निश्चित रूप से, जीवन की यात्रा में हम सभी सुख, शांति और संतोष की तलाश करते हैं। यह तलाश हमें अक्सर बाहरी दुनिया की ओर ले जाती है – धन, सम्मान, रिश्ते या भौतिक वस्तुओं में। लेकिन, क्या यह सुख स्थायी होता है? क्या यह वास्तव में हमारी आत्मा को तृप्त कर पाता है? अक्सर नहीं। सच्चा और स्थायी सुख हमें भीतर से मिलता है, और इसका एक प्रमुख मार्ग है ‘भक्ति’।
**भक्ति क्या है?**
भक्ति का अर्थ है ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का भाव। यह सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि यह जीवन जीने की एक कला है, जिसमें हम अपने हृदय को परमात्मा से जोड़ते हैं। भक्ति कई प्रकार की होती है, लेकिन इन सबमें ‘निस्वार्थ भक्ति’ को सर्वोच्च माना गया है।
**निस्वार्थ भक्ति: प्रेम का शुद्धतम रूप**
‘निस्वार्थ’ का अर्थ है बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के। जब हमारी भक्ति में कोई इच्छा, कोई कामना, कोई लेन-देन नहीं होता, तब वह निस्वार्थ भक्ति कहलाती है। हम ईश्वर से कुछ मांगने के लिए पूजा नहीं करते, बल्कि सिर्फ उनके प्रति अपने प्रेम और कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए करते हैं। हम यह नहीं सोचते कि ‘अगर मैं यह करूंगा, तो भगवान मुझे वह देंगे’। बल्कि, हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हम उन्हें प्रेम करते हैं, और उन्हें प्रेम करना ही हमारे लिए आनंद का स्रोत है।
**एक प्रेरक कथा: माली की निस्वार्थ भक्ति**
एक गाँव में एक भव्य मंदिर था, जहाँ दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते थे। धनी लोग महंगे चढ़ावे चढ़ाते, गरीब अपनी श्रद्धा अनुसार फूल-फल अर्पित करते। सब अपनी-अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते थे – किसी को संतान चाहिए थी, किसी को धन, किसी को रोग मुक्ति।
उसी गाँव में एक वृद्ध और विनम्र माली रहता था, जिसका नाम मोहन था। मोहन के पास चढ़ाने के लिए कोई महंगा चढ़ावा नहीं था, और न ही उसकी कोई विशेष इच्छा थी। वह प्रतिदिन भोर में उठकर मंदिर परिसर को साफ करता, पौधों को पानी देता, और मंदिर के आँगन में झाड़ू लगाता। वह यह सब पूरी लगन और प्रेम से करता था। उसके चेहरे पर न कोई लालच था, न कोई थकान। वह सिर्फ मंदिर की सेवा में ही परम सुख पाता था।
एक दिन मंदिर के पुजारी ने मोहन को बड़े ध्यान से देखा। उन्होंने देखा कि जब मोहन मंदिर के पौधों को पानी दे रहा था, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, एक गहरा प्रेम और शांति थी जो किसी अन्य भक्त में नहीं दिखती थी। पुजारी जी ने उसे पास बुलाया और पूछा, “मोहन, तुम इतने सालों से बिना किसी अवकाश के मंदिर की सेवा कर रहे हो। क्या तुम्हारी कोई कामना नहीं है? तुमने कभी भगवान से कुछ माँगा क्यों नहीं?”
मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, “पुजारी जी, मेरी तो कोई कामना ही नहीं है। मैं तो बस अपने प्रभु की सेवा में ही आनंद पाता हूँ। मुझे क्या चाहिए, यह मेरे प्रभु मुझसे बेहतर जानते हैं। मेरा काम तो बस उन्हें प्रेम करना और उनकी सेवा करना है।”
पुजारी जी को मोहन की बात सुनकर बहुत आत्मिक शांति मिली। उन्होंने समझा कि असली भक्ति तो मोहन की है, जिसमें कोई चाह नहीं, केवल निस्वार्थ प्रेम और समर्पण है। भगवान को हमारे चढ़ावे या भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें तो हमारे शुद्ध हृदय और निस्वार्थ प्रेम की भूख होती है। मोहन की सेवा ही उसकी सच्ची आराधना थी।
**निस्वार्थ भक्ति का महत्व**
यह कथा हमें सिखाती है कि निस्वार्थ भक्ति हमें अहंकार से मुक्त करती है और हमारे हृदय को शुद्ध करती है। जब हम बिना किसी अपेक्षा के ईश्वर से जुड़ते हैं, तो हम उनके प्रेम के वास्तविक स्वरूप को अनुभव कर पाते हैं। यह हमें भीतर से मजबूत बनाता है, हमें संतोष प्रदान करता है, और जीवन की हर परिस्थिति में शांति बनाए रखने में मदद करता है। यह हमें सिखाता है कि देने में ही सच्चा आनंद है, पाने में नहीं।
**निष्कर्ष**
निस्वार्थ भक्ति केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। यह हमें स्वयं से, दूसरों से और परमात्मा से गहरे स्तर पर जोड़ती है। आइए, हम भी अपने जीवन में निस्वार्थ सेवा और प्रेम के भाव को अपनाएं। चाहे हम अपने परिवार की सेवा करें, समाज के लिए कुछ करें, या बस अपने आराध्य का स्मरण करें, हर कार्य में निस्वार्थ भाव रखने का प्रयास करें। यही मार्ग हमें सच्ची आध्यात्मिक शांति, आंतरिक सुख और परमात्मा के सान्निध्य की ओर ले जाएगा।

