शांताकारं भुजंगशयनम्: भगवान विष्णु की अलौकिक शांति और जन्माष्टमी का दिव्य संबंध

शांताकारं भुजंगशयनम्: भगवान विष्णु की अलौकिक शांति और जन्माष्टमी का दिव्य संबंध

शांताकारं भुजंगशयनम्: भगवान विष्णु की अलौकिक शांति और जन्माष्टमी का दिव्य संबंध

प्रिय सनातन स्वर के पाठकों, हृदय से जय श्री हरि! आज हम जिस दिव्य और मंगलकारी श्लोक की चर्चा करने जा रहे हैं, वह भगवान विष्णु के परम शांतिपूर्ण और विराट स्वरूप का वर्णन करता है। यह श्लोक न केवल उनकी महिमा का गुणगान करता है, बल्कि हमें जीवन की गहराइयों और ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों से भी परिचित कराता है। यह श्लोक है:

**शांताकारं भुजंगशयनम् पद्मनाभं सुरेशम्।**
**विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्॥**
**लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।**
**वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥**

यह मात्र एक श्लोक नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के संपूर्ण सार का दर्पण है, जो हमें उनकी परम शांति, उनकी सर्वव्यापकता और उनके भक्त वत्सल स्वरूप का दिग्दर्शन कराता है। विशेषकर जब हम जन्माष्टमी जैसे पावन पर्व की ओर अग्रसर होते हैं, तब इस श्लोक का चिंतन हमें भगवान के अवतरण के मूल उद्देश्य और उनकी लीलाओं के पीछे छिपी ब्रह्मांडीय व्यवस्था को समझने में सहायता करता है। आइए, इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में छिपे अर्थ को जानें और भगवान विष्णु की इस अलौकिक शांति को अपने हृदय में उतारने का प्रयास करें।

भगवान विष्णु की दिव्य कथा और श्लोक का गूढ़ अर्थ

यह श्लोक भगवान विष्णु के गुणों और स्वरूप का विस्तृत वर्णन करता है। प्रत्येक पद एक गहन आध्यात्मिक सत्य को उजागर करता है।

**1. शांताकारं (शांत स्वरूप वाले):**

भगवान विष्णु का यह स्वरूप उनकी परम शांति का प्रतीक है। संसार में जब भी अशांति, क्लेश या अधर्म बढ़ता है, तो भक्त भगवान को पुकारते हैं। भगवान विष्णु का शांत स्वरूप हमें यह सिखाता है कि समस्त उथल-पुथल के बावजूद, एक आंतरिक शांति का अनुभव किया जा सकता है। यह शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आत्मिक होती है। यह वह परम स्थिति है, जहाँ कोई द्वेष नहीं, कोई भय नहीं, केवल शाश्वत आनंद है। जब हम भगवान श्री कृष्ण के जन्म की कथा पर विचार करते हैं, तो देखते हैं कि उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब कंस के अत्याचार चरम पर थे। ऐसे भयावह वातावरण में भी देवकी के गर्भ से भगवान का अवतरण उस दिव्य शांति का ही प्रतीक था, जो सभी भय और अशांति का नाश करती है। यह शांति ही सृजन का आधार है, और इसी शांति से सभी लीलाएं प्रवाहित होती हैं।

**2. भुजंगशयनम् (सर्प पर शयन करने वाले):**

भुजंग से तात्पर्य अनंतनाग या शेषनाग से है, जो अनंत काल और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है। भगवान विष्णु का शेषनाग पर शयन करना यह दर्शाता है कि वे काल के बंधन से परे हैं, और समस्त ब्रह्मांड उनके ही आश्रय में है। शेषनाग का फन फैलाए रहना सृजन, स्थिति और संहार के निरंतर चक्र का प्रतीक है, जिस पर भगवान शांत भाव से विराजमान हैं। यह दर्शाता है कि वे संसार की समस्त गतिविधियों के साक्षी हैं, उनसे प्रभावित हुए बिना। यह एक गहरा दार्शनिक संकेत है कि हमें भी जीवन के उतार-चढ़ाव में संतुलन बनाए रखना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे भगवान शेषनाग की हजारों फनों पर बिना किसी चिंता के विश्राम करते हैं। कृष्ण जन्म की कथा में भी जब वासुदेव जी नन्हे कृष्ण को यमुना पार करा रहे थे, तब शेषनाग ने अपने फनों से वर्षा से उनकी रक्षा की थी। यह घटना भगवान विष्णु के भुजंगशयनम् स्वरूप की ही एक छोटी सी झलक है, जो दर्शाता है कि वे अपने भक्तों की हर परिस्थिति में रक्षा करते हैं।

