यह तो प्रेम की बात है उधो: जन्माष्टमी पर कृष्ण भक्ति का गूढ़ रहस्य

यह तो प्रेम की बात है उधो: जन्माष्टमी पर कृष्ण भक्ति का गूढ़ रहस्य

यह तो प्रेम की बात है उधो: जन्माष्टमी पर कृष्ण भक्ति का गूढ़ रहस्य

सनातन स्वरों से गूँजती भक्ति की धारा में, कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो हृदय के तारों को झंकृत कर देते हैं। “यह तो प्रेम की बात है उधो, मन लागे जहाँ तहाँ जावै” – यह केवल एक भजन की पंक्ति नहीं, बल्कि प्रेममयी भक्ति के उस शिखर का उद्घोष है, जहाँ बुद्धि के तर्क, ज्ञान के सिद्धांत और वैराग्य की कठोरता सब फीके पड़ जाते हैं। यह उस अलौकिक संबंध की गाथा है जो भक्त और भगवान के बीच केवल भावनाओं की डोर से बँधा होता है। जन्माष्टमी 2024 का पावन पर्व सन्निकट है, और ऐसे में भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का यह भावार्थ और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आइए, इस जन्माष्टमी पर हम भक्ति के इस गूढ़ रहस्य को समझें, जहाँ ज्ञान नहीं, केवल प्रेम ही सर्वोपरि है। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति किसी नियम या विधान में नहीं बँधी होती, बल्कि वह हृदय की गहराइयों से प्रवाहित होती है। यह कृष्ण प्रेम भजन हमें उस दिव्य भावना से जोड़ता है जो समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त है।

गोपियों का अहेतुकी प्रेम और उद्धव का ज्ञान-गर्व

द्वापर युग की यह कथा तब की है जब भगवान श्री कृष्ण अपने बाल्यकाल की असंख्य मधुर लीलाएँ समाप्त कर कंस वध के लिए मथुरा पधार चुके थे। मथुरा और फिर द्वारका में रहते हुए भी, कृष्ण का मन अक्सर वृंदावन की ओर खिंचा चला जाता था। उनके हृदय के किसी कोने में सदैव ही गोकुल की वह प्रेममयी भूमि, उनकी गलियाँ, यमुना का तट, कदंब के पेड़, और सबसे बढ़कर, वे भोली-भाली गोपियाँ बसी हुई थीं, जो उनसे अनन्य, निस्वार्थ प्रेम करती थीं। कृष्ण जानते थे कि उनके बिना गोपियों का क्या हाल होगा; वे विरह की अग्नि में जल रही होंगी, पल-पल कृष्ण का स्मरण कर रही होंगी, और उनकी प्रत्येक साँस में बस ‘कृष्ण’ नाम ही समाया होगा।

ऐसे में, भगवान कृष्ण ने अपने परम ज्ञानी और मित्र उद्धव को वृंदावन भेजा। उद्धव, स्वयं भगवान के निकट रहकर भी ज्ञान योग और निर्गुण ब्रह्म की उपासना के प्रकांड पंडित थे। उन्हें अपने अगाध ज्ञान पर बहुत गर्व था और वे मानते थे कि परम सत्य को केवल बुद्धि और तर्क के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। कृष्ण ने उद्धव से कहा कि वे गोपियों को ज्ञान का उपदेश दें, उन्हें निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने को कहें, और उन्हें यह समझाएँ कि कृष्ण तो घट-घट में व्याप्त हैं, वे किसी एक रूप में बँधे नहीं हैं। कृष्ण का उद्देश्य उद्धव के इस ज्ञान गर्व को तोड़ना और उन्हें प्रेम भक्ति की सर्वोच्चता का साक्षात अनुभव कराना था।

