दीपावली: अंधकार पर प्रकाश की विजय का महापर्व और इसका आध्यात्मिक महत्व

दीपावली: अंधकार पर प्रकाश की विजय का महापर्व और इसका आध्यात्मिक महत्व

दीपावली: अंधकार पर प्रकाश की विजय का महापर्व

सनातन संस्कृति में त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले प्रेरणा स्रोत हैं। इनमें दीपावली का पर्व विशेष स्थान रखता है। ‘दीप’ और ‘आवली’ के मेल से बना यह शब्द ‘दीयों की पंक्ति’ का प्रतीक है, जो अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाने का संदेश देता है। यह केवल बाहरी रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि हमारे अंतर्मन में ज्ञान और सकारात्मकता की ज्योति प्रज्ज्वलित करने का महापर्व है।

दीपावली का आध्यात्मिक महत्व

दीपावली बुराई पर अच्छाई की, असत्य पर सत्य की और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी में प्रजा ने घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के जीवन में ‘अज्ञान’ रूपी अंधकार को हटाकर ‘ज्ञान’ रूपी प्रकाश को स्थापित करने का संदेश है।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि चुनौतियाँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों, धैर्य, धर्म और न्याय के पथ पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजय प्राप्त करता है। यह धन की देवी माँ लक्ष्मी और ज्ञान व विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा का भी दिन है, जो हमें भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी प्रेरित करता है।

पांच दिवसीय दीपावली पर्व का स्वरूप

दीपावली का उत्सव केवल एक दिन का नहीं, बल्कि पांच दिनों तक चलने वाला महापर्व है, जिसके प्रत्येक दिन का अपना विशिष्ट महत्व और आध्यात्मिक संदेश है:

  • धनतेरस (पहला दिन): इस दिन धन के देवता कुबेर और आरोग्य के देवता धन्वंतरि की पूजा की जाती है। नई वस्तुओं की खरीददारी शुभ मानी जाती है, विशेषकर धातु के बर्तन और सोने-चांदी के आभूषण। यह समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना का दिन है।
  • नरक चतुर्दशी (दूसरा दिन – छोटी दीपावली): इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध किया था, जिससे लोगों को उसके आतंक से मुक्ति मिली। इसे ‘रूप चौदस’ भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन स्नान और सौंदर्य प्रसाधन का विशेष महत्व है, जो बाहरी और आंतरिक शुद्धता का प्रतीक है।
  • दीपावली (तीसरा दिन – मुख्य पर्व): यह सबसे महत्वपूर्ण दिन है, जब माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम अयोध्या लौटे थे। घर-घर में दीये जलाए जाते हैं, मिठाइयाँ बांटी जाती हैं और खुशियाँ मनाई जाती हैं। यह प्रकाश, समृद्धि और कल्याण का दिन है।
  • गोवर्धन पूजा (चौथा दिन): भगवान कृष्ण ने इंद्र का अभिमान भंग करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था, जिससे ब्रजवासियों की रक्षा हुई। इस दिन प्रकृति और गौ माता की पूजा की जाती है, जो हमें पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का पाठ पढ़ाता है।
  • भाई दूज (पांचवां दिन): यह भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है, जब बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनके लंबे और सुखी जीवन की कामना करती हैं। यह स्नेह, सुरक्षा और पारिवारिक बंधनों को मजबूत करने का दिन है।

कैसे मनाएं सच्ची दीपावली?

दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल बाहरी रोशनी और पकवानों तक सीमित नहीं है। सच्ची दीपावली तब मनती है जब हम:

  • अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या और अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर प्रेम, करुणा और ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।
  • दूसरों के जीवन में भी खुशियाँ लाने का प्रयास करते हैं।
  • पर्यावरण का सम्मान करते हुए प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हैं।
  • अपने रिश्तों में मिठास घोलते हैं और क्षमा भाव अपनाते हैं।

यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और अपनी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करने का अवसर देता है।

निष्कर्ष

दीपावली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है। यह हमें सिखाती है कि कैसे हम अपने जीवन को प्रकाशमय बना सकते हैं और दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन सकते हैं। आइए, इस दीपावली पर हम सभी अपने भीतर के प्रकाश को जगाएँ और एक प्रेमपूर्ण, समृद्ध तथा शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में अपना योगदान दें। आप सभी को सनातन स्वर की ओर से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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