार और सभी वर्जित पदार्थों का पूर्णतया त्याग कर दिया। उसने केवल कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, फल, दूध, दही, पनीर, और सेंधा नमक से बने सात्विक भोजन का ही सेवन किया। उसने सादे आलू, लौकी, कद्दू जैसी सब्जियों को भी सेंधा नमक और शुद्ध घी में पकाकर खाया।
पहले कुछ दिन उसे बहुत कठिनाई हुई। उसका मन पुराने स्वादों की ओर आकर्षित होता रहा, पर संत के वचनों और माँ के प्रति उसकी श्रद्धा ने उसे विचलित होने नहीं दिया। वह प्रतिदिन प्रातः काल उठकर स्नान करता, स्वच्छ वस्त्र धारण कर माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने बैठ जाता। उसने माँ दुर्गा के मंत्रों का जाप किया, दुर्गा सप्तशती का पाठ किया और अपने व्रत में पूर्ण निष्ठा रखी।
धीरे-धीरे धर्मपाल को अपने भीतर एक अद्भुत परिवर्तन महसूस होने लगा। उसके मन की चंचलता कम होने लगी, विचारों में स्पष्टता आई और उसकी एकाग्रता बढ़ने लगी। जो भोजन उसे पहले नीरस लगता था, अब वही भोजन उसे अमृत समान लगने लगा। उसके शरीर में एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार हुआ। उसके भीतर एक अभूतपूर्व शांति और आनंद का अनुभव होने लगा।
नवरात्रि के अंतिम दिन, जब धर्मपाल ने अपने व्रत का पारण किया, तो उसने महसूस किया कि वह केवल नौ दिन नहीं, बल्कि एक नया जीवन जीकर आया है। उसके जीवन से तामसिकता का अंधकार छँट गया था और सात्विकता का प्रकाश फैल गया था। उसके खेतों में अनायास ही अप्रत्याशित फसल हुई, उसके पशुधन में वृद्धि हुई और सबसे बढ़कर, उसके मन में जो शांति और संतोष था, वह अमूल्य था। उसे साक्षात् अनुभव हुआ कि माँ दुर्गा ने उसकी तपस्या और त्याग को स्वीकार कर लिया है।
धर्मपाल ने गाँव में संत के चरणों में प्रणाम किया और अपने अनुभव का वर्णन किया। संत ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा, “पुत्र, तुमने केवल शारीरिक व्रत नहीं रखा, तुमने अपने मन को भी शुद्ध किया है। यही सच्ची साधना है। सात्विक आहार शरीर को शुद्ध करता है और शुद्ध शरीर ही शुद्ध मन का आधार बनता है। जब मन शुद्ध होता है, तभी वह परमात्मा से जुड़ने में सक्षम होता है।”
इस घटना के बाद धर्मपाल ने कभी अपने सात्विक जीवन शैली का त्याग नहीं किया और वह आजीवन माँ दुर्गा का परम भक्त बना रहा। उसकी कहानी गाँव-गाँव में फैल गई और लोग चैत्र नवरात्रि के दौरान आहार संबंधी नियमों का पालन करने लगे, जिससे उनके जीवन में भी सुख-शांति और आध्यात्मिक उन्नति आई। इस कथा का सार यही है कि माँ की सच्ची भक्ति में हमारा आहार भी एक महत्वपूर्ण घटक है, जो हमें उनकी कृपा के अधिक योग्य बनाता है।
**दोहा**
सात्विक भोजन मन शुद्ध करे, भक्ति भाव को लाये।
त्याग तामसी माँ की कृपा, जीवन सफल बनाये॥
**चौपाई**
नारि नर व्रत नव दिन धारे, मनसा वाचा कर्म विचारे।
प्याज लहसुन मांसादिक त्यागे, फल फूल दूध दही अनुरागै॥
माँ दुर्गा तब प्रसन्न होवें, सकल मनोरथ पूर्ण होवें।
तन मन शुद्ध आत्मा जागे, भवसागर से मुक्ति मांगे॥
**पाठ करने की विधि**
चैत्र नवरात्रि में भोजन संबंधी “पाठ” का अर्थ है, उपवास और आहार नियमों का श्रद्धापूर्वक और विधि-विधान से पालन करना। यह कोई शाब्दिक पाठ नहीं, बल्कि जीवनशैली और भोजन की शुद्धि का अभ्यास है। इसे करने की विधि इस प्रकार है:
1. **संकल्प**: नवरात्रि प्रारंभ होने से पूर्व ही यह दृढ़ संकल्प करें कि आप इन नौ दिनों तक सात्विक भोजन ही ग्रहण करेंगे और सभी वर्जित पदार्थों से दूर रहेंगे। यह संकल्प ही आपकी साधना का आधार है।
2. **तैयारी**: घर के रसोईघर को शुद्ध करें। ऐसे बर्तनों का उपयोग करें जिनमें पहले मांसाहारी या तामसिक भोजन न बना हो। यदि संभव हो, तो नए बर्तन या केवल व्रत के लिए आरक्षित बर्तनों का उपयोग करें।
3. **सामग्री का चयन**: व्रत के लिए उपयुक्त सामग्री जैसे कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, सेंधा नमक, शुद्ध घी, फल, दूध, दही, पनीर, लौकी, कद्दू, आलू, शकरकंद आदि पहले से एकत्रित कर लें।
4. **भोजन बनाना**: भोजन बनाने से पहले स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। स्वच्छ मन से माँ दुर्गा का स्मरण करते हुए भोजन तैयार करें। भोजन को प्रेम और भक्ति भाव से पकाएं, क्योंकि भोजन में पकाने वाले के भावों का भी संचार होता है।
