तुलसी माता की पूजा विधि
**प्रस्तावना**
सनातन धर्म में तुलसी का पौधा मात्र एक पौधा नहीं, अपितु साक्षात् देवी स्वरूप है। इसे ‘तुलसी माता’ कहकर पुकारा जाता है और प्रत्येक हिंदू घर के आँगन में, देवस्थानों पर इसका वास होता है। तुलसी को भगवान विष्णु की प्रियतमा माना जाता है, इसलिए इनकी आराधना भगवान श्रीहरि को प्रसन्न करने का एक अत्यंत सरल और प्रभावी माध्यम है। जिस प्रकार जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को भोग तुलसी दल के बिना अधूरा माना जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक पूजा में तुलसी दल का उपयोग अनिवार्य है। यह न केवल धार्मिक महत्व रखती है, अपितु वैज्ञानिक रूप से भी इसके कई औषधीय गुण प्रमाणित हैं। यह लेख आपको तुलसी माता की पूजा की विस्तृत विधि से अवगत कराएगा, जिससे आप श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी आराधना कर सकें और उनके दिव्य आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। तुलसी की महिमा अपरंपार है, जो भक्तों को मोक्ष, सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करती है। आइए, इस पवित्र पौधे की दिव्यता को समझें और उसकी पूजा विधि में लीन हों।
**पावन कथा**
तुलसी माता की उत्पत्ति और उनके भगवान विष्णु के साथ संबंध की एक अत्यंत पावन और मार्मिक कथा है। प्राचीन काल में जालंधर नामक एक अत्यंत पराक्रमी और शक्तिशाली असुर हुआ करता था। वह इतना बलशाली था कि तीनों लोकों में उसे कोई पराजित नहीं कर सकता था। इसका रहस्य उसकी पतिव्रता पत्नी वृंदा के सतीत्व में छिपा था। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थीं और अपने पति के प्रति उनकी निष्ठा इतनी अटूट थी कि कोई भी देवता या ऋषि जालंधर को परास्त नहीं कर पा रहा था। जालंधर के अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवतागण और ऋषि-मुनि भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनसे जालंधर के वध का उपाय पूछा। भगवान विष्णु ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार की।
भगवान विष्णु ने छल से जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा के पावन आश्रम में पहुँच गए। वृंदा अपने पति के आगमन से अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्हें सामान्य पति भाव से स्पर्श किया। जैसे ही वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग हुआ, जालंधर की शक्ति क्षीण हो गई और उसी क्षण युद्ध भूमि में भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया। जब वृंदा को इस छल का आभास हुआ, तो उनका हृदय टूट गया। उन्होंने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का शाप दिया और स्वयं सती हो गईं।
वृंदा के सती होने के बाद, जिस स्थान पर उनकी चिता थी, वहाँ एक पौधा उग आया, जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया। भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि वह सदा उनके साथ निवास करेंगी और उनके शाप को स्वीकार करते हुए, वे स्वयं शालिग्राम शिला के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने यह भी कहा कि मेरे किसी भी भोग या पूजा में तुलसी दल का प्रयोग अनिवार्य होगा, अन्यथा वह पूजा अधूरी मानी जाएगी। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा, “हे वृंदा, तुम मेरे सिर पर स्थान पाओगी और युगों-युगों तक मेरे साथ ही रहोगी। तुम्हारे बिना मेरी कोई पूजा पूर्ण नहीं होगी।” इसी कारण भगवान विष्णु को शालिग्राम के रूप में और तुलसी को उनके रूप में पूजा जाता है, और कार्तिक मास में तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जिसमें तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न कराया जाता है। यह कथा हमें पतिव्रता धर्म की शक्ति, छल के दुष्परिणाम और भगवान की असीम कृपा का बोध कराती है। तुलसी माता का प्रत्येक पत्ता भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और यह भक्तों के समस्त पापों का नाश करने वाला है।
**दोहा**
तुलसी माता धन्य हो, विष्णुप्रिया सुखधाम।
भवबंधन हरती सदा, जपो श्री हरि का नाम।।
**चौपाई**
तुलसी महिमा वेद बखानी, तुम हो जग की महारानी।
हरि चरणन में वास तुम्हारा, मंगल करती जग उजियारा।।
घर-घर में तुम पूजी जाती, सकल मनोरथ पूर्ण कराती।
दर्शन से सब दुख मिट जाते, प्रभु के निकट भक्त को पाते।।
**पाठ करने की विधि**
तुलसी माता की पूजा विधि अत्यंत सरल और भक्तिपूर्ण होती है, जिसे कोई भी श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अनुसार कर सकता है। सर्वप्रथम ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें। तुलसी के पौधे के आसपास के स्थान को स्वच्छ करें और जल से शुद्धिकरण करें। इसके बाद, तुलसी के पौधे के सामने एक शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। यह दीपक संध्याकाल में भी जलाना शुभ माना जाता है। धूप और अगरबत्ती जलाकर तुलसी माता को अर्पित करें। एक लोटा शुद्ध जल तुलसी के पौधे पर धीरे-धीरे अर्पित करें। ध्यान रहे कि जल अधिक न हो जिससे पौधा गलने लगे। तुलसी माता को कुमकुम, हल्दी और सिंदूर का तिलक लगाएं, यह श्रृंगार का प्रतीक है। लाल या पीले रंग के सुंदर पुष्प और एक छोटी फूलों की माला तुलसी माता को अर्पित करें। तुलसी के पौधे पर एक लाल या पीली चुनरी श्रद्धापूर्वक चढ़ाएं। यदि संभव हो तो मिश्री या अन्य कोई मीठा नैवेद्य अर्पित करें। भगवान विष्णु के भोग के लिए तुलसी दल अवश्य रखें। अब “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धनी, आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोस्तुते” मंत्र का जप करें। तुलसी गायत्री मंत्र “ॐ श्री तुलस्यै विद्महे, विष्णु प्रियायै धीमहि, तन्नो वृंदा प्रचोदयात्” का जप भी कर सकते हैं। तुलसी के पौधे की कम से कम तीन या सात बार परिक्रमा करें, परिक्रमा करते समय अपने मन में मनोकामनाएँ दोहराएँ। अंत में तुलसी माता की आरती करें और अपनी मनोकामनाओं व कल्याण के लिए तुलसी माता से प्रार्थना करें और क्षमा याचना करें यदि पूजा में कोई त्रुटि हुई हो। इस प्रकार नियमित पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
