सनातन धर्म में परशुराम जयंती का पर्व भगवान विष्णु के छठे अवतार, महर्षि परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पावन तिथि अक्षय तृतीया के साथ पड़ती है और शौर्य, न्याय तथा धर्मनिष्ठा का प्रतीक है। इस ब्लॉग में हम वर्ष 2025 में आने वाली परशुराम जयंती की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और भगवान परशुराम की प्रेरक कथा का विस्तृत वर्णन करेंगे।

सनातन धर्म में परशुराम जयंती का पर्व भगवान विष्णु के छठे अवतार, महर्षि परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पावन तिथि अक्षय तृतीया के साथ पड़ती है और शौर्य, न्याय तथा धर्मनिष्ठा का प्रतीक है। इस ब्लॉग में हम वर्ष 2025 में आने वाली परशुराम जयंती की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और भगवान परशुराम की प्रेरक कथा का विस्तृत वर्णन करेंगे।

परशुराम जयंती 2025

**प्रस्तावना**
हर वर्ष वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि सनातन धर्म में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण दिन के रूप में मनाई जाती है। यह पावन तिथि अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात है, और इसी शुभ अवसर पर भगवान विष्णु के छठे अवतार, शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता, क्रोध के संहारक और धर्म के संरक्षक, भगवान परशुराम का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है, जिसे हम परशुराम जयंती कहते हैं। वर्ष 2025 में, परशुराम जयंती का यह दिव्य पर्व शनिवार, 3 मई 2025 को बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। यह दिन सनातन परंपरा के उन महान आदर्शों का प्रतीक है, जो न्याय, धर्म और सत्य के लिए किसी भी चुनौती का सामना करने की प्रेरणा देते हैं। भगवान परशुराम एक ऐसे चिरंजीवी देवता हैं, जिनकी उपस्थिति सतयुग से लेकर कलयुग तक मानी जाती है। उनका जीवन त्याग, तपस्या, वीरता और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। वे केवल एक योद्धा नहीं थे, बल्कि ब्राह्मणत्व के परम आदर्श और न्याय के प्रबल पक्षधर थे। उनकी जयंती हमें उनके आदर्शों को स्मरण करने, उनके गुणों को आत्मसात करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह दिन भक्तों के लिए विशेष फलदायी होता है, जब वे भगवान परशुराम की पूजा-अर्चना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति व समृद्धि की कामना करते हैं।

**पावन कथा**
भगवान परशुराम की कथा युगों-युगों से भक्तों के हृदयों में वीरता, धर्मनिष्ठा और न्याय के प्रति अटूट आस्था जगाती रही है। उनका जन्म भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि और उनकी पतिव्रता पत्नी रेणुका के घर हुआ था। वे भगवान विष्णु के अवतार थे, जिन्होंने पृथ्वी पर धर्म की स्थापना और अधर्मियों का नाश करने के लिए जन्म लिया। कहा जाता है कि उनके जन्म से पूर्व, उनकी माता रेणुका ने एक दिव्य पुत्र की कामना की थी, और महादेव शिव के वरदान से उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में राम नामक पुत्र प्राप्त हुआ। वे अपने माता-पिता के पांचवें पुत्र थे और उनकी दिव्य आभा और तेज बचपन से ही अद्वितीय था।

बालक राम अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा महर्षि वशिष्ठ और अन्य गुरुओं के सान्निध्य में हुई। उन्होंने शस्त्रों और शास्त्रों का गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे वरदान में एक दिव्य फरसा (परशु) प्राप्त किया। इसी परशु को धारण करने के कारण वे “परशुराम” कहलाए। यह फरसा ही उनकी पहचान बन गया और इसी के बल पर उन्होंने अनेक दुष्टों और अहंकारी राजाओं का संहार कर धर्म की स्थापना की।

