गुरुदेव दया करके मुझे अपना लेना: गुरु पूर्णिमा पर शिष्य की करुण पुकार और गुरु महिमा
जीवन के इस विस्तृत सागर में, जब मनुष्य दिग्भ्रमित होकर दिशाहीन हो जाता है, तब उसे एक ऐसे प्रकाश स्तंभ की आवश्यकता होती है जो उसे सही मार्ग दिखाए। भारतीय संस्कृति में इस प्रकाश स्तंभ को ‘गुरु’ कहा गया है। गुरु, अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का दिव्य आलोक फैलाते हैं। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व गुरु के इसी अतुलनीय महत्व को समर्पित है। यह वह दिन है जब शिष्य अपने गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम व्यक्त करते हैं। इस वर्ष, गुरु पूर्णिमा 2024 के अवसर पर, आइए हम उस हृदय स्पर्शी भावना में डूबें जो एक शिष्य के मन में गुरु के चरणों में समर्पित होते हुए उमड़ती है – “गुरुदेव दया करके मुझे अपना लेना।” यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि प्रत्येक साधक की आत्मा की पुकार है, गुरु कृपा की अभिलाषा है।
गुरु की खोज: अविरल की आध्यात्मिक यात्रा
एक समय की बात है, अविरल नाम का एक युवा, सांसारिक जीवन की आपाधापी से अत्यंत विचलित था। उसके मन में शांति का अभाव था और जीवन का वास्तविक उद्देश्य उसे अस्पष्ट प्रतीत होता था। उसने धन-दौलत, मान-सम्मान, सभी कुछ प्राप्त किया था, परंतु भीतर ही भीतर वह एक गहरे शून्य का अनुभव करता था। उसकी आत्मा किसी अज्ञात सत्य की खोज में भटक रही थी। वह अनेक स्थानों पर गया, बड़े-बड़े ग्रंथों का अध्ययन किया, अनेक विद्वानों से मिला, पर उसके अंतर्मन की प्यास शांत न हुई। उसका हृदय गुरु कृपा पाने को व्याकुल था। उसे ऐसा लगता था कि मानो कोई अदृश्य शक्ति उसे किसी ओर खींच रही हो, किसी ऐसे मार्ग की ओर जहां उसे अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल सकें।
एक दिन, जब वह हिमालय की वादियों में एकांत की तलाश में भटक रहा था, उसकी भेंट एक वृद्ध संत से हुई। संत की आँखों में ऐसा असीम तेज था और मुख पर ऐसी अद्भुत शांति कि अविरल स्वतः ही उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। संत ने उसे उठाया और प्रेमपूर्वक अपने पास बिठाया। अविरल ने अपने मन की सारी व्यथा उन्हें कह सुनाई। उसने बताया कि कैसे उसका जीवन अर्थहीन प्रतीत होता है और वह एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु की तलाश में है। संत ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी प्यास ही तुम्हें यहां तक लाई है। जब हृदय सच्चा गुरु चाहता है, तो गुरु स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं।” संत ने अविरल को अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।
गुरुदेव ने अविरल को जीवन का मर्म समझाया। उन्होंने बताया कि असली सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और ईश्वर से जुड़ाव में है। गुरुदेव ने अविरल को ध्यान, सेवा और भजन का मार्ग दिखाया। अविरल ने पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ गुरु की सेवा में स्वयं को लीन कर दिया। वह गुरु के प्रत्येक उपदेश को अपने जीवन में उतारता गया। गुरु भक्ति उसके रोम-रोम में समा गई थी।
कई वर्षों तक अविरल ने गुरुदेव के सानिध्य में रहकर ज्ञान अर्जित किया। गुरुदेव ने उसे ‘गुरुदेव दया करके मुझे अपना लेना भजन अर्थ’ की गहराई समझाई। उन्होंने बताया कि यह भजन सिर्फ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि शिष्य के अंतर्मन की वह सच्ची पुकार है जब वह अपनी सभी दुर्बलताओं, अहंकार और सांसारिक आसक्तियों को गुरु के चरणों में समर्पित कर देता है। ‘मुझे अपना लेना’ का अर्थ है गुरु के ज्ञान, उनके प्रेम और उनकी करुणा को अपने जीवन में पूरी तरह से आत्मसात करना। यह समर्पण ही शिष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। यह आध्यात्मिक गुरु महत्व का चरमोत्कर्ष है, जहाँ शिष्य अपनी व्यक्तिगत पहचान को गुरु की चेतना में विलीन करना चाहता है।
अविरल ने अनुभव किया कि गुरु का सानिध्य उसके जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। गुरु के बिना जीवन एक ऐसी नाव के समान है जिसमें पतवार न हो, जो लहरों के थपेड़े खाकर भटकती रहे। गुरु ही उस पतवार का कार्य करते हैं, जो हमें भवसागर से पार लगाते हैं। गुरुदेव की महिमा अपरंपार है। उन्होंने अविरल को बताया कि गुरु केवल शरीर नहीं, बल्कि एक चेतना हैं, एक सिद्धांत हैं जो सदियों से ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश का ही स्वरूप हैं, क्योंकि वे जन्म, पालन और संहार तीनों करते हैं – अज्ञान का जन्म, ज्ञान का पालन और अहंकार का संहार। गुरु के उपदेश ही जीवन की असली कुंजी हैं।
‘गुरुदेव दया करके मुझे अपना लेना’ की आध्यात्मिक महत्ता
