गंगा दशहरा: माँ गंगा के पावन अवतरण का महापर्व और इसका आध्यात्मिक महत्व
सनातन धर्म में नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदायिनी देवी के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं में से एक हैं पतित पावनी, मोक्षदायिनी माँ गंगा, जिनके पृथ्वी पर अवतरण का महापर्व ‘गंगा दशहरा’ ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन न केवल गंगा के पृथ्वी पर आगमन का स्मरण कराता है, बल्कि हमें पवित्रता, त्याग और उद्धार के गहन आध्यात्मिक संदेश भी देता है। आइए, इस पावन पर्व के महत्व, पौराणिक कथा और पूजा विधि को विस्तार से जानते हैं।
माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण: पौराणिक कथा
गंगा दशहरा की कथा प्राचीन ग्रंथों में मिलती है, जो राजा सगर के वंशजों के उद्धार और राजा भागीरथ की अटूट तपस्या से जुड़ी है।
राजा सगर और कपिल मुनि
पौराणिक कथा के अनुसार, अयोध्या के प्रतापी राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। देवराज इंद्र ने भयवश यज्ञ के अश्व को चुराकर पाताल लोक में तपस्यारत महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज करते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे और उन्हें ही चोर समझकर अपमानित करने लगे। क्रोधित महर्षि कपिल ने अपने तेज से राजा सगर के सभी साठ हजार पुत्रों को भस्म कर दिया। उनकी आत्माओं को मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ, और वे प्रेत योनि में भटकने लगे।
भागीरथ की कठोर तपस्या
जब सगर के पौत्र अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप ने अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने का उपाय खोजा, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि केवल माँ गंगा का पवित्र जल ही सगर पुत्रों की भस्म को स्पर्श कर उन्हें मोक्ष प्रदान कर सकता है। इस दुष्कर कार्य का बीड़ा राजा दिलीप के पुत्र, तपस्वी राजा भागीरथ ने उठाया। उन्होंने अपनी प्रजा और राज्य का त्याग कर हिमालय में कठोर तपस्या की। उनकी वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। भागीरथ ने माँ गंगा को पृथ्वी पर लाने का वर मांगा।
ब्रह्मा जी ने कहा कि गंगा का वेग इतना प्रचंड है कि पृथ्वी उसे धारण नहीं कर पाएगी। उन्होंने भागीरथ को भगवान शिव की तपस्या करने को कहा, ताकि वे गंगा के वेग को अपनी जटाओं में समा सकें। भागीरथ ने फिर से कठोर तपस्या की। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने के लिए सहमत हो गए। इस प्रकार, माँ गंगा शिवजी की जटाओं से होते हुए पृथ्वी पर अवतरित हुईं और भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर सगर पुत्रों की भस्म तक पहुंचीं, उन्हें स्पर्श कर मोक्ष प्रदान किया। जिस दिन माँ गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, वह ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी, और तभी से यह दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से विख्यात हुआ।
गंगा दशहरा का महत्व और पूजा विधि
गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन गंगा में डुबकी लगाने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इस पावन दिन क्या करें?
- गंगा स्नान: यदि संभव हो तो गंगा नदी में स्नान करें। गंगा स्नान संभव न हो तो घर पर ही स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें और माँ गंगा का स्मरण करें।
- दान-पुण्य: इस दिन दान का भी विशेष महत्व है। वस्त्र, अन्न, जल, फल आदि का दान करना शुभ माना जाता है।
- गंगा आरती: शाम को गंगा घाटों पर भव्य गंगा आरती का आयोजन किया जाता है। इसमें शामिल होना अत्यंत पुण्यकारी होता है। घर पर भी माँ गंगा की आरती कर सकते हैं।
- मंत्र जाप: "ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः" मंत्र का जाप करना फलदायी होता है।
- पौधारोपण: पर्यावरण संरक्षण और माँ गंगा के प्रवाह को बनाए रखने के उद्देश्य से वृक्षारोपण करना भी इस दिन उत्तम माना जाता है।
जीवन में गंगा का आध्यात्मिक महत्व
माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्म का अभिन्न अंग हैं। वे जीवनदायिनी, पापहारिणी और मोक्षप्रदायिनी के रूप में पूजी जाती हैं। उनका जल पवित्रता का प्रतीक है और हर धार्मिक अनुष्ठान में इसका प्रयोग अनिवार्य माना जाता है। गंगा दशहरा का पर्व हमें त्याग, तपस्या और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश देता है। यह हमें याद दिलाता है कि जिस प्रकार भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए अथक प्रयास किए, उसी प्रकार हमें भी अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा से करना चाहिए।
निष्कर्ष: माँ गंगा का आशीर्वाद
गंगा दशहरा का महापर्व हमें माँ गंगा के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करने और उनके पवित्र जल के संरक्षण का संकल्प लेने का अवसर प्रदान करता है। आइए, हम सब मिलकर इस महान विरासत का सम्मान करें और माँ गंगा से प्रार्थना करें कि वे हम सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।

