ईश्वर अल्लाह तेरे नाम: शांति, सद्भाव और एकत्व का पावन भजन

ईश्वर अल्लाह तेरे नाम: शांति, सद्भाव और एकत्व का पावन भजन

ईश्वर अल्लाह तेरे नाम: शांति, सद्भाव और एकत्व का पावन भजन

मनुष्य के हृदय में चिरकाल से ही शांति और सौहार्द की गहरी अभिलाषा रही है। इस अभिलाषा को वाणी देने और उसे जीवन का मार्ग बनाने में भजन और कीर्तन की भूमिका अतुलनीय रही है। जब हम ‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान’ भजन का स्मरण करते हैं, तो हमारे मन में न केवल एक धुन, बल्कि एक विराट दर्शन, एक जीवनशैली और एक युगों पुराना संदेश गूंजने लगता है। यह भजन मात्र शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि हमारी आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो हमें एकता, प्रेम और सहिष्णुता के उच्चतम शिखर तक ले जाता है। सनातन धर्म की मूल भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ (सत्य एक है, ऋषि उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं) को यह भजन सहजता से प्रतिध्वनित करता है, यह बताता है कि भले ही पुकारने वाले के होंठ अलग-अलग हों, लेकिन पुकार एक ही परम सत्ता तक पहुँचती है।

एकत्व की प्राचीन गाथा और भजन का उद्भव

भारतवर्ष की धरती सदा से ही आध्यात्मिकता और दार्शनिक चिंतन का केंद्र रही है। हमारे वेद, उपनिषद और पुराणों में यह सत्य बार-बार उद्घोषित किया गया है कि परमब्रह्म एक ही है, जिसे विभिन्न रूपों और नामों से पूजा जाता है। ऋग्वेद का वह प्रसिद्ध मंत्र ‘एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ इसी सार्वभौमिक सत्य का प्रमाण है। यह केवल धार्मिक सहिष्णुता का सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह उस गहन अंतर्दृष्टि का परिणाम है कि सभी मार्ग एक ही परम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। इसी दर्शन ने भारत में भक्ति आंदोलन को जन्म दिया, जहाँ संत कबीर, गुरु नानक देव, रविदास, मीराबाई जैसे महान संतों ने जाति, धर्म और पंथ के बंधनों को तोड़कर प्रेम और एकत्व का संदेश दिया।

संत कबीर की वाणी में हमें ‘राम-रहीम एक हैं’ का सार मिलता है, जो हमें बाहरी भेदों से परे देखने की प्रेरणा देता है। उन्होंने अपने दोहों और भजनों के माध्यम से यह समझाया कि ईश्वर न तो मंदिर में है और न मस्जिद में, बल्कि वह हर प्राणी के हृदय में वास करता है। इसी तरह, गुरु नानक देव ने ‘एक ओंकार सतनाम’ का उद्घोष कर एक ही परमपिता परमात्मा की सत्ता को स्थापित किया, जहाँ कोई भेदभाव नहीं। इन संतों ने अपनी कहानियों (कथाओं) और उपदेशों से समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया, और उनके संदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

आधुनिक युग में, इस भजन को विश्वभर में पहचान दिलाने का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को जाता है। उनकी प्रार्थना सभाओं का यह एक अनिवार्य अंग था। गांधीजी ने अपने जीवन और आदर्शों से यह प्रमाणित किया कि अहिंसा और सत्य ही सबसे बड़े धर्म हैं, और सभी धर्मों का सार प्रेम और सद्भाव में निहित है। वे ‘सर्वधर्म समभाव’ के प्रबल समर्थक थे और उनके लिए यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि उनके जीवन दर्शन का मूर्त रूप था। उन्होंने इस भजन के माध्यम से करोड़ों भारतीयों के हृदय में एकता और राष्ट्रीयता की भावना को प्रज्वलित किया, जिससे भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को एक आध्यात्मिक और नैतिक बल मिला। गांधीजी की यह कहानी (kahani) स्वयं एक प्रेरणादायक कथा है कि कैसे एक व्यक्ति ने आध्यात्मिक मूल्यों के बल पर एक राष्ट्र को एकजुट किया। उनके द्वारा गाए गए इस भजन ने न केवल धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक बनाया, बल्कि यह भी सिखाया कि कैसे विभिन्न विश्वासों के लोग एक साझा उद्देश्य के लिए एक साथ आ सकते हैं। यह भजन उनकी आध्यात्मिक यात्रा और उनके लोक कल्याण के संकल्प का एक सुंदर प्रतिबिंब है।

