ॐ जय जगदीश हरे: सर्वशक्तिमान की दिव्य स्तुति और उसका महत्व

ॐ जय जगदीश हरे: सर्वशक्तिमान की दिव्य स्तुति और उसका महत्व

### परिचय
भारत की आध्यात्मिक और भक्ति परंपरा में आरतियों का एक विशेष स्थान है। ये ईश्वर की स्तुति और आराधना का एक मधुर और सशक्त माध्यम हैं, जो भक्त को सीधे परमात्मा से जोड़ती हैं। इन सभी आरतियों में, ‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती सबसे अधिक प्रचलित, सार्वभौमिक और हृदयस्पर्शी आरतियों में से एक है। यह आरती न केवल मंदिरों और घरों में नियमित रूप से गाई जाती है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक भी है। यह आरती केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि इसमें गहन आध्यात्मिक अर्थ और ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का भाव छिपा है। इस आरती की रचना पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी जी ने की थी। आइए, इस दिव्य आरती के अर्थ, महत्व और इसके पाठ से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों को गहराई से समझते हैं।

### आरती का अर्थ और आध्यात्मिक महत्व
‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती भगवान विष्णु को समर्पित है, जो संपूर्ण जगत के पालक और संहारक हैं। यह आरती भक्त को यह सिखाती है कि परमेश्वर ही एकमात्र सत्य हैं, और वही सृष्टि के कण-कण में विद्यमान हैं।

* **”ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे।”**
ये पंक्तियाँ भगवान जगदीश (जगत के ईश्वर) की जय-जयकार करती हैं। भक्त उन्हें स्वामी, यानी मालिक और रक्षक के रूप में पुकारते हैं। यह विश्वास व्यक्त किया जाता है कि भगवान अपने भक्तों और दासों के सभी संकटों को पल भर में दूर कर देते हैं। यह ईश्वर की सर्वशक्तिमानता और भक्तवत्सलता का उद्घोष है।

* **”जो ध्यावे फल पावे, दुख बिन से मन का। सुख संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का।”**
यहाँ बताया गया है कि जो भी सच्चे मन से भगवान का ध्यान करता है, उसे अवश्य ही शुभ फल प्राप्त होते हैं। उसके मन के सभी दुःख दूर हो जाते हैं और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है, शारीरिक कष्ट भी मिट जाते हैं। यह कर्मफल सिद्धांत और भगवान की कृपा का सुंदर वर्णन है।

* **”मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी।”**
भक्त यहाँ भगवान को अपने माता-पिता के रूप में स्वीकार करता है और कहता है कि उसके लिए भगवान के सिवा कोई दूसरा आश्रयदाता नहीं है, जिस पर वह आशा रख सके। यह पूर्ण समर्पण और अनन्य भक्ति का भाव है।

* **”तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी।”**
ये पंक्तियाँ भगवान के परम स्वरूप का वर्णन करती हैं। उन्हें पूर्ण परमात्मा, सबके भीतर रहने वाला (अंतर्यामी), परब्रह्म और परमेश्वर कहा गया है, जो संपूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। यह ईश्वर के असीमित और सर्वव्यापी स्वरूप को दर्शाता है।

* **”तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम भर्ता।”**
यहाँ भक्त भगवान को करुणा का सागर और पालनहार कहता है। वह स्वयं को अज्ञानी, पापी और कामनाओं से भरा हुआ मानता है, और भगवान को अपना रक्षक (भर्ता) स्वीकार करता है। यह भक्त की विनम्रता और भगवान की उदारता को प्रकट करता है।

* **”विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा।”**
यह पंक्तियाँ भगवान से प्रार्थना करती हैं कि वे भक्त के मन से सभी सांसारिक इच्छाओं (विषय-विकारों) को दूर करें और उसके पापों का हरण करें। साथ ही, प्रार्थना की जाती है कि भगवान उसकी श्रद्धा और भक्ति को बढ़ाएँ, और उसे संतों की सेवा करने का अवसर दें। यह शुद्ध मन और आध्यात्मिक उन्नति की कामना है।

* **”तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा।”**
यह आरती की सबसे मार्मिक और समर्पण भाव से भरी पंक्तियाँ हैं। भक्त कहता है कि उसका शरीर, मन और धन, सब कुछ भगवान का ही दिया हुआ है। इसलिए, वह भगवान की ही वस्तु उन्हें अर्पित कर रहा है, इसमें उसका अपना कुछ भी नहीं है। यह निस्वार्थ सेवा और पूर्ण आत्मसमर्पण का सर्वोच्च भाव है।

### आरती के आध्यात्मिक लाभ
‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती का नियमित पाठ या श्रवण कई आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है:
1. **मन को शांति:** यह मन को शांत करता है और तनाव व चिंताओं को कम करता है।
2. **ईश्वरीय संबंध:** भक्त को परमात्मा से गहरा संबंध स्थापित करने में मदद करता है।
3. **सकारात्मक ऊर्जा:** घर और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
4. **भक्ति का विकास:** श्रद्धा और भक्ति के भाव को बढ़ाता है।
5. **पापों से मुक्ति:** शुद्ध हृदय से की गई प्रार्थना व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिलाती है।
6. **धन्यवाद ज्ञापन:** यह ईश्वर द्वारा प्रदान की गई कृपा और आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है।

### निष्कर्ष
‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती सिर्फ एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा है जो हमें आत्म-समर्पण, कृतज्ञता और अनन्य भक्ति सिखाती है। यह हमें याद दिलाती है कि हम सभी उस एक परमेश्वर के अंश हैं और हमें हर पल उन्हीं की शरण में रहना चाहिए। इस आरती को गाते हुए हम अपने भीतर ईश्वर के दिव्य प्रकाश को महसूस करते हैं और जीवन के हर क्षेत्र में उनकी कृपा और मार्गदर्शन को प्राप्त करते हैं। इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाकर हम आंतरिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वरीय आनंद का अनुभव कर सकते हैं। यह आरती हमें ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास रखने की प्रेरणा देती है, जो जीवन की सभी बाधाओं को पार करने की शक्ति प्रदान करता है।

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