तुलसी दीप जलाने की विधि
प्रस्तावना
सनातन धर्म में तुलसी को केवल एक पौधा नहीं, अपितु साक्षात देवी स्वरूप और भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय रूप माना जाता है। इसे ‘हरिप्रिया’ या ‘विष्णुप्रिया’ के नाम से भी जाना जाता है। जिस घर में तुलसी का वास होता है, वहाँ नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती और सकारात्मकता का संचार निरंतर बना रहता है। तुलसी के समक्ष संध्या काल में दीप प्रज्वलित करना अत्यंत पुण्यकारी और फलदायी माना गया है। यह मात्र एक लौ नहीं, अपितु अंधकार को मिटाने वाली, ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली और समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य ज्योति है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि, शांति तथा आरोग्य प्रदान करने का एक अचूक माध्यम है। तुलसी दीप जलाने से न केवल वास्तु दोष दूर होते हैं, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में आने वाले समस्त कष्टों, बाधाओं और ग्रह दोषों को भी शांत करता है। यह श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है, जो भक्त को परमात्मा से जोड़ता है और उसके हृदय में भक्ति रस का संचार करता है। आज हम तुलसी दीप प्रज्वलन की पावन विधि, उससे जुड़ी कथा, लाभ और महत्वपूर्ण नियमों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, ताकि हर कोई इस सरल किंतु शक्तिशाली साधना से अपने जीवन को आलोकित कर सके।
पावन कथा
प्राचीन काल की बात है, एक धर्मपरायण नगर में सुखदेव नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी वेदवती के साथ निवास करते थे। वेदों और शास्त्रों में उनकी गहरी आस्था थी, किंतु उनके जीवन में एक के बाद एक परेशानियाँ आती जा रही थीं। उनका व्यापार मंदा पड़ गया था, घर में बीमारी ने डेरा डाल लिया था और संतान प्राप्ति की अभिलाषा भी अधूरी थी। सुखदेव और वेदवती ने अनेकों यज्ञ करवाए, अनुष्ठान किए, परंतु किसी भी उपाय से उन्हें शांति नहीं मिल रही थी। वे अत्यंत चिंतित और निराश रहने लगे थे। एक दिन, जब वे अपनी निराशा में डूबे थे, तो उनके नगर में एक सिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। महात्मा अपनी अलौकिक शक्तियों और ज्ञान के लिए विख्यात थे। सुखदेव और वेदवती ने महात्मा के समक्ष अपनी समस्त व्यथा सुनाई। महात्मा ने धैर्यपूर्वक उनकी बात सुनी और फिर एक मधुर मुस्कान के साथ बोले, “पुत्र, पुत्री! तुम दोनों धर्मपरायण हो, इसमें कोई संदेह नहीं, परंतु तुम्हारे जीवन में कुछ ग्रह दोष और नकारात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव है, जिसके कारण तुम्हें इन कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। इसका एक अत्यंत सरल और प्रभावी उपाय है – तुम अपने घर के आँगन में स्थापित तुलसी माता के समक्ष प्रतिदिन संध्याकाल में शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करो।”
महात्मा ने आगे बताया, “तुलसी साक्षात देवी लक्ष्मी का रूप हैं और भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। जब तुम उनके समक्ष प्रेम और श्रद्धा से दीप जलाओगे, तो उस ज्योति का प्रकाश तुम्हारे घर के हर कोने में फैलेगा और समस्त नकारात्मकता को दूर करेगा। यह दीपक तुम्हारे मन के अंधकार को भी दूर करेगा और तुम्हें सही दिशा दिखाएगा। इस दीप प्रज्वलन के साथ, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करना न भूलना।” सुखदेव और वेदवती ने महात्मा के वचनों को ब्रह्म वाक्य मानकर तत्काल उसका पालन करना आरंभ कर दिया। अगले ही दिन से उन्होंने नियमपूर्वक तुलसी माता को जल अर्पित किया और संध्याकाल में एक सुंदर मिट्टी के दीपक में शुद्ध गाय का घी डालकर, उसमें रुई की बत्ती लगाकर प्रज्वलित करना शुरू कर दिया। वे प्रतिदिन दीप जलाने से पहले स्नान करते, स्वच्छ वस्त्र धारण करते और पूर्ण श्रद्धा के साथ तुलसी के समक्ष बैठ कर ध्यान लगाते। धीरे-धीरे, उन्होंने महसूस किया कि उनके घर का वातावरण बदलने लगा था। पहले जहाँ उदासी और चिंता का माहौल रहता था, वहाँ अब एक अजीब सी शांति और सकारात्मकता महसूस होने लगी। परिवार के सदस्यों के आपसी संबंध सुधरने लगे। उनके व्यापार में फिर से गति आने लगी और धन का आगमन होने लगा। सबसे बड़ा चमत्कार यह हुआ कि कुछ ही समय बाद, वेदवती ने गर्भधारण किया और उन्हें एक स्वस्थ, तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसने उनके जीवन को पूर्णता प्रदान की। सुखदेव और वेदवती ने अपने जीवन में आई खुशियों का श्रेय महात्मा के बताए हुए तुलसी दीप प्रज्वलन को दिया। उन्होंने जीवन भर इस पावन परंपरा का पालन किया और अपने बच्चों को भी यही शिक्षा दी। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची श्रद्धा और साधारण से उपाय भी जीवन में बड़े से बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। तुलसी दीप की यह छोटी सी लौ, वास्तव में बड़े-बड़े कष्टों का निवारण कर जीवन को प्रकाशमय कर देती है।
