संकष्टी चतुर्थी: विघ्नहर्ता गणेश की कृपा का पावन पर्व
सनातन धर्म में अनेक व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें से ‘संकष्टी चतुर्थी’ का विशेष महत्व है। ‘संकष्टी’ शब्द का अर्थ है संकटों को हरने वाली। यह पावन दिन प्रथम पूज्य भगवान गणेश को समर्पित है, जो बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के दाता माने जाते हैं। इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने और भगवान गणेश की पूजा करने से भक्तों के जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। आइए, इस पवित्र व्रत की महिमा, पूजा विधि और कथा को विस्तार से समझते हैं।
कब और क्यों मनाई जाती है संकष्टी चतुर्थी?
प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। यह दिन भगवान गणेश को समर्पित होने के कारण अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तगण इस दिन उपवास रखते हैं और चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और भक्तों के जीवन से सभी विघ्नों को हर लेते हैं।
संकष्टी चतुर्थी व्रत की महिमा और लाभ
संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने से अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं:
- यह व्रत जीवन में आने वाली बाधाओं और संकटों को दूर करता है।
- यह शारीरिक और मानसिक शांति प्रदान करता है।
- संतान प्राप्ति और संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- व्यक्ति को ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- घर में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा: श्यामंतक मणि का रहस्य
संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं, जिनमें से एक कथा भगवान कृष्ण और श्यामंतक मणि से संबंधित है। एक बार भगवान कृष्ण पर श्यामंतक मणि चुराने का आरोप लगा। इस आरोप के कारण कृष्ण बहुत व्यथित हुए। तब नारद मुनि ने उन्हें इस संकट से मुक्ति पाने के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने का सुझाव दिया।
भगवान कृष्ण ने नारद मुनि के बताए अनुसार पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उन्हें जल्द ही श्यामंतक मणि मिल गई और वे निर्दोष साबित हुए। इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत कितनी भी बड़ी विपत्ति या झूठे आरोप से मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकता है। यह व्रत सच्चे मन से करने पर भगवान गणेश अपने भक्तों के सभी दुखों को दूर करते हैं।
संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और पूजन प्रक्रिया
संकष्टी चतुर्थी का व्रत निम्नलिखित विधि से किया जाता है:
- सुबह का स्नान और संकल्प: व्रत के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- गणेश जी की स्थापना: पूजा स्थल पर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- पूजा सामग्री: गणेश जी को दूर्वा, शमी पत्र, लाल फूल, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप, मोदक और लड्डू अर्पित करें।
- मंत्र जाप: ‘ॐ गं गणपतये नमः’ या अन्य गणेश मंत्रों का जाप करें। संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- फलाहार: दिन भर फलाहार पर रहें या निराहार रहें। संध्याकाल में विशेष पूजा की तैयारी करें।
- चंद्र दर्शन और अर्घ्य: रात में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को छलनी या सीधे देखकर अर्घ्य दें। अर्घ्य देने के लिए जल में दूध, फूल और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्पित करें।
- व्रत पारण: चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद गणेश जी की आरती करें और व्रत का पारण करें। पारण में मुख्य रूप से मोदक या सात्विक भोजन ग्रहण करें।
निष्कर्ष: गणपति की कृपा से पाएं जीवन में सुख-शांति
संकष्टी चतुर्थी का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान गणेश के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएं, सच्ची भक्ति और लगन से हम उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। तो आइए, इस पावन दिन पर विघ्नहर्ता गणेश का स्मरण करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुख-समृद्धि से परिपूर्ण करें।

