ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन: नवरात्रि में देवी आराधना से पाएं असीम भक्ति और आंतरिक शांति
मानव जीवन एक अनमोल अवसर है, ईश्वर से जुड़ने का, उसकी असीम कृपा का अनुभव करने का। जब यह जुड़ाव गहरा हो जाता है, जब हृदय में श्रद्धा और प्रेम की ऐसी ज्योति प्रज्ज्वलित होती है कि सब कुछ गौण लगने लगता है, तब हम उस अवस्था को ‘लगन’ कहते हैं। और जब इस लगन में व्यक्ति इतना डूब जाए कि अपने अस्तित्व का भान भी न रहे, तब वह ‘मगन’ हो जाता है। “ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन” यह पंक्ति सिर्फ एक भजन की धुन नहीं, बल्कि उस गहनतम भक्ति का सार है जो साधक को परमात्मा से एकाकार कर देती है। विशेष रूप से शक्ति की उपासना के महापर्व नवरात्रि में, यह लगन और मगन की अवस्था प्राप्त करना हर भक्त का परम लक्ष्य होता है। आइए, इस आध्यात्मिक यात्रा पर निकलें और जानें कि कैसे हम भी मीरा की भांति अपनी आराध्य देवी में पूर्णतः लीन हो सकते हैं, कैसे इस पवित्र नवरात्रि में अपनी आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर देवी की असीम कृपा के पात्र बन सकते हैं।
कथा: जब देवी की आराधना बनी जीवन का सार
पुराणों और लोक कथाओं में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ भक्तों ने अपनी अटूट श्रद्धा और लगन से ईश्वर को प्राप्त किया है। यद्यपि मीराबाई ने भगवान कृष्ण की भक्ति में स्वयं को समर्पित कर दिया, उनकी लगन की कहानी हर उस साधक के लिए प्रेरणा है जो किसी भी दिव्य स्वरूप में खुद को लीन करना चाहता है। नवरात्रि के पावन अवसर पर, हम उस लगन को देवी माँ की आराधना में कैसे अनुभव कर सकते हैं, यह समझना महत्वपूर्ण है।
कल्पना कीजिए, एक छोटी सी नगरी में एक साधारण परिवार में रहने वाली ‘मालती’ को। मालती बचपन से ही देवी माँ की भक्त थी, परंतु जीवन की आपाधापी, घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियां, और सांसारिक मोह-माया अक्सर उसकी भक्ति को बाधित कर देती थी। नवरात्रि आते ही, उसका मन उत्साह और श्रद्धा से भर उठता था, वह नियमपूर्वक व्रत रखती, मंदिरों में जाती, और आरती में शामिल होती। लेकिन उसके भीतर एक टीस थी – वह चाहती थी कि उसकी भक्ति केवल रस्म अदायगी न हो, बल्कि उसमें मीरा जैसी गहराई, वैसी ही तन्मयता हो।
इस वर्ष की नवरात्रि कुछ अलग थी। मालती ने निश्चय किया कि वह इस बार मात्र व्रतों और पूजा तक सीमित नहीं रहेगी। उसने संकल्प लिया कि वह देवी माँ को अपने हृदय के सबसे गहरे कोने में प्रतिष्ठित करेगी। पहले दिन, उसने प्रातःकाल उठकर स्नान किया, स्वच्छ वस्त्र धारण किए, और अपने पूजा कक्ष में बैठी। उसने ध्यान लगाने का प्रयास किया, लेकिन मन चंचल था, कभी बच्चों की पढ़ाई तो कभी घर के काम याद आते। वह निराश नहीं हुई। उसने आँखें बंद कीं और देवी दुर्गा के स्वरूप का ध्यान करने लगी – लाल साड़ी में, अष्टभुजाओं में शस्त्र धारण किए, सिंह पर विराजमान, सौम्य और रौद्र दोनों रूप लिए। उसने बार-बार ‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः’ मंत्र का जाप करना शुरू किया।
