महाशिवरात्रि: भगवान शिव की असीम कृपा और महिमा का महापर्व

महाशिवरात्रि: भगवान शिव की असीम कृपा और महिमा का महापर्व

महाशिवरात्रि: भगवान शिव की असीम कृपा और महिमा का महापर्व

भारतवर्ष में अनेक पर्व और त्यौहार मनाए जाते हैं, जिनमें से महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह रात्रि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और इसे ‘शिव-शक्ति’ के मिलन का पर्व माना जाता है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यह महापर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन शिव भक्त उपवास रखते हैं, विधि-विधान से शिव पूजा करते हैं और भगवान शिव से सुख-समृद्धि तथा मोक्ष की कामना करते हैं। आइए इस पावन पर्व के महत्व, इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं और सही पूजा विधि के बारे में विस्तार से जानते हैं।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

महाशिवरात्रि सिर्फ एक व्रत या त्यौहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागृति और आत्म-शुद्धि का प्रतीक है। इस दिन को कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है:

  • शिव-पार्वती विवाह: मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए यह रात्रि शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है, जो सृष्टि के संतुलन और जीवन की निरंतरता को दर्शाता है।
  • शिव का तांडव: कुछ पुराणों के अनुसार, इसी रात्रि को भगवान शिव ने सृष्टि के संरक्षण और विनाश का दिव्य तांडव नृत्य किया था।
  • अज्ञान पर प्रकाश की विजय: शिवरात्रि की रात्रि में गहन अंधकार होता है, जो अज्ञानता और नकारात्मकता का प्रतीक है। शिव पूजा और जागरण के माध्यम से भक्त अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान और आध्यात्मिकता के प्रकाश की ओर बढ़ते हैं।
  • मोक्ष का मार्ग: सच्चे मन से की गई शिव पूजा भक्तों को जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करती है।

महाशिवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथाएं

महाशिवरात्रि के पीछे कई रोचक और प्रेरणादायक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं:

1. समुद्र मंथन और नीलकंठ की कथा

सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब देवता और दानव मिलकर क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे, तब उसमें से हलाहल नामक एक अत्यंत भयंकर विष निकला। इस विष की गर्मी और दुर्गंध इतनी तीव्र थी कि तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। कोई भी देवता या दानव इस विष को ग्रहण करने को तैयार नहीं था। तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने स्वयं उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। उन्होंने विष को निगलने की बजाय अपने कंठ में रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। जिस रात्रि को भगवान शिव ने यह विषपान किया था, वह महाशिवरात्रि की रात्रि थी। इसी कारण शिव भक्त इस दिन जागरण कर शिव की आराधना करते हैं, ताकि वे सृष्टि के कल्याण के लिए किए गए उनके इस महान त्याग को याद कर सकें।

2. शिकारी और बेलपत्र की कथा

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार एक शिकारी जंगल में शिकार के लिए गया। वह एक बेल वृक्ष पर चढ़कर बैठा था और नीचे एक शिवलिंग था। रात भर वह शिकार का इंतजार करता रहा, लेकिन कोई शिकार नहीं मिला। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह नींद से बचने के लिए बेल के पत्ते तोड़-तोड़ कर नीचे फेंकता रहा। संयोगवश वे पत्ते नीचे स्थित शिवलिंग पर गिरते रहे और उसके मुख से अनजाने में ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण होता रहा। इस अनजाने व्रत और पूजा से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और शिकारी को मोक्ष प्रदान किया। यह कथा दर्शाती है कि भगवान शिव अनजाने में की गई भक्ति से भी प्रसन्न हो जाते हैं।

महाशिवरात्रि व्रत और पूजा विधि

महाशिवरात्रि के दिन भक्तगण पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ व्रत रखते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं। इसकी विधि इस प्रकार है:

  1. सुबह का स्नान: महाशिवरात्रि के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. संकल्प: पूजा प्रारंभ करने से पहले हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
  3. शिवलिंग की स्थापना: यदि घर में शिवलिंग नहीं है, तो मिट्टी का एक छोटा शिवलिंग बनाकर स्थापित कर सकते हैं।
  4. अभिषेक: शिवलिंग का जल, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शकर और गन्ने के रस से अभिषेक करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते रहें।
  5. पुष्प और पत्र: अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के पत्ते, आक के फूल, कनेर के फूल और अन्य सुगंधित पुष्प अर्पित करें।
  6. चंदन और भस्म: चंदन का लेप लगाएं और भस्म अर्पित करें।
  7. भोग: ऋतु फल, मिठाई और विशेष रूप से ठंडाई का भोग लगाएं।
  8. धूप-दीप: धूप और दीपक प्रज्ज्वलित करें।
  9. मंत्र जाप: शिव मंत्रों, विशेष रूप से महामृत्युंजय मंत्र और ‘ॐ नमः शिवाय’ का अधिक से अधिक जाप करें।
  10. शिव चालीसा और आरती: शिव चालीसा का पाठ करें और अंत में भगवान शिव की आरती उतारें।
  11. चार प्रहर की पूजा: महाशिवरात्रि की पूजा रात्रि के चार प्रहरों में की जाती है। प्रत्येक प्रहर की पूजा का अपना विशेष महत्व होता है। यदि संभव हो तो चारों प्रहर की पूजा अवश्य करें।
  12. व्रत का पारण: अगले दिन (अमावस्या) सूर्योदय के बाद स्नान आदि करके व्रत का पारण करें।

निष्कर्ष

महाशिवरात्रि का महापर्व हमें भगवान शिव के त्याग, कल्याणकारी स्वरूप और असीम शक्ति की याद दिलाता है। यह दिन भक्तों को अपने भीतर के अंधकार को दूर कर आध्यात्मिक प्रकाश की ओर अग्रसर होने का अवसर प्रदान करता है। सच्चे मन और श्रद्धा से की गई शिव आराधना निश्चित रूप से सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती है और जीवन में शांति, समृद्धि तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। भगवान शिव की कृपा हम सब पर बनी रहे!

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