तूने मुझे बुलाया शेरा वालिये माता भजन: एक भक्त की पुकार और वैष्णो देवी की अलौकिक यात्रा

तूने मुझे बुलाया शेरा वालिये माता भजन: एक भक्त की पुकार और वैष्णो देवी की अलौकिक यात्रा

जय माता दी! क्या आपने कभी महसूस किया है कि कोई अदृश्य शक्ति आपको अपनी ओर खींच रही है? एक ऐसी पुकार जो आपके हृदय के कण-कण में समा जाती है और आपको एक विशेष यात्रा पर निकलने के लिए प्रेरित करती है? यह केवल एक साधारण अनुभूति नहीं, बल्कि स्वयं आदिशक्ति माँ दुर्गा का बुलावा होता है। जब हृदय में ‘तूने मुझे बुलाया शेरा वालिये’ का भाव जागृत होता है, तब भक्त का रोम-रोम पुलकित हो उठता है। यह कोई आम आमंत्रण नहीं, यह तो स्वयं माता रानी का बुलावा है, जो अपने बच्चों को अपनी गोद में लेने के लिए बेचैन रहती हैं। विशेषकर नवरात्रि के पावन पर्व पर, यह बुलावा और भी तीव्र हो जाता है, जब हर भक्त माता के दर्शन की लालसा में डूब जाता है। आइए, आज हम इसी दिव्य बुलावे, इस अलौकिक यात्रा और उससे जुड़ी अनमोल अनुभूतियों के बारे में विस्तार से जानते हैं, जो हर भक्त को माता वैष्णो देवी के चरणों तक ले जाती है।

यह कथा मोहन नामक एक साधारण युवक की है, जिसका जीवन दिल्ली के भीड़ भरे शहर में बीत रहा था। मोहन एक मेहनती और साधारण जीवन जीने वाला व्यक्ति था, जिसके भीतर धर्म और आध्यात्मिकता की लौ तो जलती थी, पर उसे प्रज्वलित करने का अवसर नहीं मिल पा रहा था। उसका मन अक्सर अशांत रहता था, जीवन में कुछ कमी सी महसूस होती थी। कई बार उसने लोगों को ‘जय माता दी’ कहते सुना था, वैष्णो देवी की यात्रा के बारे में पढ़ा था, पर कभी जाने का मन नहीं बना पाया।

एक दिन, शरद नवरात्रि का पावन अवसर था। मोहन अपने घर में बैठा था और टीवी पर वैष्णो देवी की आरती चल रही थी। उस आरती में एक भजन बज रहा था – “तूने मुझे बुलाया शेरा वालिये, मैं आया मैं आया शेरा वालिये”। इस भजन के बोल उसके कानों में पड़ते ही, मोहन के हृदय में एक अजीब सी हलचल हुई। उसकी आँखों से अनायास ही आँसू बहने लगे। उसे लगा जैसे ये बोल केवल भजन के नहीं, बल्कि स्वयं माँ वैष्णो देवी की आवाज़ है, जो उसे पुकार रही है। उस रात मोहन को नींद नहीं आई। उसके मन में बस एक ही विचार घूम रहा था – “माता रानी ने मुझे बुलाया है।”

अगले दिन सुबह होते ही मोहन ने अपने कुछ मित्रों को अपनी इस अद्भुत अनुभूति के बारे में बताया। उसके मित्र पहले तो हैरान हुए, पर मोहन की आँखों में श्रद्धा और अटल विश्वास देखकर वे भी उसका साथ देने को तैयार हो गए। मोहन जानता था कि वैष्णो देवी की यात्रा आसान नहीं है, पर अब उसके मन में कोई संशय नहीं था। उसे बस माँ के चरणों में पहुँचने की लगन थी।

उन्होंने तुरंत टिकट बुक किए और कटरा के लिए निकल पड़े। जैसे ही उनकी ट्रेन जम्मू पहुँची, मोहन को वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा का अनुभव हुआ। ठंडी हवा में भी एक गर्माहट थी, जो सीधे आत्मा को छू रही थी। कटरा पहुँचने के बाद, उन्होंने अपनी यात्रा का श्रीगणेश किया। पैदल चढ़ाई शुरू होते ही, मोहन ने देखा कि उसके शरीर में एक नई स्फूर्ति आ गई है। रास्ते भर भक्त ‘जय माता दी’ के जयकारे लगा रहे थे, और हर जयकारे के साथ मोहन का संकल्प और दृढ़ होता जा रहा था।

यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले बाणगंगा, चरण पादुका और अर्धकुंवारी के दर्शन करते हुए, मोहन के मन में वैष्णो देवी की पौराणिक कथाएँ जीवंत हो उठीं। उसने सुना था कि कैसे माँ वैष्णवी ने हठयोगी भैरवनाथ को सबक सिखाया था और त्रिकुटा पर्वत पर तीन पिंडियों के रूप में विराजमान हुईं। अर्धकुंवारी में जहाँ माँ ने नौ महीने तपस्या की थी, वहाँ पहुँचकर मोहन को लगा जैसे वह स्वयं माता के गर्भ में बैठकर शुद्ध हो रहा हो। उसकी सारी चिंताएँ और मोह-माया दूर हो गई थीं।

जैसे-जैसे वे भवन के पास पहुँच रहे थे, रास्ते की कठिनाइयाँ कम होती जा रही थीं और उत्साह बढ़ता जा रहा था। जब अंततः वे भवन पहुँचे और माता रानी की गुफा के दर्शन किए, तब मोहन की आँखों से एक बार फिर अश्रुधारा बह निकली। यह आनंद के आँसू थे, कृतज्ञता के आँसू थे। गुफा के भीतर, जब उसने माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी और माँ काली के रूप में त्रिशक्ति स्वरूप तीन पवित्र पिंडियों के दर्शन किए, तो उसे लगा जैसे उसका जीवन धन्य हो गया हो। उसे महसूस हुआ कि माँ ने वास्तव में उसे बुलाया था, और वह उनकी पुकार पर पहुँच गया था। यह केवल एक दर्शन नहीं था, यह तो आत्मा का परमात्मा से मिलन था, माँ और बच्चे का प्रेमपूर्ण पुनर्मिलन था।

दर्शन के उपरांत, परंपरानुसार, मोहन और उसके मित्रों ने भैरव बाबा के दर्शन के लिए भी प्रस्थान किया। यह मान्यता है कि माता वैष्णो देवी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक भैरव बाबा के दर्शन न कर लिए जाएँ। भैरव बाबा के मंदिर में पहुँचकर, मोहन ने महसूस किया कि माँ की लीला अपरंपार है। उन्होंने भैरव को वरदान दिया था कि उनके दर्शन के बिना यात्रा अधूरी रहेगी, और इस प्रकार उन्होंने अपने भक्त को पूर्णता का मार्ग दिखाया। इस पूरी यात्रा में मोहन ने केवल पहाड़ नहीं चढ़े थे, बल्कि उसने अपने मन की सभी बाधाओं को पार किया था और एक नई आध्यात्मिक चेतना प्राप्त की थी। ‘तूने मुझे बुलाया शेरा वालिये’ यह भजन अब उसके लिए केवल एक गीत नहीं, बल्कि उसके जीवन का सार बन चुका था।

माता का बुलावा सिर्फ एक यात्रा का निमंत्रण नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाला एक आध्यात्मिक अनुभव है। यह दर्शाता है कि माँ अपने भक्तों को कभी नहीं भूलतीं। जब वे बुलाती हैं, तब भक्त के मन में एक अटूट श्रद्धा और विश्वास का भाव जागृत होता है, जो उसे सभी भौतिक मोह-माया से ऊपर उठाकर परमात्मा से जोड़ता है। यह बुलावा संकेत है कि आपका समय आ गया है, आपको आध्यात्मिक उन्नति के पथ पर अग्रसर होना है। वैष्णो देवी की यात्रा शारीरिक कष्टों से भरी हो सकती है, लेकिन यह कष्ट एक प्रकार का तप है, जो मन और शरीर को शुद्ध करता है। हर कदम पर ‘जय माता दी’ का जयकारा आपको भीतर से शक्ति देता है। यह यात्रा न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि आत्मिक शांति और जीवन में नई ऊर्जा का संचार भी करती है। माता रानी का दर्शन, चाहे वह उनकी पिंडियों के रूप में हो या किसी अन्य रूप में, भक्त को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है और उसे जीवन के सही मायने समझाता है। यह देवी अनुभव भक्त को यह सिखाता है कि माँ सदैव अपने बच्चों के साथ हैं, बस उन्हें पुकारने की देर है।