धीरे-धीरे, जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मालती के मन की चंचलता कम होने लगी। दूसरे दिन उसने दुर्गा चालीसा का पाठ शुरू किया, हर चौपाई को समझने का प्रयास करते हुए। तीसरे दिन, उसने स्वयं आरती की थाली सजाई, और जब उसने दीपक प्रज्ज्वलित किया, तो उसकी लौ में उसे माँ का वास दिखाई देने लगा। उसके कंठ से भजन स्वतः फूट पड़े, और अश्रुधारा बह निकली। यह आनंद के अश्रु थे, भक्ति के अश्रु थे।
चौथे दिन, जब वह माँ स्कंदमाता का ध्यान कर रही थी, उसे ऐसा लगा जैसे माँ की ममतामयी दृष्टि सीधे उस पर पड़ रही हो। पाँचवें दिन, माँ कात्यायनी की आराधना करते हुए, उसे अपनी सभी कमियों और पापों का बोध हुआ, और उसने क्षमा याचना की। छठे दिन, माँ कालरात्रि के प्रचंड स्वरूप का ध्यान करते हुए, उसके भीतर की सभी नकारात्मकता का भय समाप्त हो गया। सातवें दिन, माँ महागौरी की शांत छवि में उसे परम शांति का अनुभव हुआ। आठवें दिन, माँ सिद्धिदात्री की उपासना करते हुए, उसे अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त होने का आभास हुआ।
नवमी के दिन, जब मालती ने अपनी साधना पूर्ण की, तो उसका हृदय असीम भक्ति और आनंद से परिपूर्ण था। उसे अब बाहरी दुनिया की कोई सुध नहीं थी। वह हर पल, हर क्षण देवी माँ के साथ एक अदृश्य बंधन में बंधी हुई महसूस करती थी। यह वही ‘ऐसी लागी लगन’ थी, जहाँ मन पूर्णतः देवी में ‘मगन’ हो चुका था। उसे अब किसी बाहरी प्रेरणा की आवश्यकता नहीं थी, उसकी भक्ति स्वतः स्फूर्त हो चुकी थी। यह अनुभव मीरा के कृष्ण प्रेम से कम नहीं था, बस स्वरूप अलग था। मालती ने पाया कि यह सच्ची भक्ति न केवल उसे आंतरिक शांति दे रही थी, बल्कि उसके आस-पास के वातावरण को भी सकारात्मक ऊर्जा से भर रही थी। उसके परिवार में भी शांति और सौहार्द का माहौल बन गया था। यह था देवी की लगन में मगन होने का चमत्कार।
भक्ति की गहराई: आध्यात्मिक महत्व
यह ‘लगन मगन’ की अवस्था कोई काल्पनिक अवधारणा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा का एक शिखर है। जब भक्त का मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त, सब कुछ अपने आराध्य में विलीन हो जाते हैं, तब उसे वास्तविक आत्म-ज्ञान और ईश्वर-ज्ञान की प्राप्ति होती है। नवरात्रि में देवी आराधना का यही परम उद्देश्य है। माँ दुर्गा केवल शक्ति की देवी नहीं, वे ज्ञान, शांति, समृद्धि और मोक्ष की भी प्रदाता हैं। जब हम उन पर पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को समर्पित कर देते हैं, तो वे हमारी सभी बाधाओं को दूर कर हमें सन्मार्ग दिखाती हैं।
ऐसी भक्ति हमें सांसारिक मोह-माया के बंधन से मुक्त करती है। यह हमें सिखाती है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आंतरिक दिव्यता में है। ‘लगन मगन’ होकर की गई उपासना हमें अहंकार से मुक्ति दिलाती है, विनम्रता प्रदान करती है, और प्रेम व करुणा से हमारे हृदय को भर देती है। यह हमें जीवन के उतार-चढ़ावों में भी अविचलित रहने की शक्ति देती है, क्योंकि हमें ज्ञात होता है कि एक दिव्य शक्ति सदैव हमारा मार्गदर्शन कर रही है। यह आध्यात्मिक विसर्जन ही हमें मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है।
लगन मगन भक्ति पाने के लिए नवरात्रि की विशेष आराधना तकनीकें
