प्रस्तावना
हनुमान जयंती, भक्ति और शक्ति का अनुपम पर्व है, जो चैत्र मास की पूर्णिमा को भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारतवर्ष में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पावन दिवस हमें पवनपुत्र हनुमान की अदम्य भक्ति, अतुलनीय बल, अद्भुत पराक्रम और निष्ठावान सेवा की याद दिलाता है। हनुमान जी, जिन्हें संकटमोचन, बजरंगबली और अंजनीपुत्र जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है, भगवान श्री राम के परम भक्त हैं और उनकी कृपा से भक्तों को बल, बुद्धि, विद्या, आरोग्य और निर्भयता की प्राप्ति होती है। उनकी उपासना से जीवन के सभी भय और बाधाएं दूर होती हैं, और मन को अद्भुत शांति मिलती है। इस विशेष अवसर पर हनुमान जी की पूजा-अर्चना का विधान है, जिसमें विशेषकर तेल और सिंदूर का अर्पण एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गहरा आध्यात्मिक अर्थ रखता है। आइए, इस पावन पर्व पर उनकी पूजा की विधि को जानें और तेल-सिंदूर से जुड़ी उन अद्भुत मान्यताओं और रहस्यों को समझें, जो भक्तों के जीवन में सुख-समृद्धि और सुरक्षा लाती हैं। यह दिन हमें सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा और अटूट श्रद्धा से जीवन के हर लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
पावन कथा
यह कथा उस समय की है जब भगवान श्री राम लंका विजय के पश्चात अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो चुका था। समस्त अयोध्या नगरी उत्सव के रंग में रंगी थी। एक दिन, परम भक्त हनुमान जी ने माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर भरते हुए देखा। उनकी बाल सुलभ जिज्ञासा जागृत हुई और वे अत्यंत आश्चर्यचकित होकर माता सीता के समीप गए।
हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रता और कौतूहल से पूछा, “हे माता, आप यह लाल रंग का पदार्थ अपनी मांग में क्यों लगा रही हैं? इसका क्या महत्व है?”
माता सीता, जो हनुमान जी की निश्छल भक्ति से भली-भांति परिचित थीं, मुस्कुराईं और बड़े प्रेम से उत्तर दिया, “पवनपुत्र, यह सिंदूर है। इसे लगाने से मेरे स्वामी भगवान श्री राम की आयु लंबी होती है और उनका प्रेम और आशीर्वाद मुझ पर सदैव बना रहता है। यह सुहाग की निशानी है और इसे लगाने से पति का सौभाग्य बढ़ता है और वे प्रसन्न रहते हैं।”
माता सीता के इन शब्दों को सुनकर हनुमान जी भाव-विभोर हो गए। उनके मन में तुरंत यह विचार आया कि यदि मात्र थोड़ी सी मांग में सिंदूर लगाने से मेरे प्रभु श्री राम की आयु लंबी होती है और वे प्रसन्न होते हैं, तो मैं क्यों न अपने पूरे शरीर पर ही सिंदूर लगा लूँ? इससे तो मेरे आराध्य भगवान श्री राम अजर-अमर हो जाएंगे और वे सदा के लिए अत्यंत प्रसन्नचित्त रहेंगे। मेरे स्वामी का प्रेम और उनकी कृपा मुझ पर सदा बनी रहेगी।
हनुमान जी ने एक पल का भी विलंब नहीं किया। उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि उन्होंने तुरंत समीप पड़े एक पात्र से ढेर सारा सिंदूर लिया और उसे अपने पूरे शरीर पर मल लिया। उनका रोम-रोम सिंदूर से लाल हो गया। वे एक अद्भुत सिंदूरी रंग की आभा से दमक रहे थे। इस सिंदूर से सजे हुए रूप में ही वे भगवान श्री राम के समक्ष जा खड़े हुए।
भगवान श्री राम, लक्ष्मण, माता सीता और राजदरबार में उपस्थित सभी लोग हनुमान जी के इस अद्भुत सिंदूरी स्वरूप को देखकर पहले तो चकित रह गए, फिर उनके इस भोलेपन और अनन्य भक्ति को देखकर सभी के नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। भगवान श्री राम की आँखों में भी स्नेह और गर्व के आँसू आ गए। उन्होंने हनुमान जी को अपने समीप बुलाया और अत्यंत प्रेम से उनका आलिंगन किया।
