शिव ताण्डव स्तोत्रम्: भगवान शिव की स्तुति का अलौकिक गान, संपूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित
सनातन धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव के रूप में पूजा जाता है। उनकी महिमा अनंत है और उनकी उपासना के अनेकों माध्यम हैं, जिनमें से एक अत्यंत शक्तिशाली और हृदयस्पर्शी माध्यम है ‘शिव ताण्डव स्तोत्रम्’। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भक्ति, समर्पण और दैवीय शक्ति का अद्भुत संगम है। लंकापति रावण द्वारा रचित यह स्तोत्र भगवान शिव के रौद्र और कल्याणकारी दोनों रूपों का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन करता है, जिसे सुनकर स्वयं भगवान शिव भी प्रसन्न हो उठते हैं।
आज ‘सनातन स्वर’ के इस विशेष लेख में, हम आपको शिव ताण्डव स्तोत्रम् के संपूर्ण पाठ के साथ-साथ उसके गहन हिंदी अर्थ से भी परिचित कराएंगे। साथ ही, हम इसकी रचना के पीछे की पौराणिक कथा, इसके पाठ के आध्यात्मिक महत्व और इससे प्राप्त होने वाले अद्भुत लाभों पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे। यदि आप भगवान शिव के सच्चे भक्त हैं और उनके दिव्य स्वरूप को करीब से जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए एक अमूल्य धरोहर साबित होगा।
मुख्य कथा: शिव ताण्डव स्तोत्रम् की अद्भुत उत्पत्ति
शिव ताण्डव स्तोत्रम् की रचना के पीछे एक अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक कथा है, जो लंकापति रावण की भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति को दर्शाती है। रावण, जो अपने ज्ञान, पराक्रम और शिव भक्ति के लिए विख्यात था, एक बार भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाना चाहता था। उसका मानना था कि कैलाश पर्वत पर स्थित शिवजी की प्रतिमा को वह अपनी शक्ति से उठाकर लंका ले जाएगा, जिससे लंका भी पवित्र और अजेय बन जाएगी।
अपने इसी दृढ़ निश्चय के साथ, रावण कैलाश पर्वत के नीचे पहुँच गया और अपनी बीस भुजाओं तथा दसों सिरों की शक्ति लगाकर पर्वत को उठाने का प्रयास करने लगा। वह जानता था कि भगवान शिव को कैलाश अतिप्रिय है, और उन्हें प्रसन्न करने का यह उसका एक अनूठा तरीका था। रावण की इस चेष्टा से कैलाश पर्वत पर कंपन होने लगा, जिससे वहां उपस्थित देवी-देवता और स्वयं माता पार्वती भी भयभीत हो गईं।
जब भगवान शिव ने देखा कि रावण कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहा है, तो उन्होंने अपने पैर के अंगूठे से हल्के से पर्वत को दबा दिया। शिवजी के मात्र एक अंगूठे के दबाव से पूरा कैलाश पर्वत अपने स्थान पर स्थिर हो गया और रावण की भुजाएं पर्वत के नीचे दब गईं। असहनीय पीड़ा से रावण व्याकुल हो उठा, उसकी चीखें तीनों लोकों में गूंज उठीं।
इस असहनीय कष्ट के क्षण में भी रावण ने अपनी शिव भक्ति का त्याग नहीं किया। उसने तुरंत अपनी गलती का एहसास किया और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक अद्भुत स्तोत्र की रचना आरंभ कर दी। अपनी दबी हुई भुजाओं और कटे हुए सिरों को वीणा की तरह उपयोग करते हुए, उसने भगवान शिव के अलौकिक रूप, उनके ताण्डव नृत्य और उनकी महिमा का गुणगान करते हुए १६ श्लोकों की एक अद्भुत स्तुति गाई। यह स्तुति ही बाद में ‘शिव ताण्डव स्तोत्रम्’ के नाम से विख्यात हुई।
रावण की इस अनूठी भक्ति और स्तुति से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने रावण को पीड़ा से मुक्त किया और उसे ‘चंद्रहास’ नामक एक दिव्य खड्ग तथा अजेय होने का वरदान भी प्रदान किया। इस प्रकार, रावण के अहंकार और भक्ति का संगम ‘शिव ताण्डव स्तोत्रम्’ के रूप में हमें प्राप्त हुआ, जो आज भी शिव भक्तों के लिए परम कल्याणकारी है।
शिव ताण्डव स्तोत्रम् का आध्यात्मिक महत्व