**पाठ के लाभ**
तुलसी माता की नियमित पूजा और सेवा से अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं, जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर भक्त के जीवन को उन्नत करते हैं। तुलसी माता की पूजा से मनुष्य के समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों का शमन होता है। इनके दर्शन मात्र से ही कई पापों से मुक्ति मिल जाती है। भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होने के कारण, तुलसी की सेवा करने वाले भक्तों को अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे विष्णु लोक को प्राप्त करते हैं। घर में तुलसी का वास और उसकी नियमित पूजा से आर्थिक संपन्नता आती है। घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है और दरिद्रता दूर होती है। तुलसी के औषधीय गुणों के कारण, इसकी पूजा और सेवन से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है। यह वातावरण को शुद्ध करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। घर में कलह और अशांति दूर होती है। परिवार के सदस्यों में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। जिन कन्याओं के विवाह में विलंब हो रहा हो, उन्हें तुलसी पूजा से शीघ्र अच्छे वर की प्राप्ति होती है। तुलसी का पौधा घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है, जिससे घर का वातावरण पवित्र और आनंदमय बना रहता है। तुलसी को घर में लगाना और पूजना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह सभी प्रकार के अमंगल को दूर कर मंगल का आगमन करती है। जन्माष्टमी जैसे पावन पर्व पर लड्डू गोपाल को भोग में तुलसी दल अर्पित करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव को और भी पावन बना देता है। विशेषकर कार्तिक मास में तुलसी पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और तुलसी से विवाह करते हैं। इस दौरान की गई पूजा अक्षय पुण्य प्रदान करती है।
**नियम और सावधानियाँ**
तुलसी माता की पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और किसी प्रकार के दोष से बचा जा सके। तुलसी दल तोड़ने के संबंध में कुछ विशेष नियम हैं। एकादशी, रविवार, मंगलवार और गुरुवार को तुलसी दल नहीं तोड़ना चाहिए। सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भी तुलसी दल तोड़ना वर्जित है। संध्याकाल या रात के समय तुलसी दल कभी न तोड़ें। तुलसी दल तोड़ने से पहले तुलसी माता से अनुमति माँगें और केवल उतने ही दल तोड़ें जितनी आवश्यकता हो, अनावश्यक रूप से तुलसी के पत्तों को कभी न तोड़ें। तुलसी के पौधे के आसपास और गमले में हमेशा स्वच्छता बनाए रखें, गंदगी होने से तुलसी माता अप्रसन्न होती हैं। तुलसी को आवश्यकतानुसार ही जल दें, अधिक जल देने से पौधा सड़ सकता है, और कम जल देने से सूख सकता है। मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को तुलसी के पौधे को छूने या जल चढ़ाने से बचना चाहिए, यद्यपि मानसिक रूप से पूजा और प्रार्थना की जा सकती है। कभी भी तुलसी के पौधे को टूटे हुए या खंडित गमले में न लगाएं, ऐसा करना अशुभ माना जाता है। तुलसी का पौधा हमेशा घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूर्व दिशा में लगाना शुभ होता है, इसे जूठे बर्तन या कचरे के पास न रखें। यदि तुलसी का पौधा सूख जाए, तो उसे सम्मानपूर्वक किसी पवित्र नदी या तालाब में प्रवाहित कर देना चाहिए और उसके स्थान पर नया पौधा लगाना चाहिए, सूखे पौधे को घर में रखना अशुभ होता है। तुलसी को छूते समय शुद्धता का ध्यान रखें, अशुद्ध हाथों से इसे स्पर्श न करें। इन नियमों का पालन करने से तुलसी माता की कृपा बनी रहती है और घर में सदैव सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
**निष्कर्ष**
तुलसी माता की पूजा विधि मात्र एक कर्मकांड नहीं, अपितु भक्ति और श्रद्धा का एक पावन मार्ग है जो हमें सीधे भगवान विष्णु से जोड़ता है। यह हमारे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति लाती है। वृंदा के त्याग और भगवान विष्णु के वरदान की यह अनुपम कथा हमें विश्वास दिलाती है कि सच्ची निष्ठा और प्रेम से की गई भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। जिस प्रकार कृष्ण जन्मोत्सव पर लड्डू गोपाल को प्रिय भोग तुलसी दल के बिना अधूरा है, उसी प्रकार हमारा घर-आँगन तुलसी के बिना अधूरा है। तुलसी का पौधा घर में केवल हरियाली ही नहीं लाता, बल्कि वह साक्षात लक्ष्मी और विष्णु का वास लेकर आता है। आइए, हम सभी श्रद्धापूर्वक तुलसी माता की सेवा और पूजा करें, उनके दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करें और अपने जीवन को धन्य बनाएँ। यह सरल सी पूजा हमें न केवल रोगों और कष्टों से मुक्ति दिलाती है, बल्कि हमें एक पवित्र और शांत जीवन की ओर भी अग्रसर करती है। तुलसी माता की जय हो, श्री हरि विष्णु की जय हो।