उद्धव बड़े उत्साह के साथ वृंदावन पहुँचे। उन्होंने सोचा कि वे अपने अकाट्य तर्क और गहन ज्ञान से गोपियों के मन से कृष्ण-विरह की पीड़ा को शांत कर देंगे। वृंदावन पहुँचकर उद्धव ने देखा कि पूरा गोकुल कृष्ण के रंग में रंगा हुआ है। यमुना का पानी, कदंब के वृक्ष, गायों की आँखों में, और वृंदावन की धूल के कण-कण में उन्हें कृष्ण का ही प्रतिबिंब दिखाई दिया। गोपियाँ सूनी आँखों से कृष्ण का इंतज़ार कर रही थीं, उनके होंठों पर केवल ‘कृष्ण, कृष्ण’ का नाम था, और उनके हृदय में केवल कृष्ण का प्रेम अथाह सागर की तरह उमड़ रहा था। उनके वस्त्र मैले थे, केश बिखरे हुए थे, और आँखों से अश्रुधारा निरंतर प्रवाहित हो रही थी। वे दिन-रात कृष्ण की याद में बेचैन रहती थीं, अपने सारे काम छोड़कर बस कृष्ण की यादों में खोई रहती थीं।

उद्धव ने गोपियों को उपदेश देना शुरू किया। उन्होंने उन्हें समझाया कि कृष्ण तो शरीर नहीं, आत्मा हैं। वे तो सर्वव्यापी हैं और हर जगह मौजूद हैं। उन्हें किसी एक रूप में बांधना या किसी भौतिक स्थान पर खोजना अज्ञानता है। “हे गोपियों, तुम अपने मन को कृष्ण के इस मोह से हटाकर निर्गुण ब्रह्म में लगाओ। वही परम सत्य है, वही शाश्वत है।” उद्धव ने उन्हें योग और ध्यान की विधियाँ भी बताईं, यह समझाते हुए कि किस प्रकार अपने मन को एकाग्र कर निर्गुण निराकार ब्रह्म का चिंतन किया जा सकता है।

लेकिन गोपियों के लिए ये बातें समझना असंभव था। उनके कृष्ण तो उनके कान्हा थे, उनके ग्वाल थे, उनके बंसी वाले थे, जिनके साथ उन्होंने रास रचाया था, जिनके साथ माखन चुराया था। उनके लिए कृष्ण निराकार नहीं, साकार थे; दूर नहीं, उनके हृदय में थे, उनकी आँखों में थे। वे किसी अमूर्त अवधारणा को नहीं समझ सकती थीं।

एक गोपी ने उद्धव से बड़े भोलेपन से, और साथ ही प्रेमपूर्ण व्यंग्य के साथ कहा, “हे उद्धव! हम तो ठहरी गाँव की गँवारिनें, हम क्या जानें ये ज्ञान की बातें? हम निर्गुण निराकार को कैसे भजें? हमारे लिए तो हमारा कन्हैया ही सब कुछ है। तुम जिस निर्गुण की बात करते हो, वह कैसा है? कहाँ रहता है? क्या वह माखन खाता है? क्या वह मुरली बजाता है? क्या वह हमारे साथ रास रचता है? हमें तो उसकी पहचान ही नहीं। तुम तो उसे पहचानते हो, तो क्या वह तुम्हारा कोई काम करता है?”

दूसरी गोपी ने अपने अश्रुपूरित नेत्रों से उद्धव की ओर देखते हुए कहा, “हे उद्धव! तुम ज्ञान की बातें करते हो, और हम प्रेम की बात करते हैं। यह तो प्रेम की बात है उधो, मन लागे जहाँ तहाँ जावै। हमारा मन तो केवल हमारे श्याम सुंदर में लगा है। हम उसे कैसे निकालें? हमारा मन तो एक था, सो वो तो श्याम सुंदर के साथ चला गया। अब किस मन से हम तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म को भजें? जैसे मछली पानी के बिना जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही हम कृष्ण के बिना एक पल भी नहीं रह सकतीं।”

एक और गोपी ने अत्यंत भावुक होकर कहा, “हमारे नेत्रों ने तो केवल कृष्ण का रूप देखा है, उनके घुंघराले बाल, उनकी मोहक मुस्कान। हमारे कानों ने तो केवल कृष्ण की बंसी की मधुर धुन सुनी है, जो हमें मंत्रमुग्ध कर देती थी। हमारे हाथों ने तो केवल कृष्ण के लिए पकवान बनाए हैं, उनके सिर पर मोर मुकुट सजाया है। हमारे रोम-रोम में बस कृष्ण ही समाए हैं। तुम कहते हो, कृष्ण को भूल जाओ और निर्गुण को भजो? यह कैसा न्याय है?”

