या देवी सर्वभूतेषु – सम्पूर्ण श्लोक और व्याख्या
प्रस्तावना
सनातन धर्म में शक्ति उपासना का केंद्रीय स्थान है। जब हम ‘या देवी सर्वभूतेषु’ का उच्चारण करते हैं, तो हम केवल एक मंत्र का जाप नहीं करते, बल्कि उस परम चेतना को नमन करते हैं जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह श्लोक देवी महात्म्य का एक महत्वपूर्ण अंग है और यह बताता है कि माता दुर्गा हर प्राणी, हर वस्तु, हर भाव में निवास करती हैं। उनकी सर्वव्यापकता इतनी विराट है कि कण-कण में उनकी सत्ता का अनुभव किया जा सकता है। यह केवल एक धार्मिक कथन नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक दर्शन है, जो हमें सभी प्राणियों में दिव्यता देखने की प्रेरणा देता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जिस भी रूप में, जिस भी भाव से देवी की पूजा करते हैं, वह उन तक अवश्य पहुंचता है क्योंकि वह स्वयं उस भाव और रूप में भी विराजमान हैं। यह हमें जीवन के हर पहलू में देवी की उपस्थिति का स्मरण कराता है, चाहे वह ज्ञान हो, निद्रा हो, क्षुधा हो, शांति हो या दया। यह हमें बताता है कि होली जैसे पर्वों का आध्यात्मिक अर्थ भी उसी दिव्य शक्ति से जुड़ा है जो बुराई पर अच्छाई की विजय और नूतन ऊर्जा के संचार का प्रतीक है। होली के विविध रंग भी माता के विभिन्न स्वरूपों और उनकी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हमें जीवन को उत्साह और उमंग से जीने की प्रेरणा देते हैं। यह श्लोक हमारी चेतना को विस्तृत करता है और हमें एक अधिक समावेशी और प्रेमपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करता है। यह उस परम शक्ति का गुणगान है जो सृष्टि के हर स्पंदन में जीवित है और सभी का कल्याण करती है।
पावन कथा
प्राचीन काल की बात है, एक समय हिमालय की रमणीय घाटियों में एक सिद्ध ऋषि रहते थे, जिनका नाम मृगेश था। मृगेश ऋषि अपनी गहन तपस्या और भगवती दुर्गा के प्रति अगाध श्रद्धा के लिए जाने जाते थे। उनके आश्रम के समीप एक छोटा सा गाँव था, जहाँ के लोग सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। एक वर्ष उस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। नदियाँ सूख गईं, खेत बंजर हो गए और पशु-पक्षी भूख-प्यास से व्याकुल हो उठे। गाँव के लोग मृगेश ऋषि के पास आए और अपनी व्यथा सुनाई। ऋषि ने उन्हें धैर्य रखने को कहा और स्वयं भगवती की तपस्या में लीन हो गए। कई दिनों तक उन्होंने अन्न-जल त्याग कर देवी के ‘या देवी सर्वभूतेषु’ मंत्र का निरंतर जाप किया।
ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर एक दिन देवी उन्हें स्वप्न में दर्शन देती हैं। देवी ने उनसे कहा, “हे ऋषि मृगेश! तुम अपनी तपस्या से मुझे अत्यंत प्रिय हो। मैं इस धरती के कण-कण में समाहित हूँ, हर प्राणी में मेरा वास है। तुम अपनी दृष्टि को व्यापक करो और मेरी सर्वव्यापकता को पहचानो। अकाल का कारण केवल जल का अभाव नहीं, अपितु प्राणियों में प्रेम और सहभागिता का अभाव भी है। जब तुम हर जीव में मेरी उपस्थिति का अनुभव करोगे, तो तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।” देवी के इन वचनों ने ऋषि के मन में गहरा प्रभाव डाला। वे उठे और गाँव की ओर चल पड़े।