भगवान परशुराम का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी से अहंकारी और अन्यायी क्षत्रियों का नाश करना था, जो अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रहे थे और प्रजा को सता रहे थे। उनकी इस प्रतिज्ञा के पीछे एक मार्मिक और हृदयविदारक घटना थी। हैहयवंश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्हें सहस्रार्जुन के नाम से भी जाना जाता था, अत्यंत पराक्रमी और अहंकारी था। उसे भगवान दत्तात्रेय से हजार भुजाएं और वरदान मिला था कि उसे कोई पराजित नहीं कर सकता। एक बार, सहस्रार्जुन अपनी विशाल सेना के साथ महर्षि जमदग्नि के आश्रम में आया। महर्षि जमदग्नि ने अपनी कामधेनु गाय, सुरभि की सहायता से सहस्रार्जुन और उसकी पूरी सेना का भव्य सत्कार किया। सुरभि के दिव्य गुणों को देखकर सहस्रार्जुन को लोभ आ गया और उसने बलपूर्वक सुरभि को हड़पने का प्रयास किया। जब महर्षि जमदग्नि ने धर्मपूर्वक इनकार किया, तो अहंकारी सहस्रार्जुन ने बलपूर्वक सुरभि को अपने साथ ले जाने का आदेश दिया और आश्रम को तहस-नहस कर दिया, जिससे महर्षि और उनकी पत्नी रेणुका अत्यंत दुखी हुए।

जब भगवान परशुराम आश्रम लौटे और उन्होंने यह हृदयविदारक दृश्य देखा, तो उनका क्रोध भड़क उठा। वे अपनी माता रेणुका के करुण क्रंदन और पिता के अपमान से अत्यंत व्यथित हुए। उन्होंने तत्काल सहस्रार्जुन का पीछा किया और अपनी दिव्य शक्ति तथा फरसे के बल पर उसकी एक-एक भुजा को काट डाला और अंततः उसका वध कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने पिता के आश्रम और धर्म का अपमान करने वाले को दंडित किया।

सहस्रार्जुन के पुत्रों ने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी, जब परशुराम आश्रम में नहीं थे। उन्होंने ध्यानमग्न महर्षि का सिर धड़ से अलग कर दिया। माता रेणुका ने इक्कीस बार “हा राम, हा राम” पुकारते हुए विलाप किया, अपने पति के वियोग में बिलखती रहीं। इस दृश्य को देखकर भगवान परशुराम का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे पृथ्वी को इक्कीस बार उन अहंकारी और अधर्मी क्षत्रियों से विहीन कर देंगे, जिन्होंने ब्राह्मणों, ऋषियों और धर्म का अपमान किया है।

अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए, भगवान परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी से दुष्ट क्षत्रियों का संहार किया और उनका रक्त समंतपंचक क्षेत्र में एकत्र कर पांच सरोवर भर दिए। इस महासंहार के बाद उन्होंने अपने पूर्वजों और पितरों का तर्पण किया, जिससे उनकी आत्मा को शांति मिली। बाद में, उन्होंने एक विशाल यज्ञ करके अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मणों को दान कर दी और महेंद्र पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए।

भगवान परशुराम एक चिरंजीवी हैं, यानी वे अमर हैं और आज भी पृथ्वी पर उपस्थित माने जाते हैं। उन्हें त्रेतायुग में भगवान राम के समय भी देखा गया, जब राम ने शिव धनुष तोड़ा था। वे द्वापरयुग में गुरु द्रोणाचार्य के गुरु भी थे, जिन्होंने उन्हें दिव्यास्त्रों का ज्ञान दिया था। यहाँ तक कि महाभारत काल में भी वे भीष्म पितामह और कर्ण के गुरु के रूप में उपस्थित थे, जिन्होंने उन्हें युद्ध कला और अस्त्र-शस्त्रों का अद्भुत ज्ञान प्रदान किया था।

उनकी कथा हमें सिखाती है कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग आवश्यक है, किंतु वह शक्ति न्याय और सत्य के मार्ग पर होनी चाहिए। भगवान परशुराम का जीवन अन्याय के प्रति अडिग विरोध और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक है।

**दोहा**
परशुराम शुभ अवतारी, विष्णु रूप गुण गाएँ।
अधर्म नाश कर धरनी, धर्म ध्वजा लहराएँ॥

**चौपाई**
जय जय परशुराम बलधामा, जमदग्नि रेणुका सुत नामा।
सहस्रार्जुन भुजा दल काटा, क्षत्रिय मद का गर्व मिटाटा॥
अक्षय तृतीया शुभ दिन आयौ, परशुराम को जनम मनायौ।
चिरंजीव तुम कलयुग माहीं, शरणागत की लाज बचाईं॥
ज्ञान शस्त्र के तुम भंडारी, दुष्ट दमन प्रभु लोकहितकारी।
जो नर ध्यावै तुमरे चरना, ताके विघ्न हरे भव डरना॥

