मोहन से दिल क्यों लगाया कृष्ण भजन

मोहन से दिल क्यों लगाया कृष्ण भजन

ब्रह्मांड में प्रेम की अनेक धाराएँ बहती हैं, पर एक धारा ऐसी है जो हर हृदय को अपनी ओर खींच लेती है – वह है श्याम सुंदर, मनमोहन, बंसीवाले कृष्ण का प्रेम। जब भी हम कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर या किसी भी क्षण कान्हा की छवि देखते हैं, उनका नाम सुनते हैं, तो अनायास ही एक मधुर, अलौकिक पुलकन मन को छू जाती है। ‘मोहन से दिल क्यों लगाया’ – यह प्रश्न सिर्फ एक जिज्ञासा नहीं, बल्कि हर कृष्ण भक्त के हृदय की एक मीठी पुकार है। आखिर क्या है उस बाँके बिहारी में, जो अपने भक्तों को इस कदर बांध लेता है कि जीवन का हर सुख, हर दुख उसी के चरणों में समर्पित हो जाता है? आइए, सनातन स्वर के इस भक्तिमय यात्रा में हम कृष्ण प्रेम के इन्हीं रहस्यमयी आयामों को समझने का प्रयास करें।

श्री कृष्ण, स्वयं परब्रह्म का पूर्ण अवतार, एक ऐसा विराट स्वरूप हैं जिसमें वात्सल्य, प्रेम, मित्रता, शौर्य, वैराग्य और ज्ञान, सभी एक साथ समाहित हैं। उनके जीवन की हर लीला, हर क्षण एक अद्भुत प्रेरणा और असीम आनंद का स्रोत है।

उनके जन्म की कथा ही दिव्यता से परिपूर्ण है। कंस के कारागार में माता देवकी और पिता वसुदेव के यहाँ जन्म लेकर, मध्यरात्रि में यमुना के मार्ग से गोकुल पहुंचना, और नंद बाबा व यशोदा मैया के लाडले के रूप में पलना – यह सब कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि ब्रह्मांडीय योजना का एक हिस्सा था। कान्हा का बालपन गोकुल और वृंदावन की गलियों में बीता, जहाँ उन्होंने अपनी नटखट लीलाओं से सबका मन मोह लिया। माखन चोरी करना, गोपियों को सताना, और फिर अपनी मोहिनी मुस्कान से सबको क्षमा करने पर विवश कर देना – ये सब उनकी प्रेममयी शरारतें थीं। ‘माखन चोर’ की उपाधि उन्हें किसी दोष के कारण नहीं मिली, बल्कि उनके प्रति गोपियों और ग्रामवासियों के अगाध स्नेह के कारण मिली। कौन होगा जो ऐसे माखन चोर से दिल न लगाए?

वृंदावन की धूल में खेलते हुए कृष्ण ने कई राक्षसों का संहार किया – पूतना, शकटासुर, बकासुर, अघासुर। ये सिर्फ राक्षसों का वध नहीं था, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक था। जब इंद्र के प्रकोप से वृंदावन पर घनघोर वर्षा हुई, तब सात वर्ष के बाल गोपाल ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया, पूरे गोकुल को आश्रय दिया। यह उनकी सर्वशक्तिमानता और अपने भक्तों के प्रति गहन प्रेम का प्रमाण था। इस गोवर्धन लीला की कथा आज भी हमें बताती है कि जब-जब भक्त पर संकट आता है, भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

लेकिन कृष्ण की सबसे मनमोहक लीला उनकी बंसी की धुन है। वृंदावन की कुंज गलियों में जब मोहन अपनी मुरली बजाते, तो प्रकृति भी थम जाती। गायें चरना छोड़ देतीं, पक्षी गाना भूल जाते, और गोपियाँ अपने सारे काम-काज छोड़कर उस दिव्य धुन में खो जातीं। यह मुरली की धुन केवल संगीत नहीं थी, यह आत्मा की पुकार थी, जो हर जीव को परमात्मा से जुड़ने के लिए विवश करती थी। इस धुन में एक ऐसा सम्मोहन था, जिससे हर कोई अपने आप को कृष्ण के प्रति समर्पित कर देता था। आज भी हजारों कृष्ण भजन मुरली की इसी मादकता का गुणगान करते हैं।

राधा और कृष्ण का प्रेम संबंध तो प्रेम की सर्वोच्च पराकाष्ठा है। यह कोई साधारण मानवीय प्रेम नहीं, बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का अलौकिक प्रतीक है। राधा कृष्ण के बिना अधूरी हैं और कृष्ण राधा के बिना। उनकी हर लीला, हर मिलन विरह से भरा और प्रेम से ओत-प्रोत है। यह प्रेम हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है, त्याग से भरा होता है, और केवल समर्पण की मांग करता है। राधा कृष्ण की प्रेम कहानी हमें बताती है कि कैसे एक भक्त अपने आराध्य में इतना लीन हो सकता है कि उसकी पहचान ही मिट जाए।