उन्होंने उद्धव को बताया कि उन्हें कृष्ण हर जगह दिखते हैं – यमुना के कल-कल बहते जल में, कदंब की छायादार डालियों में, गायों की भोली आँखों में, मोर के इंद्रधनुषी पंखों में, यहाँ तक कि वृंदावन की मिट्टी के हर कण में। उनके लिए कृष्ण कभी दूर नहीं गए थे, वे तो हर पल उनके साथ थे, उनके भावों में, उनके प्रेम में। गोपियों ने कहा कि ज्ञान से मुक्ति मिलती होगी, पर प्रेम से तो साक्षात भगवान मिलते हैं। उनकी भक्ति किसी नियम, विधि या विधान से बँधी नहीं थी, वह तो बस एक अहेतुकी प्रेम था, जो बदले में कुछ नहीं चाहता था, केवल कृष्ण को चाहता था। वे कृष्ण को पाने के लिए कुछ भी कर सकती थीं, कोई भी त्याग कर सकती थीं।

गोपियों के इस अनन्य प्रेम, उनके निश्चल भाव और उनकी गहन विरह वेदना को देखकर उद्धव का ज्ञान गर्व चूर-चूर हो गया। उन्होंने देखा कि गोपियाँ केवल कृष्ण के नाम से ही जी रही थीं, उनकी हर साँस कृष्ण के लिए थी। उद्धव को पहली बार समझ आया कि ज्ञान की ऊँची-ऊँची बातें प्रेम की सरल, सहज और तीव्र धारा के सामने कितनी क्षुद्र हैं। उन्हें अपनी विद्वत्ता पर शर्मिंदगी महसूस हुई। वे गोपियों के चरणों में गिर पड़े और हाथ जोड़कर कहा, “धन्य हैं आप गोपियाँ! मैं अपने ज्ञान पर व्यर्थ ही अभिमान करता था। आज मैंने सच्चा ज्ञान आप लोगों से सीखा है, जो मुझे किसी शास्त्र में नहीं मिला। आप जैसी प्रेममयी भक्त तो स्वर्ग में भी दुर्लभ हैं। काश, मुझे वृंदावन में किसी लता-पता, किसी तृण या धूल का कण बनने का सौभाग्य मिले, ताकि मैं आपके पवित्र चरण-रज को अपने मस्तक पर धारण कर सकूँ और आपकी भक्ति का अनुभव कर सकूँ।” इस प्रकार उद्धव, जो ज्ञान का पुंज थे, प्रेम भक्ति के सामने पूर्णतः नतमस्तक हो गए और स्वयं कृष्ण प्रेम के सच्चे उपासक बन गए।

भक्ति का रहस्य: प्रेम ही परम मार्ग

“यह तो प्रेम की बात है उधो” – यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि भक्ति के उस परम रहस्य का उद्घाटन है जिसे समझने में बड़े-बड़े ज्ञानी भी चूक जाते हैं। इसका भावार्थ गहरा है और जन्माष्टमी के पावन अवसर पर यह हमें भक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझने की प्रेरणा देता है।

भक्ति का वास्तविक रहस्य: यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति का रहस्य ज्ञान, वैराग्य या किसी कठोर साधना में नहीं छिपा है, बल्कि वह अहेतुकी प्रेम में निहित है। गोपियों का प्रेम किसी लाभ, मोक्ष या स्वर्ग की इच्छा से प्रेरित नहीं था। वे तो केवल कृष्ण को कृष्ण के लिए प्रेम करती थीं। यही अहेतुकी प्रेम सर्वोच्च भक्ति है। जब हम भगवान से बिना किसी शर्त के प्रेम करते हैं, तभी हम उनकी निकटता का अनुभव कर पाते हैं। यह भक्ति हमें जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देती है और हमें आंतरिक शांति प्रदान करती है।