गाँव में उन्होंने देखा कि लोग अपने-अपने घरों में बैठे थे, एक-दूसरे की सहायता करने से कतरा रहे थे, क्योंकि हर कोई अपने लिए ही चिंतित था। ऋषि ने गाँव वालों को एकत्र किया और देवी के वचन सुनाए। उन्होंने कहा, “देवी ने कहा है कि वह हम सब में, हर वृक्ष में, हर पत्थर में, हर जल की बूँद में विद्यमान हैं। जब तक हम एक-दूसरे में उस दिव्य शक्ति को नहीं देखेंगे, तब तक हम दुःख और अभाव में रहेंगे।” ऋषि ने एक अनोखा उपाय सुझाया। उन्होंने कहा, “इस वर्ष हम होली का उत्सव उसी उत्साह से मनाएंगे, जैसे हर वर्ष मनाते हैं। होली वह त्योहार है, जब हम सभी भेदभाव मिटाकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। यह त्योहार हमें सिखाता है कि हर मनुष्य के भीतर एक दिव्यता है, और हमें उस दिव्यता का सम्मान करना चाहिए।”
गाँव वालों ने संशय के साथ सहमति दी। ऋषि ने एक और बात कही, “हम सभी मिलकर सूखी नदियों के किनारे छोटे-छोटे कुंड खोदेंगे, और उनमें अपने घरों का बचा हुआ थोड़ा-थोड़ा जल डालेंगे। हर बूँद में देवी का वास मानकर, इस कार्य को करेंगे।” गाँव वालों ने ऋषि की बात मानी। उन्होंने मिलकर कुंड खोदे और प्रेम और विश्वास से थोड़ा-थोड़ा जल इकट्ठा किया। जैसे-जैसे वे यह कार्य कर रहे थे, उनके मन में एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव बढ़ने लगा। उन्होंने रंगों से एक-दूसरे को रंगा, सूखे पत्तों और लकड़ियों से होलिका दहन किया और बुराई पर अच्छाई की विजय का संकल्प लिया।
आश्चर्यजनक रूप से, जैसे ही उन्होंने पूर्ण विश्वास और प्रेम से यह कार्य किया, आकाश में काले बादल घिर आए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। सूखी नदियाँ फिर से बह निकलीं, खेत हरे-भरे हो गए और जीवन में नई आशा का संचार हुआ। गाँव वाले समझ गए कि देवी की सर्वव्यापकता केवल जल या अन्न में नहीं, बल्कि प्राणियों के हृदय में पनपने वाले प्रेम, सद्भाव और एकता में भी है। होली के रंगों ने उनके मन के भेद मिटा दिए थे, और अब वे हर प्राणी में देवी के दर्शन कर पा रहे थे। ऋषि मृगेश ने उन्हें समझाया, “देवी निद्रा रूपेण, क्षुधा रूपेण, शांति रूपेण, बुद्धि रूपेण, हर रूप में हम सब में व्याप्त हैं। जब हम इस सत्य को जान लेते हैं, तो अभाव और दुःख का स्थान सुख और समृद्धि ले लेती है।” तब से उस गाँव में होली का त्योहार और ‘या देवी सर्वभूतेषु’ मंत्र का जाप विशेष श्रद्धा के साथ किया जाने लगा, यह स्मरण दिलाते हुए कि देवी हर रूप में हम सबके भीतर और बाहर विराजमान हैं, और हमें हर जीव का सम्मान करना चाहिए।
दोहा
या देवी सर्वभूतेषु, शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः॥
चौपाई
ज्ञान रूप भगवती जग माहीं, तुम बिन जीवन सफल न काहीं।
क्षुधा रूप धर सबहि सँवारो, शांति रूप मन-दुःख निवारी।
दया रूप सब पर तुम छाई, निद्रा रूप देह सुखदाई।
मात भवानी तुम हो सर्वत्र, पूजत तुमहिं सकल जग मित्र।
पाठ करने की विधि
‘या देवी सर्वभूतेषु’ मंत्र का पाठ अत्यंत सरल और शक्तिशाली है, परंतु इसमें श्रद्धा और सही भाव का होना अनिवार्य है। इस श्लोक का पाठ करने की विधि निम्नलिखित है:
सर्वप्रथम, स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो, तो प्रातःकाल या संध्याकाल में शांत स्थान पर बैठें।
एक आसन बिछाकर पालथी मारकर या सुखासन में बैठें। अपनी रीढ़ सीधी रखें और आँखें बंद कर लें।
कुछ देर गहरी साँस लें और छोड़ें, ताकि आपका मन शांत हो सके।
अपने मन में देवी दुर्गा, माँ भगवती या जिस भी रूप में आप उन्हें पूजते हैं, उनका ध्यान करें। कल्पना करें कि उनकी दिव्य ऊर्जा आपके चारों ओर और आपके भीतर व्याप्त है।
