तेरी मुरली की धुन: कान्हा के दिव्य संगीत की अलौकिक यात्रा और कृष्ण भजन

तेरी मुरली की धुन: कान्हा के दिव्य संगीत की अलौकिक यात्रा और कृष्ण भजन

तेरी मुरली की धुन: कान्हा के दिव्य संगीत की अलौकिक यात्रा और कृष्ण भजन

ब्रह्मांड में यदि कोई ध्वनि ऐसी है जो शाश्वत प्रेम, अद्भुत शांति और असीम आनंद का संचार करती है, तो वह निश्चित रूप से भगवान श्री कृष्ण की मुरली की धुन है। यह मात्र एक वाद्य यंत्र से निकली ध्वनि नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा के हृदय से निकली प्रेम की पुकार है, जो जड़ और चेतन, सबको मंत्रमुग्ध कर देती है। सनातन स्वर के इस भक्तिपूर्ण आलेख में, आइए हम कान्हा की इसी दिव्य मुरली की धुन, उसकी लीलाओं और उसके गहन आध्यात्मिक महत्व की अलौकिक यात्रा पर निकलें।

**कान्हा की मुरली का अलौकिक आकर्षण**

श्री कृष्ण की मुरली, उनकी पहचान का एक अभिन्न अंग है। जब भी हम कृष्ण के किसी भी स्वरूप का ध्यान करते हैं, तो उनके अधरों पर सजी यह बांसुरी स्वयं ही हमारे मन-मस्तिष्क में अंकित हो जाती है। यह बांसुरी सिर्फ एक लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि स्वयं प्रेम का प्रतीक है, जिसके हर स्वर में दिव्यता और मोहकता समाहित है। जब कान्हा अपनी मुरली पर स्वर छेड़ते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण सृष्टि थम-सी गई हो, दिशाएँ शांत हो गई हों, और काल भी अपनी गति भूल गया हो। यह धुन इतनी प्रबल है कि वह न केवल मनुष्य, बल्कि पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति और यहाँ तक कि यमुना जैसी चंचल नदी को भी स्थिर कर देती है। यही वह आकर्षण है जो हर कृष्ण भक्त को ‘तेरी मुरली की धुन’ भजन के माध्यम से कान्हा के चरणों में खींच लाता है, उन्हें विस्मृत कर देता है और अलौकिक आनंद की अनुभूति कराता है।

**मुरली की लीलाएँ: वृंदावन की हर कण-कण में समाई धुन**

वृंदावन की गलियाँ, कुंज और वन कान्हा की मुरली की धुन से आज भी गुंजायमान हैं। अनेक पौराणिक कथाओं और लीलाओं में मुरली की महिमा का वर्णन मिलता है। यह माना जाता है कि मुरली भगवान शिव का प्रिय वाद्य था, जिसे उन्होंने स्वयं भगवान कृष्ण को भेंट किया था, या कुछ कथाओं के अनुसार, यह प्रकृति का एक अंश थी जिसने स्वयं को कृष्ण के प्रेम में समर्पित कर दिया था।

कान्हा की मुरली की धुन पर कई अद्भुत लीलाएँ घटित हुईं:

* **गाय-बछड़ों का प्रेम:** जब कान्हा वन में गाय चराने जाते और मुरली बजाते, तो गायें और बछड़े अपनी चराई छोड़कर एकटक उनकी ओर देखने लगते। उनकी आँखों में प्रेम और समर्पण का भाव स्पष्ट दिखाई देता। वे धुन में ऐसे खो जाते कि उन्हें अपनी सुध-बुध भी नहीं रहती थी।
* **गोपियों का व्याकुल प्रेम:** वृंदावन की गोपियों के लिए मुरली की धुन कान्हा की पुकार थी। जैसे ही वे धुन सुनतीं, अपने सारे काम छोड़कर, परिवार की चिंता त्याग कर, दौड़ी चली आतीं। कोई दही बिलोते-बिलोते रुक जाती, कोई भोजन बनाते-बनाते छोड़ देती और कोई अपने बच्चे को भूलकर बस उस धुन की ओर खिंची चली आती। यह उनके निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण का अद्भुत उदाहरण था। ‘तेरी मुरली की धुन’ का सार गोपियों के इसी भाव में छिपा है।
* **यमुना का थमना और प्रकृति का नर्तन:** मुरली की धुन में इतना जादू था कि यमुना नदी का प्रवाह भी थम जाता था, उसकी लहरें शांत हो जाती थीं, मानो वह भी उस मधुर संगीत का पान कर रही हो। वन के वृक्ष झुक जाते, फूल खिल उठते और पक्षी अपना कलरव रोककर कृष्ण की धुन सुनते। यह धुन प्रकृति को भी प्रेम में नचा देती थी।
* **राधा रानी का समर्पण:** राधा रानी, जो कृष्ण की प्राणप्रिया हैं, मुरली की धुन में पूरी तरह से विलीन हो जाती थीं। उनके लिए यह धुन कान्हा के हृदय की पुकार थी, जो उन्हें और कान्हा को एक अटूट बंधन में बाँधती थी। राधा कृष्ण की प्रेम कथा में मुरली की धुन ने एक सेतु का कार्य किया।
* **मुरली से ईर्ष्या:** कई बार गोपियाँ मुरली से ईर्ष्या भी करती थीं, क्योंकि मुरली सदैव कृष्ण के अधरों पर विराजमान रहती थी और वे कान्हा के इतने निकट नहीं जा पाती थीं। यह दर्शाता है कि मुरली कान्हा के लिए कितनी प्रिय थी, मानो वह उनके प्राणों का ही विस्तार हो।