“गुरुदेव दया करके मुझे अपना लेना” भजन, प्रत्येक साधक के हृदय की सच्ची पुकार है। यह भजन, गुरु के प्रति उस गहन प्रेम और विश्वास को दर्शाता है, जहाँ शिष्य यह मानता है कि गुरु की कृपा ही उसके जीवन का एकमात्र आधार है। गुरु कृपा कैसे पाएं? यह प्रश्न हर शिष्य के मन में उठता है। गुरु कृपा पाने का सबसे सरल और सीधा मार्ग है पूर्ण समर्पण और श्रद्धा। जब शिष्य अपने गुरु में पूर्ण विश्वास रखता है, उनके वचनों का पालन करता है, और निष्काम भाव से उनकी सेवा करता है, तब गुरु की कृपा स्वतः ही उस पर बरसती है। गुरु का ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह उनके दिव्य स्पर्श, उनके मौन सानिध्य और उनके आशीर्वाद में निहित होता है।
यह भजन आध्यात्मिक गुरु महत्व को भी रेखांकित करता है। एक आध्यात्मिक गुरु हमें केवल भौतिक सफलताओं के लिए प्रेरित नहीं करते, बल्कि हमारी आत्मा को जागृत करते हैं, हमें अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित कराते हैं। वे हमें माया के बंधनों से मुक्त होने का मार्ग दिखाते हैं और परमात्मा से जुड़ने की युक्ति सिखाते हैं। गुरु के बिना अध्यात्म का मार्ग अत्यंत दुर्गम है। वे हमारे भीतर छिपी हुई बुराइयों को दूर करते हैं, अहंकार का नाश करते हैं और हमें विनम्रता, प्रेम तथा करुणा के गुणों से विभूषित करते हैं। गुरु ही हमें जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
गुरु की महिमा का वर्णन शब्दों में करना असंभव है। वे हमें जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करने वाले होते हैं। गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु देवो महेश्वर हैं, गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं। गुरु वंदना के बिना कोई भी आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती। यह भजन हमें याद दिलाता है कि भले ही हम कितने भी ज्ञानी या शक्तिशाली क्यों न हों, हमें सदैव एक गुरु की आवश्यकता होती है जो हमें सही दिशा दे सकें। गुरु हमें हमारी कमजोरियों से अवगत कराते हैं और उन्हें दूर करने में हमारी सहायता करते हैं।
गुरु पूर्णिमा: गुरु पूजन और परंपराएं (गुरु पूर्णिमा 2024 विशेष)
गुरु पूर्णिमा का पर्व भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उत्सव है। यह पवित्र दिन महर्षि वेदव्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जिन्होंने वेदों का संकलन किया और अठारह पुराणों की रचना की। इस वर्ष, गुरु पूर्णिमा 2024 के अवसर पर, भक्तजन अपने गुरुओं का पूजन करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। फिर अपने गुरु की प्रतिमा या चित्र को स्थापित कर उनका पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन किया जाता है। गुरु को पुष्प, फल, मिष्ठान्न और वस्त्र अर्पित किए जाते हैं।
शिष्य गुरु के चरणों में बैठकर उनके उपदेशों का श्रवण करते हैं। गुरु भक्ति को प्रकट करने के लिए अनेक भक्तजन इस दिन उपवास रखते हैं और गुरु मंत्र का जप करते हैं। कई आश्रमों और मंदिरों में विशेष गुरु पूर्णिमा आरती और सत्संग का आयोजन किया जाता है, जहाँ गुरु महिमा पर प्रवचन दिए जाते हैं और भजन-कीर्तन होते हैं। “गुरुदेव दया करके मुझे अपना लेना” जैसे भजन विशेष रूप से गाए जाते हैं, जो गुरु के प्रति शिष्य की श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त करते हैं। गुरु के श्रीचरणों में बैठकर उनकी कथा सुनने से मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। गुरु पूर्णिमा का महत्व केवल गुरु पूजन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्म-चिंतन और गुरु के दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का भी दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमें जीवन में सदैव सीखने और विनम्र रहने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष: गुरु कृपा का शाश्वत आह्वान
जीवन की प्रत्येक यात्रा में, चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक, गुरु का सानिध्य अमूल्य होता है। “गुरुदेव दया करके मुझे अपना लेना” की यह करुण पुकार, केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उस गहन आत्म-समर्पण का प्रतीक है जो शिष्य को गुरु के चरणों में पूर्णता की ओर ले जाता है। गुरु पूर्णिमा 2024 का यह पावन अवसर हमें अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का अवसर प्रदान करता है।
गुरु कृपा ही वह अमृत है जो हमारे जीवन के सभी कष्टों को हर लेता है और हमें परम शांति की ओर अग्रसर करता है। आइए, हम सभी अपने गुरुओं के प्रति अगाध श्रद्धा रखें और उनके ज्ञान के प्रकाश से अपने जीवन को आलोकित करें। यही सच्ची गुरु भक्ति है, यही सच्चा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है। गुरु की महिमा अनंत है, और उनके बिना जीवन अंधकारमय है। अतः, हे गुरुदेव, दया करके हमें अपना लेना और हमें अपने चरणों में स्थान देना। यही हमारी प्रार्थना है।