भगवान श्री राम ने हनुमान जी की इस अद्वितीय भक्ति और निष्ठा को देखकर उन्हें हृदय से आशीर्वाद दिया और एक दिव्य वरदान प्रदान किया। उन्होंने कहा, “हे पवनपुत्र, तुम्हारी यह निस्वार्थ भक्ति अद्भुत है। आज से जो भी भक्त सच्चे मन और श्रद्धा के साथ तुम्हें चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर अर्पित करेगा, उस पर मेरी और तुम्हारी कृपा सदैव बनी रहेगी। उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी, उसे किसी भी प्रकार के भय और संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा, और वह जीवन में सदा सुख-समृद्धि प्राप्त करेगा।”
तभी से हनुमान जी को सिंदूर और तेल अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है। यह केवल एक प्रथा नहीं, बल्कि हनुमान जी की श्रीराम के प्रति अटूट प्रेम, सेवा और समर्पण का जीवंत प्रतीक है। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि सच्ची भक्ति किसी भी बाहरी प्रदर्शन से परे होती है, यह हृदय की पवित्रता और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास से उत्पन्न होती है। हनुमान जी का सिंदूरी रूप उनकी अद्वितीय भक्ति का ऐसा प्रतीक बन गया, जिसे देखकर हर भक्त उनके चरणों में नतमस्तक हो जाता है।
दोहा
सिंदूर सजे हनुमत तन, तेल संग शुभ लाएं।
राम कृपा बरसे सदा, संकट सकल मिटाएं॥
चौपाई
जय हनुमंत बल बुद्धि विधाना, राम काज हित सकल समाना।
पवनपुत्र अजर अमर अविनाशी, हरहु सकल दुख पूरहु आशी॥
सिंदूर लेप मंगलकारी, भक्तन की रक्षा हितधारी।
जो यह विधि श्रद्धा से गावे, मनोकामना सिद्धि पावे॥
पाठ करने की विधि
हनुमान जयंती के पावन अवसर पर भगवान हनुमान की पूजा-अर्चना अत्यंत शुभ फलदायी होती है। यहाँ एक विस्तृत विधि दी गई है, जिसका पालन कर आप बजरंगबली का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं:
सुबह जल्दी उठें और स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो लाल रंग के वस्त्र पहनें। अपने मन को शांत और पवित्र रखें।
पूजा स्थल को साफ करें और गंगाजल छिड़ककर उसे पवित्र करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान हनुमान की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। हनुमान जी के साथ श्री राम जी और माता सीता की प्रतिमा या चित्र भी अवश्य रखें, क्योंकि हनुमान जी श्रीराम के परम भक्त हैं और उनके बिना वे किसी भी पूजा को स्वीकार नहीं करते।
सर्वप्रथम हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर अपनी मनोकामना और अपनी भक्ति को मन में धारण करते हुए संकल्प लें कि आप हनुमान जयंती की पूजा कर रहे हैं।
इसके बाद भगवान हनुमान का ध्यान करते हुए उनका आवाहन करें, “हे अंजनी पुत्र, पवनपुत्र हनुमान! आप पधारें और हमारी पूजा स्वीकार करें।”
अब हनुमान जी को चौकी पर आसन ग्रहण करने का भाव रखें। सबसे पहले प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं। फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी का मिश्रण) से स्नान कराकर पुनः गंगाजल से स्नान कराएं। स्नान के बाद स्वच्छ कपड़े से प्रतिमा को पोंछ लें।
हनुमान जी को लाल वस्त्र या लाल लंगोट अर्पित करें। फिर उन्हें जनेऊ पहनाएं।
इसके उपरांत सबसे महत्वपूर्ण चरण आता है – चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर हनुमान जी को लेपन करें। आप पूरे शरीर पर लेपन कर सकते हैं या माथे पर तिलक लगा सकते हैं।