5. **भोजन ग्रहण करना**: भोजन ग्रहण करने से पूर्व माँ दुर्गा को भोग लगाएं। भोजन को प्रसाद समझकर शांति और कृतज्ञता के साथ ग्रहण करें। जल्दबाजी या क्रोध में भोजन न करें। मन ही मन माँ का नाम जपते रहें।
6. **जल का महत्व**: पर्याप्त मात्रा में शुद्ध जल का सेवन करें। यह शरीर को शुद्ध रखने और ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करेगा। फलों का रस और छाछ भी ले सकते हैं।
7. **संयम**: केवल भूख लगने पर ही भोजन करें और अति भोजन से बचें। अल्पाहार और सुपाच्य भोजन को प्राथमिकता दें।
इन विधियों का पालन करने से आपका शरीर और मन दोनों पवित्र होते हैं, जो माँ भगवती की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
**पाठ के लाभ**
चैत्र नवरात्रि में आहार संबंधी नियमों और सात्विक भोजन के “पाठ” के अनेक लाभ हैं, जो न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी परिलक्षित होते हैं:
1. **शारीरिक शुद्धता**: तामसिक और राजसिक भोजन के त्याग से शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं। पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर भीतर से शुद्ध होता है, जिससे स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार होता है।
2. **मानसिक शांति**: सात्विक भोजन मन को शांत, स्थिर और एकाग्र करता है। क्रोध, चिड़चिड़ापन और नकारात्मक विचारों में कमी आती है। मन में सकारात्मकता और प्रसन्नता का वास होता है।
3. **आध्यात्मिक उन्नति**: शुद्ध शरीर और शांत मन साधना के लिए अनुकूल वातावरण बनाते हैं। इससे ध्यान और जप में एकाग्रता बढ़ती है, जिससे माँ दुर्गा से गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित होता है और उनकी कृपा सहजता से प्राप्त होती है।
4. **इच्छाशक्ति में वृद्धि**: भोजन पर संयम रखने से आत्म-नियंत्रण और इच्छाशक्ति मजबूत होती है। यह जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी अनुशासन और संकल्प को बढ़ाता है।
5. **रोग प्रतिरोधक क्षमता**: हल्के और पौष्टिक सात्विक भोजन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह बीमारियों से लड़ने में सहायक होता है और शरीर को स्वस्थ रखता है।
6. **सकारात्मक ऊर्जा**: तामसिक भोजन नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है, जबकि सात्विक भोजन सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा को आकर्षित करता है। इससे व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और शुभ ऊर्जा का घेरा बनता है।
7. **ईश्वरीय कृपा**: माँ दुर्गा ऐसे भक्तों पर विशेष कृपा बरसाती हैं जो शुद्ध मन और तन से उनकी आराधना करते हैं। सात्विक आहार इसका एक अभिन्न अंग है, जिससे माँ का आशीर्वाद और अनंत सुख की प्राप्ति होती है।
8. **आत्मज्ञान की प्राप्ति**: जब शरीर और मन शुद्ध होते हैं, तो व्यक्ति अपनी अंतरात्मा से जुड़ पाता है। यह आत्मज्ञान और जीवन के गहरे रहस्यों को समझने में सहायक होता है।
इस प्रकार, चैत्र नवरात्रि में आहार संबंधी नियमों का पालन करना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन परिवर्तन की प्रक्रिया है जो हमें दैवीयता की ओर ले जाती है।
**नियम और सावधानियाँ**
चैत्र नवरात्रि के दौरान आहार संबंधी नियमों का पालन करते समय कुछ विशिष्ट बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि आपकी साधना सफल हो और आपको माँ दुर्गा की पूर्ण कृपा प्राप्त हो सके।
**क्या न खाएं (वर्जित भोजन):**
1. **प्याज और लहसुन**: इन्हें तामसिक माना जाता है, जो मन को उत्तेजित करते हैं और साधना में बाधा डालते हैं।
2. **मांसाहार और अंडे**: ये पूरी तरह से वर्जित हैं, क्योंकि ये जीव हत्या से जुड़े हैं और तामसिक गुणों से भरपूर होते हैं।
3. **शराब और अन्य नशीले पदार्थ**: ये मन और शरीर को अशुद्ध करते हैं, चेतना को धूमिल करते हैं और आध्यात्मिक उन्नति में बाधक हैं।
4. **सामान्य नमक (आयोडाइज्ड नमक)**: इसके स्थान पर सेंधा नमक का उपयोग करें। सेंधा नमक को शुद्ध और सात्विक माना जाता है।
