🌌 1. कृष्ण का जन्म – अंधकार में आशा की किरण
कहानी शुरू होती है मथुरा से।
कंस के अत्याचार से काँप रही मथुरा नगरी में, भाद्रपद की अष्टमी की आधी रात को,
कारागार की ठंडी कोठरी में जन्म लेते हैं वासुदेव-देवकी के आठवें पुत्र – श्रीकृष्ण।
बाहर घोर वर्षा हो रही थी, आकाश गरज रहा था,
लेकिन उसी अंधकार में जन्मा ये बालक दुनिया को प्रेम और धर्म का प्रकाश देने वाला था।
जब वासुदेव जी उन्हें टोकरी में रखकर यमुना पार कर गोकुल पहुँचे,
तो पूरी सृष्टि जैसे इस चमत्कार में सहभागी बन गई।
यमुना का पानी कम हो गया, सर्प शेषनाग ने अपने फन से रक्षा की,
और बालक कृष्ण ने गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया की गोद में आँखें खोलीं।
🐄 2. बचपन की लीलाएँ – नटखट कान्हा का जादू
अब हमारी कहानी चलती है गोकुल और वृंदावन की ओर,
जहाँ एक नन्हा शिशु सबके दिलों पर राज करने वाला था।
🍯 माखन चोरी की कहानी
सुबह-सुबह यशोदा मैया के आँगन में माखन के मटके लटकते।
कान्हा और उनके दोस्त आते, और छुप-छुपकर माखन चुरा लेते।
कभी माखन अपने मुँह में, कभी ग्वाल-बालों को बाँटते,
और कभी तो बछड़ों तक को खिला देते।
पूरा गोकुल हँसी और प्रेम से भर जाता।
🐍 कालिया नाग वध
एक दिन गोकुल में हलचल मच गई—यमुना में रहने वाला कालिया नाग सबको डरा रहा था।
कृष्ण कूद पड़े पानी में, और कालिया के फनों पर चढ़कर नृत्य करने लगे।
सोचो ज़रा! सात साल का बालक, और पूरी नगरी ने देखा—
भय को प्रेम और साहस से हराने की मिसाल।
💖 3. राधा-कृष्ण का प्रेम – भक्ति का प्रतीक
कहानी अधूरी है अगर हम राधा रानी का नाम ना लें।
राधा-कृष्ण का प्रेम संसारिक नहीं, शुद्ध भक्ति का प्रतीक है।
वो प्रेम, जिसमें ना स्वार्थ है, ना अपेक्षा—सिर्फ़ समर्पण।
यही कारण है कि हर भक्त, चाहे वह मथुरा में हो या दक्षिण के मंदिरों में,
कृष्ण को राधा संग ही याद करता है।
⚔️ 4. गीता का उपदेश – जीवन का मार्गदर्शन
समय बीतता गया, और नटखट कान्हा बने द्वारका के राजा और महाभारत के सारथी।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर, जब अर्जुन मोह और संशय में पड़े,
तब वही कान्हा बोले—
“कर्म करो, फल की चिंता मत करो।”
यानी,
जीवन में कर्तव्य निभाओ,
भय या मोह को अपने रास्ते में मत आने दो।
यह शिक्षा आज भी हमें हर कठिनाई में मार्ग दिखाती है।
🌺 5. ब्रह्मलीला – अंत जो वास्तव में आरंभ है
अंत में, हमारी कहानी पहुँचती है ब्रह्मलीला तक।
कृष्ण जब इस धरती पर अपना कार्य पूर्ण कर चुके,
तो वे बाण के माध्यम से देह त्याग कर अपने धाम लौट गए।
लेकिन क्या वास्तव में उनका अंत हुआ?
नहीं।
क्योंकि कृष्ण एक लीला हैं,
एक मुस्कान हैं,
एक ऐसी बाँसुरी की धुन,
जो आज भी हर भक्त के हृदय में गूँजती है।
🌼 6. Janmashtami का उत्सव – आज भी वही उल्लास
आज भी जब भाद्रपद की अष्टमी आती है,
पूरे भारत में उत्सव मनता है—झाँकियाँ, भजन, दही-हांडी, और मंदिरों की सजावट।
हर घर में जन्माष्टमी का उल्लास होता है,
जैसे कृष्ण फिर से आ गए हों हमारी जिंदगी में आनंद भरने।
✨ निष्कर्ष
तो ये थी मेरे कान्हा की कहानी—
एक ऐसा बालक, जो माखन चुराता है लेकिन दिल जीत लेता है,
एक ऐसा मित्र, जो अर्जुन के सारथी बनकर धर्म का मार्ग दिखाता है,
और एक ऐसा प्रेमी, जिसकी याद में पूरी सृष्टि झूम उठती है।
इस जन्माष्टमी, अपने भीतर के कृष्ण को जगाइए।
उनकी बाँसुरी की धुन को अपने मन में महसूस कीजिए।

