कष्ट दूर करने के मंत्र
प्रस्तावना
मानव जीवन सुख-दुःख का संगम है। हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में किसी न किसी कष्ट, बाधा या संकट का सामना अवश्य करता है। ये संकट कभी शारीरिक पीड़ा के रूप में आते हैं, कभी मानसिक तनाव बनकर घेर लेते हैं, तो कभी आर्थिक समस्याओं और पारिवारिक कलह का रूप धारण कर लेते हैं। ऐसे समय में जब समस्त लौकिक उपाय विफल प्रतीत होते हैं, तब हमें अलौकिक शक्ति और दैवीय कृपा की शरण में जाने की प्रेरणा मिलती है। सनातन धर्म में अनेक देवी-देवता हैं जो भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं, परंतु जब बात संकटों से मुक्ति और बाधाओं को हरने की आती है, तो सर्वप्रथम जिस नाम का स्मरण होता है, वह है पवनपुत्र हनुमान का। भगवान हनुमान, जिन्हें संकटमोचन भी कहा जाता है, अपने भक्तों के सभी दुःखों को हरने वाले और उन्हें अभय प्रदान करने वाले देवता हैं। इस वर्ष हनुमान जयंती का पावन अवसर हमें उनकी कृपा प्राप्त करने और अपने जीवन से समस्त कष्टों को दूर करने का एक अनुपम अवसर प्रदान कर रहा है। आइए, हम सब मिलकर हनुमान जी की महिमा का गुणगान करें और उनके दिव्य मंत्रों तथा उपायों के माध्यम से अपने जीवन को कष्टमुक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त करें। उनकी भक्ति में लीन होकर हम न केवल अपने वर्तमान दुखों से मुक्ति पा सकते हैं, बल्कि भविष्य की हर बाधा के लिए भी स्वयं को सशक्त कर सकते हैं।
पावन कथा
त्रेतायुग की वह पावन गाथा, जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपनी पत्नी सीता के वियोग में व्याकुल थे। लंकाधिपति रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया था और उन्हें अपनी अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा था। श्रीराम की सेना में वानरों और भालुओं का विशाल समूह था, परंतु समुद्र लांघकर लंका तक पहुँचने का दुष्कर कार्य कोई नहीं कर पा रहा था। विशाल, गर्जना करता हुआ समुद्र अपनी असीमित गहराइयों और भयावह लहरों के साथ एक अजेय बाधा बनकर खड़ा था, जिसे पार करने की कल्पना मात्र से ही बड़े-बड़े योद्धाओं के मन में संशय उत्पन्न हो रहा था। श्रीराम स्वयं चिंतामग्न थे, क्योंकि माता सीता की खोज उनके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बन चुकी थी।
जब सभी वानर अपनी असमर्थता प्रकट कर रहे थे, अपनी शक्तियों पर संदेह कर रहे थे, उस समय वानरराज सुग्रीव के परम मित्र और महान ज्ञानी जामवंत जी ने पवनपुत्र हनुमान को उनकी अदम्य शक्तियों का स्मरण कराया। हनुमान जी को अपनी जन्मजात शक्तियों का विस्मरण हो गया था, वे एक सामान्य वानर की भांति ही अपना जीवन जी रहे थे, परंतु जामवंत जी के ओजस्वी वचन सुनते ही उनके भीतर सोई हुई दैवीय शक्ति जागृत हो उठी। उनके रोम-रोम में अपार बल, साहस और आत्मविश्वास का संचार हो गया। उनकी आँखें दिव्य तेज से चमक उठीं और उनका हृदय प्रभु श्रीराम की सेवा के लिए व्याकुल हो उठा।
हनुमान जी ने एक विशालकाय रूप धारण किया, उनका शरीर पर्वत के समान विशालकाय हो गया और वे अपनी पूंछ को आकाश में लहराते हुए, भगवान श्रीराम का नाम लेकर एक ही छलांग में समुद्र पार करने का संकल्प लिया। उनके इस संकल्प में प्रभु के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और अटूट श्रद्धा की दिव्य ऊर्जा समाहित थी। यह केवल एक छलांग नहीं थी, यह विश्वास की उड़ान थी, भक्ति की पराकाष्ठा थी, और निष्ठा का अद्वितीय प्रमाण था।