अब, ‘या देवी सर्वभूतेषु’ श्लोक का स्पष्ट और शांत स्वर में उच्चारण करें। आप इसे एक माला (१०८ बार) या अपनी इच्छानुसार जितनी बार चाहें, दोहरा सकते हैं।
प्रत्येक बार मंत्र का उच्चारण करते समय, उसके अर्थ पर ध्यान दें। अनुभव करें कि देवी हर प्राणी में, हर वस्तु में, हर विचार में विद्यमान हैं – चाहे वह ज्ञान हो, निद्रा हो, भूख हो, शांति हो, या दया।
पाठ समाप्त होने पर, कुछ देर शांत बैठें और देवी की कृपा को अपने भीतर अनुभव करें। उनका धन्यवाद करें और सभी के कल्याण की कामना करें।
आप इस मंत्र का जाप दैनिक रूप से या विशेष अवसरों पर, जैसे नवरात्रि, दुर्गा पूजा, या यहाँ तक कि होली जैसे पर्वों पर भी कर सकते हैं, जब प्रकृति में नवीन ऊर्जा का संचार होता है। इससे आपके मन में स्थिरता और सकारात्मकता आएगी।
पाठ के लाभ
‘या देवी सर्वभूतेषु’ श्लोक का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से अनेक आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं, जो व्यक्ति के जीवन को सकारात्मकता से भर देते हैं।
**आध्यात्मिक उन्नति:** यह मंत्र व्यक्ति को देवी की सर्वव्यापकता का अनुभव कराता है, जिससे भक्त की चेतना का विस्तार होता है और वह हर जीव में दिव्यता देखने लगता है। यह अहंकार को कम कर आत्मिक शांति प्रदान करता है।
**सकारात्मकता और शांति:** जब हम हर जगह देवी की उपस्थिति देखते हैं, तो मन में भय, क्रोध और घृणा जैसे नकारात्मक भाव कम हो जाते हैं। यह मंत्र मन को शांत और सकारात्मक बनाता है, जिससे आंतरिक शांति की अनुभूति होती है।
**बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति:** ‘या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता’ के जाप से बुद्धि में तीक्ष्णता आती है और ज्ञान की वृद्धि होती है। यह सही निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाता है।
**रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य लाभ:** देवी को आरोग्य प्रदान करने वाली माना गया है। इस मंत्र का जाप शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है, जिससे शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है।
**समस्त दुःखों का निवारण:** देवी भक्तों के सभी कष्टों और बाधाओं को दूर करती हैं। इस मंत्र का नियमित पाठ करने से जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति मिलती है और दुःख दूर होते हैं।
**सम्मान और प्रेम:** जो व्यक्ति हर जीव में देवी को देखता है, वह सभी का सम्मान करता है। फलस्वरूप, उसे भी समाज में सम्मान और प्रेम प्राप्त होता है।
**इच्छा पूर्ति:** सच्चे मन से की गई देवी उपासना से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह मंत्र आपकी सकारात्मक इच्छाओं को पूरा करने में सहायक होता है।
**जीवन में सद्भाव:** यह मंत्र हमें सभी प्राणियों के प्रति दया और प्रेम का भाव रखने की प्रेरणा देता है, जिससे जीवन में सद्भाव और सौहार्द बढ़ता है। होली जैसे पर्वों पर इस मंत्र का जाप विशेष रूप से मन को शुद्ध कर प्रेम और एकता का संदेश फैलाता है।
नियम और सावधानियाँ
‘या देवी सर्वभूतेषु’ मंत्र का पाठ करते समय कुछ नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि पाठ का पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके और कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े:
