# श्री बांके बिहारी तेरी आरती सम्पूर्ण लिरिक्स: प्रेम, भक्ति और आनंद का अलौकिक अनुभव
वृंदावन की पावन भूमि पर, जहाँ आज भी प्रेम और भक्ति की बंसी बजती है, वहाँ विराजे हैं श्री बांके बिहारी जी। उनका अनुपम स्वरूप, मन को मोह लेने वाला है, और उनकी एक झलक पाने के लिए भक्तजन दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं। बिहारी जी की आरती मात्र एक कर्मकांड नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी असीम श्रद्धा, प्रेम और समर्पण का एक मधुर उद्घोष है। जब दीपक की लौ टिमटिमाती है, शंखनाद होता है और आरती के बोल गूंजते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं बिहारी जी अपने भक्तों को दर्शन देने पधार रहे हों। यह क्षण दिव्यता और आनंद से परिपूर्ण होता है। आज हम सनातन स्वर के इस भक्तिमय सफर में श्री बांके बिहारी जी की उस दिव्य आरती के सम्पूर्ण लिरिक्स को जानेंगे, जो हर बिहारी भक्त के रोम-रोम में बसती है, और उसके आध्यात्मिक महत्व को भी समझेंगे।
## श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य और आरती का दिव्य अनुभव
श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य एक अद्भुत कथा से जुड़ा है। वृंदावन के महान संत, संगीत सम्राट और रसिक शिरोमणि श्री स्वामी हरिदास जी महाराज निधिवन में अपनी कुटिया में बैठकर भगवान की आराधना करते थे। उनकी भक्ति इतनी गहन थी कि साक्षात श्री राधा-कृष्ण उनके समक्ष प्रकट हुए। यह अनुपम युगल स्वरूप इतना तेजमय था कि इसे सामान्य नेत्रों से देख पाना असंभव था। भक्तों के कल्याणार्थ स्वामी हरिदास जी ने राधा-कृष्ण से आग्रह किया कि वे एक ही स्वरूप में, सरलता से दर्शनीय होकर पृथ्वी पर निवास करें। उनके आग्रह पर, राधा-कृष्ण का युगल स्वरूप एकाकार होकर एक मनमोहक श्यामवर्णी विग्रह में बदल गया, जिसे आज हम श्री बांके बिहारी जी के नाम से जानते हैं। ‘बांके’ का अर्थ है टेढ़ा या मनमोहक, और ‘बिहारी’ का अर्थ है आनंद विहार करने वाले।
वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर अपने आप में अनूठा है। यहाँ कोई मंगल आरती नहीं होती, और न ही शंखनाद होता है, क्योंकि बिहारी जी को बालक रूप में माना जाता है और उन्हें जगाना उचित नहीं समझा जाता। उनकी आरती दिन में केवल दो बार (श्रृंगार आरती और शयन आरती) की जाती है, और प्रत्येक आरती के समय गर्भगृह के सामने के परदे को बार-बार हटाया और लगाया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि बिहारी जी की मोहिनी छवि इतनी तीव्र है कि यदि वे पलकें झुकाए बिना देर तक एकटक देखते रहें, तो भक्त उनके प्रेम में पूरी तरह डूब जाएगा और संसार की सुध-बुध खो देगा।
यह आरती, श्री बांके बिहारी जी के प्रति भक्तों के अगाध प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। यह उनके श्रृंगार, उनकी लीलाओं और उनके दिव्य गुणों का वर्णन करती है। हर एक पंक्ति में भक्तों के हृदय की पुकार और भगवान के प्रति उनका अटल विश्वास झलकता है। आइए, हम भी इस दिव्य आरती में अपनी वाणी को शुद्ध कर लें और प्रेमपूर्वक गाएं:
**श्री बांके बिहारी तेरी आरती सम्पूर्ण लिरिक्स**
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।
हे गिरधर तेरी आरती गाऊं।।
आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं।
श्याम सुंदर तेरी आरती गाऊं।।
मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे।
प्यारी बंसी मेरो मन मोहे।।
देखि छबि बलिहारी मैं जाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।।
कनकमय थाल कपूर लौ बारे।
ठाड़े गिरधर मुरली संवारे।।
गरुण पे चढ़ के मैं तोहे मनाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।।
जहां जहां जाऊं वहां पाऊं तेरी सेवा।
तुमसा और न कोई देव।।
दास हूं तेरा मैं तोहे मनाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।।
चरणों से निकली गंगा प्यारी।
जिसने सारी दुनिया तारी।।