दोहा
तुलसी मैया सब सुख देनी, हरें सकल भव पीड़ा।
दीप जलावे जो नित प्रति, पावे हरि की क्रीड़ा॥
चौपाई
जय जय तुलसी माता भवानी, तुम हो विष्णुप्रिया कल्याणी।
तुमरे दल से हरि मन मोहे, पूजे जो तुमको सो न रोहे॥
जो नित साँझ दीप तुम आगे धरे, तिनके कष्ट सकल दुःख हरे।
आरोग्य धन धाम सुख पावे, अंत विष्णुलोक में जावे॥
पाठ करने की विधि
तुलसी दीप प्रज्वलित करने की विधि अत्यंत सरल और पवित्र है। इसे नियमपूर्वक करने से ही पूर्ण लाभ की प्राप्ति होती है:
१. संध्याकाल का चुनाव करें: तुलसी दीप प्रज्वलित करने का सर्वोत्तम समय संध्याकाल होता है, जब दिन ढल रहा हो और रात आने वाली हो। ब्रह्म मुहूर्त में भी दीप जलाना शुभ माना जाता है, पर संध्याकाल की अपनी महिमा है।
२. शुद्धता का ध्यान: दीप जलाने से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन और शरीर दोनों से पवित्र होना आवश्यक है।
३. दीपक का चयन: मिट्टी का दीपक सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि यह पंच तत्वों का प्रतीक है। यदि मिट्टी का दीपक उपलब्ध न हो, तो आटे या धातु का दीपक भी उपयोग कर सकते हैं। दीपक को स्वच्छ धोकर रखें।
४. घी और बत्ती: दीपक में शुद्ध गाय का घी भरें। देसी घी की उपलब्धता न होने पर तिल का तेल भी उपयोग कर सकते हैं, किंतु गाय का घी सर्वोपरि है। बत्ती के लिए नई, स्वच्छ रुई की बत्ती का प्रयोग करें। बत्ती पूर्व दिशा की ओर या उत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए होनी चाहिए।
५. स्थान और दिशा: तुलसी के पौधे के पास एक साफ-सुथरा स्थान चुनें। दीपक को तुलसी के गमले के ठीक सामने या थोड़े नीचे रखकर प्रज्वलित करें। दीपक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
६. संकल्प और मंत्र: दीप प्रज्वलित करने से पूर्व मन में अपनी मनोकामना का संकल्प लें। दीपक जलाने के बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘ॐ तुलसी देव्यै नमः’ मंत्र का ११, २१, ५१ या १०८ बार श्रद्धापूर्वक जप करें।
७. प्रार्थना और आरती: मंत्र जप के पश्चात तुलसी माता से अपने कष्टों को हरने और सुख-समृद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करें। संभव हो तो तुलसी आरती भी कर सकते हैं।
८. परिक्रमा: दीपक जलाने के बाद तुलसी माता की तीन या सात बार परिक्रमा करें।
९. ध्यान: कुछ पल के लिए शांत मन से दीपक की लौ पर ध्यान केंद्रित करें और अपनी श्रद्धा को मजबूत करें।
पाठ के लाभ
तुलसी के समक्ष दीप प्रज्वलन के अनेक आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक लाभ हैं, जिनका वर्णन करना संभव नहीं:
१. धन-धान्य की वृद्धि: माना जाता है कि तुलसी माता के समक्ष दीप जलाने से माँ लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती। दरिद्रता दूर होती है।
२. नकारात्मकता का नाश: दीपक की पवित्र अग्नि घर से समस्त नकारात्मक ऊर्जाओं, बुरी शक्तियों और बुरी नज़र के प्रभाव को दूर करती है।
३. आरोग्य की प्राप्ति: तुलसी का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व दोनों है। इसके समक्ष दीप जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और स्वास्थ्य लाभ मिलता है। दीर्घकालिक बीमारियों से मुक्ति मिलती है।
४. ग्रह दोष शांति: ज्योतिष के अनुसार, तुलसी दीप प्रज्वलन से नवग्रहों की शांति होती है, विशेषकर शनि दोष और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
५. सुख-शांति: घर-परिवार में सुख-शांति का वातावरण बना रहता है, सदस्यों के बीच प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। क्लेश और मनमुटाव दूर होते हैं।
६. मनोकामना पूर्ति: सच्ची श्रद्धा और विश्वास से जलाया गया तुलसी दीप भक्तों की समस्त जायज मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सहायक होता है।