अब हनुमान जी को चंदन और अक्षत (बिना टूटे चावल) अर्पित करें।
लाल या पीले रंग के फूल, विशेषकर गेंदा, गुड़हल या कमल, और फूलों की माला चढ़ाएं।
धूप जलाएं और शुद्ध घी या सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
नैवेद्य के रूप में गुड़-चना, बूंदी के लड्डू, बेसन के लड्डू, चूरमा, केला, और आम जैसे फल अर्पित करें। ध्यान रखें कि हनुमान जी को तुलसी दल सीधे नहीं चढ़ाए जाते, लेकिन उनके प्रसाद में रखकर अर्पित किया जा सकता है।
एक साबुत पान का पत्ता लें, उस पर थोड़ा सा गुड़, सौंफ और इलायची रखकर बीड़ा बनाएं और हनुमान जी को अर्पित करें।
हनुमान जी को इत्र लगाएं और कलावा या मौली अर्पित करें।
पूजा का सबसे महत्वपूर्ण भाग, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान अष्टक या सुंदरकांड का पाठ करें। यह पाठ अत्यंत शुभ फलदायी होता है और सभी संकटों को हरता है।
अंत में, घी के दीपक या कपूर से हनुमान जी की आरती करें।
अपनी जगह पर खड़े होकर या प्रतिमा के चारों ओर 3, 7 या 11 बार परिक्रमा करें।
पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें।
पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद सभी लोगों में बांटें और स्वयं भी ग्रहण करें। इस दिन लाल झंडा (ध्वजा) अर्पित करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे पूजा के बाद घर की छत पर या किसी मंदिर में स्थापित कर सकते हैं।
पाठ के लाभ
हनुमान जयंती पर की गई पूजा और सिंदूर-तेल अर्पण से भक्तों को अनेक अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं, जो उनके जीवन को सुखमय और सफल बनाते हैं।
दीर्घायु और शक्ति: सिंदूर शक्ति, ऊर्जा और जीवन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करने से भक्त को दीर्घायु, शारीरिक बल, मानसिक शक्ति और अदम्य ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यह हनुमान जी के श्रीराम के प्रति प्रेम और उनकी दीर्घायु की कामना का प्रतीक है, जो अब भक्तों के लिए वरदान बन गया है।
नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा: तेल, विशेषकर चमेली का तेल, और सिंदूर का मिश्रण अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली माना जाता है। यह मिश्रण नकारात्मक ऊर्जाओं, बुरी शक्तियों और ईर्ष्यालु दृष्टियों से भक्त की रक्षा करता है। यह भक्त के चारों ओर एक मजबूत सुरक्षा कवच का निर्माण करता है, जिससे कोई भी अनिष्ट उसे छू नहीं पाता।
मंगल और शनि की शांति: ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी की पूजा करने से मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव कम होते हैं और व्यक्ति में साहस, पराक्रम और आत्मबल बढ़ता है। इसके साथ ही, शनिवार को हनुमान जी को चमेली के तेल के साथ सिंदूर अर्पित करने से शनि देव के अशुभ प्रभावों से भी मुक्ति मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी ने शनि देव को रावण की कैद से मुक्त कराया था और प्रसन्न होकर शनि देव ने उन्हें वचन दिया था कि वे हनुमान भक्तों को कभी परेशान नहीं करेंगे।
मनोकामना पूर्ति: यह दृढ़ विश्वास है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक और सच्चे हृदय से हनुमान जी को तेल और सिंदूर चढ़ाते हैं, उनकी सभी बाधाएं दूर होती हैं। उनके जीवन के मार्ग में आने वाली हर चुनौती का समाधान होता है और उनकी सभी जायज मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
