भगवान गणेश: विघ्नहर्ता की अद्भुत कथा और उनकी महिमा

भगवान गणेश: विघ्नहर्ता की अद्भुत कथा और उनकी महिमा

## भगवान गणेश: विघ्नहर्ता की अद्भुत कथा और उनकी महिमा

भारत भूमि त्योहारों और आध्यात्मिक कथाओं का देश है, जहाँ हर उत्सव एक गहरा अर्थ और प्रेरणा लिए आता है। इन्हीं में से एक अत्यंत पावन और joyous पर्व है गणेश चतुर्थी। यह महापर्व भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें ‘विघ्नहर्ता’ और ‘मंगलकर्ता’ के नाम से जाना जाता है। गणेश जी की पूजा किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले की जाती है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि उनकी कृपा के बिना कोई भी कार्य सफल नहीं होता। आइए, इस पावन अवसर पर जानते हैं भगवान गणेश के प्राकट्य की अद्भुत कथा और उनके पूजन का महत्व।

### विघ्नहर्ता गणेश की जन्म कथा

भगवान गणेश के जन्म की कथा बड़ी ही रोचक और प्रेरक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवी पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए किसी को द्वार पर खड़ा करना चाहा, ताकि कोई भी उनकी अनुमति के बिना भीतर प्रवेश न कर सके। उन्होंने अपने शरीर के उबटन और मैल से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण फूँक दिए। इस प्रकार, एक तेजस्वी और पराक्रमी बालक का जन्म हुआ।

देवी पार्वती ने बालक को आदेश दिया कि वह द्वार पर पहरा दे और किसी को भी भीतर न आने दे। बालक ने अपनी माता की आज्ञा का पूर्ण निष्ठा से पालन किया। कुछ समय बाद भगवान शिव वहाँ पहुँचे और भीतर प्रवेश करना चाहा। बालक ने उन्हें रोक दिया। भगवान शिव ने बालक को समझाने का प्रयास किया, लेकिन बालक अपनी बात पर अड़ा रहा। शिव जी के साथ उनका विवाद इतना बढ़ गया कि क्रोध में आकर शिव जी ने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक धड़ से अलग कर दिया।

जब देवी पार्वती स्नान करके बाहर आईं और अपने पुत्र को मृत देखा, तो वे अत्यंत दुखी हुईं और क्रोधित हो उठीं। उन्होंने सृष्टि के विनाश का संकल्प ले लिया। सभी देवी-देवता भयभीत हो गए और उन्होंने देवी पार्वती को शांत करने का प्रयास किया। भगवान शिव को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने बालक को पुनर्जीवित करने का वचन दिया।

भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाकर जो भी पहला प्राणी मिले, जिसका सिर उत्तर दिशा की ओर हो, उसका सिर लेकर आएं। गणों को एक हाथी का बच्चा मिला, जिसका सिर उत्तर दिशा में था। वे उस गजमुख को लेकर आए और भगवान शिव ने उसे बालक के धड़ से जोड़ दिया। इस प्रकार, गजमुखधारी गणेश का पुनर्जन्म हुआ।

सभी देवी-देवताओं ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया और उन्हें ‘प्रथम पूज्य’ होने का वरदान दिया, यानी किसी भी पूजा या शुभ कार्य से पहले उन्हीं की पूजा की जाएगी।

### भगवान गणेश का महत्व: बुद्धि, समृद्धि और सिद्धि के दाता

भगवान गणेश को कई नामों से जाना जाता है – गणपति, विनायक, एकदंत, गजानन, लंबोदर और सबसे महत्वपूर्ण ‘विघ्नहर्ता’। वे न केवल बाधाओं को दूर करते हैं, बल्कि बुद्धि, समृद्धि और सफलता भी प्रदान करते हैं। उनके गजमुख का प्रतीकात्मक अर्थ गहरा है – यह विशाल बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। उनके बड़े कान सुनने की क्षमता और छोटी आँखें गहन दृष्टि का प्रतीक हैं।

यही कारण है कि कोई भी नया कार्य, चाहे वह व्यापार का उद्घाटन हो, घर में प्रवेश हो, विवाह हो या कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, भगवान गणेश की पूजा के बिना अधूरा माना जाता है। उनकी पूजा से कार्य में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।

### गणेश पूजा विधि (संक्षिप्त)

गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा बड़े भक्तिभाव से की जाती है। इसमें मुख्य रूप से:

* **स्थापना:** गणेश जी की प्रतिमा या मूर्ति की स्थापना की जाती है।
* **अर्घ्य और स्नान:** जल से स्नान कराया जाता है और चंदन का लेप लगाया जाता है।
* **पुष्प और दूर्वा:** उन्हें लाल गुड़हल के फूल और दूर्वा घास (जो उन्हें अत्यंत प्रिय है) अर्पित की जाती है।
* **भोग:** मोदक, लड्डू और फल चढ़ाए जाते हैं। मोदक गणेश जी को विशेष रूप से प्रिय हैं।
* **आरती और मंत्र:** धूप-दीप जलाकर गणेश आरती की जाती है और ‘ॐ गं गणपतये नमः’ जैसे मंत्रों का जाप किया जाता है।

### निष्कर्ष

भगवान गणेश की कथा हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी चुनौतियाँ आएं, यदि हम दृढ़ संकल्प और विश्वास के साथ आगे बढ़ें, तो विघ्नहर्ता स्वयं हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। गणेश चतुर्थी का यह पावन पर्व हमें नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता और सद्बुद्धि के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है। आइए, हम सब मिलकर गणपति बप्पा का आवाहन करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुख-समृद्धि और सफलता से भर दें। गणेश जी महाराज की जय हो!

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