संकट हरने वाले विघ्नहर्ता गणेश की महिमा: गणेश चतुर्थी कथा और पूजा विधि का महत्व

संकट हरने वाले विघ्नहर्ता गणेश की महिमा: गणेश चतुर्थी कथा और पूजा विधि का महत्व

भारत भूमि पर ऐसे अनेक पर्व मनाए जाते हैं, जो न केवल हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, बल्कि हमें आध्यात्मिक ऊर्जा से भी भर देते हैं। इन्हीं में से एक है ‘गणेश चतुर्थी’ का पावन पर्व, जो बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता, भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह पर्व आता है, और दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव हर घर में खुशियों और सकारात्मकता का संचार करता है। आइए, इस विशेष अवसर पर हम विघ्नहर्ता गणेश की अद्भुत कथा, उनके महत्व और इस पर्व के आध्यात्मिक संदेश को गहराई से समझें।

**विघ्नहर्ता गणेश की अलौकिक कथा**
भगवान गणेश को प्रथम पूज्य क्यों कहा जाता है, और कैसे उन्हें गजमुख प्राप्त हुआ, इसकी कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण फूंक दिए। उन्होंने इस बालक को आदेश दिया कि वह स्नान के लिए जाते समय किसी को भी भीतर न आने दे।

जब भगवान शिव वापस आए और भीतर जाने का प्रयास किया, तो बालक गणेश ने उन्हें रोक दिया। शिवजी ने बहुत समझाया, परंतु गणेश अपनी माता के आदेश पर अडिग रहे। क्रोधित होकर शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती को जब यह ज्ञात हुआ, तो वे अत्यंत क्रोधित हुईं और सृष्टि के विनाश की धमकी दी।

सभी देवतागण भयभीत हो गए और उन्होंने शिवजी से माता पार्वती को शांत करने की विनती की। तब शिवजी ने देवताओं को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाएं और जो भी पहला प्राणी मिले, उसका मस्तक ले आएं। देवता एक हाथी के बच्चे का मस्तक लेकर आए, जिसे शिवजी ने बालक गणेश के धड़ पर लगा दिया और उन्हें पुनर्जीवित किया।

इसके बाद भगवान शिव ने गणेश को यह आशीर्वाद दिया कि आज से तुम समस्त देवों में सर्वप्रथम पूजे जाओगे। किसी भी शुभ कार्य से पहले तुम्हारी पूजा अनिवार्य होगी, अन्यथा वह कार्य सफल नहीं होगा। तभी से भगवान गणेश ‘प्रथम पूज्य’ और ‘विघ्नहर्ता’ कहलाने लगे।

**गणेश चतुर्थी का आध्यात्मिक महत्व और पूजा विधि**
गणेश चतुर्थी का पर्व केवल भगवान गणेश के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि यह हमें जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने और नई शुरुआत करने की प्रेरणा भी देता है। भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और समृद्धि के दाता हैं। उनकी उपासना से व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है, नकारात्मकता दूर होती है और शुभ कार्यों में सफलता मिलती है।

इस दिन भक्तजन अपने घरों में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं। उन्हें प्रिय मोदक, लड्डू, दुर्वा घास, लाल फूल और सिंदूर अर्पित करते हैं। विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है, गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ किया जाता है और ‘वक्रतुंड महाकाय’ जैसे मंत्रों का जाप किया जाता है। गणेश जी की आरती गाकर और उनकी कथा सुनकर भक्तगण आत्मिक शांति और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह दस दिवसीय उत्सव हमें सिखाता है कि कैसे धैर्य, विश्वास और सच्ची भक्ति से हम जीवन की हर चुनौती का सामना कर सकते हैं।

**निष्कर्ष**
गणेश चतुर्थी का यह पावन पर्व हमें याद दिलाता है कि जब हम सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण करते हैं, तो वे हमारी सभी बाधाओं को हर लेते हैं और हमें सही मार्ग दिखाते हैं। भगवान गणेश का आशीर्वाद हम सभी पर बना रहे, वे हमारे जीवन से सभी विघ्नों को दूर करें और सुख-समृद्धि प्रदान करें। इस गणेश चतुर्थी पर, आइए हम सब मिलकर विघ्नहर्ता गणेश की महिमा का गुणगान करें और उनके दिखाए सत्य और धर्म के मार्ग पर चलें।

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