महामृत्युंजय मंत्र जाप विधि और लाभ

महामृत्युंजय मंत्र जाप विधि और लाभ

महामृत्युंजय मंत्र जाप विधि और लाभ

सनातन धर्म में ऐसे अनेक मंत्र हैं जो न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं, बल्कि लौकिक और पारलौकिक कष्टों से भी मुक्ति दिलाते हैं। इन सभी में, भगवान शिव को समर्पित ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा का पुंज है, जो अपने साधक को मृत्यु के भय से निकालकर अमरता की ओर ले जाने की क्षमता रखता है। ‘संजीवन मंत्र’ के नाम से विख्यात यह पवित्र स्तोत्र, अकाल मृत्यु को टालने, गंभीर रोगों से मुक्ति दिलाने और जीवन में शांति व समृद्धि प्रदान करने का अचूक साधन माना जाता है। आइए, सनातन स्वर के इस भक्तिमय यात्रा में हम महामृत्युंजय मंत्र के गूढ़ रहस्यों, इसकी सही जाप विधि और इससे प्राप्त होने वाले अनंत लाभों को गहराई से समझते हैं। यह मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि स्वयं महादेव की कृपा का साक्षात् अनुभव है।

महामृत्युंजय मंत्र की पौराणिक कथा: मार्कण्डेय ऋषि की अमरता

महामृत्युंजय मंत्र के उद्भव और उसकी शक्ति को समझने के लिए हमें पौराणिक कथाओं के स्वर्णिम पन्नों को पलटना होगा। यह कथा महर्षि मृकण्डु और उनकी पत्नी मरुद्मती के पुत्र मार्कण्डेय ऋषि से जुड़ी है।

मृकण्डु ऋषि निस्संतान होने के कारण अत्यंत दुखी थे। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने ऋषि से वरदान मांगने को कहा। भगवान शिव ने उन्हें दो विकल्प दिए: या तो वे एक दीर्घायु, मूर्ख पुत्र प्राप्त करें, या फिर एक अल्पायु, परंतु अत्यंत ज्ञानी और तेजस्वी पुत्र। मृकण्डु ऋषि ने बिना किसी संकोच के दूसरे विकल्प का चयन किया और कहा कि उन्हें अल्पायु किंतु सद्गुणी पुत्र चाहिए।

भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और बताया कि उनके पुत्र की आयु केवल सोलह वर्ष होगी। समय बीतता गया और मृकण्डु ऋषि को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम मार्कण्डेय रखा गया। बालक मार्कण्डेय बचपन से ही अत्यंत मेधावी, धर्मपरायण और अपने माता-पिता के प्रति समर्पित था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, ऋषि दंपत्ति के मन में सोलह वर्ष की आयु की चिंता बढ़ती गई।

जब मार्कण्डेय सोलह वर्ष के होने वाले थे, तब उनके माता-पिता बहुत उदास रहने लगे। मार्कण्डेय ने उनकी उदासी का कारण पूछा, तो उन्हें अपनी अल्पायु का रहस्य ज्ञात हुआ। यह जानकर भी मार्कण्डेय विचलित नहीं हुए। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपनी मृत्यु को स्वयं भगवान शिव की शरण में जाकर टालेंगे।

मार्कण्डेय ने काशी में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग की स्थापना की और घोर तपस्या में लीन हो गए। उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि वे निरंतर ‘ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…’ मंत्र का जाप करते रहे।

सोलह वर्ष पूर्ण होने पर, यमराज अपने दूतों के साथ मार्कण्डेय के प्राण हरने के लिए आए। उन्होंने देखा कि मार्कण्डेय शिवलिंग को कसकर पकड़े हुए निरंतर मंत्र जाप कर रहे हैं। यमदूतों ने मार्कण्डेय को खींचने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हुए। तब स्वयं यमराज भैंसे पर सवार होकर वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने अपना पाश मार्कण्डेय के गले में डाला, जो शिवलिंग से भी लिपट गया।

जैसे ही यमराज ने पाश खींचा, मार्कण्डेय की रक्षा के लिए भगवान शिव स्वयं शिवलिंग से प्रकट हो गए। उनका क्रोध प्रलयंकारी था। भगवान शिव ने यमराज को ‘महाकाल’ रूप में ललकारा और उन्हें चेतावनी दी। भगवान शिव ने यमराज से कहा, “तुमने मेरे परम भक्त के प्राण लेने का दुस्साहस किया है, वह भी उस अवस्था में जब वह मेरा स्मरण कर रहा था।” भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से यमराज को दंडित किया और उन्हें पराजित कर दिया।

भगवान शिव ने मार्कण्डेय को चिरंजीवी होने का वरदान दिया और कहा कि जो कोई भी इस महामृत्युंजय मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताएगा और वह दीर्घायु प्राप्त करेगा। इस प्रकार, मार्कण्डेय ऋषि ने अपनी अटूट भक्ति और महामृत्युंजय मंत्र की शक्ति से मृत्यु पर विजय प्राप्त की और चिरंजीवी कहलाए। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और मंत्रों की शक्ति से बड़े से बड़ा संकट भी टाला जा सकता है।