समुद्र पार करते समय उन्हें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा, जैसे मानों प्रकृति भी उनकी परीक्षा ले रही हो। सर्वप्रथम समुद्र में रहने वाली सुरसा नामक राक्षसी ने उनके मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया। उसका भयानक रूप देखकर कोई भी भयभीत हो सकता था, परंतु हनुमान जी अविचल रहे। सुरसा ने उन्हें निगलने के लिए अपना मुंह एक योजन तक बढ़ाया, हनुमान जी ने भी तुरंत अपना शरीर दोगुना कर लिया। सुरसा ने फिर अपना मुंह बढ़ाया, हनुमान जी ने फिर अपना शरीर बढ़ाया, यह क्रम चलता रहा। अंततः जब सुरसा का मुंह सौ योजन तक फैल गया, तो हनुमान जी ने अपनी बुद्धि और कौशल का प्रयोग करते हुए, सूक्ष्म रूप धारण कर लिया और एक मक्खी की भांति उसके विशाल मुख में प्रवेश कर तुरंत उसके दाहिने कान से बाहर निकल आए। सुरसा ने उनकी बुद्धिमत्ता और शक्ति पर प्रसन्न होकर उन्हें आशीष दिया, क्योंकि हनुमान जी ने अपनी चतुरता से उसका मान रख लिया था और उसे यह दिखा दिया था कि शक्ति का प्रदर्शन केवल शारीरिक बल से ही नहीं, बल्कि बुद्धि से भी होता है।
इसके उपरांत, सिंहिका नामक एक और मायावी राक्षसी सामने आई, जो समुद्र में उड़ते हुए जीवों की परछाई को पकड़कर उन्हें अपनी ओर खींच लेती थी और फिर उन्हें भक्षण कर जाती थी। उसने हनुमान जी की आकाश में पड़ती विशाल छाया को पकड़ा और उन्हें अपनी ओर खींचना चाहा। हनुमान जी ने क्षणभर में इस अदृश्य शक्ति के स्रोत को भांप लिया। वे तीव्र गति से उसके विशालकाय मुख में प्रवेश कर गए और भीतर ही भीतर अपने नाखून से उसके हृदय को विदीर्ण कर दिया। सिंहिका का शरीर निष्क्रिय हो गया और वह समुद्र में जा गिरी। इस प्रकार एक और भयावह बाधा को उन्होंने सहजता और अद्भुत पराक्रम से पार कर लिया।
जब हनुमान जी लंका के तट पर पहुँचे, तो लंकिनी नामक राक्षसी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, जो लंका की द्वारपाल थी और अपनी शक्ति पर अत्यंत अहंकारी थी। लंकिनी ने हनुमान जी को साधारण वानर समझकर उन्हें लंका में प्रवेश करने से मना किया और उन पर प्रहार किया। हनुमान जी ने उसे एक मुक्का मारा, जिससे वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। मूर्छा टूटने पर लंकिनी ने अपने पूर्वजों की भविष्यवाणी को याद किया कि जिस दिन कोई वानर उसके प्रहार से धरती पर गिरेगा, उसी दिन रावण के विनाश का मार्ग खुलेगा। उसने हनुमान जी की शक्ति को पहचाना और भविष्य की घटनाओं का आभास कर उन्हें नम्रतापूर्वक लंका में प्रवेश का मार्ग दे दिया। इस प्रकार हनुमान जी ने एक के बाद एक आने वाली हर बाधा को अपनी शक्ति, बुद्धि, पराक्रम और प्रभु श्रीराम के प्रति अनन्य, अविचल भक्ति के बल पर परास्त किया।
हनुमान जी लंका में प्रवेश कर गए और गहन खोज के बाद उन्होंने अशोक वाटिका में माता सीता को पाया, जो रावण की कैद में अत्यंत दुखी और विलाप कर रही थीं। वहाँ उन्होंने माता सीता को प्रभु श्रीराम का संदेश दिया, उनकी मुद्रिका भेंट की और उन्हें धैर्य बँधाया। रावण के अहंकार और अधर्म को देखकर हनुमान जी ने अशोक वाटिका को तहस-नहस किया और रावण के पुत्र अक्षय कुमार सहित कई राक्षसों का वध किया। इसके पश्चात्, वे अपनी पूंछ में आग लगाकर पूरी लंका का दहन कर दिया, जिससे रावण और उसकी अहंकारी सेना में भय का संचार हो गया। उन्होंने सफलतापूर्वक माता सीता का पता लगाया और श्रीराम को यह शुभ समाचार दिया, जिससे श्रीराम के हृदय में आशा, उत्साह और संतोष का संचार हुआ।
यह पावन कथा हमें सिखाती है कि जीवन में कितनी भी बड़ी बाधाएँ, भयावह परिस्थितियाँ या कठिन चुनौतियाँ क्यों न आ जाएँ, यदि हमारे भीतर अटल विश्वास, सच्ची निष्ठा और प्रभु के प्रति अटूट श्रद्धा है, तो हम हर संकट को पार कर सकते हैं। हनुमान जी का चरित्र हमें यह प्रेरणा देता है कि चाहे वह विशाल, अथाह समुद्र हो या मायावी, शक्तिशाली राक्षसी, सच्ची लगन, अद्भुत पराक्रम, विवेकपूर्ण बुद्धि और प्रभु के नाम के जाप से हर कष्ट का निवारण संभव है। हनुमान जी ने स्वयं श्रीराम के सबसे बड़े संकटों को दूर किया, इसीलिए उन्हें ‘संकटमोचन’ कहा जाता है। उनकी भक्ति से जीवन के हर क्षेत्र में विजय, शांति और परम् सुख की प्राप्ति होती है। हनुमान जी की इस पावन गाथा का स्मरण मात्र ही भक्तों के हृदय से भय, संशय और निराशा को दूर कर देता है और उन्हें अदम्य शक्ति प्रदान करता है।