5. **अनाज और दालें**: गेहूं, चावल, बेसन, सूजी, मैदा, मक्का, दालें (चना, अरहर, उड़द, मूंग आदि) – इन सभी का सेवन वर्जित है।
6. **मसाले**: हल्दी, धनिया पाउडर, गरम मसाला, राई, हींग, मेथी जैसे सामान्य मसालों का उपयोग नहीं करना चाहिए। केवल काली मिर्च, हरी इलायची, लौंग (सीमित मात्रा में) और हरी मिर्च का प्रयोग कर सकते हैं।
7. **तले हुए और गरिष्ठ भोजन**: अधिक तेल या घी में तले हुए पदार्थ जैसे पूड़ियाँ, पकौड़े आदि से बचना चाहिए, क्योंकि ये पाचन में भारी होते हैं और आलस्य उत्पन्न करते हैं।
8. **बासी भोजन**: हमेशा ताजा पका हुआ भोजन ही ग्रहण करें। बासी भोजन तामसिक होता है और ऊर्जा को नकारात्मक बनाता है।
9. **प्रोसेस्ड फूड**: पैकेटबंद चिप्स, नमकीन, बिस्कुट, रेडीमेड जूस आदि से दूर रहें, क्योंकि इनमें अक्सर सामान्य नमक, अवांछित सामग्री और प्रिजर्वेटिव्स होते हैं।
10. **सफेद चीनी**: इसके स्थान पर गुड़ या शहद का उपयोग कर सकते हैं, यदि आवश्यक हो।
**क्या खाएं (अनुमत भोजन):**
1. **अनाज के विकल्प**: कुट्टू का आटा (बकव्हीट), सिंघाड़े का आटा (वॉटर चेस्टनट फ्लोर), राजगिरा का आटा (एमारेंथ फ्लोर), साबूदाना (टेपिओका पर्ल्स) का उपयोग कर सकते हैं।
2. **फल**: सभी प्रकार के ताजे फल जैसे सेब, केला, अंगूर, संतरा, पपीता, अनार, तरबूज आदि।
3. **सब्जियाँ**: आलू, शकरकंद, अरबी, लौकी, कद्दू, टमाटर, खीरा, पालक, गाजर जैसी सब्जियाँ।
4. **डेयरी उत्पाद**: दूध, दही, छाछ, पनीर, शुद्ध घी।
5. **मेवे और बीज**: बादाम, अखरोट, काजू (सीमित मात्रा में), कद्दू के बीज, सूरजमुखी के बीज।
6. **पानी**: पर्याप्त मात्रा में पानी, नारियल पानी, नींबू पानी (सेंधा नमक और शहद के साथ) का सेवन करें।
**सावधानियाँ:**
1. **स्वास्थ्य का ध्यान**: यदि आपको कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या है (जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था), तो व्रत रखने से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
2. **अति से बचें**: भले ही व्रत का भोजन सात्विक हो, परंतु अत्यधिक मात्रा में भोजन करने से बचें। अल्पाहार ही बेहतर है।
3. **स्वच्छता**: भोजन बनाने और खाने से पहले हाथों और बर्तनों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।
4. **मन की शुद्धि**: केवल भोजन का त्याग पर्याप्त नहीं है। मन में बुरे विचार, ईर्ष्या, क्रोध और लालच का भी त्याग करें।
5. **सात्विक वातावरण**: घर में पवित्र और शांत वातावरण बनाए रखें। भजन-कीर्तन करें और माँ दुर्गा के नाम का जाप करें।
इन नियमों और सावधानियों का पालन करके आप चैत्र नवरात्रि की साधना को अधिक फलदायी और पुण्यदायक बना सकते हैं।
**निष्कर्ष**
चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर ही नहीं देता, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का एक सशक्त माध्यम भी है। इस दौरान भोजन में संयम और सात्विकता का पालन करना माँ दुर्गा के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा का प्रतीक है। जब हम तामसिक और राजसिक भोजन का त्याग कर सात्विक आहार को अपनाते हैं, तो हमारा शरीर न केवल रोगों से मुक्त होता है, बल्कि हमारा मन भी शांत, पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर उठता है। यही वह अवस्था है जहाँ हम अपनी अंतरात्मा को माँ भगवती की दिव्य शक्ति से जोड़ पाते हैं।
यह केवल बाहरी नियमों का पालन नहीं, बल्कि भीतर से स्वयं को माँ के चरणों में समर्पित करने की प्रक्रिया है। हर निवाला जो हम खाते हैं, वह हमारी साधना का हिस्सा बन जाता है, यदि वह पवित्र भाव और शुद्धता से युक्त हो। आइए, इस चैत्र नवरात्रि में हम संकल्प लें कि हम अपने आहार को अपनी भक्ति का एक महत्वपूर्ण अंग बनाएंगे। ऐसा करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होंगी और उनके आशीर्वाद से हमारा जीवन सुख-समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित होगा। अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण पाकर और सात्विक जीवन अपनाकर, हम न केवल इस जन्म में, बल्कि आने वाले अनेकों जन्मों तक माँ की कृपा के पात्र बनेंगे। जय माँ दुर्गा!