स्वास्थ्य लाभ: कुछ भक्त मानते हैं कि सिंदूर और तेल का लेपन हनुमान जी के शरीर को शीतल करता है और बदले में भक्तों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। यह शारीरिक और मानसिक आरोग्य प्रदान करता है, जिससे भक्त निरोगी और ऊर्जावान जीवन व्यतीत कर पाता है।
आत्मविश्वास और निर्भयता: हनुमान जी की उपासना से व्यक्ति में अद्भुत आत्मविश्वास और निर्भयता आती है। वह किसी भी परिस्थिति का सामना करने में सक्षम होता है और उसके मन से भय और संशय दूर हो जाते हैं।
श्री राम की कृपा: चूंकि हनुमान जी भगवान श्री राम के परम भक्त हैं, इसलिए उनकी पूजा करने से स्वयं भगवान श्री राम की कृपा भी प्राप्त होती है। हनुमान जी की सेवा करने से श्री राम अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को भी आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
नियम और सावधानियाँ
हनुमान जयंती की पूजा करते समय कुछ नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
स्वच्छता और पवित्रता: पूजा से पहले स्वयं को और पूजा स्थल को पूर्ण रूप से स्वच्छ और पवित्र रखें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
संकल्प: पूजा आरंभ करने से पूर्व अपनी मनोकामना के साथ संकल्प अवश्य लें।
तुलसी दल: हनुमान जी को सीधे तुलसी दल अर्पित नहीं किए जाते हैं। यदि आप प्रसाद में तुलसी का उपयोग कर रहे हैं, तो उसे प्रसाद में रखकर ही अर्पित करें, सीधे प्रतिमा पर नहीं।
ब्रह्मचर्य: हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं, अतः पूजा करते समय पवित्र मन और विचारों को बनाए रखें।
प्रसाद: हनुमान जी को बूंदी के लड्डू, बेसन के लड्डू, गुड़-चना, चूरमा और फल अत्यंत प्रिय हैं। सात्विक प्रसाद ही अर्पित करें। तामसिक भोजन (मांस, मदिरा) का सेवन पूजा के दिन पूर्णतः वर्जित है।
चमेली का तेल: सिंदूर के साथ चमेली का तेल ही प्रयोग करना सर्वाधिक उत्तम माना जाता है। यदि चमेली का तेल उपलब्ध न हो, तो तिल का तेल या सरसों का तेल भी प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन प्राथमिकता चमेली को दें।
स्त्री भक्तों के लिए: मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों को हनुमान जी की प्रतिमा को स्पर्श नहीं करना चाहिए। दूर से ही ध्यान और पाठ कर सकती हैं।
निस्वार्थ भाव: पूजा हमेशा निस्वार्थ भाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ करनी चाहिए। मन में किसी प्रकार का छल-कपट या अहंकार नहीं होना चाहिए।
मांस या मदिरा का त्याग: हनुमान जयंती के दिन और यदि संभव हो तो पूजा के कुछ दिन पहले से ही मांस और मदिरा का सेवन त्याग देना चाहिए।
निष्कर्ष
हनुमान जयंती का यह पावन पर्व हमें केवल एक उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह हमें अटूट भक्ति, निस्वार्थ सेवा और अदम्य साहस का पाठ भी पढ़ाता है। भगवान हनुमान की सिंदूर और तेल से सजी प्रतिमा हमें उनकी श्री राम के प्रति उस अनमोल निष्ठा की याद दिलाती है, जिसने उन्हें चिरंजीवी और संकटमोचन बनाया। इस दिन विधि-विधान से की गई पूजा और हृदय से अर्पित किए गए सिंदूर-तेल के माध्यम से भक्त हनुमान जी से बल, बुद्धि, विद्या और साहस का वरदान प्राप्त करते हैं। उनकी कृपा से जीवन के सभी भय, बाधाएं और नकारात्मकता दूर होती है, और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। आइए, हम सब इस पावन अवसर पर बजरंगबली के चरणों में अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। जय श्री राम, जय हनुमान!