भजन का गहन आध्यात्मिक महत्व

‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम’ भजन का आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक गहरा है। यह हमें सिखाता है कि:
1. नाम नहीं, भाव महत्वपूर्ण है: यह भजन इस बात पर जोर देता है कि ईश्वर को किसी भी नाम से पुकारा जाए, चाहे वह ईश्वर हो, अल्लाह हो, राम हो, कृष्ण हो, गुरु हो या खुदा, महत्वपूर्ण नाम नहीं बल्कि पुकारने वाले का भाव और उसकी श्रद्धा है। सच्चा भक्त उस निराकार परम सत्ता को देखता है जो सभी नामों और रूपों से परे है। यह हमें आडंबरों से दूर रहकर हृदय से भक्ति करने की प्रेरणा देता है।
2. एकता और सार्वभौमिक प्रेम: भजन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश एकता और सार्वभौमिक प्रेम का है। यह सिखाता है कि सभी मनुष्य एक ही परमपिता परमात्मा की संतान हैं, और इसलिए हमें एक-दूसरे से प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिए। यह भजन समाज में फैली विभाजनकारी सोच और धार्मिक कट्टरता को चुनौती देता है, और एक ऐसे विश्व की परिकल्पना करता है जहाँ सभी धर्मों के लोग शांति और सौहार्द के साथ रहते हैं। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करता है।
3. सन्मति और विवेक की प्रार्थना: भजन का दूसरा महत्वपूर्ण अंश है ‘सबको सन्मति दे भगवान’। यह केवल ईश्वर से प्रेम की प्रार्थना नहीं, बल्कि सदबुद्धि, विवेक और सही मार्ग पर चलने की प्रार्थना भी है। सन्मति का अर्थ है शुभ बुद्धि, वह ज्ञान जो हमें सही और गलत का भेद सिखाए, जो हमें पूर्वाग्रहों और संकीर्ण विचारों से मुक्त करे। यह प्रार्थना व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागरूकता और नैतिक मूल्यों का विकास करती है, जिससे वह अपने जीवन को धर्म और न्याय के पथ पर अग्रसर कर सके। यह हमें मोक्ष के मार्ग पर ले जाने के लिए आवश्यक विवेक प्रदान करता है।
4. आंतरिक शांति का मार्ग: जब हम इस भजन को पूरे हृदय से गाते हैं या सुनते हैं, तो यह हमारे भीतर एक अद्भुत शांति का संचार करता है। यह हमें बाहरी दुनिया के कोलाहल से दूर करके अपने अंतर्मन से जुड़ने का अवसर देता है। यह भजन ध्यान (meditation) और प्रार्थना का एक शक्तिशाली माध्यम बन सकता है, जो मन को शांत और एकाग्र करता है, और हमें आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।

रीति-रिवाज और परंपराओं में भजन का स्थान

यद्यपि ‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम’ किसी विशिष्ट पूजा-विधि या धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं है, फिर भी इसने विभिन्न आध्यात्मिक और सामाजिक परंपराओं में अपना एक विशेष स्थान बनाया है।

