श्री गणेश आरती: जय गणेश जय गणेश देवा – सुख, समृद्धि और विघ्न हरण का पावन मंत्र

श्री गणेश आरती: जय गणेश जय गणेश देवा – सुख, समृद्धि और विघ्न हरण का पावन मंत्र

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**श्री गणेश आरती: जय गणेश जय गणेश देवा – सुख, समृद्धि और विघ्न हरण का पावन मंत्र**

हमारे हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है। वे विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता और मंगलकर्ता के रूप में पूजे जाते हैं। उनकी भक्ति और आराधना के अनेक रूप हैं, जिनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी माध्यम है उनकी आरती। ‘जय गणेश जय गणेश देवा’ यह वह आरती है जिसे लगभग हर घर में गाया जाता है और यह भगवान गणेश के प्रति हमारी श्रद्धा का प्रतीक है।

क्या आपने कभी सोचा है कि इस आरती के शब्द कितने गहरे अर्थ समेटे हुए हैं और इसके नियमित पाठ से हमें क्या लाभ मिल सकते हैं? आइए, आज हम इसी पावन आरती की महिमा और इसके अर्थ को समझते हैं।

**विघ्नहर्ता भगवान गणेश का प्राकट्य और उनकी महिमा**

भगवान गणेश का प्राकट्य स्वयं माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से किया था, और उन्हें अपने कक्ष का द्वारपाल नियुक्त किया था। जब भगवान शिव अंदर प्रवेश करना चाहते थे, तो गणेश ने उन्हें रोक दिया। क्रोधित होकर शिवजी ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती के विलाप से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तब देवताओं ने भगवान शिव से गणेश को पुनः जीवन देने की प्रार्थना की। परिणामस्वरूप, एक हाथी के बच्चे का सिर उनके धड़ पर स्थापित किया गया और इस प्रकार गजानन गणेश का जन्म हुआ।

भगवान शिव ने उन्हें यह वरदान दिया कि पृथ्वी पर किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले उनकी पूजा की जाएगी, और जो ऐसा नहीं करेगा उसके कार्य में विघ्न आएंगे। तभी से गणेश जी ‘विघ्नहर्ता’ और ‘प्रथम पूज्य’ कहलाए।

**’जय गणेश जय गणेश देवा’ आरती का अर्थ और महत्व**

यह आरती भगवान गणेश के गुणों, उनके परिवार और उनके स्वरूप का गुणगान करती है। आइए इसके कुछ मुख्य अंशों और उनके अर्थों पर एक दृष्टि डालें:

* **’जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती पिता महादेवा’**: यह पंक्ति भगवान गणेश के दिव्य माता-पिता – माता पार्वती और पिता महादेव – का स्मरण कराती है, जो उनकी शक्ति और पवित्रता का मूल स्रोत हैं।
* **’एक दंत दयावंत चार भुजा धारी, माथे पर सिंदूर सोहे मूसे की सवारी’**: यह गणेश जी के स्वरूप का वर्णन है – उनका एक दांत (जो ज्ञान और त्याग का प्रतीक है), उनकी चार भुजाएं (जो चारों दिशाओं में उनकी शक्ति को दर्शाती हैं), उनके माथे पर सुशोभित सिंदूर (जो शुभता और ऊर्जा का प्रतीक है) और उनका वाहन मूषक (जो सांसारिक इच्छाओं पर नियंत्रण का प्रतीक है)।
* **’पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा, लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा’**: यह भगवान गणेश को प्रिय भोग और उनकी सेवा में लीन भक्तों का उल्लेख है। गणेश जी को मोदक और लड्डू अत्यंत प्रिय हैं, और उन्हें अर्पित करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
* **’अंधन को आंख देत कोढ़िन को काया, बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया’**: ये पंक्तियां भगवान गणेश की कृपा और उनके चमत्कारिक प्रभावों का वर्णन करती हैं। वे नेत्रहीनों को दृष्टि, कुष्ठ रोगियों को स्वास्थ्य, निःसंतान को संतान और गरीबों को धन प्रदान करते हैं। यह उनकी असीम दयालुता और भक्तों के संकट हरने की शक्ति को दर्शाता है।

**आरती पाठ के लाभ**

‘जय गणेश जय गणेश देवा’ आरती का नियमित पाठ करने से कई आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. **विघ्न बाधाओं का नाश**: भगवान गणेश स्वयं विघ्नहर्ता हैं। उनकी आरती करने से जीवन के हर क्षेत्र में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
2. **सुख और समृद्धि की प्राप्ति**: गणेश जी की कृपा से घर में सुख-शांति और धन-धान्य का आगमन होता है।
3. **ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि**: वे बुद्धि के देवता हैं। उनकी आराधना से एकाग्रता बढ़ती है और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।
4. **नकारात्मक ऊर्जा का शमन**: आरती की ध्वनि और उसके सकारात्मक कंपन से घर का वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
5. **मनोकामना पूर्ण**: सच्ची श्रद्धा से की गई गणेश आरती भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है।

**निष्कर्ष**

‘जय गणेश जय गणेश देवा’ सिर्फ एक आरती नहीं, बल्कि यह भगवान गणेश के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। यह हमें यह सिखाती है कि जीवन में किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए हमें भगवान पर भरोसा रखना चाहिए और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अपनी दिनचर्या में इस पावन आरती को शामिल करें और भगवान गणेश की असीम कृपा और आशीर्वाद का अनुभव करें। ॐ गं गणपतये नमः!

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