**शुद्धता:** पाठ करने से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन और शरीर दोनों की शुद्धता आवश्यक है।
**एकाग्रता:** मंत्र का जाप एकाग्र मन से करें। ध्यान भंग न होने दें। यदि मन भटकता है, तो धीरे-धीरे उसे वापस मंत्र पर लाएं।
**श्रद्धा और विश्वास:** बिना श्रद्धा और विश्वास के किया गया जाप फलदायी नहीं होता। देवी के प्रति पूर्ण समर्पण और विश्वास के साथ जाप करें।
**उच्चारण:** मंत्र का उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए। गलत उच्चारण से अर्थ बदल सकता है या प्रभाव कम हो सकता है। यदि आप संस्कृत से परिचित नहीं हैं, तो पहले किसी जानकार से सीख लें।
**सात्विक भोजन:** मंत्र जाप के दिनों में सात्विक भोजन करना उत्तम माना जाता है। तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज आदि का सेवन न करें।
**ब्रह्मचर्य:** यदि आप विशेष अनुष्ठान के रूप में जाप कर रहे हैं, तो ब्रह्मचर्य का पालन करना श्रेयस्कर होता है।
**स्थान की पवित्रता:** जहाँ बैठकर जाप करें, वह स्थान शांत, स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए। आप मंदिर में, पूजा कक्ष में या अपने घर के किसी शांत कोने में जाप कर सकते हैं।
**मानसिक भाव:** पाठ करते समय यह भाव रखें कि देवी हर जीव में, हर वस्तु में, यहाँ तक कि आपके अपने भीतर भी निवास कर रही हैं। सभी के प्रति प्रेम और सद्भाव का भाव रखें। किसी के प्रति ईर्ष्या या द्वेष का भाव मन में न लाएं।
**नियमितता:** यदि संभव हो, तो प्रतिदिन एक निश्चित समय पर और निश्चित संख्या में जाप करें। नियमितता से अधिक फल प्राप्त होता है।
**गुरु का मार्गदर्शन:** यदि आप किसी विशेष उद्देश्य या दीर्घकालिक साधना के लिए इस मंत्र का जाप कर रहे हैं, तो किसी योग्य गुरु से मार्गदर्शन लेना उचित होगा।
इन नियमों का पालन करते हुए किया गया पाठ निश्चय ही आपको देवी की कृपा और आत्मिक शांति प्रदान करेगा।
निष्कर्ष
‘या देवी सर्वभूतेषु’ केवल एक श्लोक नहीं, अपितु सनातन धर्म का एक सार तत्व है, जो हमें इस विराट ब्रह्मांड में व्याप्त उस परम दिव्य शक्ति की अनुभूति कराता है। यह हमें सिखाता है कि जिस देवी को हम मंदिरों में पूजते हैं, वही देवी ज्ञान बनकर हमारे भीतर, शांति बनकर हमारे आस-पास और दया बनकर हर प्राणी के हृदय में निवास करती हैं। यह मंत्र हमारी चेतना को इतना विस्तृत करता है कि हम न केवल मनुष्यों में, बल्कि पशु-पक्षियों में, वृक्षों में, नदियों में, पहाड़ों में – सृष्टि के हर कण में उस परमेश्वरी के दर्शन करने लगते हैं। यह हमें होली जैसे पावन पर्वों की वास्तविक आध्यात्मिकता को समझने की दृष्टि प्रदान करता है, जहाँ रंगों की उमंग और आनंद में भी माँ शक्ति की लीला ही परिलक्षित होती है, जो बुराई का नाश कर हर वर्ष नवजीवन का संचार करती हैं। इस श्लोक का नियमित पाठ हमें केवल व्यक्तिगत लाभ ही नहीं देता, बल्कि हमें एक अधिक करुणापूर्ण, समावेशी और समझदार इंसान बनाता है। यह हमें यह बोध कराता है कि हम सभी एक ही चेतना के अंश हैं, और जब हम एक-दूसरे में उस दिव्यता को पहचानते हैं, तभी वास्तविक शांति और आनंद की प्राप्ति होती है। तो आइए, हम सभी ‘या देवी सर्वभूतेषु’ मंत्र को अपने जीवन का आधार बनाएं और इस महामंत्र के दिव्य प्रकाश से अपने जीवन को आलोकित करें, सभी में भगवती के स्वरूप का दर्शन कर एक सुंदर और शांत विश्व का निर्माण करें।