**पाठ करने की विधि**
परशुराम जयंती 2025 का पावन पर्व वैशाख मास की शुक्ल तृतीया, शनिवार, 3 मई 2025 को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान परशुराम का पूजन अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह दिन स्वयं में अबूझ मुहूर्त होने के कारण पूरे दिन ही किसी भी शुभ कार्य या पूजा-पाठ के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। पूजा विधि इस प्रकार है:

1. **सुबह का स्नान:** जयंती के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों में या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ और धुले हुए वस्त्र धारण करें।
2. **संकल्प:** पूजा स्थल को साफ कर भगवान परशुराम के चित्र या मूर्ति को स्थापित करें। एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मूर्ति/चित्र रखें। हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर अपने नाम, गोत्र और पूजा के उद्देश्य (भगवान पर परशुराम के आशीर्वाद प्राप्ति) का संकल्प लें।
3. **शुभ मुहूर्त:** परशुराम जयंती का शुभ मुहूर्त अक्षय तृतीया के साथ ही होता है, जो कि अबूझ मुहूर्त माना जाता है। अतः पूरे दिन ही पूजा-पाठ के लिए शुभ होता है, विशेषकर दोपहर के समय, जिसे भगवान परशुराम के जन्म का समय माना जाता है।
4. **पूजा सामग्री:** चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल), धूप, दीप, घी का दीपक, ताजे पुष्प (विशेषकर श्वेत या पीले कनेर, गुलाब), तुलसी दल, नैवेद्य (मिठाई, फल, मिश्री, पंचामृत), गंगाजल, जनेऊ, नए वस्त्र, सुपारी, लौंग, इलायची।
5. **पंचोपचार/षोडशोपचार पूजा:**
* सर्वप्रथम भगवान गणेश और माता लक्ष्मी का ध्यान कर उनसे पूजा की सफलता का आशीर्वाद मांगें।
* भगवान पर परशुराम का आवाहन करें, उन्हें आसन ग्रहण करने के लिए निमंत्रित करें।
* उनके चरणों को जल से प्रक्षालित करें (पाद प्रक्षालन) और आचमन कराएं।
* चंदन, रोली, अक्षत से तिलक करें।
* नए वस्त्र, जनेऊ और सुगंधित पुष्प माला अर्पित करें।
* सुगंधित धूप और घी का दीपक प्रज्वलित करें।
* नैवेद्य (भोग) अर्पित करें, जिसमें मिश्री, फल, पंचामृत आदि शामिल हों।
* तांबूल (पान, सुपारी, लौंग, इलायची) चढ़ाएं।
6. **मंत्र जाप:** भगवान परशुराम के मूल मंत्र “ॐ परशुरामाय नमः” का कम से कम 108 बार या अपनी श्रद्धा अनुसार अधिक जाप करें। आप “ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुरामः प्रचोदयात्” इस गायत्री मंत्र का भी जाप कर सकते हैं।
7. **आरती:** अंत में कपूर या घी के दीपक से भगवान परशुराम की श्रद्धापूर्वक आरती करें।
8. **प्रदक्षिणा और क्षमा याचना:** भगवान की प्रदक्षिणा करें और पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा याचना करें।
9. **दान:** इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। ब्राह्मणों को भोजन कराएं, वस्त्र, अनाज, गाय या दक्षिणा का दान करें। गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करें।

**पाठ के लाभ**
भगवान परशुराम जयंती पर उनके पूजन और स्मरण से अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जो भक्त के जीवन को सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि से भर देते हैं। यह पावन दिन न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है, बल्कि लौकिक सुखों की भी प्राप्ति कराता है:

* **शौर्य और पराक्रम की प्राप्ति:** भगवान परशुराम स्वयं वीरता, पराक्रम और निर्भीकता के प्रतीक हैं। उनकी उपासना से भक्त में निर्भयता, साहस और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है, जिससे वह जीवन की हर चुनौती का सामना दृढ़ता और सफलता से कर पाता है।
* **न्याय और धर्म के प्रति निष्ठा:** जो भक्त न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ होते हैं, उन्हें भगवान परशुराम का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। उनकी कृपा से व्यक्ति अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति प्राप्त करता है और धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है।
* **ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि:** परशुराम शस्त्र और शास्त्र दोनों के महान ज्ञाता थे। उनके पूजन से विद्या, बुद्धि, विवेक और आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है। विद्यार्थियों और ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए यह दिन विशेष फलदायी है।
* **शत्रुओं पर विजय और बाधाओं से मुक्ति:** भगवान परशुराम ने दुष्टों का संहार कर धर्म की रक्षा की। उनकी उपासना से भक्तों को शत्रुओं और जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है। यह सुरक्षा और विजय का भाव प्रदान करता है।
* **मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति:** सच्चे मन से की गई आराधना से आध्यात्मिक प्रगति होती है, मन शांत होता है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और अंततः व्यक्ति मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
* **सुख-समृद्धि और संतान प्राप्ति:** माना जाता है कि परशुराम जयंती पर विधि-विधान से पूजा करने से घर में सुख-शांति, धन-धान्य और समृद्धि आती है। निःसंतान दंपतियों को भगवान परशुराम के आशीर्वाद से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
* **चिरंजीवी आशीर्वाद:** भगवान परशुराम स्वयं चिरंजीवी हैं। उनकी आराधना से दीर्घायु, आरोग्य और स्वस्थ जीवन का वरदान मिलता है। यह शरीर और मन को ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होता है।