महामृत्युंजय मंत्र का आध्यात्मिक और गूढ़ अर्थ

महामृत्युंजय मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों और शिव तत्व को समझने की एक कुंजी है। इसके प्रत्येक शब्द में गहरा आध्यात्मिक अर्थ समाहित है, जो इसे अत्यंत शक्तिशाली बनाता है।

मंत्र इस प्रकार है:
**ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।**
**उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥**

आइए, इसके एक-एक शब्द के अर्थ को समझें:

* **ॐ (ओम्):** यह संपूर्ण ब्रह्मांड की ध्वनि है, परब्रह्म का प्रतीक। सभी मंत्रों का बीज और आदि ध्वनि।
* **त्र्यम्बकं (त्रयम्बकं):** ‘त्रि’ का अर्थ है तीन और ‘अम्बकं’ का अर्थ है आँखें। अर्थात, तीन नेत्रों वाले देव। यह भगवान शिव का विशेषण है, जो उनके भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता होने या सूर्य, चंद्र और अग्नि रूपी तीन नेत्रों को दर्शाता है।
* **यजामहे (यजामहे):** हम पूजते हैं, हम उनकी स्तुति करते हैं। यह समर्पण और भक्ति का भाव है।
* **सुगन्धिं (सुगन्धिम्):** सुगंधित, जिसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैली हुई हो। यह भगवान शिव के पवित्र, आनंदमय और सर्वव्यापी स्वरूप का वर्णन करता है। जैसे फूलों की सुगंध सब जगह फैल जाती है, वैसे ही शिव की कृपा भी हर जगह व्याप्त है।
* **पुष्टिवर्धनम् (पुष्टिवर्धनम्):** पोषण करने वाले, जीवन को समृद्ध करने वाले, शक्ति प्रदान करने वाले। भगवान शिव न केवल भौतिक पोषण देते हैं, बल्कि आत्मा को भी शक्ति और शांति प्रदान करते हैं। वे जीवन में आरोग्य, धन, यश और आध्यात्मिक उन्नति के दाता हैं।
* **उर्वारुकमिव (उर्वारुकमिव):** ‘उर्वारुक’ का अर्थ है ककड़ी या खरबूजा। ‘इव’ का अर्थ है ‘की तरह’। अर्थात, जैसे ककड़ी या खरबूजा अपनी बेल से पकने पर अनायास ही अलग हो जाता है।
* **बन्धनान् (बन्धनान्):** बंधनों से, मोह माया के बंधनों से, रोग-शोक के बंधनों से, मृत्यु के भय के बंधनों से।
* **मृत्योर्मुक्षीय (मृत्योर्मुक्षीय):** ‘मृत्यु’ से ‘मुक्षीय’ यानी मुक्ति मिले। यह न केवल शारीरिक मृत्यु से मुक्ति की कामना है, बल्कि जन्म-मरण के चक्र से, अज्ञान के अंधकार से और सांसारिक कष्टों से भी मुक्ति का आह्वान है।
* **माऽमृतात् (माऽमृतात्):** ‘मा’ का अर्थ है नहीं और ‘अमृतात्’ का अर्थ है अमरता से। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें अमरता न मिले, बल्कि यह कि हमें मृत्यु से इस प्रकार मुक्ति मिले, जैसे ककड़ी पक कर अपनी बेल से स्वतः अलग हो जाती है, सहजता से, बिना किसी कष्ट के। इसका एक गूढ़ अर्थ यह भी है कि हमें नश्वर जीवन के मोह से मुक्ति मिले, ताकि हम वास्तविक अमरत्व यानी मोक्ष की प्राप्ति कर सकें।

यह मंत्र हमें भगवान शिव की त्रिनेत्रीय शक्ति, उनकी सुगंधित उपस्थिति और पोषणकारी स्वभाव का स्मरण कराता है। यह प्रार्थना करता है कि जिस प्रकार एक पका हुआ फल अपनी डाली से बिना किसी प्रयास के अलग हो जाता है, उसी प्रकार हम भी मृत्यु के बंधन से सहजता से मुक्त हो सकें, और केवल शारीरिक मृत्यु से ही नहीं, बल्कि जन्म-मृत्यु के चक्र से, अज्ञानता से और सभी सांसारिक बंधनों से भी हमें मुक्ति मिले, ताकि हम अमृतत्व यानी मोक्ष को प्राप्त कर सकें। यह मंत्र हमें मृत्यु के भय से निकालकर जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य ‘मोक्ष’ की ओर प्रेरित करता है।

महामृत्युंजय मंत्र जाप विधि और उससे प्राप्त होने वाले लाभ

महामृत्युंजय मंत्र का जाप विधि-विधान और पूर्ण श्रद्धा के साथ करने पर ही इसके अधिकतम लाभ प्राप्त होते हैं। इसकी जाप विधि निम्नलिखित है:

1. **शुद्धि और संकल्प:**
* जाप करने से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* महादेव का ध्यान करते हुए मानसिक और शारीरिक शुद्धि का भाव रखें।
* एक शांत और पवित्र स्थान का चुनाव करें।
* पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
* जाप से पहले संकल्प लें। संकल्प में अपना नाम, गोत्र, स्थान और जिस उद्देश्य से जाप कर रहे हैं, उसे स्पष्ट रूप से कहें। जैसे: “मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अमुक मनोकामना (जाप का उद्देश्य) की पूर्ति हेतु महामृत्युंजय मंत्र का (संख्या) जाप करने का संकल्प लेता हूँ/लेती हूँ।”

2. **आसन और माला:**
* कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
* रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। रुद्राक्ष स्वयं शिव का स्वरूप माना जाता है और यह जाप में अत्यधिक फलदायी होता है।

3. **पूजा और ध्यान:**
* सामने भगवान शिव की प्रतिमा, चित्र या शिवलिंग स्थापित करें।
* शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत, चंदन और फूल आदि अर्पित करें।
* भगवान शिव का ध्यान करें। उनके शांत, दिव्य और कल्याणकारी स्वरूप का मन ही मन चिंतन करें।

4. **जाप का समय और संख्या:**
* सुबह ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व), प्रदोष काल या शिवरात्रि जैसे शुभ अवसरों पर जाप करना विशेष फलदायी होता है।
* जाप कम से कम 108 बार (एक माला) करें।
* विशेष मनोकामनाओं के लिए सवा लाख (1,25,000) या ग्यारह लाख (1,100,000) जाप का अनुष्ठान किया जाता है। इतने बड़े जाप किसी योग्य पंडित के मार्गदर्शन में किए जाने चाहिए।

5. **उच्चारण और भावना:**
* मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए।
* जाप करते समय मन शांत और एकाग्र रखें। भगवान शिव पर अपना ध्यान केंद्रित करें।
* मंत्र के अर्थ और उसके सकारात्मक प्रभावों पर विचार करें।
* जाप के दौरान किसी से बातचीत न करें।

6. **जाप के लाभ (Benefits):**
* **अकाल मृत्यु का भय समाप्त:** यह मंत्र अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है और लंबी आयु प्रदान करता है, जैसा कि मार्कण्डेय ऋषि की कथा में देखा गया।
* **गंभीर रोगों से मुक्ति:** इसे ‘संजीवन मंत्र’ भी कहते हैं। असाध्य रोगों से जूझ रहे व्यक्तियों को इस मंत्र के जाप से विशेष लाभ मिलता है और वे स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं।
**ग्रह दोषों का निवारण:** कुंडली में किसी भी प्रकार के ग्रह दोष, जैसे मंगल दोष, शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के नकारात्मक प्रभावों को शांत करने में यह मंत्र अत्यंत प्रभावी है।
* **मानसिक शांति और भयमुक्ति:** यह मन को शांति प्रदान करता है, तनाव, चिंता और अवसाद को दूर करता है। अज्ञात भय से मुक्ति दिलाता है।
* **मोक्ष की प्राप्ति:** यह मंत्र न केवल सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
* **समृद्धि और उन्नति:** जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर यह सुख, समृद्धि और निरंतर उन्नति के मार्ग खोलता है।
* **शत्रुओं पर विजय:** यह मंत्र व्यक्ति को आंतरिक और बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है।
* **आध्यात्मिक विकास:** निरंतर जाप से आत्मिक बल में वृद्धि होती है और साधक का आध्यात्मिक पथ आलोकित होता है।

निष्कर्ष

महामृत्युंजय मंत्र, सनातन धर्म का एक ऐसा अनुपम वरदान है जो भगवान शिव की असीम करुणा और शक्ति का प्रतीक है। मार्कण्डेय ऋषि की कथा से लेकर आज तक, करोड़ों भक्त इस मंत्र के माध्यम से जीवन के हर संकट का सामना करने और उस पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा पाते रहे हैं। यह सिर्फ एक मंत्र नहीं, बल्कि एक जीवनदर्शन है जो हमें मृत्यु के भय से ऊपर उठकर शाश्वत सत्य, आरोग्य और आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है।

चाहे आप गंभीर बीमारी से जूझ रहे हों, अकाल मृत्यु के भय से ग्रस्त हों, या केवल आत्मिक शांति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा चाहते हों, महामृत्युंजय मंत्र का जाप आपके लिए संजीवनी बूटी के समान है। इसे अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाएं, शुद्ध मन और अटूट श्रद्धा के साथ इसका जाप करें। भगवान शिव निश्चित रूप से आपकी सभी प्रार्थनाएं स्वीकार करेंगे और आपको अभय प्रदान करेंगे।

इस दिव्य मंत्र के प्रकाश में, आइए हम सभी महादेव के चरणों में अपना शीश झुकाएं और उनके कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान करते हुए जीवन को धन्य बनाएं। ॐ नमः शिवाय। हर हर महादेव!

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