हनुमान अष्टक सम्पूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित: बजरंगबली की असीम कृपा प्राप्त करें
सनातन धर्म में भगवान हनुमान को बल, बुद्धि और विद्या का प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के एकादश रुद्रावतार हैं और प्रभु श्री राम के परम भक्त हैं। जब-जब भक्तों पर कोई संकट आता है, बजरंगबली ही संकटमोचन बनकर उनके कष्टों को हर लेते हैं। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण और हनुमान अष्टक जैसे स्तोत्र उनके प्रति हमारी श्रद्धा और विश्वास को दृढ़ करते हैं। इन्हीं शक्तिशाली स्तोत्रों में से एक है ‘हनुमान अष्टक’, जिसका नियमित पाठ करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं और साधक को हनुमान जी की असीम कृपा प्राप्त होती है।
आज हम ‘सनातन स्वर’ के माध्यम से आपके लिए हनुमान अष्टक का सम्पूर्ण पाठ उसके हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं। यह सिर्फ एक पाठ नहीं, बल्कि हर श्लोक में भगवान हनुमान के पराक्रम, उनकी भक्ति और उनके संकटमोचन स्वरूप का वर्णन है। आइए, इस पावन यात्रा पर चलें और जानें कैसे हनुमान अष्टक का पाठ हमें भय, दुख और बाधाओं से मुक्ति दिला सकता है।
हनुमान अष्टक: प्रत्येक श्लोक का गहन अर्थ और उसकी महिमा
हनुमान अष्टक उन परिस्थितियों में भगवान हनुमान से मदद की याचना है, जब व्यक्ति स्वयं को असहाय पाता है, जब मित्र और सगे-संबंधी भी साथ छोड़ देते हैं। यह आठ चौपाइयों का स्तोत्र बजरंगबली के उन अद्भुत कार्यों का स्मरण कराता है, जिनमें उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया। इन श्लोकों में उनकी महिमा का गुणगान करते हुए, भक्त उनसे अपने कष्टों को हरने की प्रार्थना करते हैं।
॥ हनुमान अष्टक ॥
श्लोक १: बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अँधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब, छांड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! जब आप बाल्यकाल में थे, तब आपने सूर्यदेव को एक लाल फल समझकर निगल लिया था। आपके इस कृत्य से तीनों लोकों में गहन अंधकार छा गया, जिससे पूरे ब्रह्मांड में भय और हाहाकार मच गया। यह ऐसा संकट था जिसे कोई भी दूर नहीं कर सकता था। तब सभी देवताओं ने आकर आपसे विनती की, जिसके बाद आपने सूर्यदेव को अपने मुख से मुक्त कर दिया और इस प्रकार सभी के कष्टों का निवारण किया। हे कपि (वानरश्रेष्ठ)! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आप हर संकट को हरने वाले हैं। यह श्लोक हनुमान जी की जन्मजात शक्ति और उनके परोपकारी स्वभाव को दर्शाता है, कि कैसे उन्होंने अपनी बाल लीला से ही त्रिलोक के संकट को क्षण भर में दूर कर दिया था।
श्लोक २: बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महा मुनि श्राप दियो तब, कौन बिचार बिचारो बिचारो।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो, तुम दास के सोक निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! जब किष्किंधा नरेश बालि के भय से सुग्रीव (कपीश) ऋष्यमूक पर्वत पर निवास कर रहे थे और अपने भाई के विनाशकारी प्रकोप से मुक्ति की राह देख रहे थे। उस समय ऋष्यमूक पर्वत पर मातंग ऋषि का श्राप था कि कोई भी बालि वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता था। ऐसे संकट के समय, आपने ही ब्राह्मण का रूप धारण कर प्रभु श्री राम को सुग्रीव के पास पहुंचाया, जिससे उनकी मित्रता हुई और सुग्रीव के मन का सारा दुख और भय दूर हो गया। हे कपि! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आप अपने दास के समस्त दुखों को हरने वाले हैं। यह श्लोक हनुमान जी की बुद्धिमत्ता, कूटनीति और भक्तवत्सलता को उजागर करता है, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में सही मार्ग दिखाया।