शिव ताण्डव स्तोत्रम् केवल एक पाठ नहीं, बल्कि शिव तत्व को समझने और अनुभव करने का एक माध्यम है। इसके प्रत्येक शब्द में भगवान शिव की विराटता, उनका सौंदर्य, उनकी शक्ति और उनकी करुणा समाहित है।
1. **समर्पण और भक्ति:** यह स्तोत्र रावण के अगाध शिव प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इसका पाठ करने से भक्त के मन में भी वैसी ही निष्ठा और भक्ति का संचार होता है।
2. **नकारात्मक ऊर्जा का नाश:** स्तोत्र के तीव्र कंपन और शक्तिशाली मंत्र नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर मन और परिवेश में सकारात्मकता भर देते हैं।
3. **आत्मिक शांति और भय मुक्ति:** भगवान शिव का स्मरण और उनके ताण्डव का ध्यान भय, चिंता और अशांति को दूर करता है, जिससे भक्त को आंतरिक शांति और निर्भयता प्राप्त होती है।
4. **शारीरिक और मानसिक लाभ:** नियमित पाठ से एकाग्रता बढ़ती है, वाणी शुद्ध होती है और मानसिक शक्ति का विकास होता है। यह स्वास्थ्य और समृद्धि को भी आकर्षित करता है।
5. **मोक्ष की प्राप्ति:** जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और समझ के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे लौकिक सुखों के साथ-साथ अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
शिव ताण्डव स्तोत्रम् के पाठ की विधि और लाभ
शिव ताण्डव स्तोत्रम् का पाठ अत्यंत प्रभावी होता है, बशर्ते इसे सही विधि और पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाए।
**पाठ कब करें?**
* **सोमवार:** भगवान शिव को समर्पित दिन, शिव ताण्डव स्तोत्रम् के पाठ के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।
* **प्रदोष काल:** संध्याकाल (सूर्यास्त के बाद) भगवान शिव की पूजा और स्तोत्र पाठ के लिए अत्यंत शुभ होता है।
* **महाशिवरात्रि:** महाशिवरात्रि पर इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी होता है।
* **शिव पूजा:** किसी भी शिव पूजा, शिव कथा या अनुष्ठान के दौरान इसका पाठ किया जा सकता है।
**पाठ कैसे करें?**
1. **शुद्धि और आसन:** सर्वप्रथम स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शांत और पवित्र स्थान पर आसन पर बैठकर शिवजी का ध्यान करें।
2. **संकल्प:** पाठ से पूर्व मन में अपनी मनोकामना या शिवजी की प्रसन्नता हेतु पाठ का संकल्प लें।
3. **शिव स्मरण:** भगवान शिव का ध्यान करते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।
4. **उच्चारण:** स्तोत्र का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द का शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण करें। यदि संस्कृत का ज्ञान न हो, तो पहले हिंदी अर्थ को समझकर पढ़ें।
5. **समर्पण:** पाठ के उपरांत भगवान शिव को प्रणाम करें और अपने पाठ को उन्हें समर्पित करें।
**पाठ के लाभ:**
* यह स्तोत्र शनि दोष को शांत करने में सहायक माना जाता है।
* इससे आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और शत्रु भय से मुक्ति मिलती है।
* नकारात्मक ऊर्जा और बाधाएं दूर होती हैं।
* विद्यार्थियों को एकाग्रता और ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिलती है।
* धन, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
* अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और दीर्घायु प्राप्त होती है।
शिव ताण्डव स्तोत्रम् – सम्पूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित
**ॐ नमः शिवाय**
**१. जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।**
**डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥**
हिंदी अर्थ: जिन शिवजी के जटा रूपी वन से होकर गंगाजी का जल प्रवाहित होता है और जिनके गले में सर्पों की माला लटक रही है, वे डम-डम-डम-डम की ध्वनि करते हुए प्रचण्ड ताण्डव नृत्य करते हैं। वे शिवजी हमें सुख प्रदान करें।