1. प्रार्थना सभाएं और संकीर्तन: महात्मा गांधी ने इसे अपनी प्रार्थना सभाओं का अभिन्न अंग बनाया था, और आज भी अनेक आश्रमों, आध्यात्मिक केंद्रों और विद्यालयों में इसे प्रार्थना के रूप में गाया जाता है। यह सामूहिक संकीर्तन का एक प्रभावशाली माध्यम है, जहाँ विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग एक साथ बैठकर शांति और प्रेम का संदेश फैलाते हैं। यह भजन कीर्तन का एक ऐसा रूप है जो सीमाओं को लांघता है।
2. अंतरधार्मिक संवाद: यह भजन अक्सर अंतरधार्मिक सम्मेलनों और सद्भाव बैठकों में गाया जाता है, जहाँ यह विभिन्न धर्मों के अनुयायियों को एक साझा मंच प्रदान करता है। यह संवाद को बढ़ावा देता है और यह दिखाता है कि कैसे विभिन्न आस्थाएं एक-दूसरे का सम्मान करते हुए सह-अस्तित्व में रह सकती हैं।
3. व्यक्तिगत साधना: अनेक व्यक्ति इसे अपनी दैनिक पूजा, ध्यान या आरती के समय भी गाते हैं। यह उन्हें अपने इष्टदेव से जुड़ने और अपनी आध्यात्मिक यात्रा को गहरा करने में मदद करता है। यह एक सरल लेकिन शक्तिशाली मंत्र की तरह कार्य करता है, जो मन को एकाग्र करता है और भीतर शांति लाता है। यह भजन स्वयं में एक प्रकार की ‘कथा’ है जो हमें ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम की सीख देती है।
4. सामाजिक और शैक्षणिक महत्व: विद्यालयों में प्रातःकालीन सभाओं में इसे गाकर बच्चों को बचपन से ही सहिष्णुता और एकता का पाठ पढ़ाया जाता है। यह भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण मूल्य ‘धार्मिक सद्भाव’ को पुष्ट करता है।

आज के समय में भजन की प्रासंगिकता

आज के विश्व में जहाँ धार्मिक और सांस्कृतिक विभाजन अक्सर संघर्षों का कारण बनते हैं, ‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम’ भजन का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि भले ही हम अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हों, हम सभी का गंतव्य एक ही है – प्रेम, शांति और मानवता की सेवा। यह भजन हमें उस आंतरिक शक्ति को खोजने में मदद करता है जो हमें घृणा और द्वेष से ऊपर उठकर करुणा और प्रेम को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है, जो हमें सच्चे ‘आध्यात्मिक यात्रा’ की ओर अग्रसर करता है। यह हमें सिखाता है कि धर्म का वास्तविक अर्थ मानव-सेवा और सह-अस्तित्व में निहित है, न कि अलगाव और संघर्ष में। यह हमें उन सनातन मूल्यों की ओर लौटाता है जो सभी वेदों, पुराणों और उपनिषदों का सार हैं – वह ज्ञान जो सत्य की खोज में सहायता करता है।

निष्कर्ष

‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान’ – यह भजन सनातन सत्य का एक मधुर और सशक्त उद्घोष है। यह हमें याद दिलाता है कि सभी नामों के पीछे एक ही परम सत्ता है, और उस सत्ता की सच्ची पूजा हृदय में प्रेम और सभी के प्रति सद्भाव रखने में है। यह भजन हमें अपनी आध्यात्मिक यात्रा में एक मार्गदर्शक की तरह प्रेरणा देता है कि हमें केवल अपने ईश्वर को ही नहीं, बल्कि दूसरों के ईश्वर को भी सम्मान देना चाहिए, क्योंकि सभी मार्ग अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। आइए, हम इस पवित्र भजन के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करें, और शांति, एकता तथा सन्मति के प्रकाश को अपने आसपास फैलाएं, जिससे यह धरा एक प्रेमपूर्ण और सद्भावपूर्ण ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ बन सके। यह भजन हमें उस परम ज्ञान की ओर ले जाता है जो जीवन का सार है, जो हमें सच्चा मोक्ष प्रदान करता है।

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