श्री कृष्ण और सुदामा: सच्ची मित्रता और निस्वार्थ भक्ति का अनुपम उदाहरण
सनातन धर्म में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो हमें जीवन के गहन मूल्यों और ईश्वर की महिमा से परिचित कराते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रेरणादायक कथा है भगवान श्री कृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा की। यह कथा न केवल सच्ची मित्रता का मर्म समझाती है, बल्कि निस्वार्थ भक्ति और प्रभु की असीम कृपा का भी अद्भुत प्रमाण है। आइए, इस पावन गाथा में गोता लगाते हैं और इसके दिव्य संदेश को आत्मसात करते हैं।
मित्रता का अद्भुत बंधन: गुरुकुल के दिन
भगवान श्री कृष्ण, जो स्वयं परम ब्रह्म हैं, और गरीब ब्राह्मण सुदामा की मित्रता उनके बचपन से थी। दोनों ने एक ही गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की थी, जहाँ उन्होंने ऋषि सांदीपनि के सान्निध्य में विद्या और जीवन के मूल्यों को सीखा। गुरुकुल में वे एक साथ रहते, खाते, खेलते और पढ़ते थे। उनकी मित्रता जाति, धन या सामाजिक स्थिति से परे थी। यह आत्मा से आत्मा का पवित्र बंधन था, जो समय के साथ और भी दृढ़ होता गया।
दरिद्रता में भी अटल विश्वास
शिक्षा पूर्ण होने के बाद कृष्ण द्वारका के राजा बन गए और समस्त ऐश्वर्य के स्वामी कहलाए, जबकि सुदामा अपने गाँव लौटकर घोर गरीबी में जीवन यापन करने लगे। उनके पास पेट भरने के लिए भी पर्याप्त भोजन नहीं होता था। सुदामा की पत्नी, जिनका नाम सुशीला था, अपने पति की दरिद्रता से बहुत दुखी रहती थीं। उन्होंने कई बार सुदामा से कहा कि वे अपने मित्र कृष्ण से सहायता मांगें, लेकिन सुदामा स्वाभिमानी थे और अपनी समस्या के लिए मित्र को परेशान करना नहीं चाहते थे। उनका कृष्ण पर अटूट विश्वास था, पर वे अपनी दरिद्रता को उनके सामने प्रकट करने में संकोच करते थे।
द्वारका में सखा का भव्य स्वागत
एक दिन सुशीला ने फिर आग्रह किया और सुदामा को समझाने में सफल रहीं। सुदामा अपनी पत्नी की बात मानकर कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका जाने को तैयार हो गए। उनके पास अपने मित्र के लिए भेंट देने को कुछ नहीं था, सिवाय थोड़े से कच्चे चावलों (पोहा) के, जिन्हें उनकी पत्नी ने पड़ोस से मांगकर एक छोटी सी पोटली में बांध दिया था।
फटे-पुराने वस्त्रों में, भूखे-प्यासे सुदामा जब द्वारका पहुँचे, तो द्वारपालों ने उन्हें भीतर जाने से रोका। लेकिन जब सुदामा ने अपना नाम बताया और कहा कि वे कृष्ण के मित्र हैं, तो खबर सुनकर स्वयं भगवान श्री कृष्ण नंगे पैर दौड़ते हुए आए। उन्होंने सुदामा को गले से लगा लिया, उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। कृष्ण ने सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाया, उनके चरण धोए और स्वयं अपने हाथों से उनकी सेवा की। द्वारका की रानियाँ और सभी दरबारी यह दृश्य देखकर अचंभित थे कि उनके चक्रवर्ती सम्राट एक गरीब ब्राह्मण को इतना सम्मान दे रहे हैं।
निस्वार्थ प्रेम का प्रतिफल
कृष्ण ने सुदामा से उनके बचपन के किस्से पूछे और उन्हें अपने महल में रुकने का आग्रह किया। सुदामा ने अपनी पोटली छिपा रखी थी, क्योंकि उन्हें कृष्ण जैसे राजा को वह तुच्छ भेंट देने में शर्म आ रही थी। कृष्ण सब जानते थे। उन्होंने हंसते हुए सुदामा की पोटली छीन ली और उसमें से चावल के कुछ कण निकालकर बड़े प्रेम से खाए। उन्होंने कहा, “सुदामा, इससे उत्तम भेंट मैंने कभी नहीं पाई।”
कुछ दिन द्वारका में रहने के बाद, सुदामा अपने घर वापस लौट रहे थे। वे कृष्ण से कुछ भी मांग नहीं पाए थे, क्योंकि उनका मन इतना निर्मल था कि वे अपनी मित्रता में किसी स्वार्थ को नहीं आने देना चाहते थे। वे थोड़े निराश थे, लेकिन उनके मन में कृष्ण के प्रति प्रेम और श्रद्धा और बढ़ गई थी। जब वे अपने गाँव पहुँचे, तो अपने घर के स्थान पर उन्हें एक भव्य महल दिखाई दिया। उनकी पुरानी झोपड़ी गायब थी और उनकी पत्नी तथा बच्चे उत्तम वस्त्रों में थे। यह सब कृष्ण की कृपा का फल था। सुदामा ने बिना मांगे ही अतुलनीय धन और वैभव प्राप्त कर लिया था।
इस कथा से मिलती प्रेरणा
श्री कृष्ण और सुदामा की यह पवित्र कथा हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्यों की शिक्षा देती है:
- सच्ची मित्रता: मित्रता धन, पद या प्रतिष्ठा पर आधारित नहीं होती, बल्कि निस्वार्थ प्रेम और विश्वास पर टिकी होती है।
- निस्वार्थ भक्ति: सुदामा की भक्ति में कोई लालच नहीं था। उन्होंने कभी कुछ मांगा नहीं, फिर भी उन्हें सब कुछ प्राप्त हुआ। ईश्वर केवल हमारे भाव को देखते हैं, हमारी भेंट की कीमत को नहीं।
- ईश्वर की कृपा: भगवान अपने भक्तों की आवश्यकता को जानते हैं और सही समय पर उनकी मदद करते हैं, भले ही भक्त कुछ न मांगें। उनकी कृपा अकथनीय और असीम है।
- सरलता और विनम्रता: सुदामा की सरलता और विनम्रता ही उन्हें ईश्वर के इतने करीब ले गई।
निष्कर्ष: भक्ति का शाश्वत संदेश
भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की कथा हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति और प्रेम ही जीवन का सबसे बड़ा धन है। यह हमें सिखाती है कि हमें अपने संबंधों को संजोना चाहिए और ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिए। जब हम निस्वार्थ भाव से जीवन जीते हैं और ईश्वर पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह हमारी हर आवश्यकता का ध्यान रखते हैं। यह कथा युगों-युगों तक मानव जाति को प्रेरणा देती रहेगी, यह दर्शाते हुए कि परमपिता परमात्मा के लिए सभी भक्त समान हैं, चाहे वे कितने भी धनी हों या निर्धन।