**3. पद्मनाभं (नाभि में कमल धारण करने वाले):**

भगवान विष्णु की नाभि से एक कमल निकलता है, जिस पर ब्रह्मा जी विराजमान होकर सृष्टि की रचना करते हैं। यह पद्मनाभं स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति भगवान विष्णु से ही हुई है। वे ही समस्त ब्रह्मांड के मूल स्रोत हैं। कमल शुद्धता, सृजन और ज्ञान का प्रतीक है। यह हमें यह सिखाता है कि भले ही हम संसार के कीचड़ में क्यों न हों, हमें कमल की तरह निर्मल और पवित्र रहना चाहिए। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे भीतर भी सृजन की असीम शक्ति और ईश्वरीय चेतना का वास है। कृष्ण जन्म की कथा में, भगवान कृष्ण का स्वयं अवतरित होना भी इसी सृजन शक्ति का प्रमाण है, जहां वे लीलाओं के माध्यम से धर्म की स्थापना करते हैं और एक नई सृष्टि का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

**4. सुरेशम् (देवताओं के स्वामी):**

सुरेशम् का अर्थ है ‘देवताओं के ईश्वर’। यह दर्शाता है कि भगवान विष्णु केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि समस्त देवगणों और लोकों के स्वामी हैं। वे धर्म और न्याय के संरक्षक हैं, और जब भी अधर्म बढ़ता है, वे देवताओं के साथ मिलकर उसे समाप्त करने का कार्य करते हैं। यह उनकी सर्वोच्च सत्ता और पालनहार की भूमिका को पुष्ट करता है। जन्माष्टमी पर हम भगवान कृष्ण का आह्वान करते हैं, जो भगवान विष्णु के ही पूर्णावतार हैं, यह मान्यता है कि वे न केवल हमारी बल्कि समस्त देवताओं की भी रक्षा करते हैं।

**5. विश्वाधारं (संपूर्ण विश्व के आधार):**

विश्वाधारं का अर्थ है ‘संपूर्ण विश्व को धारण करने वाले’। भगवान विष्णु ही इस ब्रह्मांड के आधार हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश – सभी उन्हीं में समाहित हैं। वे ही समस्त चराचर जगत को धारण किए हुए हैं। उनकी शक्ति से ही यह विशाल ब्रह्मांड चलता है। यह हमें अपनी सीमाओं से परे जाकर ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने की प्रेरणा देता है। जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण की बाल लीलाएं हमें याद दिलाती हैं कि यह छोटा सा बालक ही संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है, जैसा कि यशोदा मैया को उनके मुख में पूरा ब्रह्मांड दिखा था। यह भगवान की सर्वव्यापकता का अद्भुत दर्शन कराता है।

**6. गगनसदृशं (आकाश के समान व्यापक):**

भगवान विष्णु आकाश के समान सर्वव्यापी, असीम और निराकार हैं। जैसे आकाश हर जगह मौजूद है, वैसे ही भगवान विष्णु हर कण में विद्यमान हैं। वे किसी विशेष स्थान या रूप तक सीमित नहीं हैं। यह हमें बताता है कि ईश्वर को किसी मंदिर या मूर्ति तक सीमित न करें, बल्कि उन्हें सर्वत्र देखें। यह हमारी चेतना को विस्तृत करने और ईश्वरीय प्रेम को हर प्राणी में देखने की शिक्षा देता है।

**7. मेघवर्णं शुभांगम् (मेघ के समान श्याम वर्ण वाले और शुभ अंगों वाले):**

भगवान विष्णु का वर्ण श्याम है, जैसे गहरे बादल। यह वर्ण शांति, शीतलता और गहराइयों का प्रतीक है। उनका शुभ अंग हमें उनकी अनुपम सौंदर्य और मंगलमय स्वरूप का अनुभव कराता है। उनका दिव्य रूप भक्तों के मन को मोह लेता है और उन्हें परम आनंद की अनुभूति कराता है। भगवान कृष्ण का श्याम सुंदर स्वरूप तो जगविख्यात है। जन्माष्टमी पर हम इसी मेघवर्णं शुभांगम् स्वरूप का ध्यान करते हैं, जो मन को शीतलता और हृदय को प्रेम से भर देता है। उनकी प्रत्येक लीला, प्रत्येक अंग भक्तों के लिए शुभकारी और कल्याणकारी है।