**२. जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।**
**धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥**
हिंदी अर्थ: जिन शिवजी की जटाओं के कुंड में वेग से घूमती हुई गंगाजी की चंचल लहरें सुशोभित हो रही हैं और जिनके माथे की अग्नि में धधकती हुई ज्वालाएं जल रही हैं, उन बाल चंद्रमा को धारण करने वाले शिवजी में मेरा प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता रहे।
**३. धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।**
**कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥**
हिंदी अर्थ: जो गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती जी के विलास में सहायक हैं, जो सभी दिशाओं में प्रकाशित हो रहे हैं और जिनके मन में प्रसन्नता समाई हुई है, जिनकी कृपादृष्टि से कठिन आपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, उन दिगम्बर शिवजी में मेरा मन रमण करे।
**४. जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।**
**मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयलण्डुरे मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥**
हिंदी अर्थ: जिनके जटाओं में लिपटे सर्प की चमकती हुई पीली मणि की प्रभा दिशाओं को प्रकाशित करती है, जो दिशा रूपी वधुओं के मुख को कुमकुम से लिप्त करती है, तथा जो मदमस्त हाथी के चमड़े को धारण किए हुए हैं, उन अद्भुत भूतों के स्वामी शिव में मेरा मन अद्भुत आनंद प्राप्त करे।
**५. सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।**
**भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥**
हिंदी अर्थ: जिनके चरण कमल इन्द्र आदि देवताओं के शीश पर से गिरते हुए पुष्पों की धूल से धूसरित हैं, जिनके जटाजूट सर्पों की माला से बंधे हुए हैं, वे चंद्र को अपने मुकुट में धारण करने वाले शिवजी हमें चिरकाल तक लक्ष्मी प्रदान करें।
**६. ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।**
**सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः॥६॥**
हिंदी अर्थ: जिनके माथे की आग की चिनगारियों ने कामदेव को भस्म कर दिया था, जिनके मस्तक पर चंद्रमा की अमृतमयी किरणें सुशोभित हैं और जो देवताओं के नायक हैं, उन महाकपाली शिवजी की जटाएं हमें संपत्ति प्रदान करें।
**७. करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।**
**धराधरेन्द्रनन्दिनी कुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम॥७॥**
हिंदी अर्थ: जिनके भयानक ललाट पर धधकती हुई अग्नि में कामदेव भस्म हो गए थे, जो पर्वतराज की पुत्री (पार्वती) के स्तनों पर चित्र बनाने में एकमात्र शिल्पी हैं, उन तीन नेत्रों वाले शिवजी में मेरा मन अनुरक्त हो।
**८. नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।**
**निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥८॥**
हिंदी अर्थ: जिनकी गर्दन नए मेघों से घिरे अमावस्या की काली रात के समान घनी काली है, जो गंगाजी को धारण करते हैं, जो गजचर्म को धारण करते हैं, जो चंद्रमा के मित्र हैं, और जो संसार का भार वहन करते हैं, वे शिवजी हमें धन प्रदान करें।
**९. प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबन्धकन्धरम्।**
**स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥**
हिंदी अर्थ: जिनके गले में खिले हुए नीले कमल के समान नीली आभा सुशोभित है, जो कामदेव का नाश करने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का नाश किया, जो संसार के बंधनों को काटने वाले हैं, जिन्होंने दक्ष यज्ञ को नष्ट किया, जिन्होंने अंधकासुर और गज का वध किया, उन यमराज को भी मारने वाले शिवजी को मैं भजता हूँ।