**नियम और सावधानियाँ**
परशुराम जयंती के पावन अवसर पर पूजा-पाठ करते समय कुछ नियमों और सावधानियों का पालन करना आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और भगवान परशुराम का आशीर्वाद पूर्ण रूप से प्राप्त हो:

1. **पवित्रता:** पूजा से पूर्व शरीर और मन की शुद्धता अनिवार्य है। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन को एकाग्र रखें। किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार मन में न लाएं।
2. **सात्विक आचरण:** इस दिन पूर्ण रूप से सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा और किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का त्याग करें। लहसुन और प्याज से भी परहेज करें।
3. **ब्रह्मचर्य का पालन:** पूजा के दिन और यदि संभव हो तो पूजा से एक दिन पूर्व भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
4. **क्रोध और हिंसा से बचें:** भगवान परशुराम यद्यपि क्रोध के लिए जाने जाते थे, किंतु उनका क्रोध धर्म स्थापना हेतु था, व्यक्तिगत द्वेष के लिए नहीं। भक्तों को इस दिन क्रोध, हिंसा, झूठ, अपशब्दों का प्रयोग और किसी के प्रति ईर्ष्या भाव से बचना चाहिए। शांत और प्रेमपूर्ण व्यवहार अपनाएं।
5. **दान का महत्व:** अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य अवश्य करें। ब्राह्मणों, गरीबों और जरूरतमंदों को अनाज, वस्त्र या धन का दान करना पूजा को अधिक फलदायी बनाता है।
6. **गुरुजनों का सम्मान:** भगवान परशुराम स्वयं गुरुजनों और ब्राह्मणों का अत्यधिक सम्मान करते थे। इस दिन अपने गुरुजनों, माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों का आदर करें, उनके प्रति विनम्रता रखें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
7. **पूर्ण श्रद्धा:** पूजा केवल विधि-विधान का पालन नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति का विषय है। मन में पूर्ण विश्वास और आस्था के साथ भगवान परशुराम का ध्यान करें और उनकी आराधना करें। दिखावा या औपचारिकता से बचें।

**निष्कर्ष**
भगवान परशुराम जयंती केवल एक तिथि विशेष नहीं है, बल्कि यह सनातन मूल्यों, शौर्य, न्याय और धर्मपरायणता का महापर्व है। यह हमें स्मरण कराती है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म और अन्याय का बोलबाला होगा, तब-तब धर्म की रक्षा के लिए कोई न कोई दैवीय शक्ति अवश्य अवतरित होगी। भगवान परशुराम का जीवन हमें सिखाता है कि आत्म-नियंत्रण, ज्ञान और शौर्य का सही उपयोग धर्म की स्थापना और समाज के कल्याण के लिए होना चाहिए। उनका प्रचंड क्रोध भी अधर्म के नाश के लिए ही था, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए। वे चिरंजीवी हैं और आज भी धर्म के रक्षक के रूप में उपस्थित माने जाते हैं। आइए, वर्ष 2025 में आने वाली परशुराम जयंती के इस पावन अवसर पर, हम सभी भगवान परशुराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। उनके दिखाए मार्ग पर चलकर, हम अपने समाज और राष्ट्र में धर्म, शांति और न्याय की स्थापना में अपना योगदान दें। भगवान परशुराम हम सभी भक्तों को ज्ञान, बल, बुद्धि, विवेक और धर्मनिष्ठा प्रदान करें, जिससे हमारा जीवन सार्थक और पुण्यमय बने। जय परशुराम! हर हर महादेव!

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