प्रेम भक्ति की सर्वोच्चता: उद्धव जैसे प्रकांड ज्ञानी का गोपियों के प्रेम के सामने नतमस्तक हो जाना इस बात का प्रमाण है कि प्रेम भक्ति सभी मार्गों में श्रेष्ठ है। ज्ञान मार्ग बुद्धि को संतुष्ट करता है, लेकिन प्रेम मार्ग सीधे हृदय को भगवान से जोड़ता है। जहाँ तर्क की सीमा समाप्त होती है, वहाँ से प्रेम का साम्राज्य शुरू होता है। गोपियों ने अपनी सहज, सरल प्रेम भक्ति से उद्धव के गहन ज्ञान को भी बौना सिद्ध कर दिया।

जन्माष्टमी का संदर्भ: जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य का उत्सव है। यह उत्सव हमें उनके बाल्यकाल की लीलाओं और वृंदावन की प्रेममयी भक्ति की याद दिलाता है। कृष्ण का जन्म ही प्रेम का संदेश लेकर आया था। इस दिन हम विशेष रूप से कृष्ण प्रेम भजन गाते हैं, उनकी आरती करते हैं और उनकी कथा व कहानी सुनते हैं। ये सभी क्रियाएँ हमें गोपियों के उस निस्वार्थ प्रेम की याद दिलाती हैं, जो कृष्ण के हृदय को भी बांधने में सक्षम था। जन्माष्टमी पर हम यह संकल्प लें कि हम भी अपने मन में कृष्ण के प्रति ऐसा ही शुद्ध और निस्वार्थ प्रेम विकसित करेंगे।

भावार्थ: इस पूरे प्रसंग का भावार्थ यह है कि भगवान केवल प्रेम के भूखे होते हैं। वे कर्मकांडों या ज्ञान के प्रदर्शन से प्रभावित नहीं होते, बल्कि वे भक्त के हृदय में बसे सच्चे प्रेम को पहचानते हैं। उनका नाम जपना, उनके रूप का ध्यान करना, उनके लिए विरह में आँसू बहाना – यही सच्ची पूजा है। यह हमें यह भी सिखाता है कि भगवान को खोजने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, वे तो हमारे हृदय में ही वास करते हैं, बशर्ते हमारे पास उन्हें प्रेम से देखने वाली आँखें हों।

जन्माष्टमी के रीति-रिवाजों में प्रेम का सार

यद्यपि “यह तो प्रेम की बात है उधो” सीधे तौर पर किसी विशिष्ट कर्मकांड से जुड़ा नहीं है, यह भजन और इसके पीछे की कथा हमें जन्माष्टमी के उत्सव और उससे जुड़े रीति-रिवाजों को एक नई दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है। जन्माष्टमी पर मनाए जाने वाले प्रत्येक विधान में, गोपियों के उस अनमोल प्रेम का सार छिपा होता है।

प्रेम से भरी पूजा: जन्माष्टमी पर हम भगवान कृष्ण का अभिषेक करते हैं, उन्हें नए वस्त्र पहनाते हैं, उन्हें झूले पर झुलाते हैं, और उन्हें छप्पन भोग लगाते हैं। ये सभी क्रियाएँ केवल रस्में नहीं हैं, बल्कि ये हमारे हृदय के उस अनन्य प्रेम की अभिव्यक्ति हैं, जो गोपियाँ अपने कान्हा के प्रति रखती थीं। जब हम बाल कृष्ण को झूले पर झुलाते हैं, तो हमारा भाव वही होता है जैसे मैया यशोदा या गोपियाँ अपने लाल को दुलार रही हों। यह आरती और पूजा कृष्ण के प्रति हमारे गहरे लगाव को दर्शाती है।