चरणों में तेरे शीश झुकाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।।
दास अनाड़ी तेरे प्रेम का प्यासा।
छोड़ कभी ना देना मेरा साथा।।
तेरे चरणों में नित शीश झुकाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।।
जय बांके बिहारी प्यारे, जय जय राधा रानी।
करो कृपा मेरे ऊपर, कृपा बरसाओ मेरी महारानी।।
श्री राधा बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।
जय गिरधर तेरी आरती गाऊं।।
## आरती का आध्यात्मिक महत्व और गूढ़ अर्थ
यह आरती मात्र शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भक्तों के अंतर्मन से निकली एक गहरी पुकार है। आरती की प्रत्येक पंक्ति श्री बांके बिहारी जी के दिव्य गुणों और भक्तों के प्रति उनके वात्सल्य भाव को दर्शाती है।
* **”श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरधर तेरी आरती गाऊं।”** – यह पहली पंक्ति ही समर्पण का भाव दर्शाती है। भक्त अपने प्रभु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर उनकी स्तुति करना चाहता है। ‘गिरधर’ संबोधन भगवान कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला का स्मरण कराता है, जिससे उनकी शक्ति और भक्तवत्सलता प्रकट होती है।
* **”मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे, प्यारी बंसी मेरो मन मोहे।”** – यह पंक्ति बिहारी जी के मनमोहक श्रृंगार का वर्णन करती है। मोर मुकुट और बांसुरी कृष्ण के अभिन्न अंग हैं, जो उनके दिव्य और आकर्षक स्वरूप को प्रकट करते हैं। भक्त इस छवि से इतना मोहित हो जाता है कि अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो जाता है।
* **”कनकमय थाल कपूर लौ बारे, ठाड़े गिरधर मुरली संवारे।”** – यह आरती के वास्तविक दृश्य का चित्रण है, जहाँ सोने के थाल में कपूर की लौ जल रही है और श्याम सुंदर मुरली धारण किए खड़े हैं। यह दृश्य मन को वृंदावन के उसी दिव्य वातावरण में ले जाता है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई भेद नहीं रहता।
* **”चरणों से निकली गंगा प्यारी, जिसने सारी दुनिया तारी।”** – यह भगवान विष्णु के वामनावतार से जुड़ी कथा का स्मरण कराता है, जब उनके चरणों से गंगा का उद्गम हुआ था। यह दर्शाता है कि बिहारी जी स्वयं परम ब्रह्म हैं और उनके चरणों का स्पर्श मात्र ही समस्त पापों का नाश कर मोक्ष प्रदान करने वाला है। उनके चरण ही त्रिलोकी का उद्धार करने में सक्षम हैं।
* **”दास अनाड़ी तेरे प्रेम का प्यासा, छोड़ कभी ना देना मेरा साथा।”** – यह पंक्ति भक्त की दीनता, सरलता और भगवान के प्रति अटल विश्वास को दर्शाती है। भक्त स्वयं को अनाड़ी मानते हुए भी प्रभु के प्रेम का प्यासा है और उनसे कभी भी अपना साथ न छोड़ने की प्रार्थना करता है, जो भक्त और भगवान के अटूट रिश्ते का परिचायक है। यह भक्ति का चरम रूप है, जहाँ भक्त पूर्णतः भगवान पर आश्रित हो जाता है।
* **”जय बांके बिहारी प्यारे, जय जय राधा रानी।”** – यह अंत में राधा रानी के नाम का समावेश इस बात का प्रतीक है कि कृष्ण की भक्ति राधा के बिना अधूरी है। राधा-कृष्ण का युगल स्वरूप ही पूर्ण है और उनकी कृपा से ही जीवन में परम आनंद की प्राप्ति होती है। राधा रानी की जयकार से आरती की पूर्णता होती है, क्योंकि वृंदावन में राधा नाम ही सर्वोपरि है।
यह आरती गाते समय भक्त भगवान के सामीप्य का अनुभव करता है, उसके मन के सारे क्लेश दूर हो जाते हैं और वह अलौकिक शांति व आनंद में डूब जाता है। यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक सरल और प्रभावशाली माध्यम है।
## आरती की परंपराएँ और विधि-विधान
श्री बांके बिहारी जी की आरती का विधान वृंदावन में उनके मंदिर में अत्यंत भक्तिमय वातावरण में संपन्न होता है। दिन में दो बार होने वाली यह आरती भक्तों के लिए एक विशेष अनुभव होती है:
1. **श्रृंगार आरती (Morning Aarti):** यह आरती सुबह के समय की जाती है जब बिहारी जी को उनके भव्य वस्त्रों और आभूषणों से सजाया जाता है। इस समय मंदिर परिसर भक्तों की भीड़ से भरा होता है, और वातावरण जयकारों और भजनों से गुंजायमान रहता है। परदे का बार-बार हटना और लगाना इस आरती का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो बिहारी जी के अद्भुत दर्शन को और भी रहस्यमय और आकर्षक बना देता है। यह क्षण ऐसा होता है मानो भगवान स्वयं अपने भक्तों के साथ लुकाछिपी खेल रहे हों।
2. **शयन आरती (Evening Aarti):** यह आरती शाम को बिहारी जी के विश्राम से पहले की जाती है। यह भी उतनी ही महत्वपूर्ण और भावुक होती है, जहाँ भक्त अपने आराध्य को दिन भर की लीलाओं के बाद विश्राम करते हुए देखते हैं। इस आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं, और भक्तजन अगले दिन के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं।
**घर पर आरती का विधान:**
जो भक्त वृंदावन जाकर बिहारी जी की आरती में सम्मिलित नहीं हो पाते, वे अपने घरों में भी पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी आरती कर सकते हैं। इसके लिए कुछ सामान्य परंपराओं का पालन किया जाता है:
* **स्वच्छता:** आरती से पूर्व शरीर और मन की शुद्धि अत्यंत आवश्यक है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, और पूजा स्थल को भी पवित्र करें।
* **स्थान:** एक पवित्र स्थान का चयन करें जहाँ बिहारी जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित हो। मूर्ति या चित्र को साफ करके सुंदर वस्त्रों और पुष्पों से सजाएँ।
* **सामग्री:** आरती की थाली में शुद्ध घी के दीपक (सामान्यतः 5 या 7 बाती), कपूर, धूपबत्ती, अगरबत्ती, पुष्प, चंदन और नैवेद्य (मिठाई या फल) रखें। घंटी और शंख भी रखें।
* **भाव:** सबसे महत्वपूर्ण है सच्चा और निर्मल भक्ति भाव। आरती करते समय बिहारी जी के मनमोहक स्वरूप का ध्यान करें और हर पंक्ति को हृदय से अनुभव करें। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि हृदय का उद्गार है।
* **विधि:** दीपक प्रज्वलित कर पहले भगवान को धूप-दीप दिखाएं, फिर शंखनाद करें (यदि संभव हो)। इसके बाद, आरती के बोल प्रेमपूर्वक गाते हुए भगवान के चरणों से लेकर शीर्ष तक और फिर पूरे विग्रह की आरती उतारें। आरती को घड़ी की सुई की दिशा में (दक्षिणावर्त) घुमाएं। अंत में, आरती सभी उपस्थित लोगों को दें ताकि वे अपने हाथों से लौ को स्पर्श कर सकें और प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। फिर प्रसाद वितरित करें।
आरती केवल एक पूजा विधि नहीं, बल्कि प्रभु के साथ संवाद स्थापित करने का एक माध्यम है। यह हमारे मन, वचन और कर्म को उनके प्रति समर्पित करने का एक सुंदर तरीका है, जिससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
## निष्कर्ष
श्री बांके बिहारी तेरी आरती सिर्फ शब्दों का एक संग्रह नहीं, बल्कि वृंदावन के उस दिव्य प्रेम की गूंज है, जो युगों-युगों से भक्तों के हृदयों को शीतलता प्रदान कर रही है। इस आरती में निहित भक्ति, समर्पण और प्रेम का अनुभव करने से जीवन में अद्भुत शांति और आनंद की प्राप्ति होती है। जब हम पूर्ण भाव से इस आरती का गान करते हैं, तब हमें ऐसा प्रतीत होता है मानो बांके बिहारी जी स्वयं हमारे सामने खड़े होकर अपनी मोहक मुस्कान बिखेर रहे हों। यह आरती हमें उनकी लीलाओं, उनके दिव्य स्वरूप और उनके अगाध प्रेम की याद दिलाती है। यह हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम और श्रद्धा ही ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग है।
तो आइए, हम सभी अपने व्यस्त जीवन से कुछ क्षण निकालकर इस पवित्र आरती का नित्य गान करें और श्री बांके बिहारी जी के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर, उनके प्रेमसागर में गोता लगाएं। इस आरती के माध्यम से हम न केवल अपने मन को शांत करते हैं, बल्कि अपने जीवन को भी भक्ति के रंग से रंग लेते हैं। जय श्री बांके बिहारी! जय जय श्री राधे!