‘ऐसी लागी लगन’ की अवस्था तक पहुँचने के लिए कुछ विशेष देवी आराधना तकनीकें और परंपराएं सहायक हो सकती हैं, जो नवरात्रि के दौरान विशेष फलदायी होती हैं:
- **नियमित मंत्र जाप:** “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै” या किसी अन्य देवी मंत्र का निरंतर और श्रद्धापूर्वक जाप करें। मंत्रों की ध्वनि कंपन (vibration) मन को एकाग्र करती है।
- **ध्यान और contemplation:** प्रतिदिन कुछ समय निकालकर देवी के स्वरूप का ध्यान करें, उनके गुणों का चिंतन करें। उनकी शक्ति, ममता, ज्ञान और सौंदर्य को अपने हृदय में महसूस करें।
- **कथा श्रवण/पाठ:** दुर्गा सप्तशती (दुर्गा पाठ) या अन्य देवी कथाओं का श्रवण या पाठ करें। कथाएँ हमें देवी के महात्म्य और लीलाओं से जोड़ती हैं, जिससे श्रद्धा बढ़ती है।
- **आरती और भजन-कीर्तन:** सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से देवी की आरती करें और भक्तिमय भजन गाएं। संगीत और सामूहिक ऊर्जा मन को भक्ति में लीन करने में अत्यंत सहायक होती है।
- **सात्विक जीवनशैली:** नवरात्रि के दौरान सात्विक भोजन ग्रहण करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें और अनावश्यक वार्तालाप से बचें। यह सब मन को शुद्ध और एकाग्र रखने में मदद करता है।
- **सेवा भाव:** किसी भी धार्मिक कार्य में निस्वार्थ सेवा करें, गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करें। सेवा से हृदय में करुणा जागृत होती है और अहंकार मिटता है, जो सच्ची भक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
- **अखंड दीपक:** यदि संभव हो, तो नवरात्रि के नौ दिनों तक अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित करें। यह निरंतर ऊर्जा और भक्ति का प्रतीक है।
- **श्रद्धा और समर्पण:** सबसे महत्वपूर्ण है अटूट श्रद्धा और पूर्ण समर्पण। देवी माँ पर विश्वास रखें कि वे आपकी हर पुकार सुनती हैं और आपको अपनी कृपा अवश्य प्रदान करेंगी।
इन तकनीकों को केवल रस्म के तौर पर नहीं, बल्कि हृदय से अपनाएं। जब आप इन्हें प्रेम और विश्वास से करेंगे, तब धीरे-धीरे आपके भीतर वह ‘लगन’ जागृत होगी और आप देवी की भक्ति में ‘मगन’ होते चले जाएंगे।
निष्कर्ष: माँ की कृपा से पाएं परम आनंद
नवरात्रि का यह महापर्व हमें एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है, स्वयं को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर, देवी माँ की असीम शक्ति और प्रेम में लीन होने का। “ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन” यह केवल एक भजन नहीं, यह एक जीवन शैली है, एक आध्यात्मिक अवस्था है जहाँ साधक और साध्य के बीच की दूरी मिट जाती है। जैसे मीरा ने कृष्ण को पाया, वैसे ही आप भी अपनी अटूट लगन और श्रद्धा से माँ दुर्गा को अपने हृदय में प्रतिष्ठित कर सकते हैं।
आइए, इस नवरात्रि हम सब संकल्प लें कि हम केवल बाहरी कर्मकांडों तक सीमित न रहकर, आंतरिक भक्ति की गहराइयों में उतरेंगे। अपने मन को शांत कर, देवी के दिव्य स्वरूप का ध्यान करेंगे, उनके मंत्रों का जाप करेंगे, और उनकी कृपा को हर पल महसूस करेंगे। जब हृदय में सच्ची लगन होगी, तो माँ अवश्य अपने भक्तों को मगन कर देंगी। उनकी कृपा से आपका जीवन सुख, शांति, समृद्धि और परम आनंद से भर जाए। जय माता दी!