७. पुण्य की प्राप्ति: यह कर्म मोक्षदायी माना गया है और व्यक्ति को अतुलनीय पुण्य की प्राप्ति होती है, जो उसे जीवन और मरण के चक्र से मुक्ति दिला सकता है।
८. वातावरण शुद्धिकरण: घी की लौ से निकलने वाला धुआँ और सुगंध वातावरण को शुद्ध करता है, जिससे सकारात्मकता और शांति का अनुभव होता है।
नियम और सावधानियाँ
तुलसी दीप प्रज्वलित करते समय कुछ महत्वपूर्ण नियमों और सावधानियों का पालन करना आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
१. स्वच्छता: तुलसी का स्थान हमेशा स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए। आसपास किसी प्रकार की गंदगी या कूड़ा-कचरा न हो। तुलसी के गमले को भी साफ रखें।
२. दीपक की पवित्रता: जिस दीपक का प्रयोग करें, वह स्वच्छ हो और उसका प्रयोग किसी अन्य सामान्य कार्य के लिए न किया गया हो। संभव हो तो प्रत्येक बार नया मिट्टी का दीपक प्रयोग करें या धातु के दीपक को अच्छी तरह साफ कर लें।
३. घी का प्रयोग: सदैव शुद्ध गाय के घी का ही प्रयोग करें। तेल का प्रयोग आपात स्थिति में ही करें। घी का दीपक अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
४. बत्ती का ध्यान: बत्ती रुई की ही होनी चाहिए और वह भीगने के बाद आसानी से जलनी चाहिए। बत्ती का मुख हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में रखें।
५. स्पर्श निषेध: रविवार और एकादशी के दिन तुलसी के पत्तों को तोड़ना या उन्हें स्पर्श करना वर्जित माना गया है। इन दिनों में दीप प्रज्वलित कर सकते हैं, परंतु पत्तों को न छूएँ।
६. खंडित दीपक: खंडित या टूटे हुए दीपक का प्रयोग कदापि न करें। यह अशुभ माना जाता है।
७. क्रोध और नकारात्मकता से बचें: दीप जलाते समय मन को शांत और सकारात्मक रखें। क्रोध, ईर्ष्या या किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार मन में न लाएँ।
८. स्नान के बाद: सदैव स्नान करके और स्वच्छ वस्त्र धारण करके ही दीप प्रज्वलित करें। यह आवश्यक है कि शारीरिक और मानसिक दोनों पवित्रता बनी रहे।
९. नियमितता: इस साधना में नियमितता बहुत महत्वपूर्ण है। यदि संभव हो, तो प्रतिदिन संध्याकाल में दीप प्रज्वलित करें। विशेषकर कार्तिक मास में प्रतिदिन दीप जलाना अत्यंत फलदायी होता है।
१०. मांस-मदिरा का त्याग: जिस दिन दीप प्रज्वलित करें, उस दिन मांस-मदिरा का सेवन न करें। सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
११. दीप को बुझने न दें: जब तक दीपक में घी है, उसे बुझने नहीं देना चाहिए। यदि वह स्वयं बुझ जाए तो कोई बात नहीं, परंतु जानबूझकर उसे बुझाना उचित नहीं।
इन नियमों का पालन करते हुए तुलसी दीप प्रज्वलित करने से व्यक्ति निश्चित रूप से भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की कृपा का पात्र बनता है।
निष्कर्ष
तुलसी दीप प्रज्वलन मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु यह जीवन को सकारात्मकता, शांति और समृद्धि से भरने का एक दिव्य मार्ग है। यह एक ऐसी सरल साधना है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपनाकर अपने जीवन के समस्त अंधकार को दूर कर सकता है। जिस प्रकार एक छोटी सी लौ बड़े से बड़े अंधकार को मिटा देती है, उसी प्रकार तुलसी के समक्ष जलाया गया यह पवित्र दीपक हमारे जीवन के कष्टों, बाधाओं और दुर्भाग्य को जलाकर राख कर देता है। यह हमें प्रकृति से जोड़ता है, ईश्वर के प्रति हमारी आस्था को सुदृढ़ करता है और हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। तो आइए, आज से ही इस पावन परंपरा को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएँ। नित्य संध्याकाल में तुलसी मैया के समक्ष एक घी का दीपक प्रज्वलित करें और उस पवित्र ज्योति के प्रकाश में अपने जीवन को आलोकित करें। यह दीप केवल एक प्रकाशपुंज नहीं, यह आशा का संचार है, आनंद का स्रोत है और प्रभु कृपा का साक्षात प्रतीक है। इसे अपनी भक्ति से प्रज्वलित करें और देखें कि कैसे आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि स्वयं चलकर आती है।
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सनातन परंपरा, धार्मिक विधि, पूजा-पाठ
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तुलसी, दीपदान, धार्मिक विधि, पूजा-पाठ, सनातन धर्म, घी का दीपक, लक्ष्मी प्राप्ति, कष्ट निवारण