दोहा
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
चौपाई
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट ते हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥
पाठ करने की विधि
हनुमान जी के मंत्रों और पाठ का विधि-विधानपूर्वक जाप करने से अतुलनीय लाभ प्राप्त होते हैं। हनुमान जयंती का दिन इस कार्य के लिए अत्यंत शुभ होता है, परंतु मंगलवार और शनिवार को भी यह पाठ विशेष फलदायी होता है।
सर्वप्रथम, प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र को एक स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें। उनके सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप-अगरबत्ती जलाएँ। हनुमान जी को लाल पुष्प, जैसे गुड़हल या गुलाब, अत्यंत प्रिय हैं। उन्हें सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें। बूंदी के लड्डू या गुड़-चना का भोग लगाएँ।
इसके पश्चात्, शांत मन से आसन पर बैठ जाएँ। हनुमान जी का ध्यान करें और अपने मन में उनके प्रति श्रद्धा व समर्पण का भाव लाएँ। सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और “ॐ गं गणपतये नमः” का जाप करें ताकि पूजा निर्विघ्न संपन्न हो।
इसके बाद, हनुमान चालीसा का पाठ कम से कम तीन, सात या ग्यारह बार करें। यदि आप बजरंग बाण का पाठ कर सकते हैं, तो वह भी अत्यंत प्रभावशाली होता है। हनुमान जी के मूल मंत्र “ॐ हं हनुमते नमः” का जाप 108 बार रुद्राक्ष की माला से करें।
पाठ करते समय अपनी सभी समस्याओं और कष्टों को हनुमान जी के चरणों में समर्पित करें और उनसे कष्ट निवारण की प्रार्थना करें। पूर्ण एकाग्रता और भक्ति भाव से किया गया पाठ निश्चित रूप से फल प्रदान करता है। पाठ के उपरांत हनुमान जी की आरती करें और भोग प्रसाद भक्तों में वितरित करें।
पाठ के लाभ
हनुमान जी के मंत्रों और पाठ के जाप से भक्तों को अनेकानेक लाभ प्राप्त होते हैं, जो उनके जीवन को सुख-शांति और समृद्धि से भर देते हैं:
हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है। उनके नाम का जाप और मंत्रों का पाठ करने से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं। वे भक्तों के जीवन से हर प्रकार की बाधाओं को हर लेते हैं।
यदि आपको शत्रुओं का भय है या कोई विरोधी आपको परेशान कर रहा है, तो हनुमान जी का पाठ करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और वे शांत हो जाते हैं। यह आपको अदृश्य बुरी शक्तियों से भी बचाता है।
हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का नियमित पाठ गंभीर से गंभीर रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायक माना जाता है। यह शारीरिक कष्टों को कम करता है और व्यक्ति को स्वस्थ जीवन प्रदान करता है।
हनुमान जी बल और साहस के प्रतीक हैं। उनके स्मरण से सभी प्रकार के भय, चिंता, तनाव और नकारात्मक विचार दूर होते हैं। व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और सकारात्मकता का संचार होता है।
हनुमान जी की भक्ति व्यक्ति को आंतरिक शक्ति प्रदान करती है। यह आत्मविश्वास बढ़ाती है और हर चुनौती का सामना करने की प्रेरणा देती है।
हनुमान जी भूत-पिशाच और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करते हैं। उनके नाम के जाप से घर और आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और बुरी आत्माओं का प्रभाव समाप्त होता है।
सच्ची श्रद्धा और भक्ति से हनुमान जी का पाठ करने वाले भक्तों की सभी शुभ मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। वे उन्हें इच्छित फल प्रदान करते हैं।
जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने और आर्थिक समृद्धि लाने के लिए हनुमान जी का पाठ अत्यंत प्रभावशाली होता है। यह करियर, व्यवसाय और शिक्षा में आने वाली बाधाओं को दूर करता है।
ये सभी लाभ हनुमान जी की कृपा से प्राप्त होते हैं, बशर्ते पाठ पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से किया जाए।
नियम और सावधानियाँ
हनुमान जी की पूजा और मंत्र जाप करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
पूजा से पूर्व शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य है। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और मन में किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार न लाएँ।
हनुमान जी ब्रह्मचारी देवता हैं। उनकी पूजा करने वाले व्यक्ति को सात्विक भोजन करना चाहिए। प्याज, लहसुन, मांसाहार और तामसिक भोजन का सेवन वर्जित है। यदि संभव हो तो पूजा वाले दिन व्रत रखें या फलाहार करें।
यदि आप विशेष अनुष्ठान या लंबे समय तक हनुमान जी का पाठ कर रहे हैं, तो ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पाठ को नियमित रूप से और पूर्ण एकाग्रता के साथ करना चाहिए। मन भटकने न दें और हनुमान जी के स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करें।
बिना श्रद्धा और विश्वास के किया गया कोई भी कर्म फलदायी नहीं होता। हनुमान जी पर अटूट विश्वास रखें कि वे आपके कष्ट अवश्य दूर करेंगे।
पूजा स्थल और हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र को सदैव स्वच्छ रखें।
पूजा के दिनों में या सामान्यतः भी क्रोध, ईर्ष्या और कटु वचनों से बचना चाहिए। मन को शांत और सकारात्मक रखें।
मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों को हनुमान जी की प्रतिमा को स्पर्श नहीं करना चाहिए और न ही पाठ करना चाहिए। दूर से मानसिक जाप किया जा सकता है।
हनुमान जी की भक्ति में लीन रहते हुए अपने भीतर से अहंकार का त्याग करें। सेवा भाव और विनम्रता के साथ उनकी आराधना करें।
इन नियमों का पालन करते हुए हनुमान जी की आराधना करने से निश्चित रूप से उनकी कृपा प्राप्त होती है और सभी कष्टों का निवारण होता है।
निष्कर्ष
प्रिय भक्तों, जीवन में आने वाले संकट, कष्ट और बाधाएँ हमें विचलित कर सकती हैं, परंतु यह भी सत्य है कि हर समस्या का समाधान ईश्वर की शरण में होता है। पवनपुत्र हनुमान, जो रामभक्ति के चरम आदर्श हैं, स्वयं संकटमोचन हैं और अपने भक्तों के सभी दुखों को हरने वाले हैं। उनकी पावन गाथाएँ हमें साहस, शक्ति और विश्वास की प्रेरणा देती हैं। हनुमान जयंती का यह पवित्र अवसर हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि जब तक हमारे हृदय में हनुमान जी के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास है, तब तक कोई भी बाधा हमें पराजित नहीं कर सकती। उनके दिव्य मंत्रों का जाप, हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ न केवल हमारे कष्टों को दूर करता है, बल्कि हमें आध्यात्मिक शक्ति और आंतरिक शांति भी प्रदान करता है।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी अपने मन-वचन-कर्म से हनुमान जी का स्मरण करें। उनकी कृपा से हमारे जीवन से सभी दुख-दर्द मिट जाएँगे और हम एक सुखमय, शांत और समृद्ध जीवन जी सकेंगे। अपने हृदय में सदा उस बलशाली वीर हनुमान को धारण करें, जो हर पल अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। जय श्री राम! जय हनुमान!
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Category: भक्ति एवं मंत्र
Slug: kasht-dur-karne-ke-mantra
Tags: हनुमान जयंती, संकटमोचन हनुमान, कष्ट निवारण मंत्र, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान उपाय, रोग मुक्ति, भय निवारण, हनुमान पूजा विधि