वृंदावन से मथुरा और फिर द्वारका तक की यात्रा में कृष्ण ने अनेक भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने धर्म की स्थापना के लिए कंस का वध किया, मगध नरेश जरासंध को परास्त किया, और द्वारका नगरी बसाई। वे कुशल राजनीतिज्ञ, महान योद्धा और प्रजापालक राजा बने।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी भूमिका उन्होंने महाभारत के युद्ध में निभाई, जब वे अर्जुन के सारथी बने। कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में जब अर्जुन मोहग्रस्त हो गए, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का अमर ज्ञान दिया। यह ज्ञान केवल अर्जुन के लिए नहीं था, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए कर्म, धर्म, कर्तव्य और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाला था। एक मित्र, एक मार्गदर्शक, एक गुरु के रूप में कृष्ण ने हमें सिखाया कि जीवन के हर संघर्ष में कैसे स्थिर बुद्धि से धर्म का पालन किया जाए। उनका यह उपदेश हमें बताता है कि मोहन सिर्फ प्रेम के प्रतीक ही नहीं, बल्कि परम ज्ञान और वैराग्य के भी सागर हैं।

मोहन से दिल क्यों लगाया? क्योंकि वह एक संपूर्ण व्यक्तित्व हैं। वे माखन चोर भी हैं, गोवर्धन धारी भी हैं, बंसीवाला भी हैं, राधा के श्याम भी हैं, अर्जुन के सारथी भी हैं, और परम ब्रह्म भी। उनकी हर अदा, हर लीला, हर उपदेश में हमें अपनी आत्मा का प्रतिबिंब दिखता है। उनका प्रेम सिर्फ एकतरफा नहीं, वह अपने भक्तों के प्रेम का सौ गुना बढ़कर प्रतिदान करते हैं।

श्री कृष्ण के प्रति प्रेम लगाना केवल एक भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान का एक निश्चित मार्ग है। यह भक्ति योग का सार है, जहाँ भक्त अपने आराध्य में स्वयं को विलीन कर देता है। कृष्ण प्रेम के रहस्य में छिपा है परम शांति और आनंद का अनुभव। जब हम मोहन से दिल लगाते हैं, तो हम स्वयं को संसार के क्षणभंगुर मोह-माया से मुक्त कर लेते हैं। उनकी भक्ति हमें अहंकार से मुक्ति दिलाती है, करुणा और निस्वार्थता का पाठ पढ़ाती है। कृष्ण के नाम का जप, कृष्ण भजन का श्रवण, उनकी लीलाओं का स्मरण, ये सभी हमें आंतरिक शुद्धता और आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हमें इसी शाश्वत प्रेम की याद दिलाता है, हमें उनके जन्म और उनके जीवन के दिव्य उद्देश्यों से परिचित कराता है। यह प्रेम हमें सिखाता है कि हर जीव में कृष्ण को देखें और हर कर्म को उन्हीं के चरणों में समर्पित करें। यह प्रेम ही तो है जो जीवन को सार्थक बनाता है और आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है।

मोहन से अपने दिल के तार जोड़ने का सबसे सुंदर तरीका है उनकी भक्ति में लीन हो जाना, विशेषकर कृष्ण जन्माष्टमी जैसे पावन पर्व पर। जन्माष्टमी व्रत रखना, मंदिरों को सजाना, पालने में कान्हा को झुलाना, और मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव का भव्य अभिषेक व आरती करना, ये सभी परंपराएं हमारे प्रेम को व्यक्त करने के माध्यम हैं। भक्तजन इस दिन उपवास रखते हैं, कृष्ण कथा सुनते हैं और रात भर जागरण कर भगवान के जन्मोत्सव की प्रतीक्षा करते हैं। घरों में और मंदिरों में सुंदर झांकियां सजाई जाती हैं, जो कृष्ण लीलाओं का सजीव चित्रण करती हैं। मथुरा वृंदावन जैसे पावन धामों में तो इस दिन का उत्सव देखते ही बनता है, जहाँ हर गली, हर मंदिर कृष्ण भक्ति के रंगों से सराबोर हो जाता है। कृष्ण भजन गाए जाते हैं, रास लीलाएं होती हैं और “नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। ये सभी रीति-रिवाज हमें केवल बाहरी तौर पर नहीं जोड़ते, बल्कि हमारे हृदय में मोहन के प्रति प्रेम और श्रद्धा को और गहरा करते हैं। इन परंपराओं के माध्यम से हम अपने प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं और ईश्वर के करीब आने का प्रयास करते हैं।

तो, ‘मोहन से दिल क्यों लगाया’? इसका उत्तर सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि हर उस भक्त के हृदय में छिपा है जिसने उनके प्रेम का अनुभव किया है। कृष्ण केवल एक देवता नहीं, वे एक ऐसे मित्र हैं, एक ऐसे प्रेमी हैं, एक ऐसे गुरु हैं, और एक ऐसे रक्षक हैं जो जीवन के हर मोड़ पर हमारे साथ खड़े होते हैं। उनकी मोहक छवि, उनकी लीलाएं, उनका उपदेश, और उनका निस्वार्थ प्रेम – ये सब मिलकर हमें उनकी ओर खींचते हैं। यह प्रेम ही हमें जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देता है, हमें आनंद की अनुभूति कराता है, और अंततः हमें मोक्ष की ओर ले जाता है। आइए, हम भी अपने जीवन के हर क्षण को मोहन के प्रेम से भर दें, उनके नाम का स्मरण करें, कृष्ण भजन गाएं और उनके दिखाए भक्ति मार्ग पर चलकर अपने जीवन को धन्य करें। राधे-राधे!

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