## ओम जय जगदीश हरे आरती: भक्ति, शांति और समर्पण का दिव्य स्वर
भारत की आध्यात्मिक भूमि पर अनेक भक्तिपूर्ण स्तोत्र, मंत्र और आरतियाँ प्रचलित हैं, जो सदियों से भक्तों को ईश्वर से जोड़ती रही हैं। इन्हीं में से एक है ‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती, जो न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में फैले करोड़ों हिन्दुओं के घरों और मंदिरों में सुबह-शाम गूंजती है। यह आरती केवल एक गायन नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के प्रति अटूट श्रद्धा, समर्पण और प्रेम का एक दिव्य उद्घोष है।
### परिचय: एक सार्वभौमिक प्रार्थना
‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती का निर्माण पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा 19वीं सदी में किया गया था और तब से यह इतनी लोकप्रिय हो गई कि यह किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान का अभिन्न अंग बन गई है। विशेषकर भगवान सत्यनारायण की कथा और पूजा के अंत में इसका गायन अनिवार्य माना जाता है। इस आरती की सादगी, गहरा अर्थ और मधुरता इसे हर उम्र के व्यक्ति के लिए सुलभ और प्रिय बनाती है।
### आरती का गहरा आध्यात्मिक महत्व
यह आरती मात्र शब्दों का समूह नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक सत्यों को समेटे हुए है। आइए, इसकी कुछ प्रमुख पंक्तियों के माध्यम से इसके गहरे अर्थ को समझने का प्रयास करें:
* **“ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे, ओम जय जगदीश हरे।”**
यह पंक्ति भगवान को ब्रह्मांड का स्वामी (जगदीश) घोषित करती है और उनसे भक्तों के सभी दुखों और परेशानियों को तुरंत दूर करने की प्रार्थना करती है। यह ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और भक्तवत्सलता का परिचय देती है।
* **“जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का, स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख संपति घर आवे, कष्ट मिटे तन का, ओम जय जगदीश हरे।”**
यह बताता है कि जो सच्चे मन से भगवान का ध्यान करता है, उसे सभी मनोवांछित फल मिलते हैं, मानसिक दुख दूर होते हैं, घर में सुख-समृद्धि आती है और शारीरिक कष्ट भी समाप्त होते हैं। यह भक्ति के लौकिक और पारलौकिक लाभों का वर्णन है।
* **“मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी, ओम जय जगदीश हरे।”**
यह पंक्ति भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और निर्भरता को दर्शाती है। भक्त कहता है कि हे प्रभु, आप ही मेरे माता-पिता हैं, मेरा एकमात्र आश्रय हैं। आपके सिवा मेरा और कोई नहीं, जिससे मैं उम्मीद रख सकूँ। यह एकांतिक भक्ति का सर्वोच्च भाव है।
* **“तुम पूरन परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी, ओम जय जगदीश हरे।”**
यहां भगवान को पूर्ण परमात्मा, सर्वव्यापी (अंतर्यामी) और परमेश्वर के रूप में महिमामंडित किया गया है। यह दर्शाता है कि ईश्वर ही ब्रह्मांड के नियामक और सभी प्राणियों के स्वामी हैं।
* **“तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता, ओम जय जगदीश हरे।”**
भक्त स्वयं को अज्ञानी और कामवासना से युक्त बताते हुए भगवान की असीम करुणा और पालन शक्ति का आह्वान करता है। यह विनम्रता और ईश्वर से कृपा की याचना का भाव है।
### आरती का महत्व और लाभ
‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती का नियमित गायन या श्रवण कई आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्रदान करता है:
1. **मन की शांति:** इसके मधुर स्वर और भक्तिपूर्ण शब्द मन को शांत करते हैं, तनाव और चिंता को कम करते हैं।
2. **सकारात्मक ऊर्जा:** आरती का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है, जो घर और मन दोनों को शुद्ध करता है।
3. **एकाग्रता में वृद्धि:** आरती के दौरान ध्यान केंद्रित करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है और ध्यान की अवस्था प्राप्त होती है।
4. **ईश्वर से जुड़ाव:** यह भक्तों को अपने आराध्य देव से गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस कराती है।
5. **नकारात्मकता का नाश:** श्रद्धापूर्वक गाई गई आरती नकारात्मक विचारों और ऊर्जा को दूर करती है, जिससे जीवन में शुभता आती है।
6. **सांस्कृतिक पहचान:** यह हमारी समृद्ध भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो पीढ़ियों को जोड़े रखती है।
### निष्कर्ष
‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती सिर्फ एक पूजा का समापन गीत नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की सर्वव्यापकता, दयालुता और भक्तों के प्रति उनके असीम प्रेम का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि जीवन के हर सुख-दुख में हमें अपने परमपिता परमात्मा पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वही हमारे सच्चे पालक और संकटमोचक हैं। इस दिव्य आरती का नियमित गायन हमें न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ावों में अडिग रहने की शक्ति और विश्वास भी देता है। अपने दिन की शुरुआत या अंत इस पवित्र आरती के साथ करके आप भी ईश्वर की कृपा और शांति का अनुभव कर सकते हैं।

