गोवर्धन पूजा: क्यों उठाते हैं गिरिराज पर्वत? भगवान कृष्ण की अद्भुत लीला

गोवर्धन पूजा: क्यों उठाते हैं गिरिराज पर्वत? भगवान कृष्ण की अद्भुत लीला

गोवर्धन पूजा: भगवान कृष्ण की अद्भुत लीला और इसका महत्व

सनातन धर्म में अनेक ऐसे पर्व हैं, जो हमें प्रकृति, भक्ति और ईश्वर की असीमित शक्ति का स्मरण कराते हैं। इन्हीं में से एक है गोवर्धन पूजा, जिसे दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है। यह पर्व भगवान कृष्ण की एक ऐसी अद्भुत लीला का स्मरण कराता है, जिसमें उन्होंने अपनी एक छोटी उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। आइए, आज हम इस पावन कथा के रहस्यों और इसके गहरे आध्यात्मिक महत्व को समझते हैं।

गोवर्धन पूजा का आरंभ: इंद्र का अहंकार और कृष्ण की युक्ति

पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में ब्रजवासी प्रतिवर्ष देवराज इंद्र को प्रसन्न करने के लिए वर्षा और अन्न के देवता के रूप में उनकी पूजा करते थे। उनका मानना था कि इंद्र देव की कृपा से ही उन्हें अच्छी फसल और सुख-समृद्धि मिलती है।

एक बार भगवान कृष्ण ने, जो उस समय एक बालक रूप में ब्रज में लीलाएं कर रहे थे, ब्रजवासियों को यह पूजा करते देखा। उन्होंने अपने पिता नंद बाबा से पूछा कि यह पूजा क्यों की जाती है? जब उन्हें बताया गया कि यह इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए है, तब उन्होंने तर्क दिया कि हमें उसकी पूजा करनी चाहिए जो हमें प्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाता है। कृष्ण ने समझाया कि वर्षा तो इंद्र का कर्तव्य है, परंतु अन्न और जीवन का आधार तो यह गोवर्धन पर्वत और गायें ही हैं। गोवर्धन हमें चारा, लकड़ी और जल देते हैं, तथा गायें हमें दूध देती हैं।

उनकी बात मानकर ब्रजवासियों ने इस वर्ष इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय लिया। उन्होंने नाना प्रकार के पकवान (छप्पन भोग) बनाए और गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा कर उसकी पूजा की।

इंद्र का क्रोध और कृष्ण का चमत्कार

जब देवराज इंद्र को यह ज्ञात हुआ कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा छोड़ गोवर्धन पर्वत की पूजा की है, तो उनका अहंकार जागृत हो उठा। उन्होंने इसे अपना घोर अपमान समझा और क्रोधित होकर ब्रज पर प्रलयकारी वर्षा का आदेश दे दिया। भयंकर आँधी-तूफान और मूसलाधार वर्षा से ब्रज में हाहाकार मच गया। ब्रजवासी, अपने पशुओं सहित, इस जल प्रलय से भयभीत होकर भगवान कृष्ण की शरण में आए।

भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों की पुकार सुनी और उन्हें बचाने के लिए एक अद्भुत लीला रची। उन्होंने अपनी कनिष्ठा (सबसे छोटी) उंगली पर पूरे गोवर्धन पर्वत को एक छाते की तरह उठा लिया। ब्रज के सभी निवासी, उनके पशुधन, गायें और बछड़े उस पर्वत के नीचे आ गए, जहाँ वे वर्षा, आँधी और तूफान से सुरक्षित रहे।

अहंकार का पतन और गोवर्धन की स्थापना

लगातार सात दिनों तक इंद्र देव ने अपनी पूरी शक्ति से वर्षा की, परंतु वे ब्रजवासियों को कोई हानि नहीं पहुंचा सके। अंततः, जब इंद्र का क्रोध शांत हुआ और उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, तो वे शर्मिंदा हुए। ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं ने उन्हें समझाया कि वे जिनसे प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, वह स्वयं भगवान विष्णु के पूर्णावतार श्रीकृष्ण हैं।

इंद्र देव ने भगवान कृष्ण से क्षमा याचना की और तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को वापस अपने स्थान पर रख दिया। इस घटना के बाद से ही गोवर्धन पर्वत की पूजा और परिक्रमा की परंपरा आरंभ हुई। भगवान कृष्ण को ‘गिरिराज धरण’ के नाम से भी जाना जाने लगा।

गोवर्धन पूजा का आध्यात्मिक संदेश

  • अहंकार का त्याग: यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार पतन का कारण बनता है। इंद्र का अहंकार ही उनके कष्ट का कारण बना।
  • शरण और विश्वास: भगवान पर पूर्ण विश्वास और उनकी शरण में जाने से वे भक्तों की हर विपदा से रक्षा करते हैं। ब्रजवासियों का कृष्ण पर अटूट विश्वास था।
  • प्रकृति का सम्मान: यह पर्व हमें प्रकृति, विशेषकर पहाड़ों और पर्यावरण के प्रति सम्मान का भाव सिखाता है। गोवर्धन पर्वत प्रकृति का प्रतीक है।
  • कर्म की प्रधानता: भगवान कृष्ण ने कर्मों की प्रधानता पर जोर दिया। हमें उन्हीं की पूजा करनी चाहिए जो हमें प्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाते हैं और हमारे कर्मों का फल देते हैं।

निष्कर्ष

गोवर्धन पूजा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह हमें भगवान कृष्ण की असीम शक्ति, उनकी भक्तवत्सलता और प्रकृति के प्रति सम्मान का गहरा संदेश देती है। आइए, इस पावन पर्व पर हम भी अपने मन से अहंकार का त्याग कर, प्रभु की शरण में जाएं और प्रकृति के हर कण का सम्मान करें। जय श्री कृष्ण, गिरिराज महाराज की जय!

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