**8. लक्ष्मीकांतं (देवी लक्ष्मी के स्वामी):**

लक्ष्मीकांतं का अर्थ है ‘देवी लक्ष्मी के पति’। देवी लक्ष्मी धन, समृद्धि, ऐश्वर्य और सौभाग्य की देवी हैं। भगवान विष्णु के साथ उनका होना यह दर्शाता है कि जहाँ धर्म, न्याय और शांति है, वहाँ समृद्धि और कल्याण भी अवश्य होता है। वे जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। लक्ष्मी और नारायण का यह संबंध हमें सिखाता है कि वास्तविक समृद्धि केवल भौतिक धन में नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक जीवन जीने में निहित है।

**9. कमलनयनं (कमल के समान नेत्रों वाले):**

भगवान विष्णु के नेत्र कमल के समान सुंदर, विशाल और शांत हैं। कमल के नेत्र उनकी पवित्रता, करुणा और सौम्यता को दर्शाते हैं। ये नेत्र हर जीव पर दया दृष्टि रखते हैं और भक्तों की पुकार सुनते हैं। कमल के समान नेत्रों से वे संपूर्ण सृष्टि का अवलोकन करते हैं और हर प्राणी के दुःख-सुख को समझते हैं। भगवान कृष्ण के बड़े-बड़े, मोहक नेत्रों की कल्पना मात्र से ही मन शांत हो जाता है और हृदय में भक्ति का संचार होता है।

**10. योगिभिर्ध्यानगम्यम् (योगियों द्वारा ध्यान से प्राप्त होने वाले):**

यह श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, जो बताता है कि भगवान विष्णु को केवल बाहरी कर्मकांडों से ही नहीं, बल्कि आंतरिक ध्यान और योग के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है। सच्चे योगी और भक्त अपने अंतर्मन में ध्यान लगाकर उन्हें अनुभव करते हैं। यह उनकी अलौकिक उपस्थिति का प्रमाण है, जो केवल भौतिक आँखों से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से देखी जा सकती है। जन्माष्टमी पर जब हम भगवान कृष्ण का ध्यान करते हैं, तो हम भी योगियों की तरह अपने मन को एकाग्र कर उनकी दिव्यता को अनुभव करने का प्रयास करते हैं।

**11. वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् (मैं उन विष्णु भगवान को प्रणाम करता हूँ, जो संसार के भय को हरने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं):**

यह अंतिम पद भगवान विष्णु को प्रणाम करने का आह्वान करता है। वे भवभयहरं हैं, अर्थात संसार के समस्त भय, कष्ट और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने वाले हैं। वे सर्वलोकैकनाथम् हैं, अर्थात सभी लोकों के एकमात्र स्वामी और संरक्षक हैं। यह पद हमें भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और शरणागति का भाव सिखाता है। जन्माष्टमी का पर्व हमें इसी भवभयहरं श्री कृष्ण के अवतरण का स्मरण कराता है, जिन्होंने अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना की और भक्तों के समस्त भय को दूर किया।

देवत्व का महत्व और जन्माष्टमी से संबंध

यह श्लोक भगवान विष्णु के गुणों का वर्णन करता है, और जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, जो भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं। इस श्लोक का चिंतन हमें यह समझने में मदद करता है कि कृष्ण का जन्म क्यों इतना विशेष है। भगवान विष्णु का शांत, सर्वव्यापी और पालनहार स्वरूप ही कृष्ण के रूप में प्रकट हुआ ताकि वे धर्म की स्थापना कर सकें, भक्तों को आनंद दे सकें और दुष्टों का संहार कर सकें।

* **शांति का स्रोत:** भगवान विष्णु की परम शांति ही कृष्ण के रूप में अवतरित होकर संसार में शांति स्थापित करती है। जब संसार में अधर्म और अशांति बढ़ जाती है, तब उसी शांत स्वरूप से कृष्ण रूप में लीलाओं का उद्भव होता है, जो अंततः शांति की स्थापना करता है।
* **पालनहार का अवतार:** विश्वाधारं और सर्वलोकैकनाथम् भगवान विष्णु ही कृष्ण के रूप में आकर धर्म की रक्षा करते हैं और भक्तों का पालन करते हैं। कृष्ण की लीलाएं, जैसे गोवर्धन लीला या कालिया मर्दन, सब उनके पालनहार स्वरूप का ही प्रदर्शन हैं।
* **भय मुक्ति:** भवभयहरं भगवान विष्णु ही कृष्ण बनकर कंस जैसे अत्याचारियों का वध कर भक्तों को भयमुक्त करते हैं। जन्माष्टमी पर हम यही प्रार्थना करते हैं कि श्री कृष्ण हमारे समस्त भय और कष्टों को हर लें।
* **ज्ञान और भक्ति:** योगिभिर्ध्यानगम्यम् विष्णु ही कृष्ण के रूप में गीता का ज्ञान देते हैं, जो योग और ध्यान का परम सार है। जन्माष्टमी हमें भक्ति के मार्ग पर चलने और भगवान के दिव्य स्वरूप का ध्यान करने की प्रेरणा देती है।