भजन-कीर्तन और आरती: जन्माष्टमी की रात मंदिरों और घरों में विशेष कृष्ण प्रेम भजन गाए जाते हैं, और कृष्ण की आरती उतारी जाती है। ये भजन हमें गोपियों के विरह, उनके समर्पण और उनके आनंद की याद दिलाते हैं। “यह तो प्रेम की बात है उधो” जैसे भजन इन उत्सवों की जान होते हैं। आरती के दीपक की लौ भगवान के प्रति हमारी निष्ठा और प्रेम का प्रतीक होती है।

कथा और कहानी का श्रवण: इस पावन अवसर पर भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं, रासलीलाओं और उनकी महिमा से जुड़ी कथाएँ व कहानियाँ सुनना और सुनाना एक महत्वपूर्ण परंपरा है। ये कहानियाँ, विशेष रूप से उद्धव-गोपी संवाद, हमें भक्ति के गहरे अर्थों से अवगत कराती हैं और हमारे हृदय में कृष्ण प्रेम को जगाती हैं। इन कथाओं के माध्यम से हम समझते हैं कि कैसे कृष्ण ने हर रिश्ते में प्रेम की महत्ता को स्थापित किया।

माखन-मिश्री का भोग: भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाना एक पुरानी परंपरा है। यह सिर्फ एक प्रसाद नहीं, बल्कि गोकुल की उस प्रेममयी परंपरा का प्रतीक है जहाँ गोपियाँ अपने हाथों से माखन बनाकर कृष्ण को खिलाती थीं। यह भोग हमें उस सहज, सरल और निस्वार्थ प्रेम की याद दिलाता है जो गोपियों के हृदय में कृष्ण के लिए था।

इन सभी परंपराओं और अनुष्ठानों का मूल उद्देश्य भगवान कृष्ण के प्रति हमारे प्रेम और भक्ति को पोषित करना है। यह हमें सिखाता है कि बाहरी दिखावा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हृदय की पवित्रता और भगवान के प्रति हमारा अनन्य प्रेम ही सबसे बड़ा अनुष्ठान है। जन्माष्टमी हमें केवल कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाने का अवसर नहीं देती, बल्कि उनके प्रेम और भक्ति के गहन संदेश को आत्मसात करने का भी अवसर प्रदान करती है।

निष्कर्ष: प्रेम ही परमात्मा का शाश्वत द्वार

इस प्रकार, “यह तो प्रेम की बात है उधो” केवल एक भजन नहीं, अपितु भक्ति मार्ग का एक उज्ज्वल प्रकाश स्तंभ है। यह हमें सिखाता है कि परमात्मा से मिलने का सबसे सीधा और सरल मार्ग प्रेम ही है। जन्माष्टमी 2024 का यह पवित्र अवसर हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि भगवान श्री कृष्ण किसी ज्ञान के सागर या योग के तपस्वी से नहीं, बल्कि एक सच्चे और निस्वार्थ प्रेमी हृदय से प्रसन्न होते हैं।

गोपियों ने उद्धव को यह सिद्ध कर दिया कि जहाँ प्रेम होता है, वहाँ कोई दूरी नहीं होती, कोई अभाव नहीं होता। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ भगवान हर कण में, हर पल में विराजमान होते हैं। आइए, हम सब भी इस जन्माष्टमी पर अपने हृदय के द्वारों को खोलें, और अपने मन में उस निष्कलंक, अहैतुकी कृष्ण प्रेम को स्थापित करें, जो हमें जीवन की हर बाधा से पार पाने की शक्ति देगा और हमें परम आनंद की ओर अग्रसर करेगा।

याद रखें, सच्ची भक्ति का अर्थ है अपने सर्वस्व को भगवान को समर्पित कर देना, जैसे गोपियों ने किया था। यह हमें उनके प्रति अटूट विश्वास, समर्पण और विनीत भाव रखने की प्रेरणा देता है। इस जन्माष्टमी पर, आइए हम भी अपने हृदय में कृष्ण की बंसी की धुन को महसूस करें, उनके प्रेम में लीन हो जाएँ और अपने जीवन को भक्ति के इस अनमोल रहस्य से प्रकाशित करें।

जय श्री कृष्ण!

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