ॐ: आदि ध्वनि जो ब्रह्मांड का सार है
नमस्ते! सनातन स्वर के इस भक्तिमय यात्रा में आपका स्वागत है। आज हम उस दिव्य ध्वनि पर प्रकाश डालेंगे, जो सिर्फ एक अक्षर नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड का सार, आदि और अनंत का प्रतीक है – वह है ॐ (ओम्)। यह मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि एक कम्पन है, एक अनुभूति है जो हमारे अस्तित्व की गहराई से जुड़ती है।
प्रणव: ब्रह्मांड का पहला स्पंदन
सनातन धर्म में ॐ को ‘प्रणव’ कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘नया’ या ‘नवीनतम’। यह वह ध्वनि है जिससे ब्रह्मांड का पहला स्पंदन उत्पन्न हुआ। यह सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों का प्रतिनिधित्व करता है। उपनिषदों में इसे ‘ब्रह्म’ और ‘आत्मा’ का भी प्रतीक बताया गया है। जब हम ॐ का उच्चारण करते हैं, तो हम ब्रह्मांड की उस मूल ऊर्जा से जुड़ते हैं जिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ है।
ॐ के तीन अक्षर और चौथा आयाम
ॐ (ओम्) वास्तव में तीन अक्षरों से मिलकर बना है: अ, उ, म, और इसके बाद आने वाली एक शांत अवस्था या अनहद नाद।
- अ (A): यह जागृत अवस्था (जाग्रत) का प्रतीक है। यह उस अवस्था को दर्शाता है जब हम अपनी इंद्रियों से बाहरी दुनिया का अनुभव करते हैं। यह सृष्टि की शुरुआत का भी प्रतीक है।
- उ (U): यह स्वप्न अवस्था (स्वप्न) का प्रतीक है, जहाँ मन अंदरूनी दुनिया में होता है और सपने देखता है। यह स्थिति या पोषण का भी प्रतीक है।
- म (M): यह सुषुप्ति अवस्था (गहरी नींद) का प्रतीक है, जहाँ चेतना शांत और एकाग्र होती है। यह संहार या विघटन का भी प्रतीक है।
- अनहद नाद (बिंदु/अनुस्वार): ॐ के उच्चारण के बाद आने वाली यह शांत, मौन अवस्था, तीनों अवस्थाओं से परे है। यह तुरीय अवस्था (अत्यंत उच्च चेतना) है, जो आत्म-साक्षात्कार और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है। यह वह अवस्था है जहाँ हमें वास्तविक शांति और पूर्णता का अनुभव होता है।
जीवन में ॐ का महत्व और लाभ
ॐ का नियमित जप और ध्यान हमारे जीवन में अनेक सकारात्मक बदलाव लाता है:
- मन की शांति: ॐ का उच्चारण मन को शांत करता है, तनाव और चिंता को कम करता है।
- एकाग्रता में वृद्धि: ध्यान के माध्यम से ॐ पर केंद्रित होने से एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
- सकारात्मक ऊर्जा: यह शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे नकारात्मकता दूर होती है।
- श्वास नियंत्रण: ॐ के जप से श्वास गहरा और लयबद्ध होता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
- आध्यात्मिक जागरण: यह हमारी चेतना को उच्च स्तर तक ले जाता है, जिससे हमें अपने वास्तविक स्वरूप और ब्रह्मांड से अपने संबंध का बोध होता है।
- आत्म-ज्ञान: यह हमें आत्म-चिंतन और आत्म-बोध की दिशा में अग्रसर करता है।
हमारे शास्त्रों में ॐ
ॐ का उल्लेख लगभग सभी प्रमुख वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। मुंडक उपनिषद में कहा गया है, “ॐ ही धनुष है, आत्मा ही बाण है और ब्रह्म ही लक्ष्य है।” यह दर्शाता है कि ॐ के माध्यम से ही हम अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़ सकते हैं। गीता में भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं, “मैं वेदों में ॐ हूँ।”
भक्ति और साधना में ॐ
ॐ केवल जप के लिए ही नहीं, बल्कि भक्ति और साधना का एक शक्तिशाली उपकरण भी है। कई योग और ध्यान की पद्धतियों में ॐ को केंद्रीय स्थान दिया गया है। चाहे आप किसी भी देवी-देवता की उपासना करते हों, ॐ का उच्चारण सभी को एक सूत्र में पिरोता है, क्योंकि यह स्वयं निराकार ब्रह्म का प्रतीक है।
तो आइए, हम सभी अपने जीवन में इस पवित्र आदि ध्वनि ॐ को अपनाएं और इसके माध्यम से आंतरिक शांति, आध्यात्मिक विकास और ब्रह्मांडीय चेतना का अनुभव करें। ॐ नमः शिवाय! ॐ शांति शांति शांति!