जन्माष्टमी के पावन अनुष्ठान और परंपराएं

जन्माष्टमी का पर्व भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत और विश्वभर में बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्त कई प्रकार के अनुष्ठान और परंपराएं अपनाते हैं, जो भगवान विष्णु के इस दिव्य श्लोक के सार को और भी गहरा कर देते हैं:

1. **उपवास और व्रत:** भक्तगण पूरे दिन निराहार या फलाहार रहकर उपवास रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्म के बाद ही व्रत खोलते हैं। यह तपस्या मन को शुद्ध करती है और भगवान की शांति से जुड़ने में सहायक होती है।
2. **बाल गोपाल की पूजा:** घरों में बाल गोपाल की सुंदर झांकियां सजाई जाती हैं। उन्हें स्नान कराया जाता है (पंचामृत अभिषेक), नए वस्त्र पहनाए जाते हैं, झूले में बिठाकर झुलाया जाता है और विभिन्न प्रकार के व्यंजनों (छप्पन भोग) का भोग लगाया जाता है। यह सब भगवान के शुभांगम् स्वरूप का ही स्मरण है।
3. **आरती और भजन:** मध्यरात्रि में भगवान के जन्म के बाद विशेष आरती की जाती है और रात भर भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। ये भक्तिमय गीत और धुनें भगवान के गुणों का गुणगान करती हैं और मन को शांताकारं स्वरूप से जोड़ती हैं। कई भक्त भगवान विष्णु की आरती भी करते हैं, जो उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाती है।
4. **भागवत कथा श्रवण:** इस दौरान श्रीमद्भागवत महापुराण की कथाएं सुनी जाती हैं, जिनमें भगवान कृष्ण की लीलाओं और विष्णु के अवतारों का वर्णन होता है। यह कथा श्रवण भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है और उन्हें भवभयहरं विष्णु से जोड़ता है।
5. **दही हांडी:** महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में दही हांडी का आयोजन किया जाता है, जो भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का प्रतीक है। यह उत्सव उल्लास और सामुदायिक भावना को बढ़ाता है।
6. **संकल्प और ध्यान:** भक्त इस दिन शांताकारं भुजंगशयनम् श्लोक का जप करते हैं और भगवान विष्णु/कृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं। यह ध्यान योगिभिर्ध्यानगम्यम् के सिद्धांत को साकार करता है, जिससे भक्त आंतरिक शांति और प्रभु से जुड़ाव महसूस करते हैं।

निष्कर्ष: शाश्वत शांति और भक्ति का आह्वान

‘शांताकारं भुजंगशयनम्’ श्लोक भगवान विष्णु के दिव्य, शांत और सर्वव्यापी स्वरूप का एक सुंदर वर्णन है। यह हमें सिखाता है कि जीवन की सभी चुनौतियों के बावजूद, हम आंतरिक शांति पा सकते हैं और ब्रह्मांड के आधारभूत नियमों को समझ सकते हैं। यह श्लोक हमें भगवान विष्णु के पालनहार स्वरूप, उनके दिव्य सौंदर्य, उनकी असीम शक्ति और उनकी सर्वव्यापकता का स्मरण कराता है।

जन्माष्टमी का पावन पर्व हमें इसी परम शांति के अवतार, श्री कृष्ण के जन्म का स्मरण कराता है। यह हमें याद दिलाता है कि जब-जब धर्म का पतन होता है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान स्वयं अवतरित होकर धर्म की रक्षा करते हैं। उनका अवतरण हमें भय से मुक्ति दिलाता है और हमें प्रेम, करुणा और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

आइए, हम सभी इस जन्माष्टमी पर भगवान विष्णु और उनके अवतार श्री कृष्ण के शांताकारं स्वरूप का ध्यान करें। उनके भुजंगशयनम् पर विराजमान होकर वे हमें संदेश देते हैं कि जीवन की अशांति में भी, हमें अपने आंतरिक शांति के स्रोत को नहीं भूलना चाहिए। उनकी भक्ति में डूबकर, उनके मंत्रों का जप करके और उनकी लीलाओं का स्मरण करके, हम अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं।

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।
जय श्री हरि! जय श्री कृष्ण!

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