शब्द ब्रह्म की महिमा: जब मौन भी बन जाए साधना

शब्द ब्रह्म की महिमा: जब मौन भी बन जाए साधना

शब्द ब्रह्म: ध्वनि और अर्थ का दिव्य संगम

सनातन धर्म में ‘शब्द ब्रह्म’ की अवधारणा अत्यंत गूढ़ और महत्वपूर्ण है। यह सिर्फ अक्षरों या ध्वनियों का समूह नहीं, बल्कि वह परम सत्ता है जो वाणी और अर्थ के रूप में प्रकट होती है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, मंत्रों से लेकर स्तोत्रों तक, शब्द ही हमें दिव्यता से जोड़ते हैं, ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं और हमारी आध्यात्मिक यात्रा को दिशा देते हैं। ‘ॐ’ जैसे पवित्र अक्षर तो स्वयं ब्रह्म का ही नादात्मक स्वरूप माने जाते हैं, जिनकी ध्वनि में सृष्टि का सार समाहित है।

जब मौन भी बन जाए साधना

परंतु, क्या हो जब शब्द अनुपस्थित हों? क्या आध्यात्मिक प्रगति शब्दों के अभाव में रुक जाती है? बिलकुल नहीं। कभी-कभी, परम सत्य तक पहुँचने के लिए मौन और आंतरिक चिंतन ही सबसे प्रबल माध्यम बन जाते हैं। जैसे किसी गहरे ध्यान में, जहाँ मन विचारों और शब्दों की सीमाओं से परे चला जाता है, तब साधक स्वयं ब्रह्म के अनुभव में लीन होता है। यह वह अवस्था है जहाँ आंतरिक अनुभूति बाह्य अभिव्यक्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

भाव की शक्ति: शब्दों से परे की भक्ति

हमारी भक्ति केवल शब्दों या मंत्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे भाव (भावनाओं) और श्रद्धा से भी पोषित होती है। जब हम पूर्ण हृदय से ईश्वर का स्मरण करते हैं, तब चाहे हम कोई मंत्र न भी बोलें, हमारी भावनाएँ ही प्रार्थना बन जाती हैं। मीराबाई का प्रेम, शबरी की प्रतीक्षा, या हनुमान जी की निस्वार्थ सेवा—ये सभी भक्ति के ऐसे उदाहरण हैं जो शब्दों से कहीं बढ़कर भाव की गहराई को दर्शाते हैं।

  • आंतरिक चिंतन: ध्यान और मनन के माध्यम से अपनी आत्मा से जुड़ना।
  • निस्वार्थ प्रेम: बिना किसी अपेक्षा के ईश्वर के प्रति प्रेम रखना।
  • समर्पण: स्वयं को पूर्ण रूप से परम सत्ता के चरणों में अर्पित करना।
  • सेवा भाव: दूसरों की निस्वार्थ सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानना।

मौन में छिपा आध्यात्मिक रहस्य

यह मौन हमें अपने अंदर झाँकने का अवसर देता है। यह बाहरी दुनिया के शोर से हटकर, अपनी आत्मा की गहरी पुकार सुनने का समय है। इस मौन में ही हमें अपनी सच्ची प्रकृति, अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है। यहीं पर हम सीखते हैं कि ईश्वर न केवल मंदिर के विग्रह में, बल्कि हमारे अपने हृदय में भी निवास करते हैं, और उन्हें महसूस करने के लिए कभी-कभी शब्दों से अधिक शांति की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष: हर रूप में ईश्वर की उपस्थिति

अतः, चाहे हम पवित्र मंत्रों का उच्चारण करें या गहन मौन में लीन हों, ईश्वर की उपस्थिति हर कण में है और हमारी भक्ति हर रूप में स्वीकार्य है। शब्द ब्रह्म की महिमा अनंत है, किंतु भाव और आंतरिक अनुभूति की शक्ति भी असीम है। आइए, हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा में शब्दों और मौन दोनों का सम्मान करें, और अपने हृदय में भक्ति की लौ को प्रज्वलित रखें।

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