ये लीलाएँ दर्शाती हैं कि कान्हा की मुरली मात्र एक वाद्य नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और दैवीय आनंद का एक शाश्वत माध्यम है, जो वृंदावन की हर कथा और हर कोने में जीवंत है।

**आध्यात्मिक गहराइयाँ: मुरली, प्रेम और समर्पण का प्रतीक**

मुरली की धुन का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह केवल कर्णप्रिय संगीत नहीं, बल्कि एक उच्च आध्यात्मिक अनुभव है जो भक्त को सीधे परमात्मा से जोड़ता है।

* **परमात्मा का निमंत्रण:** मुरली की धुन को अक्सर परमात्मा का भक्तों के लिए निमंत्रण माना जाता है। यह हमें सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मा की वास्तविक पहचान और परमात्मा से उसके संबंध की याद दिलाती है। यह पुकार हमें अपने भीतर झाँकने और ईश्वर से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है।
* **खाली बांसुरी और परमात्मा:** मुरली स्वयं अंदर से खाली होती है। यह मनुष्य का प्रतीक है। जब एक खाली बांसुरी (मनुष्य का शरीर और मन) स्वयं को पूरी तरह से कृष्ण (परमात्मा) के हाथों में सौंप देता है, तो उसमें से दिव्य संगीत (भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान) प्रवाहित होने लगता है। यह पूर्ण समर्पण का चरम प्रतीक है, जहाँ अहंकार शून्य हो जाता है और केवल ईश्वर की इच्छा ही शेष रहती है।
* **प्रेम और योग:** मुरली की धुन प्रेम योग का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम ही ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल और शक्तिशाली मार्ग है। इस धुन में खोकर भक्त अपने सभी दुखों और चिंताओं को भूल जाता है और एक अद्भुत शांति व आनंद की अनुभूति करता है।
* **अध्यात्मिक जागरण:** कृष्ण के भजन, विशेषकर ‘तेरी मुरली की धुन’ पर आधारित भजन, आध्यात्मिक जागरण का स्रोत हैं। इन भजनों को सुनकर, गाकर या उन पर ध्यान केंद्रित कर भक्त अपने चित्त को शांत कर सकता है और स्वयं को उस दिव्य ऊर्जा से जोड़ सकता है जो ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है।

**मुरली की भक्ति में लीन होने के तरीके**

कान्हा की मुरली की दिव्य धुन से जुड़ने के कई सरल और प्रभावशाली तरीके हैं, जिन्हें कोई भी भक्त अपने जीवन में अपना सकता है:

* **कृष्ण भजन और कीर्तन:** ‘तेरी मुरली की धुन’ जैसे कृष्ण भजन गाना या सुनना, स्वयं को उस दिव्य वातावरण में लीन करने का सबसे आसान तरीका है। भक्ति संगीत हमें सीधे ईश्वर से जोड़ता है और मन को शुद्ध करता है। विभिन्न कृष्ण आरती और कृष्ण लीला के वर्णन में भी मुरली की महिमा का गुणगान होता है।
* **मंत्र जाप:** हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करना, या अन्य कृष्ण मंत्रों का उच्चारण करना, मन को एकाग्र करने और मुरली की धुन के आध्यात्मिक कंपन से जुड़ने में मदद करता है।
* **ध्यान और कल्पना:** शांतिपूर्ण स्थान पर बैठकर, आँखें बंद करके कृष्ण की मुरली बजाते हुए छवि का ध्यान करें। कल्पना करें कि उनकी मुरली से निकलने वाली धुन आपको घेरे हुए है और आपके भीतर शांति भर रही है।
* **मंदिरों में दर्शन और सेवा:** बांके बिहारी या अन्य कृष्ण मंदिरों में जाकर दर्शन करना और सेवा करना भी भक्ति को बढ़ाता है। मंदिरों में अक्सर मुरली वाले स्वरूप की पूजा की जाती है, जो हमें उस धुन का स्मरण कराती है।
* **पवित्र ग्रंथों का पाठ:** श्रीमद्भगवद्गीता और भागवत पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों का पाठ करना या सुनना कृष्ण और उनकी लीलाओं को समझने में मदद करता है, जिससे मुरली के आध्यात्मिक महत्व की गहरी समझ विकसित होती है।

**अंतिम विचार: कान्हा की मुरली की अमर पुकार**

भगवान श्री कृष्ण की मुरली की धुन केवल बीते युग की कोई मधुर स्मृति नहीं, बल्कि एक शाश्वत सत्य है जो आज भी हमारे हृदय में गूँजती है। यह हमें प्रेम, भक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाती है। ‘तेरी मुरली की धुन’ सिर्फ एक भजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा का आह्वान है – एक ऐसी यात्रा जो हमें स्वयं से, प्रकृति से और अंततः परमात्मा से जोड़ती है।

आइए, हम सब अपने जीवन में कान्हा की मुरली की इस दिव्य धुन को सुनें, उसके हर स्वर को महसूस करें और स्वयं को उस अलौकिक प्रेम में लीन कर दें जो संपूर्ण सृष्टि को चलायमान रखता है। सनातन स्वर की यह कामना है कि आप सभी इस कृष्ण महिमा का अनुभव करें और अपने जीवन को धन्य बनाएँ। हरि बोल!

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