श्लोक ३: अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बात बिचारो।
सागर के ऊपर लंक ही जाय, सो अद्भुत कष्ट निस्तारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! जब सीता माता की खोज के लिए आप अंगद और अन्य वानरों के साथ दक्षिण दिशा में गए थे। सभी वानर विशाल समुद्र को देखकर निराश हो गए थे कि लंका कैसे पहुंचा जाए। यह एक ऐसा अद्भुत और दुर्गम संकट था जिसे कोई पार नहीं कर पा रहा था। तब आपने ही अपनी अलौकिक शक्ति से विशाल समुद्र को पार किया और लंका पहुंचकर माता सीता का पता लगाया। हे कपि! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आपने समुद्र जैसे बड़े अवरोध को पार करके एक असंभव कार्य को संभव कर दिखाया। यह श्लोक हनुमान जी के अदम्य साहस, उनकी उड़ने की शक्ति और लक्ष्य के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
श्लोक ४: रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षस सों कहि शोक निवारो।
लंकहि जाय सिया सुधि लाय, खबर रघुनाथहिं कष्ट निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! जब लंका में रावण ने माता सीता को भयंकर कष्ट और पीड़ा दी थी, जिससे वे अत्यंत शोकाकुल थीं। ऐसे निराशाजनक समय में, आपने ही लंका पहुंचकर अशोक वाटिका में माता सीता को सांत्वना दी, प्रभु श्री राम की अंगूठी देकर उनका विश्वास जीता और उन्हें धैर्य बंधाया। फिर, आपने माता सीता का समाचार श्री राम तक पहुंचाया, जिससे प्रभु श्री राम का भी दारुण कष्ट दूर हुआ। हे कपि! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आपने न केवल माता सीता के दुख दूर किए, बल्कि प्रभु राम के हृदय को भी शांति प्रदान की। यह श्लोक हनुमान जी की संवेदनशीलता, उनके दूत कर्म की श्रेष्ठता और उनके भक्तिभाव को प्रदर्शित करता है।
श्लोक ५: बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत तब, गिरि द्रोण सुबीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के प्राण उबारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! जब लंका युद्ध में मेघनाद (रावण पुत्र) के शक्ति बाण से लक्ष्मण जी के हृदय में गंभीर चोट लगी और उनके प्राण संकट में पड़ गए। उनके जीवन की रक्षा के लिए संजीवनी बूटी की आवश्यकता थी। ऐसे भयंकर संकट के समय, आपने ही वैद्य सुषेन को उनकी गृह सहित लंका से उठाया और द्रोणागिरी पर्वत को भी उठाकर ले आए, क्योंकि आपको संजीवनी बूटी की पहचान नहीं थी। आपने शीघ्रता से संजीवनी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की। हे कपि! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आपने अकेले ही यह असंभव कार्य करके लक्ष्मण जी को नवजीवन दिया। यह श्लोक हनुमान जी के अद्भुत पराक्रम, उनकी गति, कर्तव्यनिष्ठा और जीवनरक्षक क्षमता को दर्शाता है।
श्लोक ६: रावण युद्ध अनल जारो तब, कौन उपाय करौ सुखसारो।
जातुधान दल सैन्य समेटो, संकटमोचन नाम तिहारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! जब रावण के साथ युद्ध का भीषण अग्नि प्रज्वलित हो रहा था और राक्षसों की विशाल सेना चारों ओर से घेर रही थी, तब इस विकट स्थिति में कौन सा ऐसा उपाय था जिससे सुख और शांति प्राप्त हो सकती थी? आपने ही उस समय राक्षसों की सेना को संहार करके, उनकी शक्ति को समाप्त करके, और लंका को जलाकर युद्ध में प्रभु श्री राम की विजय का मार्ग प्रशस्त किया। हे कपि! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आपने युद्ध के सबसे कठिन क्षणों में भी अद्भुत साहस और पराक्रम का परिचय दिया। यह श्लोक हनुमान जी के युद्ध कौशल, उनकी विनाशकारी शक्ति और शत्रु संहारक रूप को दर्शाता है।