**१०. अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।**
**स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥**
हिंदी अर्थ: जो अनेक प्रकार के मंगलकारी कदम के फूलों के रस की मधुरता को बढ़ाने वाले भ्रमरों से युक्त हैं (अर्थात जो कदम के फूलों से बनी माला धारण करते हैं), जो कामदेव, त्रिपुर, भव (संसार), दक्ष यज्ञ, गज (गजासुर), अंधक (अंधकासुर) और अंतक (यमराज) का अंत करने वाले हैं, उन शिवजी को मैं भजता हूँ।
**११. जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गफुल्लनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।**
**धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥**
हिंदी अर्थ: जिनके ललाट पर अत्यंत वेग से घूमते हुए सर्प के फन से निकली हुई प्रचंड अग्नि प्रज्वलित हो रही है, और जो धिमिद्धिमिद्धां-धिमिद्धिमिद्धां बजते हुए मृदंग की मंगल ध्वनि के साथ प्रचंड ताण्डव नृत्य करते हैं, उन शिवजी की जय हो।
**१२. दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।**
**तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥१२॥**
हिंदी अर्थ: पत्थरों और सुंदर शय्या पर, सर्प और मोतियों की माला पर, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले पर, मित्र और शत्रु पर, घास और कमल पर, साधारण मनुष्य और महान राजा पर समान दृष्टि रखने वाले शिवजी को मैं कब भजूंगा?
**१३. कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।**
**विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥**
हिंदी अर्थ: कब मैं गंगाजी के तट पर स्थित कुंजों में निवास करते हुए, बुरी बुद्धि का त्याग कर, अपने सिर पर हाथ जोड़कर, चंचल नेत्रों को छोड़कर और माथे पर तिलक लगाए, ‘शिव’ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए सुखी होऊंगा?
**१४. इयं हि देवदेवस्य महाकालस्य साम्प्रतं स्तुतिं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्।**
**हरौ गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥१४॥**
हिंदी अर्थ: निश्चय ही, जो मनुष्य देवताओं के देव महाकाल की इस स्तुति को निरंतर पढ़ता है, स्मरण करता है और सुनाता है, वह शुद्ध हो जाता है। वह शीघ्र ही भगवान शिव में उत्तम भक्ति प्राप्त करता है, क्योंकि जीवों के लिए भगवान शंकर का चिंतन ही एकमात्र मोक्ष का मार्ग है।
**१५. पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।**
**तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥१५॥**
हिंदी अर्थ: जो व्यक्ति पूजा के अंत में, प्रदोष काल में, रावण द्वारा गाए गए इस शिव ताण्डव स्तोत्रम् का पाठ करता है, शंभु उसे रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त स्थिर लक्ष्मी प्रदान करते हैं।
**॥ इति श्रीरावणविरचितं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥**
निष्कर्ष: शिव भक्ति का अनमोल वरदान
शिव ताण्डव स्तोत्रम् भगवान शिव के प्रति रावण की अगाध श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि अहंकार को त्याग कर सच्चे हृदय से की गई भक्ति से स्वयं देवों के देव महादेव भी प्रसन्न होते हैं। इस दिव्य स्तोत्र का पाठ करने से न केवल हमें लौकिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि यह हमारे मन को शांत करता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और हमें आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।
यदि आप भी अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि चाहते हैं, तो नियमित रूप से शिव ताण्डव स्तोत्रम् का पाठ अवश्य करें। इसके शुद्ध उच्चारण और अर्थ को समझते हुए पाठ करने से आप भगवान शिव की असीम कृपा के पात्र बनेंगे और आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आएगा। शिवजी की महिमा अनंत है और उनकी भक्ति का यह मार्ग परम कल्याणकारी है। ओम नमः शिवाय!

