श्री कृष्ण जन्माष्टमी: पावन कथा और उसका आध्यात्मिक महत्व
हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव ‘जन्माष्टमी’ के रूप में बड़े हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। भगवान श्री कृष्ण का जन्म स्वयं भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में हुआ था, जिनका जीवन हमें प्रेम, धर्म, कर्म और भक्ति का मार्ग दिखाता है। आइए, इस पावन पर्व की अद्भुत कथा और उसके गहन आध्यात्मिक महत्व को गहराई से समझते हैं।
जन्माष्टमी की पावन कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, आज से हजारों वर्ष पूर्व मथुरा नगरी पर क्रूर और अहंकारी राजा कंस का शासन था। कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था, लेकिन एक भविष्यवाणी ने उसके मन में भय भर दिया। आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस के वध का कारण बनेगी। इस भय से कंस ने देवकी और उसके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनकी एक-एक संतान को जन्म लेते ही निर्दयतापूर्वक मार डाला।
जब देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समय आया, तो कारागार के द्वारपालों को नींद आ गई, कारागार के ताले स्वयं खुल गए, और हथकड़ियाँ अपने आप टूट गईं। घनघोर वर्षा और बादलों की गरज के बीच, भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र में, मध्यरात्रि को भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ। जन्मोत्सव के समय संपूर्ण कारागार एक दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा और स्वयं भगवान विष्णु ने प्रकट होकर वसुदेव को अपने बाल अवतार का परिचय दिया।
भगवान की आज्ञा मानकर, वसुदेव ने नवजात शिशु कृष्ण को एक टोकरी में रखकर यमुना नदी पार की। यमुना अपने उफान पर थी, लेकिन जैसे ही शिशु कृष्ण के चरण यमुना जल को स्पर्श करते, नदी का जल स्तर कम हो जाता। शेषनाग ने अपने फन से शिशु कृष्ण को वर्षा से बचाया। वसुदेव गोकुल पहुँचे, जहाँ उन्होंने शिशु कृष्ण को नंद बाबा और यशोदा मैया के घर छोड़ दिया और उनकी नवजात पुत्री (योगमाया) को लेकर मथुरा लौट आए।
कंस को जब आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली, तो वह क्रोधित होकर कारागार आया और उस शिशु कन्या को पटक कर मारने का प्रयास किया। लेकिन वह कन्या योगमाया के रूप में आकाश में उड़ गई और कंस को चेतावनी दी कि उसका वध करने वाला गोकुल में सुरक्षित है। इस प्रकार, भगवान श्री कृष्ण का जन्म धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए हुआ।
जन्माष्टमी का आध्यात्मिक महत्व
श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व केवल भगवान के जन्मोत्सव का आनंद मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई गहरे आध्यात्मिक संदेशों को भी समाहित किए हुए है:
- अधर्म पर धर्म की विजय: भगवान कृष्ण का जन्म कंस जैसे अत्याचारी शासक का अंत करने और धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए हुआ था। यह हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म अंततः विजयी होते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हों।
- सकारात्मकता का संदेश: कारागार के अंधकार में कृष्ण का जन्म यह दर्शाता है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी आशा और सकारात्मकता की किरण फूट सकती है। यह हमें जीवन की चुनौतियों का सामना धैर्य और विश्वास के साथ करने की प्रेरणा देता है।
- ईश्वरीय शक्ति में विश्वास: भगवान का जन्म और उनकी लीलाएँ हमें यह विश्वास दिलाती हैं कि एक परमसत्ता हमेशा हमारे साथ है और वह अधर्म के नाश के लिए अवतरित होती है।
- भक्ति और प्रेम का मार्ग: भगवान कृष्ण ने अपने जीवन में भक्ति, प्रेम और निस्वार्थ कर्म के महत्व पर जोर दिया। उनका जीवन बताता है कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति प्रेम और दूसरों की सेवा में है।
- कर्म योग का सिद्धांत: ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का उपदेश देकर कृष्ण ने हमें फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करने की सीख दी। जन्माष्टमी हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा देती है।
- मानवता की सेवा: भगवान कृष्ण ने हमेशा दीन-दुखियों और सज्जनों की रक्षा की। उनका जन्मोत्सव हमें समाज सेवा और परोपकार के लिए प्रेरित करता है।
निष्कर्ष
श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न हों, यदि हम धर्म और सत्य के मार्ग पर चलते हैं, तो अंततः विजय हमारी ही होती है। यह दिन भगवान श्री कृष्ण के प्रति हमारी श्रद्धा को और गहरा करता है और हमें उनके दिव्य गुणों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। इस जन्माष्टमी पर, आइए हम सब भगवान कृष्ण के दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लें और अपने जीवन को प्रेम, भक्ति और धर्म से परिपूर्ण करें। हरे कृष्णा!