श्लोक ७: अहिरावण जब देख्यो रामहिं, ले गयो पातालहिं तबही।
तहाँ सहाय कियो प्रभु को, यह संकट टारो कपि तबही।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! जब मायावी राक्षस अहिरावण ने छल से प्रभु श्री राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में ले जाकर बंदी बना लिया था। यह एक ऐसा भयंकर संकट था जब स्वयं भगवान भी असहाय थे। उस समय आपने ही पाताल लोक में प्रवेश किया, अहिरावण का वध किया और प्रभु श्री राम व लक्ष्मण को उसकी कैद से मुक्त कराया। आपने ही प्रभु की सहायता कर इस महान संकट का निवारण किया। हे कपि! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आपने पाताल लोक में जाकर भी अपने प्रभु की रक्षा की। यह श्लोक हनुमान जी के गहरे भक्तिभाव, उनके अदम्य संकल्प और उनके अद्भुत रक्षक स्वरूप को दर्शाता है।
श्लोक ८: काज कियो बड़ देवन को तुम, संकटमोचन नाम बिचारो।
राम लखन सिय के मन भाए, तब काम कियो यह कष्ट निस्तारो।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥
हिंदी अर्थ: हे हनुमान जी! आपने देवताओं के भी बड़े-बड़े कार्य सिद्ध किए हैं और आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, यह सर्वविदित है। आप प्रभु श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के हृदय में बसे हुए हैं और आपने उनके मन को अत्यंत प्रिय लगने वाले ऐसे कार्य किए हैं, जिनसे उनके सभी कष्टों का निवारण हुआ। आपने सदैव निःस्वार्थ भाव से सेवा की और हर बार संकटों को दूर किया। हे कपि! इस संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ है, क्योंकि आपके जैसा परम भक्त और संकटों को हरने वाला कोई दूसरा नहीं है। यह श्लोक हनुमान जी के सम्पूर्ण जीवन को प्रभु सेवा में समर्पित होने और उनके परोपकारी स्वरूप को दर्शाता है।
दोहा: राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुरभूप।
संकटमोचन कृपा करो, प्रभु हनुमान स्वरूप॥
हिंदी अर्थ: हे देवों के राजा हनुमान जी! आप प्रभु श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ मेरे हृदय में निवास करें। हे संकटमोचन हनुमान! आप अपने कृपालु स्वरूप में हम पर अपनी कृपा बनाए रखें और हमारे सभी संकटों का निवारण करें। यह दोहा हनुमान अष्टक का फलश्रुति है, जिसमें भक्त अपनी अंतिम प्रार्थना के रूप में हनुमान जी से अपने हृदय में निवास करने और कृपा बरसाने का अनुरोध करता है।
हनुमान अष्टक पाठ के आध्यात्मिक और लौकिक लाभ
हनुमान अष्टक का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शांति का मार्ग है।
- संकटों से मुक्ति: जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह स्तोत्र जीवन के हर प्रकार के संकट, चाहे वे शारीरिक हों, मानसिक हों या आर्थिक, उनसे मुक्ति दिलाता है। हनुमान जी स्वयं संकटमोचन हैं।
- भय और चिंता का नाश: जो लोग अज्ञात भय, चिंता या किसी भी प्रकार के डर से ग्रसित हैं, उन्हें हनुमान अष्टक का पाठ करने से अपार साहस और मानसिक शांति मिलती है।
- आत्मविश्वास और शक्ति में वृद्धि: यह स्तोत्र भक्तों को आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास प्रदान करता है, जिससे वे जीवन की चुनौतियों का दृढ़ता से सामना कर पाते हैं।
- नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा: हनुमान जी को भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाला माना जाता है। इस पाठ से बुरी नजर, जादू-टोने और अन्य नकारात्मक प्रभावों से रक्षा होती है।
- ग्रह दोषों का निवारण: जिन जातकों की कुंडली में शनि, मंगल या राहु-केतु जैसे ग्रहों का अशुभ प्रभाव होता है, उन्हें हनुमान अष्टक का पाठ करने से इन दोषों से मुक्ति मिलती है।
- स्वास्थ्य लाभ: नियमित पाठ से शारीरिक कष्टों, रोगों और असाध्य बीमारियों में भी लाभ मिलता है। यह मानसिक तनाव को कम कर व्यक्ति को स्वस्थ रखता है।
- भगवान हनुमान की असीम कृपा: सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि हनुमान अष्टक का पाठ करने वाले भक्त पर बजरंगबली की सीधी कृपा होती है। वे हर कदम पर अपने भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं और उन्हें सफलता प्रदान करते हैं।
- मनोकामना पूर्ति: सच्चे मन से की गई प्रार्थना और हनुमान अष्टक का पाठ भक्तों की सभी सद्भावना पूर्ण मनोकामनाओं को पूरा करता है।
हनुमान अष्टक पाठ की विधि और परंपराएं
किसी भी स्तोत्र का पूर्ण लाभ तभी मिलता है जब उसे सही विधि और पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाए। हनुमान अष्टक के पाठ के लिए कुछ सरल परंपराएं हैं:
- कब करें पाठ: हनुमान अष्टक का पाठ विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ये दिन भगवान हनुमान को समर्पित हैं। इसके अलावा, यदि आप किसी बड़े संकट में हैं, किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए जा रहे हैं, या नियमित रूप से आध्यात्मिक शांति चाहते हैं, तो प्रतिदिन इसका पाठ कर सकते हैं।
- कैसे करें पाठ:
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- घर के पूजा स्थल पर या किसी शांत, पवित्र स्थान पर बैठें।
- हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि संभव हो तो उनके सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूपबत्ती लगाएं।
- सर्वप्रथम भगवान गणेश का स्मरण करें और उसके बाद प्रभु श्री राम व माता सीता का ध्यान करें।
- पूर्ण श्रद्धा, एकाग्रता और शांत मन से हनुमान अष्टक का पाठ करें। प्रत्येक श्लोक को उसके अर्थ को समझते हुए पढ़ना अधिक फलदायी होता है।
- पाठ पूरा करने के बाद हनुमान जी की आरती करें।
- उन्हें भोग स्वरूप गुड़, चना, लड्डू या किसी भी मौसमी फल का प्रसाद चढ़ाएं।
- कुछ महत्वपूर्ण बातें: पाठ करते समय मन को शुद्ध और विचारों को सकारात्मक रखें। यदि संभव हो तो पाठ के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस-मदिरा आदि से दूर रहें।
निष्कर्ष: संकटमोचन हनुमान की शरण में
हनुमान अष्टक केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि भगवान हनुमान के प्रति अगाध प्रेम, विश्वास और समर्पण का एक सुंदर माध्यम है। यह हमें यह सिखाता है कि जीवन में कितनी भी विकट परिस्थितियां क्यों न आएं, यदि हमारा विश्वास दृढ़ है और हम सही मार्ग पर चल रहे हैं, तो बजरंगबली सदैव हमारे साथ हैं। उनके ‘संकटमोचन’ नाम में ही यह शक्ति समाहित है कि वे अपने भक्तों को हर मुश्किल से उबार लेते हैं।
इस पावन स्तोत्र का नियमित पाठ कर हम न केवल अपने जीवन के कष्टों को दूर कर सकते हैं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी स्वयं को उन्नत कर सकते हैं। तो आइए, आज से ही हनुमान अष्टक को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाएं और भगवान हनुमान की असीम कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करें।
जय श्री राम! जय हनुमान!

