गजेन्द्र मोक्ष: जब एक गज की पुकार पर स्वयं दौड़े चले आए भगवान विष्णु

गजेन्द्र मोक्ष: जब एक गज की पुकार पर स्वयं दौड़े चले आए भगवान विष्णु

गजेन्द्र मोक्ष: एक भक्त की अद्भुत पुकार और भगवान की त्वरित कृपा

सनातन धर्म में अनेक ऐसी कथाएँ हैं जो जीव और ईश्वर के अटूट संबंध को दर्शाती हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और प्रेरणादायक कथा है ‘गजेन्द्र मोक्ष’। यह कथा हमें सिखाती है कि जब सभी सहारे छूट जाते हैं, तब एकमात्र भगवान ही हमारे रक्षक होते हैं। यह पूर्ण शरणागति और निष्ठावान भक्ति का अनुपम उदाहरण है, जहाँ भगवान अपने भक्त की एक सच्ची पुकार पर तुरंत सहायता के लिए दौड़े चले आते हैं, चाहे भक्त पशु योनि में ही क्यों न हो।

कथा का आरम्भ: गजेन्द्र का विहार

पुराणों के अनुसार, प्राचीन काल में त्रिकूट पर्वत पर एक विशाल और शक्तिशाली गजराज रहता था, जिसका नाम गजेन्द्र था। वह अपने झुंड के साथ उस पर्वत की शोभा बढ़ाता था। एक दिन भीषण गर्मी से व्याकुल होकर गजेन्द्र अपने झुंड सहित एक सरोवर में जलक्रीड़ा करने पहुँचा। सरोवर का जल अत्यंत शीतल और सुगंधित था, जिसमें कमल के फूल खिले हुए थे। गजेन्द्र और उसके साथी आनंदपूर्वक जल का पान कर रहे थे और स्नान कर रहे थे।

संकट की घड़ी: जब ग्राह ने जकड़ा

गजेन्द्र अपनी सूंड से कमल का फूल तोड़ रहा था, तभी अचानक एक बलवान मगरमच्छ (ग्राह) ने उसके पैर को मजबूती से पकड़ लिया। मगरमच्छ इतना शक्तिशाली था कि गजेन्द्र अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उसके चंगुल से छूट नहीं पा रहा था। गजेन्द्र और ग्राह के बीच हजारों वर्षों तक युद्ध चलता रहा, जिससे जल का रंग रक्तमय हो गया। धीरे-धीरे गजेन्द्र की शक्ति क्षीण होने लगी, जबकि जल का प्राणी होने के कारण मगरमच्छ की शक्ति बढ़ती जा रही थी। गजेन्द्र के साथी हाथी भी उसे बचाने में असमर्थ रहे और अंततः उसे अकेला छोड़कर चले गए।

तीनों लोकों में हाहाकार और गजेन्द्र की करुण पुकार

जब गजेन्द्र को लगा कि अब उसका अंत निश्चित है और कोई भी उसे बचाने वाला नहीं है, तब उसने अपनी सारी आस भौतिक जगत से हटाकर परमपिता परमात्मा पर केंद्रित कर दी। अपनी आँखों में अश्रु लिए, पीड़ा से कराहते हुए उसने अपनी सूंड में एक कमल का फूल लिया और आकाश की ओर उठाकर, अत्यंत करुण स्वर में भगवान विष्णु को पुकारा: “ओम् नमो भगवते वासुदेवाय!” उसने अपनी अंतिम शक्ति से प्रभु से प्रार्थना की, उस आदि देव को याद किया जो निराकार होकर भी साकार रूप में भक्तों के उद्धार के लिए प्रकट होते हैं।

भक्तवत्सल भगवान का आगमन

गजेन्द्र की हृदय विदारक पुकार सुनकर तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। भगवान विष्णु, जो उस समय वैकुण्ठ में देवी लक्ष्मी के साथ विराजमान थे, अपने भक्त की करुण पुकार सुनकर सब कुछ छोड़कर तुरंत गरुड़ पर सवार होकर गजेन्द्र की सहायता के लिए चल पड़े। उनकी गति इतनी तीव्र थी कि गरुड़ भी उनके पीछे रह गया। भगवान ने सरोवर के तट पर पहुँचकर देखा कि गजेन्द्र की आँखों में पीड़ा और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने बिना विलम्ब किए अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का सिर धड़ से अलग कर दिया और गजेन्द्र को उसके चंगुल से मुक्त कराया।

गजेन्द्र और ग्राह का उद्धार: पूर्व जन्म का रहस्य

यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती। भगवान विष्णु की कृपा से गजेन्द्र को तुरंत मोक्ष प्राप्त हुआ और वह चतुर्भुज रूप धारण कर वैकुण्ठ धाम को चला गया। वास्तव में, गजेन्द्र अपने पूर्व जन्म में एक धर्मात्मा राजा इन्द्रद्युम्न था, जिसे अगस्त्य ऋषि के शाप के कारण हाथी की योनि में जन्म लेना पड़ा था। इसी प्रकार, ग्राह भी अपने पूर्व जन्म में ‘हूहू’ नामक एक गंधर्व था, जिसे देवल ऋषि के शाप के कारण मगरमच्छ बनना पड़ा था। भगवान की कृपा से दोनों को अपने शापों से मुक्ति मिली और उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।

गजेन्द्र मोक्ष से प्राप्त आध्यात्मिक शिक्षाएँ

गजेन्द्र मोक्ष की यह कथा हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पाठ सिखाती है:

  • अखण्ड भक्ति और शरणागति: यह कथा बताती है कि जीवन के सबसे बड़े संकट में भी यदि मनुष्य पूर्ण हृदय से भगवान पर विश्वास रखकर उनकी शरण लेता है, तो भगवान उसकी सहायता अवश्य करते हैं। भगवान जाति, योनि या स्वरूप नहीं देखते, वे केवल सच्ची भक्ति और प्रेम को देखते हैं।
  • संकट में ईश्वर स्मरण: जब सारे सांसारिक सहारे छूट जाएँ, तब ईश्वर का स्मरण ही एकमात्र सहारा है। भगवान तभी सबसे करीब होते हैं जब भक्त उन्हें सच्चे मन से पुकारता है।
  • भगवान की दयालुता: भगवान अत्यंत दयालु और भक्तवत्सल हैं। वे अपने भक्तों के कष्ट को देखकर सहन नहीं कर पाते और उनकी रक्षा के लिए तुरंत प्रकट होते हैं।
  • कर्मफल और मोक्ष: यह कथा कर्मफल के सिद्धांत और मोक्ष की अवधारणा को भी समझाती है। राजा इन्द्रद्युम्न और गंधर्व हूहू को अपने कर्मों और शापों के कारण विभिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ा, किंतु अंततः भगवान की कृपा से उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।

आज भी गजेन्द्र मोक्ष की यह कथा हमें यह विश्वास दिलाती है कि यदि हम सच्चे हृदय से भगवान को पुकारें, तो वे अवश्य हमारी सहायता के लिए आएंगे। यह हमें सिखाती है कि जीवन के हर मोड़ पर भगवान पर अटूट श्रद्धा रखना ही सबसे बड़ी शक्ति है।

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