वैष्णो देवी की यात्रा अपने आप में कई महत्वपूर्ण रीति-रिवाजों और परंपराओं से सुसज्जित है। सबसे पहले, यात्री कटरा पहुँचकर यात्रा पर्ची प्राप्त करते हैं, जो यात्रा शुरू करने की अनुमति का प्रतीक है। इसके बाद, बाणगंगा में पवित्र स्नान कर यात्रा की शुरुआत की जाती है। यहाँ श्रद्धालु अपने कष्टों को दूर करने और मन की शुद्धिकरण के लिए डुबकी लगाते हैं। चरण पादुका में माता के चरणों के निशान के दर्शन किए जाते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि माता ने इसी मार्ग से यात्रा की थी। अर्धकुंवारी में गर्भ जून गुफा के दर्शन का विशेष महत्व है, जहाँ माता ने नौ महीने तक तपस्या की थी। इस गुफा से गुजरना जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।

भवन पहुँचने पर, भक्त लंबी कतारों में लगकर माता रानी की पवित्र गुफा में प्रवेश करते हैं, जहाँ माँ वैष्णो देवी तीन पिंडियों – महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली – के रूप में विराजमान हैं। इन दिव्य पिंडियों के दर्शन कर भक्त अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण होने का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। दर्शन के बाद, प्रसाद ग्रहण करना और पवित्र जल (चरणामृत) प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण रस्म है। भक्त अक्सर माता को लाल चुनरी, नारियल और सूखे मेवे अर्पित करते हैं।

यात्रा का समापन भैरव बाबा के दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है। यह मान्यता है कि माँ वैष्णो देवी ने भैरव को वरदान दिया था कि जो भक्त उनके दर्शन नहीं करेगा, उसकी यात्रा सफल नहीं मानी जाएगी। इसलिए, भवन से थोड़ी और चढ़ाई करके भैरव घाटी में स्थित भैरवनाथ मंदिर के दर्शन किए जाते हैं। शाम को होने वाली दिव्य आरती में शामिल होना एक अत्यंत सौभाग्यशाली अनुभव होता है, जब पूरा वातावरण माँ के जयकारों और भजनों से गूँज उठता है। नवरात्रि के दौरान, यह सभी परंपराएँ और भी श्रद्धापूर्वक निभाई जाती हैं, जब लाखों भक्त माता के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। भजन-कीर्तन, विशेषकर ‘तूने मुझे बुलाया शेरा वालिये’ जैसे भजन, यात्रा का अभिन्न अंग हैं, जो भक्तों को ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करते हैं।

अंत में, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ‘तूने मुझे बुलाया शेरा वालिये’ का भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि माँ और भक्त के बीच के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। यह एक ऐसा बुलावा है जो हर उस हृदय तक पहुँचता है जो माँ की ममता के लिए तरसता है। वैष्णो देवी की यात्रा केवल एक भौगोलिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा की परमात्मा तक पहुँचने की एक आध्यात्मिक यात्रा है। यह हमें सिखाती है कि जब माँ बुलाती हैं, तो कोई बाधा हमें रोक नहीं सकती। यह यात्रा हमें आंतरिक शांति, शक्ति और अटूट विश्वास प्रदान करती है। इसलिए, यदि आपके मन में कभी भी माँ वैष्णो देवी की पुकार महसूस हो, तो बिना किसी हिचकिचाहट के इस दिव्य यात्रा पर निकल पड़ें। माँ आपकी हर बाधा को दूर करेंगी और आपको अपनी ममतामयी गोद में लेंगी। जय माता दी! माँ वैष्णो देवी सदैव हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *